लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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religious educationनिर्मल रानी
हालांकि हमारे देश के कई प्रखर विचारक तथा बुद्धिजीवी अक्सर यह सचेत करते रहे हैं कि धर्म और राजनीति का रिश्ता किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। लिहाजा इनका आपस में रिश्ता जोड़ने के बजाए इनका आपसी तलाक किया जाना चाहिए। परंतु बड़े दुःख की बात है कि विभिन्न राजनैतिक दलों के लोग अपने निजी राजनैतिक हितों को साधने के लिए बार-बार धर्म और राजनीति का ‘ब्याह’ कराने की कोशिशों में लगे रहते हैं। परिणामस्वरूप इस समय देश का सामाजिक ताना-बाना किस दौर से गुजर रहा है यह आज सबके सामने है। टेलीविजन का कोई भी चैनल लगाकर देखिए आपको सहिष्णुता, असहिष्णुता धर्म आधारित जनसंख्या, धर्मग्रंथ, धर्मस्थान, सांप्रदायिकता, धर्मपरिवर्तन, बीफ, गौवंश, कभी लव जेहाद तो कभी घर वापसी, कहीं मंदिर-मस्जिद निर्माण जैसे विषयों पर गर्मागर्म बहस होती सुनाई देगी। इन बहसों को देखकर ऐसा लगता है कि गोया देश के सामने इस समय उपरोक्त समस्याएं ही सबसे बड़ी समस्याएं बनकर रह गई हैं। देश को विकास, मंहगाई नियंत्रण, साामाजिक उत्थान, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थय, औद्योगिकरण, पर्यावरण, प्रदूषण नियंत्रण, सड़क-बिजली-पानी जैसी जरूरी चीजों की न तो जरूरत है न ही राजनेता, राजनैतिक दल व मीडिया इन बातों पर बहस करने-कराने की कोई जरूरत महसूस कर रहे हैं। हमारे देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी देशों में विद्यालय इसलिए खोले जाते हैं ताकि बच्चों को सामान्य ज्ञान, विज्ञान, व्यवसायिक ज्ञान तथा उनके अपने जीवन, चरित्र तथा राष्ट्र के विकास में काम आने वाले ज्ञान संबंधी शिक्षाएं दी जा सकें। जहां तक धार्मिक शिक्षा दिए जाने का प्रश्न है तो इसके लिए लगभग सभी धर्मों में अलग धार्मिक शिक्षण संस्थाएं मौजूद हैं जो अपने-अपने निजी धर्म प्रचारों हेतु अपने ही धर्म के बच्चों को अपने-अपने धर्मग्रंथों व अपने धर्म के महापुरुषों व उनके जीवन परिचय व आचरण संबंधी शिक्षा देती हैं। परंतु सामान्यतया सरकारी स्कूलों में या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में इस प्रकार की धार्मिक अथवा धर्मग्रंथ संबंधी शिक्षा आमतौर पर नहीं दी जाती। इसके बावजूद गत् कई वर्षों से हमारे देश में खासतौर पर यह देखा जा रहा है कि कुछ राजनैतिक दल धर्म और राजनीति का घालमेल करने कीगरज से तथा समुदाय विशेष को अपनी ओर लुभाने के मकसद से यानी मात्र अपने राजनैतिक हितों को साधने के उद्देश्य से सरकारी वगैर सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रमों में विशेष धर्मग्रंथ को शामिल कराए जाने की वकालत करते देखे जा रहे हैं। कई राज्यों में तो इस प्रकार की शिक्षा शुरु भी कर दी गई है। और कई राज्य ऐसे भी हैं जहां किसी एक धर्म के धर्मग्रंथ को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने का दूसरे धर्मों के लोग विरोध भी कर रहे हैं। उनके द्वारा यह मांग की जा रही है कि या तो अमुक धर्मग्रंथ की शिक्षाओं को पाठ्यक्रम से हटाया जाए या फिर दूसरे धर्मों के धर्मग्रंथों की शिक्षाओं को भी पाट्यक्रमों में शामिल किया जाए। जाहिर है राजनैतिक लोग भी यही चाहते हैं कि इस प्रकार के विरोधाभासी स्वर उठें और ऐसी आवाजें बुलंद होने के परिणामस्वरूप समाज धर्म के नाम पर विभाजित हो और देश के लोग रोटी-कपड़ा, मकान, विकास, बेरोजगारी, मंहगाई, शिक्षा तथा स्वास्थय और सड़क-बिजली-पानी जैसी बुनियादी जरूरतों से विमुख होकर केवल धर्म के नाम पर बंट जाएं और उसी आधार पर मतदान करें। मध्यप्रदेश भी देश के ऐसे ही कुछ राज्यों में एक है जहां हिंदू धर्म के प्रमुख धर्मग्रंथ के रूप में स्वीकार्य भगवद् गीता स्कूली पाठ्यक्रमों में शामिल की जा चुकी है। स्कूलों में गीता के पाठ पढ़ाए जाने के बाद अन्य धर्मों के लोगों ने भी इस मांग को लेकर लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन किए कि यदि गीता की शिक्षाएं स्कूली पाठ्यक्रमों के माध्यम से बच्चों को दी जा रही है तो उनके अपने धर्मग्रंथों अर्थात् कुरान, बाईबल और गुरु ग्रंथ साहब जैसे अन्य धर्मों का सार भी उन्हीें पुस्तकों में शामिल किए जाए। राज्य से आ रहे समाचारों के अनुसार इस विषय पर विभिन्न समुदायों द्वारा किए गए हंगामे के बाद अब स्कूलों मेंकुरान, बाईबल व गुरु ग्रंथ जैसे दूसरे धर्मों की प्रमुख शिक्षाओं को भी राज्य के प्राईमरी तथा अपर प्राइमरी कोर्स में शामिल किए जाने का प्रस्ताव है। इस आशय का एक प्रस्ताव पाठ्यक्रम स्थायी समिति को भेजा जा चुका है। और यदि समिति ने इस प्रस्ताव को अपनी संस्तुति प्रदान कर दी तो राज्य के विद्यालयों के बच्चे 2016-17 के सत्र में गीता के श£ोक, कुरान व बाईबल की आयतें तथा गुरु ग्रंथ साहब की वाणी का पाठ करते सुनाई देंगे। राज्य सरकार द्वारा पाठ्यक्रम में विभिन्न धर्मों के प्रमुख धार्मिक ग्रंथों की शिक्षाओं को तथा इनके सार को सम्मिलित किए जाने के पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि स्कूल के बच्चे इनका अध्ययन कर बचपन में ही नैतिक शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे तथा अपने धर्म के साथ दूसरे धर्मों की शिक्षाओं की जानकारी भी हासिल कर सकेंगे। इसके पक्ष में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इसकदम से बच्चों में अपने धर्म के साथ ही दूसरे धर्म के प्रति स मान की भावना पैदा होगी व बच्चों में सर्वधर्मसंभाव का माहौल पैदा होगा। इसमें कोई शक नहीं कि देश में प्रत्येक धर्म के बच्चों को प्रत्येक धर्म के धार्मिक ग्रंथों तथा उनके अपने महापुरुषों की जीवनी तथा उनके द्वारा किए गए सद्कार्यों व उनके द्वारा दिए गए सद्वचनों की जानकारी जरूर होनी चाहिए। सरकार का यह तर्क बिल्कुल सही है कि ऐसी शिक्षा से बच्चों में एक-दूसरे धर्म के प्रति स मान व आदर की भावना पैदा होगी तथा सर्वधर्म संभाव का माहौल विकसित होगा। परंतु यहां एक विवाद परंतु सत्य यह भी है कि विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों में कई ऐसी बातें भी उल्लिखित हैं जो धर्मग्र्रंथ लिखे जाने अथवा उसका संकलन किए जाने के समय भले ही तर्कसंगत अथवा न्यायसंगत रही हों परंतु आज के दौर में ऐसी कई विवादित बातें धर्मग्रंथों की ऐसी शिक्षाओं पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रही हैं। दूसरी बात यह है कि धर्मग्रंथों की शिक्षा देने के लिए पहले से ही विभिन्न धर्मों के लोग अपने-अपने मदरसे, गुरुकुल तथा चर्च आदि संचालित कर रहे हैं जिनमें वे अपने-अपने धर्म के बच्चों को अपने धर्मग्रंथ व अपने धर्मगुरुओं से संबंधित शिक्षाएं देते आ रहे हैं। फिर आखिर स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में किसी भी धर्म के किसी भी धर्मग्रंथ की शिक्षा या उसके सार को शामिल करने की जरूरत ही क्या है? हां यदि सभी धर्मों के बच्चों में सभी धर्मों व उनकी शिक्षाओं के प्रति आदर व सम्मान पैदा करने जैसी सच्ची मंशा है भी तो ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि प्रत्येक धर्म के बच्चे किसी भी दूसरे धर्म की धार्मिक शिक्षण संस्थाओं में दाखिला ले सकें और वे स्वेच्छा से किसी भी धर्मग्रंथ अथवा महापुरुष के विषय में ज्ञान अर्जित कर सकें। जैसाकि पश्चिम बंगाल में देखा जा सकता है। वहां मदरसों में हिंदू बच्चे भी जाते हैं और उनमें कई हिंदू शिक्षक भी देखे जा सकते हैं। परंतु सामान्य स्कूली पाठ्यक्रम में इस प्रकार की शिक्षाएं देने से बच्चों के समय की बरबादी भी होगी तथा सांसारिक, उनके भविष्य संबंधी एवं व्यसायिक शिक्षा के ग्रहण करने में भी बाधा उत्पन्न होगी। दूसरी बात यह है कि जिस प्रकार मुख्यमंत्री शिवराज चैहान के शासन में सभी धर्मों के धर्मग्रंथों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव राज्य की 16 सदस्यीय पाठ्यक्रम समिति को भेजा गया है (हालांकि यह नीति अभी लागू नहीं की गई है)। चैहान ने भी इस विषय पर विचार करने की तब कोशिश की है जबकि राज्य में अन्य धर्मों के अनुयाईयों द्वारा बड़े पैमाने पर अन्य धर्मों के धर्मग्रंथों के सार को शामिल करने हेतु अपना विरोध दर्ज कराया गया। चैहान ने भी सबसे पहले केवल भगवद् गीता को ही स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किया था। अब यह जरूरी नहीं कि भविष्य में देश के दूसरे राज्य भी सभी धर्मों के धर्मग्रंथों को विद्यालयों में पढ़ाए जाने की अनुमति प्रदान करें और ऐसाभी संभव है कि धर्मविशेष के लोगों कोखुश करने के लिए विभिन्न राज्यों की निर्वाचित सरकारों द्वारा ऐसा किया भी जाए। परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीतिज्ञों द्वारा इस विषय पर जो भी फैसला लिया जाएगा उसके पीछे बच्चों के उज्जवल भविष्य की चिंता तो कम होगी अपने वोट बैंक साधने की फिक्र ज्यादा। वैसे भी हमारे देश में इस समय धर्मगुरुओं, प्रवचनकर्ताओं, मौलवियों, पादरियों तथा ज्ञानियों की एक बाढ़ सी आई हुई है। और यह बताने की भी जरूरत नहीं कि ऐसे ‘महान लोग’ व धर्माधिकारी हमें अपने ‘आचरण’ से क्या शिक्षा दे रहे हैं और उनमें से कईयों को स्वयं किस दौर से गुजरना पड़ रहा है? लिहाजा यदि बच्चों में सर्वधर्म संभाव की भावना जागृत करने का प्रयास विद्यालय स्तर पर करना भी है तो ज्यादा से ज्यादा यह किया जा सकता है कि विभिन्न धर्मों के प्रमुख आराध्य महापुरुषों के त्याग, तपस्या, उनके सद्कर्मों तथा सद्वचनों व असत्य व अधर्म के विरुद्ध उनके द्वारा बुलंद की गई आवाजों से संबंधित संक्षिप्त शिक्षाएं व उनके द्वारा मानवता, प्रकृति, पर्यावरण प्रेम संबंधी शिक्षाओं को बच्चों को दिया जाए। अन्यथा स्कूल में तो बच्चों को केवल विज्ञान, सामान्य ज्ञान, समाजशास्त्र, भूगोल, गणित तथा उनके भविष्य व राष्ट्र के विकास संबंधित शिक्षाओं को ही दिए जाने की सबसे बड़ी जरूरत है ताकि वे आगे चलकर न केवल स्वयं आत्मनिर्भर बन सकें बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी अपना समुचित योगदान दे सकें

 

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1 Comment on "औचित्य विद्यालयों में धर्मग्रंथों की शिक्षा का?"

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Himwant
Guest

विनम्रता, बड़ो तथा स्त्रियों को सम्मान, मानवता, प्रकृति, पर्यावरण प्रेम संबंधी शिक्षाओं को बच्चों को दिया जाए यह आवश्यक है। लेकिन इन शिक्षा को किसी एक धार्मिक पुस्तक के मार्फत देने पर कलह हो सकता है। इसलिए एक अलग से पाठ्यक्रम विकसित करना चाहिए जो नव नागरिको में इन सदगुणों को पौध लगा दे। क्योंकी नागरिक राष्ट्र की ईंट है। ईंट खराब होगी तो मकान कैसे अच्छा होगा।

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