लेखक परिचय

उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। संपर्क: द्वारा जयप्रकाश, दूसरा तल, एफ-23 ए, निकट शिवमंदिर कटवारिया सराय, नई दिल्ली – 110016

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उमेश चतुर्वेदी

बचपन में मानस में कुछ कोलॉज चस्पा हो जाते हैं..वे कोलॉज ताउम्र आपका पीछा नहीं छोड़ते..कोलकाता को लेकर बचपन से ही मेरे मन में खास तरह का रोमांस है..कहते हैं ना सपनों का शहर..तो कोलकाता मेरे लिए सपनों का ही शहर है..सपने हकीकत की पथरीली जमीन पर अक्सर झनाक से टूट जाते हैं। बरसों बाद कोलकाता की यात्रा ने इस बार कुछ ऐसा ही अनुभव दिया..।

भारतीय राजनीति को झकझोर देने वाले डॉक्टर राममनोहर लोहिया की शख्सियत अपने को खासा आकर्षित करती रही है.. लोहिया से जुड़े लोग, लोहिया के विचार, लोहिया की किताबें, लोहिया के लेख अपने को खूब लुभाते हैं..लोहिया ने पुराने कलकत्ता और अब के कोलकाता के मशहूरविद्यासागर कॉलेज में पढ़ाई की थी। 1927 से 1929 तक लोहिया इसी कॉलेज के बीए ऑनर्स के छात्र रहे। लोहिया को लेकर अपने अंतरतम का रोमांस विद्यासागर कॉलेज खींच ले गया।

जनवरी के पहले हफ्ते की वह सांझ थी…हल्की ठंड की जुंबिश के बीच कोलकाता अलसाने के मूड में नजर आ रहा था..उम्मीद थी कि विद्यासागर कॉलेज जब जाएंगे तो वहां चहकते युवा चेहरों के दर्शन होंगे..उम्मीद तो यह भी थी कि पिछली सदी के सत्तर के दशक में देश की राजनीति में नया अध्याय जोड़ने वाले कोलकाता के छात्रों की परंपरा अब भी जारी होगी..कुछ नहीं होगा तो कुछ न कुछ छात्र बौद्धिक जुगाली करते हुए ही मिल जाएंगे।

इन उम्मीदों के साथ लोहिया जैसी शख्सियत का बिंब भी कहीं मन में तारी था..इन सबका कोलॉज विद्यासागर कॉलेज को लेकर कुछ खास ही बन गया था..इसी भाव को लेकर कॉलेज स्ट्रीट की मुख्य सड़क के बाद उत्सुकता के आकाश को अपने मन में समाए उस गली में घुस गए, जिसमें विद्यासागर का वह पुराना मुख्य द्वार है, जो करीब उन्नीसवीं सदी से ही मौजूद है..गेट पर कुल जमा दो छात्र और एक छात्रा बैठे मिले।

सभी बीए और बीएससी ऑनर्स के विद्यार्थी…कॉलेज गेट के ठीक सामने करीब डेढ़ सौ साल पुरानी बिल्डिंग अपने पुराने दिनों को याद करा रही थी..बिलकुल खाली उस बिल्डिंग के बारे में पता चला कि कभी इसमें छात्र रहा करते थे.. बहरहाल यह भवन अभी खाली है..गेट पर बैठे छात्रों से पूछ बैठा…क्या आप डॉक्टर राममनोहर लोहिया को जानते हैं? तीनों छात्रों के चेहरे पर असमंजस के भाव उभरने लगे..आपस में उन्होंने बांग्ला में बात भी की..जिसका भाव कुछ ऐसा था कि उन्होंने तो राममनोहर लोहिया का नाम ही नहीं सुना..

राममनोहर लोहिया ने भी नहीं सोचा होगा कि आने वाली पीढ़ियां उनको याद करें..राजनीति का फक्कड़ योद्धा अगर ऐसी उम्मीदें पालता तो शायद वह गांधी के दरिद्रनारायण की असली आवाज बनकर आजादी के बाद नहीं उभरता। राजनीति में सादगी, परिवारवाद के विरोध और मूल्यों का पाठ नहीं पढ़ाता..उस शख्सियत ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की असल में अगुआई करते वक्त भी खुद को याद रखे जाने योग्य नहीं समझा होगा।

अगर सोचा होता तो आजाद भारत के सत्ता तंत्र में वह आसानी से फिट हो जाता..वैसे लोहिया के बताए पथ पर चलने वाले लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, ओमप्रकाश चौटाला, शरद यादव आदि ने ही लोहिया को कहां याद रखा है जो उस कॉलेज के छात्र उन्हें याद रखते, जहां उन्होंने अपने जीवन के तीन अहम साल गुजारे..जहां उन्होंने भारत को गढ़ने का सपना देखा..जहां उन्हें हिंदुस्तान को नया रूप देने की सीख और दृष्टि मिली..छात्रों के लिए लोहिया के अनजाना रूप से शुरू में झटका तो लगा..लेकिन भारतीय राजनीति की विद्रूपता याद आ गई तो फिर लगा कि ये छात्र तो कम से लालू-मुलायम जैसे लोहिया के अनुयायियों से अलग तो हैं ही..वे लोहिया का नाम तो नहीं बेचते..

लेकिन असल झटका तब लगा, जब विद्यासागर कॉलेज के दिन की पॉली वाले प्रिंसिपल डॉक्टर गौतम कुंडू से मुलाकात हुई..प्रिंसिपल साहब सहज व्यक्ति हैं..वनस्पति शास्त्र के प्रोफेसर हैं.. मेरठ में रहकर पढ़ाई की है, इसलिए उन्हें लोहिया की ताकत और उनके बारे में पता तो है, लेकिन वे खुद चौंक गए, जब उन्हें बताया गया कि जिस कॉलेज के वे प्रिंसिपल हैं, उसके विद्यार्थी करीब नब्बे साल पहले डॉक्टर राममनोहर लोहिया थे। इसी कॉलेज में पढ़ाई करते वक्त उनकी नेतृत्व क्षमता का विकास हुआ।

1928 में अखिल बंग छात्र परिषद के सम्मेलन में जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस नहीं पहुंचे तो लोहिया ने ही उसकी अध्यक्षता की थी। यहीं रहते हुए उन्होंने साइमन कमीशन का विरोध किया था, लेकिन डॉक्टर कुंडू को भरोसा नहीं हुआ। अलबत्ता उन्होंने यह जरूर बताया कि उनके कॉलेज के विद्यार्थी बाबू जगजीवनराम रहे थे। जगजीवनराम के बारे में उन्हें ही नहीं, कॉलेज छात्र संघ के कॉमनरूम सेक्रेटरी शुभम मंडल को भी पता है..लेकिन लोहिया को लेकर कोई जानकारी नहीं..प्रिंसिपल के कमरे में तब तक कई छात्र आ गए थे…छात्रों को पहले यह समझाना पड़ा कि डॉक्टर लोहिया कौन थे..

बाद में पता चला कि जगजीवनराम के बारे में छात्रों को इसलिए पता है, क्योंकि उनकी बेटी मीरा कुमार हाल के दिनों तक लोकसभा की अध्यक्ष रहीं। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान यानी 2013-14 में कॉलेज में जगजीवनराम की मूर्ति लगाने के लिए जगह की मांग की थी। साथ ही उनके नाम पर संग्रहालय बनाने का भी प्रस्ताव रखा था। लिहाजा छात्रों को भी इसकी जानकारी है..प्रिंसिपल गौतम कुंडू को लोहिया का अपना छात्र मानने के लिए अपनी ही सहयोगी राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर चित्रिता चौधुरी से पूछना पड़ा..चित्रिता ने जब तस्दीक की तब जाकर उन्हें भरोसा हुआ।

पश्चिम बंगाल को राजनीति की धुरी माना जाता है। छात्रसंघ से उम्मीद थी कि शायद उसे राजनीति के विराट व्यक्तित्व लोहिया की जानकारी हो..लेकिन लोहिया का नाम सुनते ही छात्रसंघ के अंधेरे सीलन भरे कमरे में बैठे छात्र नेताओं के चेहरे अपरिचय के भाव में ही नजर आए..तभी मन में उत्तर प्रदेश और बिहार के छात्रसंघ याद आ गए…

तब ये सवाल भी मन में आया कि क्या यूपी और बिहार के किसी दोयम कॉलेज के सीनियर अल्युमुनाई डॉक्टर राममनोहर लोहिया होते तो क्या वहां के छात्रसंघ उसे भूल जाते…निश्चित तौर पर इस सवाल का जवाब ना में ही होता..पश्चिम बंगाल की भावी राजनीति को समझने के लिए क्या यह अनुभव काफी नहीं हो सकता..इस सवाल का जवाब आप भी तलाशिए…

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