लेखक परिचय

हिमकर श्‍याम

हिमकर श्‍याम

वाणिज्य एवं पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।

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हिमकर श्याम

लोकतंत्र में जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार चुनी जाती है। अपने खून-पसीने की कमाई से आम जनता राज्य का खजाना भरती है और चाभी चुनी हुई सरकार को सौंप देती है। इस विश्वास के साथ कि खजाना का इस्तेमाल राज्यहित और जनहित में सर्वांगीण विकास के लिए किया जायेगा। पर सरकार द्वारा इन पैसों का उपयोग जन कल्याण के बजाए जनप्रतिनिधियों के फायदे के लिए किया जाता रहा हैं। इसे विडंबना ही कहेंगे कि खजाने का मालिक आज बदहाल है और इसका रखवाला मालामाल। सांसद और विधायक बनने के बाद जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में आश्चर्यजनक वृद्धि दिखायी देती है। पांच वर्ष विधायक या सांसद रहने पर कुनबा धनवान हो जाता है। जीने की शैली में गुणात्मक परिवर्तन आ जाता है। यह देख कर कौतूहल होता है कि रातों रात जनप्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों को इतनी समृद्धि कहां से आ जाती है। जब खजाने का रखवाला ही उसे लुटने लगे तो जनता की दुर्दशा होगी ही।

दरअसल वर्तमान राजनीति में ईमानदारी एक सिरे से गायब है। हमारे नेताओं का मूल्यों और मुद्दों से कोई वास्ता नहीं है। आम आदमी की बात] विकास की बात] रोजी-रोटी और सड़क की बात कोई नहीं करता। इन नेताओं के लिए राजनीति जनकल्याण का माध्यम न होकर अर्थ साधना एवं भोग का माध्यम है। पद और गोपनीयता की शपथ लेने के बाद जनप्रतिनिधियों के तेवर बदल जाते हैं। जनता की समस्याओं को भूला कर उनकी सारी चिंता अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने तक ही सीमित रह जाती है। राजनीतिक सिद्धांतकार रूसो की चिंता भारतीय लोकतंत्र पर सटीक बैठती है। रूसो के अनुसार प्रतिनिधिक प्रणाली में आम लोग कई वर्षों में एक बार अर्थात् चुनाव के समय ही स्वतंत्र होते है] उसके बाद वे पुनः अपने शासकों के मातहत वाली स्थिति में आ जाते हैं जो दासता से बेहतर नहीं होती। रामलीला मैदान से अन्ना बार-बार जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने कई बार कहा कि हमने जनप्रतिनिधियों को चुनकर भेजा है सेवा के लिए लेकिन वे सेवा के बदले मेवा खाने में लिप्त हैं इसी कारण देश की यह दशा है। अन्ना की बातों ने लोगों की चेतना को जगाने का काम किया है लेकिन इन बातों का नेताओं पर कोई असर होता नहीं दिख रहा है।

अन्ना के अनशन और आंदोलन की गहमागहमी के बीच झारखंड में मंत्रियों और विधायकों के वेतन भत्तों में चार गुना वृद्धि को मंजूरी दी गयी है। कैबिनेट ने मंत्रियों-विधायकों के वेतन के नये प्रारूप को मंजूरी देते हुए कहा है कि इससे सरकार पर हर साल करीब १८.५ करोड़ रूपये का वित्तीय बोझ पडे़गा] पर परोक्ष रूप से यह बोझ आम आदमी को ही उठाना होगा। ऐसे समय जब खाने पीने की वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं] लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में परेशान हैं] यह अतिरिक्त बोझ कितना उचित है? इस पर बहस की जरूरत है। यहां बता दें कि झारखंड राज्य के बने अभी ११ साल हुए हैं लेकिन विधायकों का वेतन आठवीं बार बढ़ाया जा रहा है जबकि इन सालों में झारखंड की बदहाली किसी से नहीं छिपी हुई है। जनप्रतिनिधि इस बात पर तनिक विचार नहीं करते कि आम जनता की स्थिति क्या है? यहां प्रति व्यक्ति आय अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है। राज्य की आधी से अधिक आबादी गरीब है। वित्तीय कुप्रबंधन के कारण राज्य की वित्तीय स्थिति खराब हो जा रही है। वेतन, पेंशन और सूद की अदायगी पर खर्च काफी बढ़ गया है दूसरी ओर सरकार संसाधन जुटाने में लगातार पिछड़ती जा रही है। घोषणाओं के बावजूद राज्य में नयी नियुक्तियां नहीं हो रही हैं। पुराने अधिकारी धीरे-धीरे रिटायर हो रहे हैं। नक्सल प्रभावित इस राज्य में पिछले १० वर्षों में एक भी दारोगा की बहाली नहीं हुई है। उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग और जेलों में भारी संख्या में पद खाली हैं। कर्मचारी चयन पर्षद का गठन नहीं हो पाया है। जेपीएससी की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। अगर कहीं नियुक्तियां हुईं भी हैं तो संविदा के आधार पर हुई हैं। संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों और अधिकारियों को उनकी योग्यता की तुलना में काफी कम वेतन मिलता है। सरकार द्वारा तकनीकी और गैर तकनीकी पदों पर संविदा पर बहाली कर शोषण का जरिया ही खड़ा किया जा रहा है।

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को समाज की इच्छा या राज्य की इच्छा के अनुसार चलना होता है और उसी के मुताबिक अपनी इच्छाओं की हद बनानी होती है। जनप्रतिनिधि के सादगी, सदाचार और कर्त्तव्यपरायणता की बात अब पुरानी हो चुकी है। जनप्रतिनिधि समाजवादी दृष्टिकोण को छोड़ते जा रहे हैं। वह अपने जीवन स्तर को लगातार ऊंचा उठाने की जुगत में रहते हैं उनकी यहीं इच्छा उन्हें बेईमान बनाती है। महात्मा गांधी जनप्रतिनिधियों को वेतन देने के खिलाफ थे। वह नहीं चाहते थे कि जनप्रतिनिधि किसी प्रकार का वेतन लेकर काम करें। १९५४ में सांसदो का वेतन भत्ता कानून बना। उसके बाद से करीब २५ बार से अधिक सांसदों के वेतन भत्ते और अन्य सुविधाओं में बढ़ोतरी हो चुकी है। प्रत्येक जनप्रतिनिधि चाहे वह विधानसभा का सदस्य हो या लोकसभा का, देश की आम जनता की औसत आमदनी से कई गुना अधिक वेतन उठा रहा है। सांसदों और विधायकों को जो वेतन, भत्ते एवं अन्य सुविधाएं दी जाती हैं वह अन्य सरकारी सेवाओं के मुकाबले कई गुना अधिक हैं। कम वेतन की दुहाई देकर समय-समय पर इसमें वृद्धि के फैसले लिए जाते हैं। वर्तमान में सांसदो को ५० हजार रूपये प्रतिमाह मूल वेतन और लगभग उतने ही कार्यालय और चुनाव क्षेत्र के भत्ते के रूप में मिलते हैं। इतना ही नहीं मॉनसून सत्र के ठीक पहले सांसद निधि बढ़ाकर पांच करोड़ कर दी गयी है। सरकारी खजाने पर इससे हर साल ३९५० करोड़ रूपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

वेतन वृद्धि के मामले में कोई भी राज्य पीछे नहीं है। हाल के दिनों में दिल्ली, मध्यप्रदेश, बिहार के विधायकों के वेतन एवं अन्य सुविधाओं में वृद्धि की गयी है। भारत की ३६ प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रही है। देश की आम जनता की आमदनी अब भी औसतन १५० रूपये रोजाना भी नहीं है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश के गांवों में प्रति व्यक्ति मासिक आय ४८७ रूपये है जबकि शहरी क्षेत्र में ९८२ रूपये। बिहार के गांवों में प्रतिव्यक्ति मासिक आय ४६५ रूपये और शहरों में ६८४ रूपये और झारखंड के गांवों में प्रतिव्यक्ति मासिक आय ४८९ रूपये तथा शहरों में १०८२ रूपये है। योजना आयोग के मुताबिक गांव में १२ रूपये और शहर में १७ रूपये से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं समझा जाता। जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्ते आदि को तय करने के लिए आयोग के गठन और कानून में संशोधन की बात समय-समय पर उठती रही है। यह कतई न्यायोचित और तर्कसंगत नहीं कि जनप्रतिनिधि अपने वेतन में वृद्धि का फैसला खुद लें।

केंद्र और राज्यों के सभी मंत्रियों के लिए १९६४ में बनायी गयी आचार संहिता के अनुसार प्रत्येक वर्ष केन्द्रीय मंत्रियों को प्रधानमंत्री और राज्यों के मंत्रियों को अपने-अपने राज्य के मुख्यमंत्रियों को अपनी संपत्ति का ब्योरा देना है। मंत्री अपनी संपत्ति की घोषणा अपने तरीके से करते हैं, फिर भी वे औसत आम भारतीयों से काफी समृद्ध हैं। हिंदी भाषी क्षेत्र के औसत मंत्री की संपत्ति ७.९७ करोड़ रूपये है। बिहार के सांसदों के पास औसत ११० लाख की संपत्ति है जबकि राज्य के विधायकों की औसतन संपत्ति बीस लाख रूपये है। ये तो महज उदाहरण हैं, ऐसे नेताओं की फेहरिस्त काफी लंबी है। जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में हो रही अप्रत्याशित वृद्धि व्यवस्था की खामियां उजागर करती हैं।

विधायकों और सांसदों को सहज एवं सस्ता कर्ज मिलता है। विधायकों को यह कर्ज वाहन एवं घर के लिए दिया जाता है। कोई विधायक एक टर्म में अधिकतम दो बार कर्ज ले सकता है। दूसरी बार कर्ज लेने के लिए पहले के कर्ज और सूद चुकाने जरूरी हैं। नियमानुसार कर्ज की वसूली विधायकों के कार्यकाल में ही होनी चाहिए। अलग-अलग राज्य में अग्रिम की रकम अलग-अलग तय की गयी है। कई राज्यों में कर्ज और उसके सूद की वापसी समय पर नहीं होती है। हाल ही में झारखंड के एजी ने अपनी रिपोर्ट में विधायक और पूर्व विधायक के ऊपर १.३३ करोड़ रूपये के बकाया रहने पर आपत्ति की है। कर्ज नहीं चुकानेवालों में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा समेत कई बड़े नाम शामिल हैं। इसके पूर्व हरियाणा में भी ऐसा मामला सामने आया था। हरियाणा में तीन दर्जन से अधिक विधायक सरकार से लिए गये कर्ज को वापस नहीं किया था जिनमें पांच विधायकों का निधन हो चुका था, जबकि आठ विधायक डिफाल्टर घोषित किये गये थे। अपने प्रभाव के कारण ये विधायक कर्ज चुकाने की चिंता से बेफ्रिक रहते हैं वहीं दूसरी ओर कर्ज की बोझ में किसानों को आत्महत्या करनी पड़ती है।

जहां पैसे का बोलबाला हो और पैसा बनाने की होड़ हो, वहां जनकल्याण और आमलोगों के मुद्दों की बात पीछे रह जाये तो इसमें आश्चर्य नहीं होनी चाहिए। विकास में सबसे बड़ी बाधा भ्रष्टाचार है। विधायक और सांसद निधि से होनेवाले विकास कार्यों में कमीशनबाजी और भ्रष्टाचार की बात लंबे अरसे से चल रही है। योजनाओं के मद की धनराशि का बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्ट राजनेता और अधिकारी खुद हड़प लेते हैं। जिला पंचायत सदस्यों से लेकर ग्राम प्रधानों तक भ्रष्टाचार के घेरे में हैं। सरकार की ओर से बननेवाली सड़कों, नालियों और अन्य विकास कार्यों के लिए आयी धनराशि में भी लूट होती है। सड़न पूरी व्यवस्था में है।

लोकतंत्र में जनता को रोजगार, आवास, भोजन, उचित जीवन की अन्य आवश्यकताएं प्राप्त करने के लिए मूलभूत अधिकार प्राप्त है। जहां ये सारी चीजे उपलब्ध नहीं होती वहां स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती है। सामान्य जनता की जरूरतों को पूरा करने में लोकतंत्रीय शासन के अन्य प्रकार के शासन की तुलना में अधिक कारगर होने की संभावना होती है। जनप्रतिनिधि यदि अपने दायित्वों के प्रति जवाबदेह होंगे तभी लोकतंत्र सही अर्थों में सामने आएगा।

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