लेखक परिचय

मन ओज सोमक्रिया

मन ओज सोमक्रिया

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under चुनाव.


For Better Future of Your Child, do vote from now onwards?

यदि महँगाई, आतंकवाद, अन्याय और शोषण सहने के लिए भारत की भोली-भाली जनता (Inncocent Indian Natives) को ही तैयार रहना है तो फिर आदरणीय प्रधानमंत्री जी! जनता द्वारा वोट दे कर आपको व आपकी सरकार को किसलिए चुना गया है? यदि आप ही अपनी गलतियों का ठीकरा जनता के सिर पर फोड़ देंगे तो फिर क्यों चुनावों के समय भारतीय जनता ने आप पर भरोसा जताया था? क्या आपका और आपके मंत्रियों का यही काम है कि किसी भी मुश्किल घड़ी पर, जो अधिकत्तर सरकारी पैदाईश ही होती है, एक पहुँचे हुए सिद्ध ज्योतिषी की तरह भविष्यवाणियाँ करके आप लोग जनता को सतर्क करते रहें – अब भारतीयों को आतंकी हमलों (Terrorist Attacks) के लिए तैयार रहना होगा! अब महँगाई (Price Rise) के लिए! अब ट्रैफिक जाम (Traffic Jam) के लिए तो हमेशा लुटने, घुटने और मन-मसोज कर रह जाने के लिए! लेकिन हम भारतीयों को तो बस तैयार रहना है! हर बात के लिए!

इन सब समस्याओं के लिए यदि जनता को सरकारी फरमान द्वारा बताया जाता है कि अब जनता को ही सब कुछ झेलना और बर्दाश्त करना है तो फिर जनता को भी क्या जरूरत है, प्रधानमंत्री की? क्या जरूरत है, राष्ट्रपति की? और क्या जरूरत है सरकार की? क्योंकि दर्द तो अब हर हाल में ही मिलना है।

आज भारतीय विश्व में जिस जगह खड़े हैं वहाँ तक हम कैसे पहुँचे? क्या सरकारी प्रयासों से? जी नहीं! आज तक हुई भारतीय तरक्की में सबसे बड़ा हाथ निजी क्षेत्र का ही रहा है। सरकारें तो पिछले 15 साल से हर दिन बदलती ही जा रही हैं। और अगर आज भारतीय जनता महँगाई, गरीबी और बेरोजगारी की मार झेल रही है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है? ये बात जरा दिल से सोचिए, जवाब जरूर मिलेगा।

वैसे भी भारतीय सदैव ही झेलने और सहने को तैयार रहते हैं और उसी का फायदा उठा रही है आज के यूपीए सत्ताधारियों की ये मित्र-मंडली, जिन्होंने लालच में उधोगों व पूँजीपतियों को तो खूब फायदा पहुँचाया लेकिन जनता के दुखड़ों पर कभी ग़ौर नहीं किया। वो इसलिए, क्योंकि गरीब जनता के पास उनकी जेबें भरने के लिए काला या सफेद धन नहीं है। गरीब जनता के पास अगर कुछ है तो वो है – वोट। उसकी भी जरूरत इन्हें 5 साल के बाद पड़ती है और फिर गरीबों और अशिक्षितों को बहकाने में कौन सी ज्यादा मेहनत या समय ही लगता है? बस चुनाव से पहले उनके घर दस्तक देने पहुँच जाओ ब्लैक-कैट कमांडो और सुरक्षा दस्ते के साथ! गरीब तो फौज देख कर ही इम्प्रैस हो जाएगा। रही-सही कसर पॉलिटिकल स्टंटबाजी, पब्लिसिटी और ऐडवरटाइजिंग से पूरी हो जाएगी, जिसमें कि काँग्रेसी नेताओं को ख़ास महारत हासिल है।

इससे तो क्या बेहतर यही होता कि भारत अंग्रेजों के अधीन ही रहता! कम से कम कोई हम भारतीयों से ऐसा तो न कहता कि अब हमें परिवार को तरसते हुए देखने के लिए तैयार रहना है। क्योंकि उनके समय में तो हम वैसे भी तैयार ही रहते थे। लेकिन अब समय आ चुका है कि हम भारतवासियों को तैयार होना ही होगा। या तो हम इन दिखाऊ, बेहकाऊ और बेईमान नेताओं के झाँसे में यूँ ही आते रहें या फिर अपने लिए बेहतर सरकार चुनें ताकि एक बेहतर सुव्यवस्थित और समृद्ध समाज बन सके। वैसे भी आज की सरकार के शासन में जिस प्रकार का जीवन प्रजा जी रही है, ईस्ट इंडिया के शासन में उससे बेहतर ही जी रही थी। ऐसा बुज़ुर्गों ने फरमाया है।

स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज भारतीय जनता का खून पीते थे तो हम उन्हें पराया समझ कर बर्दाश्त भी करते थे तो कभी विरोध भी करते थे। उस विरोध के लिए जब हम लाठियाँ खाते तो हमें खुशी होती थी कि हमने अपनों के लिए परायों से लोहा मोल लिया और अपना खून बहाया। लेकिन, ये क्या? आज तो खुले-आम हमारे ही चुने हुए जन-प्रतिनिधि, जो अब सत्ताधारी होकर सत्ता और ऐश्वर्य का सुख भोग रहे हैं, कभी खुले-आम, तो कभी गुप-चुप तरीके से अपनी ही भारतीय जनता का खून पी रहे हैं। और अगर कोई इन मंत्रियों या इनके संरक्षकों के विरुद्ध खड़ा होता है तो अंग्रेज शासन की ही तरह आज भी इन आंदोलनकारियों का या तो दमन होता है या फिर इनके सिर पर लाठियाँ बरसाई जाती हैं। कभी दिल्ली पुलिस, यूपी पुलिस. हरियाणा पुलिस, पंजाब पुलिस या फिर कभी केन्द्रिय रिजर्व पुलिस। भारतीयों के किस्मत में आजादी से पहले अंग्रेज पुलिस की दनदनाती लाठियाँ लिखी थीं तो आजादी मिलने के बाद अब अपनी ही पुलिस के तेल पीते हट्टे-कट्टे मोटे-मोटे डंडे। तो क्या आज भारत वाकई आजाद है? आलम ये है कि आज जनता बर्दाश्त तो कर रही है, लेकिन विरोध नहीं। क्योंकि आज भारतीयों का खून कोई पराया नहीं बल्कि अपने ही लोग पी रहे हैं।

अभी हाल ही में पैट्रोल और गैस के दाम बढ़ने के बाद प्रधानमंत्री जी के बयान के अनुसार, “आर्थिक सुधारों के कारण अभी महँगाई और बढ़ेगी इसलिए जनता को और अधिक महँगाई के लिए तैयार रहना होगा।“ अरे सर क्या आप डिटेल में बता पाएँगे कि ऐसे कौन से आर्थिक सुधार आप की सरकार ने पिछले 7 साल से भारत में कर दिए जिससे कि जनता का कोई बहुत बड़ा फायदा हुआ हो। हाँ, पिछले 7 साल से लगातार जनता महँगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, ट्रेफिक जाम, रोड़-टैक्स, हाऊस-टैक्स, टोल-टैक्स, वैट-टैक्स बगैरह-बगैरह के बोझ के नीचे दबती जा रही है। और आप हैं कि अपने मसखरे मंत्रियों की मंडली सहित जनता को और अधिक बर्दाश्त करने की सलाह दिए जा रहे हैं। अरे सर अगर आप से देश का सुख और कल्याण नहीं संभलता है तो आप भी थोड़ा सा बर्दाश्त कीजिए ना और दे डालिए शुद्ध, देसी, मस्त – इस्तीफा। इन पिछले 7 सालों में आपने ऐसा कौन सा तीर मार दिया जिससे गरीबी, महँगाई, भुखमरी और लाचारी खत्म हुई हो या कम भी हुई हो। प्रधानमंत्री जी! हवा में छोड़े गए तीर हमेशा निशाने पर नहीं लगते। आपके इस बहकावे को क्या भारतीय जनता नहीं समझेगी। शायद आप यही समझते हैं। क्योंकि पिछले चुनावों में भी भारतीयों ने सिद्ध कर दिया कि वे कितने बड़े मूढ़ हैं जो उन्होंने वही लुटेरों की मंडली के हाथों में सरकारी खजाने की चाबी फिर से दे दी।

भारतीय जनता को यही नहीं मालूम कि जिनके हाथों में सत्ता है वही आज आम भारतवासियों का खून चूस रहे हैं। भारतीय जनता को शायद कोई श्राप मिला है जो पिछले 1000 सालों से वो बस जुल्मो-सितम ही बर्दाश्त कर रही है। पहले 700 साल हमने मुगलों के जुल्म बर्दाश्त किए। फिर 200 साल से ज्यादा अंग्रेजों की गुलामी सहन की और अब पिछले 60 साल से हम अपनी कहे जाने वाली भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की हेरा-फेरी, बेईमानी और विश्वासघात झेल रहे हैं। लेकिन फिर भी हम हिन्दुस्तानी इस सत्य से अंजान हैं कि जब पिछले 60 सालों में गरीबी वैसी की वैसी बनी है, समस्याएँ जस की तस नहीं बल्कि बढ़ चुकी हैं, भविष्य का कोई ठौर-ठिकाना नहीं, कोई कारगर योजना नहीं, पर्यावरण, जल, पेड़-पौधों, नदी-नालों और तो और समुन्दर तक की तो वाट ही लगाई जा चुकी है। तो फिर पिछले लोकसभा चुनावों में किस उम्मीद से भारतीयों ने यूपीए (UPA) के रूप में काँग्रेस को दोबारा सत्ता की चाबी सौंप दी।

… आखिर क्यों?

… क्योंकि, हम भारतीय मतदाता इतने भोले हैं कि जो लोग पिछले 60 साल से हमसे हमारी रोजी-रोटी, सुख-चैन, आराम और विश्वास छीन रहे हैं हम सिद्धड़ उन्हीं अभिनेता रूपी नेताओं की दिखाऊ, शोभायुक्त वाणी के भ्रम में पड़ कर उन्हीं भेड़ियों को फिर से अपना खून चुसवाने के लिए अपनी बागडोर सौंपे दे रहे हैं।

… हम ऐसा क्यों करते हैं?

… क्योंकि, हमें लगता है कि या तो इनसे अधिक सुयोग्य कोई और नहीं, जो कि एक सत्य ही है। किन्तु अधूरा। आखिर क्यों नहीं कोई इनसे बेहतर शासन कर सकता? आज के प्रजातंत्र भारत में देश की बागडोर तो हर उस भारतीय के पास है जो कि वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुनता है। ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि दरअसल वोट देकर सर्वसम्मति से विश्वास करके अपने जीने का अधिकार अपने चुने हुए प्रतिनिधि को सौंपने वाला ही सही मायनों में देश का शासक अथवा राजा है। गणतंत्र शब्द का असली मूल आधार भी यही है कि सरकार चुनने वाला प्रत्येक नागरिक वास्तविक शासक है, इसीलिए संविधान और कानून की नजर में प्रत्येक भारतीय नागरिक एक समान है।

यदि भारतीय जनता अपना कर्तव्य और भलाई समझे और यदि अपने बच्चों और पोतों का भविष्य सुधारना चाहे तो हर किसी नागरिक को चुनावों में वोट अवश्य डालना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश, भारत में मतदाता प्रतिशत केवल 50 से 55 फीसदी ही होता है। कहाँ चले जाते हैं बाकी के 45% नागरिक? क्यों नहीं जाते वे भी वोट देने? यदि हर एक भारतीय एक-जुट होकर हर तरह के चुनाव मे अपना मतदान करे तो हमारा देश सही शासन और व्यवस्था पाकर बड़ी तेजी से सही प्रकार की तरक्की के रास्ते पर आगे बढेगा। इन अनसरवादी नेताओं से जनता को रोज-रोज की किलकिलबाजी से हमेशा के लिए राहत मिल जाएगी। नहीं तो हमारी आने वाली पीढ़ियाँ आज की पीढ़ी यानि हमें कभी माफ नहीं करेगी।

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