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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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हृदयनारायण दीक्षित

अस्तित्व सुरम्य है। रूपों रहस्यों से भरा-पूरा। यहां रूप के साथ रस, गंध, ध्वनि छन्द का वातायन है। जन्म मृत्यु की आंख मिचौनी है। ऐसा विराट अस्तित्व क्या अकारण है? प्रत्येक कार्य के पहले कारण होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण में कार्य कारण की महत्ता है। ‘श्वेताश्वतर उपनिषद्’ की शुरूवात सृष्टि के बारे में इसी तरह के मजेदार प्रश्नों से होती है, ब्रह्म चर्चा वाले जिज्ञासुओं ने आपस में विमर्श करते हुए पूछा कि इस सृष्टि का मुख्य कारण ब्रह्म कौन है? हम सब किससे उत्पन्न हुए है? – ‘किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता’। किस कारण से जी रहे हैं? किसमें स्थित हैं? – ‘क्व च सम्प्रतिष्ठाः’। किसके अधीन सुख और दुख में बरत रहे हैं – ‘वर्तामेह’। (‘श्वेताश्वतर उपनिषद्’ मन्त्र 1) फिर स्वयं ही अनुमान लगाते हैं, काल, स्वभाव, नियति, संयोग, पांच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और जीवात्मा ये कारण विचार में नहीं आते हैं। इनमें आत्मभाव नहीं है। इसलिए अलग-अलग या मिलकर भी कारण नहीं हो सकते। आत्मा सुख-दुख का अनुभव नहीं करती, इसलिए वह भी कारण नहीं हो सकती। (वही मन्त्र 2) उपनिषद् के ऋषि प्रचलित सभी धारणाओं को खारिज करते हैं। आगे कहते हैं, उन्होंने ध्यान योग लगाया। अपने गुणों से ढकी हुई दिव्य-आत्म शक्ति का अनुभव किया और उस एक अकेले को ही काल से आत्मा तक सम्पूर्ण कारणों का – ‘कारणानि निखिलानि अधिष्ठाता देखा’। (वही 3) अर्थात् कारणों का भी कारण वह एक है लेकिन प्रगाढ़ ध्यान योग की गहन अनुभूति में उसकी प्रतीति होती है।

गीता के कृष्ण अर्जुन के सखा हैं। वे महाभारत काल के महानायक है लेकिन सबसे बड़ी बात है कि वे योगेश्वर है। सो परमसत्ता के प्रवक्ता हैं। वे अर्जुन को योग के सामान्य सूत्र बताते हैं। योगसिध्दि के उपाय बताते हैं फिर आत्मदर्शन का ध्यान योग बताते हैं। ध्यान योग प्रकृति में चल रहे कार्य कारण के पार का आनंदलोक है। कृष्ण आगे कहते हैं, अब सुनो कि योग युक्त होकर मुझमें ध्यान लगाकर – ‘मयासक्तमनाः पार्थ योगं युंजन्म दाश्रयः’ तू मुझे ठीक तरह से कैसे जानेगा? मैं तुझे यह ज्ञान-विज्ञान सहित बताऊंगा। इसे जान लेने के बाद कुछ भी जानने के लिए शेष नहीं रहेगा। (गीता अध्याय-7.1-2) ज्ञान की प्यास अनंत है लेकिन गीताकार ने यहां परमतत्व के ज्ञान को अंतिम बताया है। ठीक भी है, परम ज्ञान पा लिया तो शेष क्या बचा? लेकिन परम ज्ञान की प्राप्ति का प्रयास बिरले ही करते हैं। उनमें भी बहुत कम लोग सफल होते हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यही बात कही, हजारों लोगों में कोई एक ऐसी सिध्दि का प्रयास करता है। ऐसी सिध्दि पा चुके लोगों में से कोई बिरला ही मुझे जान पाता है। (वही, 3) यहां उलटवासी हैं कि सिध्दि पा चुके लोग भी परमात्म तत्व को नहीं जान पाते। तब ‘सिध्दि’ का अभिप्राय क्या है? चर्चा योग की है। योग सिध्दि कठिन अवश्य है पर अभ्यास और वैराग्य से उपलब्ध हो जाती है लेकिन परम अनुभूति चेतना का इससे ऊंचा तल है। बेशक योग सिध्द इसका पात्र है लेकिन सभी योगसिध्दों को ऐसी अनुभूति नहीं मिलती।

भारतीय चिन्तन-दर्शन में दृश्यमान यह प्रकृति सम्पूर्णता का ही व्यक्त भाग है। व्यक्त भाग इन्द्रियों की पकड़ में आता है, लेकिन अव्यक्त गाढ़ी अनुभूति का विषय है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया, प्रकृति पृथ्वी जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुध्दि और अहंकार इन आठ रूपों में विभाजित है। (गीता-7.4) इसमें प्रथम 5 महाभूत कहलाते हैं। वे प्रत्यक्ष है, इन्द्रियगोचर है। मन, बुध्दि और अहंकार प्रकृति के सभी रूपों से संबंधित होते हैं। कृष्ण कहते हैं यह मेरी निम्न प्रकृति है। चेतना उच्चतर प्रकृति है, यह प्राण – जीव रूप है। इसी के द्वारा यह संसार धारण किया जाता है – ‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’। (वही श्लोक 5) चेतना ही जगत् का आधार है इसलिए कृष्ण कहते हैं कि सब प्राणियों का जन्म इसी से हुआ है। कहते हैं मैं इस संसार उत्‍पत्तिकर्ता मूल हूं और मैं ही प्रलय भी हूं। – ‘अहं कृत्सस्य जगतः प्रभावः प्रलयस्तया’। (वही श्लोक 6)

ऊर्जा दृश्मान नहीं होती। उसका कार्यरूप ही दिखाई पड़ता है। परम चेतना ही सत्य है, सारी प्रकृति उसी की रूपांतर सत्ता है। रूप परिवर्तनीय है। इसलिए उन्हें माया जैसे नाम दिए गये। ‘ऋग्वेद’ में अनेक देवता हैं लेकिन परम सत्य एक है, विद्वान उसे तमाम नामों से पुकारते हैं। ‘मुण्डकोपनिषद्’ (1.1.6) के गुनगुनाने लायक मंत्र में कहते हैं जो जानने में नहीं आता है, बुध्दि की ग्राह्यता में नहीं आता, गोत्र रहित, रंग आकार रहित, आंख कान आदि इन्द्रियों से हीन, हाथ, पैर रहित उस नित्य, सर्वव्यापी, अतिसूक्ष्म अविनाशी को ही ज्ञानी जन समस्त प्राणियों का कारण देखते हैं। परमतत्व एक है, वही रूप आकार विकसित करता है। ‘ऋग्वेद’ में इन्द्र विराट शक्ति हैं, वही रूप रूपं प्रतिरूप प्रत्यक्ष होते हैं। ‘कठोपनिषद’ में अग्नि रूपं, रूपं प्रतिरूप है और वायु भी। अग्नि और वायु प्रत्यक्ष हैं, इन्द्र अनुभूतिपरक है। लेकिन नाम में क्या धरा है। परम सत्ता, परम सत्य या सम्पूर्णता का नाम कुछ भी हो सकता है। उसका एक नाम ‘सत्य’ अतिप्राचीन है। उपनिषदों में उसका नाम प्रायः ‘ब्रह्म’ आया है। ‘ऋग्वेद’ की ‘अदिति’ या पुरूष और उपनिषदों के ब्रह्म एक जैसे हैं। ऋग्वेद से लेकर सम्पूर्ण परवर्ती पुराण दर्शन में विष्णु और शिव भी ऐसी ही सत्ता हैं। गीता के कृष्ण रूप आकार वाले है लेकिन अक्सर इसी परमसत्ता के प्रवक्ता होकर अर्जुन का प्रबोधन करते है संसार में कोई भी तत्व मुझसे परे नहीं है, संसार की प्रत्येक वस्तु मुझमें वैसे ही पिरोई हुई है जैसे मणियों की माला। (गीता- 7.7)

ज्ञान प्रबोधन की अपनी कठिनाई है। परमतत्व का भी वर्णन प्रकृति में मौजूद रूपों के उदाहरण से ही दिया जाता है। उपनिषद् के ऋषियों ने बहुधा ऐसे सभी रूपों और महिमा का खण्डन करके भी विराट की महत्ता समझाने का प्रयास किया है। कृष्ण कहते हैं, मैं जलों में रस हूं, सूर्य और चन्द्र का प्रकाश हूं, शब्दों में वैदिक परम्परा का ओ3म् हूं, आकाश में शब्द हूं, पुरूषों में पौरूष हूं। पृथ्वी में सुगंध हूं, अग्नि की दीप्ति हूं, प्राणवानों में मैं जीवन हूं और तपस्वियों में तप हूं। सब विद्यमान वस्तुओं का बीज हूं, मैं बुध्दि हूं, तेज हूं। मैं काम-राग रहित बल हूं। धर्मानुकूल लालसा हूं। मैं सात्विक, राजस और तामस भावना हूं। इनका जन्म मुझसे हुआ है, मैं उनमें नहीं हूं वे मुझमें हैं। (श्लोक 8 से 12) यहां भौतिक जगत् के सारभूत में परमचेतना ही मुख्य कारण है। यहां अपनी समझ के अनुरूप नाम रूप बढ़ाए जा सकते हैं जैसे हे अर्जुन मैं सभी विद्युत उपकरणों को चलाने वाली विद्युत हूं। मैं सभी तरह की सरकारों के संचालन में लोक कल्याण हूं। वगैरह। असली बात तत्वदर्शन की है।

‘यजुर्वेद’ का 16वां अध्याय रूद्र शिव को अर्पित है। ऋषि ने प्रकृति के प्रत्येक रूप, भाव और गुण में रूद्र, शिव को देखा है। गीता का यह भाग ‘यजुर्वेद’ और उपनिषद् साहित्य की परम्परा है। यजुर्वेद में कहते हैं, अल्पकायी को नमन्, वृध्द को नमन् अतिवृध्द को नमन, तरूण रूपं को नमन, अग्रेसर-अगुवा को नमन्। शीघ्रगतिमान को नमन्, शीघ्रकर्मी का नमन। प्रवाहमान को नमन। प्रवाहमान जलों और स्थिर जलों को नमन। आदि-आदि। (‘यजुर्वेद’ -16.30-31) ऋषि इन सभी रूपों में शिव देखते हैं। सारे नमस्कार शिव के लिए है, रूप हमारी पहचान के लिए। कहते है रथकार के रूप में रूद्र को नमस्कार। मिट्टी के कलाकार कुम्हार, लोहे के लोहार को नमन, झीलों और वनगामी लोगों को नमन। कुत्ते के गली में रस्सी बांधकर जीविका चलाने वाले, शिकार का भी लोगों को नमन। वे सब रूद्र, रूप है। (वही मन्त्र 27) लेकिन बाद की जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था में ये सब निम्न हो गये। लेकिन यजुषः के ऋषि इन्हें नमस्कार-प्रणाम करते हैं। ‘वेदों’ से लेकर ‘गीता’, ‘रामचरित मानस’ तक सृष्टि के सभी रूपों में एक ही परमसत्ता को देखने और नमस्कार करने की भारतीय परम्परा भी नमस्कारों के योग्य है – ‘सीयराममय सब जग जानी/करऊं प्रणाम जोरि रजुग पानी’।

* लेखक उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य हैं।

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1 Comment on "भारतीय चिंतन में ब्रह्म निरूपण"

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himwant
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हम ब्रहम को सत्य तथा जगत को मिथ्या मानते रहे. कदाचित इसी कारण से हम भौतिक प्रगति मे पीछे रह गए. हमे संतुलित दृष्टिकोण रखना होगा. अगर हम स्थुल भौतिक सत्य से आरम्भ करके शुक्ष्मतर सचाईयो को खोजते चलेगे तो हम अंततः परम ब्रहम तक जा पहुंचेगे. उसी प्रकार हम अगर परम ब्रहम से आरम्भ कर स्थुलतर सच्चाईयो को खोजते आगे चलेगे तो हम भौतिक ईकाई तक पहुंच जाएंगे. लेकिन हमारी यात्रा रुक गई है. पुरातन ज्ञान का महिमामंडन करने से मात्र कुछ हासिल नही होगा. हमे नागार्जुन की तरह ब्रहम से भौतिक ईकाई तक की यात्रा प्रमाणिक ढंग से… Read more »
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