लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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-आलोक कुमार-  090813101413_education2

बिहार के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की बदहाली को उजागर करती एक विस्तृत रिपोर्ट

बिहार में सुशासन का प्रचार तो खूब किया जाता है पर बिहार की जमीनी हकीकत
ठीक इस प्रचार के विपरीत है। आईए बात की जाए सुशासन के एक बहुत ही
महत्वपूर्ण पहलू “प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा” की। बिहार में
प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की दिशा और दशा दोनों ठीक नहीं है।
माध्यमिक शिक्षा की बदहाल स्थिति को तो खुद बिहार सरकार के द्वारा प्रदत
आँकड़े ही साबित करते हैं। आंकड़ों के अनुसार 5500 ग्राम पंचायतों में अब
भी एक भी माध्यमिक विद्यालय नहीं है। राज्य में 8400 से अधिक ग्राम
पंचायत है, जिनमें से 5500 में एक भी माध्यमिक विद्यालय (सेकेंडरी) नहीं
है। यानि 65 प्रतिशत से भी ज्यादा पंचायतों में एक भी माध्यमिक
विद्यालय नहीं है।

जबकि केन्द्र सरकार सर्वशिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा
अभियान (आर.एम.एस.ए.) के तहत हजारों करोड़ रुपये राज्यों को मुहैया कराती
है। आर.एम.एस.ए. के तहत बिहार में 949 मध्य विद्यालयों को उन्नत किया
जाना था । केंद्र ने आर.एम.एस.ए. के तहत पांच किलोमीटर की परिधि में कम
से कम एक माध्यमिक स्कूल खोलने का लक्ष्य रखा था । बिहार इन लक्ष्यों की
प्राप्ति से कोसों दूर है।

बिहार के अधिकतर गांवों में प्राथमिक – माध्यमिक शिक्षा की बुनियादी
सुविधाएं खोजे नहीं मिलती हैं और अगर प्राथमिक – माध्यमिक शिक्षा का साधन
उपल्ब्ध है भी तो वो केवल दिखावे के लिए ही है। प्राथमिक – माध्यमिक
शिक्षा की इस दयनीय स्थिति के बारे में ग्रामीण इलाकों के लोग कहते हैं
कि “ सरकार चाहे किसी की भी हो, लालू-राबड़ी की या नीतिश कुमार की , किसी
ने भी शिक्षा की स्थिति सुधारने की तरफ ध्यान नहीं दिया। हमें अब किसी
सरकार से कोई उम्मीद नहीं है कि कोई इधर ध्यान देगा ! हमारे यहां सही
मायनों में शिक्षा नाम की कोई चीज नहीं है। इसीलिए हमारे बच्चे अभी भी
मजदूरी करने या गाय-गोरू चराने के लिए विवश हैं प्राथमिक – माध्यमिक
शिक्षा की तरफ अगर सरकार की ओर से तनिक भी ध्यान दिया जाता तो हालात कुछ
अलग होते।”

बिहार के ज्यादातर इलाकों, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में अशिक्षा का
साम्राज्य फैला हुआ है। बिहार में अधिकतर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा
की संरचनाएं अपनी बदहाली की व्यथा बयां कर रही हैं। पटना, नालंदा, गया, जहानाबाद , नवादा  और अररिया जिले के लगभग 30 गांवों के भ्रमण ,
प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा के संरचनाओं के अवलोकन व ग्रामीणों से
साक्षात्कार के पश्चात एक चौंकाने वाली बात ऊभर कर आई कि ज्यादातर गांवों
में जो बच्चा सबसे उच्च शिक्षा प्राप्त है वह भी मात्र छठी कक्षा पास है।

आज यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि आज बिहार में ग्रामीण इलाकों के
विद्यालय केवल दोपहर के भोजन देने का केन्द्र बनकर रह गए हैं । शिक्षा के
इन केन्द्रों में शिक्षा देने के अलावा अन्य सारे कार्य पूरी तन्मयता से
किए जाते हैं । बिहार में प्राथमिक – माध्यमिक विद्यालयों पर नजर रखने के
लिए प्रखंड संसाधन केन्द्र की की शुरुआत की गई थी परन्तु यह बिहार का
दुर्भाग्य ही है कि आज रक्षक ही भक्षक कि भूमिका में है। जिस केन्द्र की
स्थापना इस आशा का साथ की गई थी कि यह पूरे प्रखंड के शिक्षकों का पठन
पाठन के क्षेत्र में मार्गदर्शक की भूमिका निभायेगा वह केन्द्र आज पूरी
तरह से भ्रष्टाचार में आकंठ डूब गया है। इस बात से समस्त बिहार भली-भांति
परिचित है कि आज बिहार में सर्वशिक्षा अभियान अपने लक्ष्य से भटक चुका
है। इस भटकाव मे में भ्रष्टाचार की कितनी भूमिका है यह शायद बिहार के
शीर्ष- सत्ता से छुपा हुआ नहीं होगा !

लगभग डेढ़ – पौने दो वर्ष पहले नॉबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री श्री
अमर्त्य सेन द्वारा पटना में प्रस्तुत एक सर्वेक्षण -रिपोर्ट के मुताबिक
बिहार में प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा के उत्थान की राह में शिक्षकों और
विद्यालय-भवन संबंधी बुनियादी ज़रूरतों का अभाव ही सबसे बड़ी रूकावट है।
रिपोर्ट में कहा गया था कि राज्य के विद्यालयों में शिक्षकों के पढ़ाने
और छात्रों के सीखने का स्तर अभी भी नीचे है। 76 पृष्ठों की इस रिपोर्ट
में आंकड़ों की भरमार थी लेकिन निष्कर्ष में चार मुख्य बातें कही गईं थीं
:

1. पहली ये कि सरकारी प्राथमिक / माध्यमिक विद्यालयों में
इन्फ्रास्ट्रकचर यानी बुनियादी ज़रूरतों वाले ढाँचे का घोर अभाव यहाँ
स्कूली शिक्षा की स्थिति को कमज़ोर बनाए हुए है।

2. दूसरी बात ये कि शिक्षकों और ख़ासकर योग्य शिक्षकों की अभी भी भारी
कमी है। जो शिक्षक हैं भी, उनमें से अधिकांश स्कूल से अक्सर अनुपस्थित
पाए जाते हैं।

3. निरीक्षण करने वाले सरकारी तंत्र और निगरानी करने वाली विद्यालय
शिक्षा समिति के निष्क्रिय रहने को इस बदहाल शिक्षा-व्यवस्था का तीसरा
कारण माना गया है।

4. चौथी महत्वपूर्ण बात ये है कि बिहार के स्कूलों में शिक्षकों के
पढ़ाने और बच्चों के सीखने का स्तर, गुणवत्ता के लिहाज़ से बहुत नीचे हैl
इस रिपोर्ट में कहा गया था कि बिहार सरकार वयस्क साक्षरता, ख़ासकर
स्त्री-साक्षरता बढ़ाकर प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा के प्रति ग्रामीण
जनमानस में रूझान बढ़ा सकती है। इस रिपोर्ट के प्रस्तुतिकरण के इतने
दिनों के बावजूद  प्रदेश की सरकार की तरफ़ से इस के द्वारा सुझाए गए
उपायों पर अमल करने की अब तक कोई पहल नहीं हुई है।
विगत वर्ष ही बिहार को लेकर जारी एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार विद्यालयों
में बच्चों की उपस्थिति में लगातार गिरावट आ रही है। लड़कियों की उपस्थिति
कम होती जा रही है, क्योंकि न तो विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था है
और न पढ़ाई लिखाई को लेकर ही संतोषजनक माहौल है।

एक तरफ़ बिहार का गौरवशाली शैक्षणिक अतीत है और दूसरी तरफ़ आज इस राज्य
का शैक्षणिक पिछड़ापन. ये सचमुच बहुत कचोटने वाला विरोधाभास है।
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में साक्षरता का
प्रतिशत 63.8 तक ही पहुंच पाया है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में
काफ़ी कम है।

किसी भी राज्य के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसके जन-मानस विशेषकर
उसके “भविष्य (बच्चों)” का शिक्षित होना है। कभी बिहार पूरी दुनिया
में शिक्षा का केंद्र हुआ करता था। लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा के क्षेत्र
में यह राज्य पिछड़ता चला गया। पिछले कुछ दशकों में यह राज्य शिक्षा के
सबसे निचले पायदान पर जा पहुंचा है । वर्तमान सरकार ने भी इसमें सुधार के
लिए कोई गंभीर और सार्थक प्रयास नहीं किया है । शायद “सुशासन की
प्राथमिकताओं  में बुनियादी शिक्षा का कोई स्थान नहीं है!” प्राथमिक –
माध्यमिक शिक्षा को बेहतर बनाने की योजनाएं जमीन से अधिक फ़ाइलों और
सचिवालय के कमरों में ही सिमटती नजर आती हैं ।
शिक्षा में गुणवता को लेकर सरकार के दावों की कलई तब खुलती नजर आती है जब
यह पता चलता है कि बच्चे दाखिला सरकारी विद्यालयों में कराते हैं, जबकि
विधिवत पढाई निजी विद्यालयों में करते हैं । सरकार ने बच्चों के लिए ऐसे
शिक्षको की व्यवस्था की है जिसे कायदे से शिक्षक कहा नहीं जा सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अवस्थित अधिकांश विद्यालयों में आंकड़ों के बाजीगरी
के खेल में नामांकन 90 प्रतिशत हो गए हैं, लेकिन आरंभिक शिक्षा से जुडे
ग्रामीण क्षेत्रों के 47 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट ट्यूशन के भरोसे हैं ।
आधे से अधिक प्राइमरी पास बच्चे कक्षा दो की किताबें नहीं पढ पाते हैं।
शिक्षा के अधिकार कानून-2009 के तहत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा में
गुणवत्ता सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेवारी है, लेकिन बिहार में
शिक्षा को लेकर संरचनाओं की उपलब्धता, गुणवत्ता और सभी के लिए समान
अवसरों का होना हमेशा से चिन्ता के विषय रहे हैं। हालांकि सुशासन की
सरकार ने आंकड़े तो ऐसे प्रस्तुत किए हैं मानो बिहार में शिक्षा को लेकर
क्रांति हो गई हो, परन्तु जमीनी सच्चाई किसी से छिपी नहीं है।

विकास को लेकर प्रदेश सरकार भले ही दावे करती रही है , किन्तु शिक्षा को
लेकर प्रदेश सरकार की ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता सवालों के घेरे में है ।
शिक्षा को बढ़ावा देने के तमाम अभियानों के बावजूद स्थिति यह है कि बिहार
अपने लक्ष्य से अबतक कोसों दूर है  क्योंकि कारगर योजनाओं को कारगर तरीके
से  लागू करने में सरकारी उदासीनता या भ्रष्टाचार आड़े आ जाती है। ग्रामीण
क्षेत्रों में शिक्षा की तमाम योजनाएं किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार की
भेंट चढ़ जाती हैं ।
बिहार के सरकारी विद्यालयों की व्यवस्था किसी से छिपी नहीं है। यहाँ वर्ष
के 6 महीने शिक्षकों को वोटर लिस्ट तैयार करने, पोलियो ड्रॉप पिलाने और
तरह – तरह के रिपोर्ट तैयार करने जैसे गैर – शैक्षणिक कार्यों में लगाए
रखा जाता है। इसके अतिरिक्त जबसे मिड-डे मील योजना आरंभ हुई है शिक्षकों
का आधा समय इसकी व्यवस्था और हिसाब – किताब संभालने में ही गुजर जाता है।
दूसरी ओर शिक्षा विभाग में बैठे अफसर भी इनका जमकर शोषण करते हैं। हालत
इतनी खराब है कि बगैर पैसा दिए एक शिक्षक को अपने लिए अवकाश की मंजूरी
कराना, बकाया तनख्वाह पाना और अलाउंस की मंजूरी हासिल करना भी मुहाल है।
महीने भर की मेहनत के बाद भी वेतन का कुछ हिस्सा चढ़ावा के रूप में देना
शिक्षकों की मजबूरी है, अन्यथा ईमानदारी से कार्य करने पर भी प्रतिफल
नकारात्मक ही मिलेगा। साक्षात्कार के क्रम में कुछ शिक्षकों ने बताया की
यदि कोई शिक्षक स्कूल छोड़कर अपने कार्य को पूरा करने के लिए शिक्षा विभाग
के कार्यालय पहुंच गया तो फिर उसकी शामत  ही समझें। कुछ का कहना था कि
शिक्षक का पेशा अब इज्जत के काबिल नहीं रहा। एक शिक्षक नाम का शिक्षक तो
अवश्य रहता है परंतु उससे कार्य प्रतिकूल ही लिए जाते हैं। कमोबेश यह
स्थिति प्रदेश के  सभी  इलाकों में ही देखने को मिल जाती है। जाहिर है
ऐसी परिस्थिति में जब एक शिक्षक अपने दायित्वों का पूर्ण निवर्हन नहीं कर
पाता होगा तो वैसे वातावरण में शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चों की
मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता होगा। श्रीश्री रविशंकर का
चर्चित और विवादित बयान अगर इस संदर्भ में देखा जाए तो कोई गलत नहीं था ।
एयरकंडीशन कमरों में बैठने वाले लोगों के लिए बिहार का अर्थ केवल पटना
होता है। उनकी दृष्टि में वह क्षेत्र नहीं होते हैं जहां इस प्रकार की
स्थिति होती है। ऐसे लोगों को प्रभावित क्षेत्रों में जाकर बच्चों के बीच
वक्त गुजारना चाहिए ताकि उन्हें इस बात का अहसास हो कि सच्चाई वह नहीं है
जो वो देख रहे हैं, या जो जिसे वो दिखाना चाहते हैं।

यह कड़वा सच है कि प्रदेश के निजी और सरकारी विद्यालयों की स्थिति में
जमीन – आसमान का फर्क है। सवाल यह है कि यदि सरकारी विद्यालयों के परिणाम
अच्छे हैं तो अभिभावक मोटी फीस देकर भी अपने बच्चों का नामांकन निजी
स्कूलों में करवाने को क्यों आतुर हैं ? स्वयं सियासी लीडर अपने बच्चों
को सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाते हैं ? जो लोग यह दावा करते हैं
कि उन्होंने अपनी शिक्षा सरकारी विद्यालय में ही प्राप्त की है तो क्या
वह अब भी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही भेजते हैं अथवा पढ़ाना
पसंद करते हैं ? ग्रामीण क्षेत्रों की बात तो दूर इस वक्त प्रदेश की
राजधानी के सरकारी विद्यालयों की हालत भी खस्ता है। आवश्यकता इस बात की
है कि हम प्रत्येक मसले का हल राजनीतिक अथवा किसी रंग में रंगने की बजाए
उसे सामाजिक दृष्टिकोण से ढूंढ़ें। व्यवस्था में गड़बड़ी को उजागर करने
वालों पर उंगली उठाने से कहीं बेहतर यह है कि समस्या के सम्यक निराकरण पर
जोर दिया जाए।

इस रिपोर्ट को कवर करने के सिलसिले में पिछले वर्ष (2013 में ) 17 दिनों
में मैंने जितने विद्यालयों का जायजा लिया उन सबों के हाल का यहां जिक्र
करने से रिपोर्ट अनावश्यक रूप से लम्बी और उबाऊ हो जाएगी। आइए, चंद
विद्यालयों में मैं ने जो देखा उस की आंखों देखी कुव्यवस्था की कहानी
से आपको भी रूबरू कराऊं।

23 दिसम्बर 2013 को इस रिपोर्ट को कवर करने के सिलसिले में सुबह के 10:30
बजे मैं राजधानी पटना से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर बेरिया के माध्यमिक
विद्यालय में था। वहां मैंने जो देखा वो हतप्रभ करने वाला था, कड़ाके की
ठंढ के बावजूद खुले आसमान के नीचे कक्षाएं चालू थीं, ज्यादातार बच्चों
को उसी समय मध्यान भोजन भी परोसा जा रहा था। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो
तब हुआ जब मैंने देखा की लगभग पूरी तरह से ढह चुके कमरों में बच्चों की
जान जोखिम में डालकर कक्षाएं चालू थीं। मैंने वहां मौजूद कुछ शिक्षकों
से जब इस के बारे में पूछा तो उन का सीधा सा जबाव था “ जो भी पूछना है
प्रधानाध्यापक से पूछिए।” प्रधानाध्यापक महोदय के बारे में पूछने पर पता
चला की वो अभी आए ही नहीं हैं। अब मैंने आगे बढ़ने की सोची और 11:15 बजे
मैं पटना जिले के अजीम चक गांव के विद्यालय परिसर में था , हर ओर सन्नाटा
पसरा था, क्लास-रूम खाली पड़े थे, ना तो एक भी छात्र दिखा ना ही कोई
शिक्षक व् कर्मचारी लेकिन विद्यालय परिसर में ही खलिहान की चहल-पहल थी।
विद्यालय में महंगे फर्नीचर बाट जोहते दिखे कि कोई तो आए और उनका उपयोग
करे , हमने पास ही खड़ी एक छोटी-सी बच्ची से जब यह पूछा कि मास्टर साहेब
व् मैडम किधर हैं ? तो वह कुछ देर सोच में डूब गई , फिर कुछ सोचने के बाद
वह बोली कि “यहां हर मौसम में स्कूल अलग-अलग जगह होता है।” वह हमें बगल
में छोटे से एक बगीचे में ले गई और बोली, ”यही स्कूल है”। एकबारगी तो
लगा ‘क्या अंधी हो गई है सरकार ” फिर ख्याल आया   ” सरकार तो अंधी व्
बहरी ही होती है।” मैंने जब वहां मौजूद शिक्षकों व कर्मचारियों से बात
करनी चाही तो उन्होंने धमकी भरे लहजे में कहा “जाइए हियां से बहुते
पत्रकार देखे हैं , कैमरा –उमरा सब इहें रह जाएगा।” मैंने वहाँ से खिसक
जाना ही उचित समझा क्योंकि मैं तस्वीरें पहले ही ले चुका था।
कुछ ही देर बाद दोपहर 1 बजे मैं अपने गांव ( धनरूआ ) के विद्यालय में था। अपना गांव होने के कारण मैं यहां किसी भी तरह की आशंका व डर से
बेफिक्र था। परिसर में शिक्षक, शिक्षिकाएं व कर्मचारी गुन-गुनी धूप का
आनन्द ले रहे थे, कुछ बच्चे फूलों की क्यारी में ‘ बागवानी  की विधा ’
सीख रहे थे। पढ़ाई का काम बिल्कुल ही बंद था, एक कमरे में मध्यान भोजन
की  तैयारी जारी थी और कुछ बच्चे भी थाली लेकर इंतजार में खड़े थे।
“शिक्षा’ एक कोने में ‘सहमी हुई और सिसकती ‘ दिखी। चन्द मिनटों बाद ही
वहाँ और बच्चों के आने का सिलसिला शुरू हो गया , सबों के हाथों में कॉपी-किताब की जगह थाली थी। थोड़ी ही देर में वहां लगभग 60-70 बच्चे जमा हो

गए, सभी सीधे रसोई घर का रुख कर रहे थे। यहां भी प्रधानाध्यापिका
नदारथ थीं, उनके बारे में मेरे द्वारा पूछे जाने पर शायद किसी कर्माचारी
की सूचना पर प्रधानाध्यापिका महोदया को उनके किसी परिवार वाले ने
मोटरसाइकिल से वहाँ  पहुंचाया। प्रधानाध्यापिका  के पास न तो शिक्षकों व
कर्मचारियों का हाजिरी रजिस्टर था और न ही उन्हें स्कूल में दाखिल बच्चों
की सही संख्या ही मालूम थी। पूछने पर उन्होंने बताया ”सारे रजिस्टर एक
टीचर के घर पर हैं।” उन्होंने मुझे ग्रामीण होने की दुहाई देते हुए लगभग
गिड़गिड़ाते हुए कहा कि “सर… छापिएगा नहीं… चलिए देखिए हम कैसे
मध्यान भोजन को एकदम दुरुस्त कर दिए हैं।”

24.12 .2013 की सुबह मैं पटना-जहानाबाद जिले की सीमा पर स्थित तिनेरी
ग्राम के विद्यालय में था।  ग्रामीणों ने बताया कि यह काफी ही पुराना
विद्यालय है। इस विद्यालय की स्थिति शोचनीय थी , विद्यालय की खपरैल छ्त
का अधिकांश हिस्सा टूटा हुआ था , बड़े परिसर में ही लोगों के खलिहान लगे
थे, एक कमरे और बरामदे का उपयोग गोशाले के रूप में हों रहा था, पुआल के
ढेर  (पुंज) सजे थे , खुले आसमान के नीचे कुछ बच्चे बोरा बिछा कर मास्टर
जी के सामने बैठे थे। मात्र दो शिक्षक ही उपस्थित थे। एक ग्रामीण
नरेंद्र उर्फ छुरी शर्मा जी ने पूछने पर कहा कि “ई स्कूल एइसे हीं चलता
है।” बातचीत के क्रम में उनसे पता चला कि जाड़े के दिनों में यह खुले
आसमान में ही चलता है और बरसात में यह लगभग बंद ही रहता है। गांव के ही
रहने वाले सुदर्शन जी ने कहा ”गांव के बच्चों का भविष्य भगवान भरोसे है,
यहां कितने शिक्षक नियुक्त हैं और कितने बच्चों का नामांकन है ये किसी को
मालूम नहीं है। सुध लेने वाला कोई नहीं है , स्कूल में गौशाला रहने के
कारण पशु भी बच्चों के बीच घुस जाते हैं। उन्होंने कटाक्ष के लहजे में
कहा “ हमर गांव के गाय-गोरू भी पढल हबअ बाबु।”

तिनेरी का ये विद्यालय बिहार का अकेला ऐसा प्राइमरी विद्यालय  नहीं है,
जहाँ पर केवल सरकारी औपचारिकताओं के लिए स्कूल चल रहे हैं। एक सरकारी
रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में करीब 3,000 विद्यालय  पेड़ों की छांह में
ही चल रहे हैं। एक सर्वे में 1,875 विद्यालयों को अस्तित्वविहीन बताया
गया है , यह सर्वे राज्य सरकार की पहल पर ही कराया गया था। मंदिर,
दालान, गोशाला और सामुदायिक भवनों में चल रहे विद्यालयों की संख्या को
जोड़ दें तो भवनहीन विद्यालयों की संख्या काफी है। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ
एजुकेशनल प्लानिंग ऐंड एडमिनिस्ट्रेशन 2011-12 की रिपोर्ट में बिहार की
23.21 फीसदी प्राइमरी विद्यालयों को भवनहीन बताया गया है , यह अन्य
राज्यों की तुलना में काफी ज्यादा है।

25.12.2013 को मैं जहानाबाद जिले के कड़ौना में था। यहां के विद्यालय
परिसर में दाखिल होने पर 20-25 छात्र – छात्राओं , 3 शिक्षकों और एक
कर्मचारी के दर्शन हुए। यहाँ 110 बच्चों का दाखिला है ऐसा मुझे कर्मचारी
के ही द्वारा बताया गया और उन्हें पढ़ाने के लिए 4 शिक्षकों की नियुक्ति
है। कर्मचारी महोदय ने नाम नहीं छापने के अनुरोध पर बताया कि “यहाँ
स्कूल शिक्षकों की मर्जी के हिसाब से चलता है।”

जहानाबाद जिले के ही एक निवासी व सामाजिक कार्यकर्ता प्रद्युमन जी ने
साक्षात्कार के क्रम में कहा कि “ जिले के विद्यालयों  में अध्यापन का जो
स्तर है, वह किसी से छिपा नहीं है। इन विद्यालयों में अध्यापन का स्तर
किसी भी पैमाने पर बेहतर नहीं कहा जा सकता। इसी का परिणाम है कि तमाम
छात्रों को सही से हिंदी पढ़नी भी नहीं आती। अन्य विषयों के बारे में
क्या स्थिति होगी, इसके बारे में कल्पना ही की जा सकती है। ज्यादातर
अध्यापक अध्यापन के बजाय समय बिताने में लगे रहते हैं। यदि किसी अध्यापक
की पहुंच ऊपर तक है  तो उसे अध्यापन न करने, देर से आने और आपनी मर्जी से
आने-जाने की पूरी छूट होती है। इसके अलावा ज़्यादातर  अध्यापक ऐसे ही हैं
जिन्हें अपने विषय की पर्याप्त जानकारी ही नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण
यह है कि नियुक्ति व प्रमोशन का आधार ज्ञान नहीं, सिफारिश व डिग्री है।
आज के दौर में डिग्री प्राप्त करना कितना आसान है, यह किसी से छिपा नहीं
है। प्रमोशन के दौरान संबंधित अध्यापक के विषय से संबंधित जानकारी को
पूरी प्रमोशन प्रक्रिया में कहीं  भी नहीं जांचा जाता है। यह बेहद
निराशाजनक स्थिति है और इसमें बदलाव लाना जरूरी है।”

दरअसल, राज्य के नए प्राइमरी विद्यालयों के लिए जमीन और भवन की समस्या
वर्षों से है। सर्वशिक्षा अभियान के तहत खुलने वाले विद्यालयों की जमीन
के लिए राशि का प्रावधान नहीं है, हालांकि कुछ स्कूलों विद्यालयों के
लिए भूमि और भवन उपलब्ध हुए हैं, लेकिन ऐसे विद्यालयों की संख्या ज्यादा
नहीं है। हाल ही में शिक्षा विभाग ने भूमि और भवन उपलब्ध कराने के लिए
जन सहयोग की अपील की थी , सरकार ने दाताओं के नाम पर विद्यालय और भवन का
नाम किए जाने का संकल्प भी जारी किया था  लेकिन इसका फायदा नहीं हुआ।
पहले भी सरकार अपील करती रही है , हालांकि अररिया के 296 विद्यालयों
स्कूलों में से 129 विद्यालयों के लिए जमीन मुहैय्या कराई गई थी, फिर भी
167 प्राइमरी स्कूलों के लिए समस्या बरकरार है। पूरे सूबे भर में ऐसी
समस्या मौजूद है। राज्य में 42,307 प्राइमरी और 27,958 अपर प्राइमरी
विद्यालय हैं। सिर्फ नवादा में 171 विद्यालय ऐसे हैं, जिनकी अपनी
बिल्डिंग नहीं है। अपवाद को छोड़ दें तो अधिकांश विद्यालयों में पढ़ाई
की व्यवस्था कमोबेश बेरिया, धनरूआ, तिनेरी व कड़ौना जैसी ही है।
नवादा के विश्वकर्मा टोला प्राइमरी स्कूल को ही लें। यह विद्यालय छह साल
से ग्रामीण अयोध्या मिस्त्री की करीब 15 फुट लंबी और छह फुट चौड़ी खपरैल
की दुकान में चल रहा है। यहां करीब 100 बच्चों का दाखिला है, जिसके लिए
चार महिला शिक्षिकाएं नियुक्त हैं, लेकिन यह परिसर अक्सर खाली ही रहता है।

ग्रामीण रीता देवी कहती हैं, ”स्कूल की अधिकतर टीचर गायब रहती हैं।”
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह जिला नालंदा भी इससे अछूता नहीं है।
बिंद ब्लॉक का पीतांबर बिगहा विद्यालय ऐसा ही उदाहरण है। रहुई प्रखण्ड
मुख्यालय से सटे एक टोले  में स्थित प्राइमरी विद्यालय अपनी स्थापना के
दिन  से ही पेड़ों के नीचे चल रहा है। शेखपुरा के विष्णुपुर, लक्ष्मीपुर
और गया के रामपुर प्राइमरी विद्यालय जैसे सैकड़ों उदाहरण बिहार में मौजूद
हैं।
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश के 3.69
लाख विद्यालयों में  लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं, जिसमें बिहार
के 33,853 स्कूल हैं। सूचना  के अधिकार कानून के तहत हासिल जानकारी के
मुताबिक बिहार  में 94.7 फीसदी स्कूल छात्र -शिक्षक का अनुपात पूरा नहीं
करते हैं।
बिहार में साक्षरता दर 63.82 फीसदी है, राज्य सरकार ने 2020 तक
शत-प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य रखा है। मौजूदा हालात को देखते हुए ये
बेबाकी से कहा जा सकता है कि ये लक्ष्य फ़ाईलों और आंकड़ों में तो हासिल कर
ही लेगी सरकार लेकिन वास्तविक रूप से इसे हासिल करना असंभव है। राज्य
में प्राइमरी शिक्षा की इस बदहाली पर बिहार इंटेरमीडिएट काउंसिल के एक
भूतपूर्व अध्यक्ष का  कहना है कि  ”प्राइमरी और एलिमेंटरी एजुकेशन के
मामले में बिहार सबसे नीचे है, फिर भी राज्य सरकार के पास कोई स्थायी
नीति नहीं है।”
पिछले वर्ष पटना में ‘समझो – सीखो, गुणवत्ता मिशन’ कार्यक्रम में बिहार
के शिक्षा मंत्री पीके शाही जी ने कहा था कि “अब हमारी कोशिश
क्वालिटी एजुकेशन देना है। उन्होंने दावा किया था कि प्रदेश में 6 से 14
वर्ष आयु वर्ग के 2.18 करोड़ बच्चों में से 2.15 करोड़ बच्चों का नामांकन
हुआ है, जिसमें ज्यादातर बच्चे सरकारी विद्यालयों  के हैं।” वो सरकार
हैं और सरकार कुछ भी दावा कर सकती है लेकिन यहाँ मेरा प्रश्न है कि “बिना
इमारत के विद्यालय से किस तरह की क्वालिटी शिक्षा मिल सकती है ?” ये बात
मुझे कोई समझा दे !

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