लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

Posted On by &filed under विविधा.


विपिन जोशी

1बिहार के एक सरकारी स्कूल में दोपहर का भोजन खाने के बाद जो हादसा हुआ वह देश में मिड डे मील के इतिहास का सबसे काला दिन बन गया है। इस खाने के बाद दर्जन भर से अधिक बच्चों की मौत हुई है। इस घटना ने न केवल बिहार और केंद्र सरकार बल्कि देष के सभी राज्यों की सरकारों और नगर निगमों को भी हिला कर रख दिया है। मिड डे मील परोसने के बाद ऐसा दर्दनाक हादसा भले ही पहली दफे हुआ हो, लेकिन इससे संबंधित घटनाएं देश भर से आती रहती हैं। जिसे लगातार नज़रअंदाज किया जाता था। इससे पूर्व 22 जनवरी 2011 को महाराष्‍ट्र के एक नगर निगम स्कूल में जहरीला भोजन खाने से में 61 बच्चे गंभीर रूप से बीमार हुए थे। 25 नवंबर 2009 को दिल्ली के त्रिलोकपुरी में इसी कारण 120 छात्राएं बीमार हो गई थीं। वहीं 12 सितम्बर 2008 को झारखण्ड के नरेंगा में मिड डे मील खाने से 60 छात्रों की हालत खराब हुई थी। अन्य प्रान्तों में भी मिड डे मील की स्थिति संतोषजनक नहीं है। जिस दिन सारण में यह घटना हुई उसी दिन बिहार के दूसरे स्कूलों से भी मिड डे मील खाने से बच्चों के बीमार पड़ने की खबरें आईं थीं। पूर्ववर्ती मामलों में सरकार जांच का आदेश देकर मामलें को रफादफा करती रही है। यदि इन मामलों को गंभीरता से लिया जाता तो शायद आज उन दर्जन भर बच्चों की किलकारी वक्त से पहले खामोश नहीं होती। दूसरी ओर मीडिया का रवैया भी इसपर सकारात्मक नहीं रहा है। सारण की घटना से पहले मीडिया ने भी मिड डे मील से बीमार पड़ने वाले बच्चों के इश्‍यू को सुर्खी बनाने में अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

मिड डे मील योजना देश ही नहीं बल्कि विश्‍व की सबसे बड़ी स्कूलों में खाना परोसने वाली योजना है। इस समय देष के 12.6 लाख सरकारी स्कूलों में यह योजना चल रही है और इससे करीब 12 करोड़ बच्चों को दोपहर का भोजन प्रदान किया जा रहा है। कई बार इससे जुड़ी शिकायतें मिलती रही हैं। पिछले महीने मानव संसाधन मंत्रालय को मिली पैसा रिपोर्ट के अनुसार इस योजना में सबकुछ दुरूस्त नहीं था। रिपोर्ट में बिहार और उत्तर प्रदेश में ही इस योजना के क्रियान्वयन पर कई गंभीर सवाल खड़े किये गए थे। जिसमें निगरानी में कमी, शिकायतों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था न होने और योजना के लिए दिए जाने वाले खाद्यान्न में हेराफेरी की बातों का प्रमुखता से जि़क्र किया गया था। इसके बावजूद दिल्ली का भी इस मुद्दे पर खामोश रहना उसे कठघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त है। आज भले ही इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करने की सलाह दी जा रही है। लेकिन यदि रिपोर्ट आते ही बिना किसी राजनीति के बिहार सरकार को फटकार लगाते और लगाम कसते तो शायद इतना बड़ा हादसा कभी नहीं होता। सरकारी स्कूलों में स्टॉफ का कम होना और जो हैं उन पर अध्यापन के साथ-साथ दाल-चावल का हिसाब रखना एक प्रकार की झंझट ही है। हालांकि स्कूलों में प्रतिदिन के अनुसार मीनू तय है कि कौन से दिन क्या बनेगा? लेकिन कागजी प्रक्रिया और जमीनी हकीकत में बड़ा अन्तर होता है। मिड डे मील के लिए राषन की खरीद-फरोख्त करने वाले कर्मचारी अपने घर की रसोई के लिए भी इसी गुणवत्ता का राशन खरीदतें हैं क्या? सरकारी स्कूलों में मिड डे मील का प्रति दिन प्रति बच्चा क्या बजट है? इस बात की समीक्षा भी जरूरी है। पका हुआ खाना किस तरह का है? तय मीनू के अनुसार है या उसमें अपनी सुविधा के अनुसार फेर बदल किया गया है? इस बात की भी समीक्षा समय-समय पर होनी चाहिए। ऐसा होता भी होगा पर सरकारी नियमों और अफसरशाही के चलते तमाम बातें आयी गई हो जाती हैं। ऐसी लीपा पोती की जाती है कि सब अच्छा लगता है। दाल की कटोरी में एक-एक दाने को ढूढंते बच्चे मिड डे मील की पोल खोलने को काफी है। किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं एक नजर बच्चों की थाली में डाल लिजिये, सब समझ में आ जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज बिहार में इतने बच्चों की दर्दनाक मौत नहीं होती।

यह ठीक है कि ऐसे वक्त में राजनीति नहीं करनी चाहिए। लेकिन कम से कम जवाबदेही तो तय करना ही पड़ेगा। यह जानना जरूरी है कि आखिर इसके लिए कौन दोशी है? वह बच्चे जिन्होंने भोजन लिया। वो लोग जिन्होने इसे बनाया या वो लोग जो अच्छी गुणवत्ता वाली सामाग्री खरीदने की बजाये अपनों को फायदा पहुंचाते रहे? सरकारी स्कूलों में खेल का मैदान, पीने का स्वच्छ पानी, और गुणवत्तापरक भोजन होना ही चाहिए। इसके साथ बेहतर बैठक व्यवस्था और अध्ययन की व्यवस्था होनी ही चाहिए। यह तो मूलभतल अधिकार है यदि इतना भी नहीं हो रहा है तो सरकारी शिक्षा व्यवस्था और मिड डे मील जैसी योजनाओं पर पुनर्विचार की आवश्‍यकता है। सरकार जितना खर्च शिक्षा व्यवस्था के सुधारीकरण में कर रही है उसका सफल परिणाम धरातल पर कहीं नहीं दिखता। हर रोज इस तरह की घटनाएं घटती हैं और असर कहीं नहीं होता। अच्छा होता कि मिड डे मील को बंद कर अनाज वितरण योजना को लागू दिया जाता। कम से कम घर में बना खाना विष्वसनीय तो होगा। लेकिन हमारे योजनाकार और नीतिनियंताओं को अपनी उदर पूर्ती के विकल्प भी देखने होते हैं। राजनैतिक स्वार्थ भी किसी साये की तरह चलता रहता है। इसलिए ठोस योजनाएं सिर्फ फाइलों तक सिमीत रह जाती हैं और जमीनी स्तर पर सिर्फ खानापूर्ती होती है।

कोई मॉनिटरिंग नहीं, कोई आकस्मिक छापा नहीं। घटिया मिड डे मील पाया गया तो दोशी के लिए सजा का कोई प्रावधान नहीं? अब सरकार को भी चिंता सताने लगी है कि दोपहर भोजन और तमाम सुविधाओं के बावजूद भी सरकारी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति न्यूनतम क्यों हो रही है? जो अभिभावक आर्थिक रूप से सक्षम हैं उनकी पहली प्राथमिकता कोई प्राइवेट स्कूल होता है। खुद सरकारी स्कूलों में मोटी सैलरी लेने वाले शिक्षक भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं। आखिर सरकारी अव्यवस्था के बारे में इनसे अधिक कौन परिचित होगा। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले यह बच्चे गरीब जरूर हैं लेकिन इनमें भी देष का भविश्य संवारने की भरपूर क्षमता है। प्लीज़! इस क्षमता को घटिया खाना में मिलाकर बर्बाद मत किजिये। (चरखा फीचर्स)

 

Leave a Reply

1 Comment on "मिड डे मील का सिस्टम सुधारना होगा"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
आर. सिंह
Guest
मिड डे मिल का यह हादसा इतना भयावह है क़ि इसने लोगों को हिलाकर रख दिया है .इसकी तीव्रता किसी बड़े साजिस क़ी और भी इशारा करती है.इस ख़ास हादसे का चाहे जो भी कारण हो,पर यह सही है क़ि हमारी सरकारी स्कूलों का जो हाल है और जिस तरह का भ्रष्टाचार वहां व्याप्त है,उसमे कुछ भी संभव है.,पर किसी का तो ध्यान उस तरफ नहीं है.भेड बकरियों से भी बदतर हालत हो गयी है,इंसानों की. आज विरोध में बीजेपी का स्वर सबसे मुखर है,पर क्या यह हालात पिछाले एक महीने क़ि देन है? क्या एक महीने पहले सबकुछ ठीक… Read more »
wpDiscuz