लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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आजादी के पूर्व में देश को विपन्नता, अशिक्षा, बेरोजगारी से मुक्ति दिलाने की प्रतिबद्धताएं दोहरायी जाती थी। आजादी के 6 दशक व्यतीत हो चुके है किंतु समस्याएं जस की तस बनी हुई है। इसके लिए देश में अपनाए गये विकास के मॉडल में खोट समझी जाये अथवा प्रयासों की कमी मानी जाये। यह एक गंभीर विशय है। मध्यप्रदेश में आजादी के बाद दस पंचवर्षीय योजना पूर्ण हो चुकी है और 11 वीं योजना की देहलीज पर कदम रख रहे है। वर्ष 2003 में प्रदेश में राजनैतिक परिवर्तन होने के पश्चात योजना विकास और प्रषासकीय पहल में कुछ बुनियादी बदलाव किए गये है। इनका उद्देश्‍य विकास को समाज में सुखद बदलाव का साधन बनाना रहा है। मध्यप्रदेश में बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा के क्षेत्र में जो पहल आरंभ हुई है उसमें गति आने के पीछे बढ़ती हुई जनभागीदारी का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित हुआ है। प्रदेश में प्रमुख रूप से अर्थव्यवस्था खेती पर निर्भर रही है। खेती की अधोसरंचना विकास के लिए पिछले पांच-छ: वर्ष में भगीरथ प्रयास हुए है। सिंचाई का अतिरिक्त रकवा बढ़ाए जाने के साथ खेतों में जलाशय बनाने का काम जनभागीदारी के आधार पर आरंभ किया गया जिससे लघु सीमांत किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने का सपना पूरा हुआ है। किसानों पर कर्ज के बढ़ते बोझ को देखते हुए किसानी के लिए मिलने वाली कर्ज की दरों को घटाया गया है। पिछले दशकों में 18 प्रतिशत ब्याज पर किसानों को कर्ज दिया जाता था जिसे प्रदेश में क्रमश: घटाकर 7 प्रतिशत, 5 प्रतिशत और अब 3 प्रतिशत कर दिया है। इससे किसानों को काफी राहत मिली है। इसी तरह प्राकृतिक आपदाओं में अब तक किसानों को प्रतिकात्मक राहत दी जाती थी। इस राहत को तीन से चार गुना बढ़ा दिया गया है। आजादी के बाद किसानों को आर्थिक सुरक्षा दिलाने के नाम पर फसल बीमा की योजना वर्षो पहले आरंभ की गयी किंतु उसका लाभ कभी भी किसानों को नहीं मिला। अलबत्ता उनकी बीमा किश्‍त राशि जमा होती रही और अंत में उन्हें टका से जवाब दिया गया कि प्राकृतिक आपदा से हुई क्षति मानदण्ड पर खरी नहीं उतरी। पिछले पांच वर्षों में फसल बीमा योजना को किसानोन्मुखी बनाया गया है और उसे तहसील स्तर से पटवारी हल्का स्तर और ग्राम स्तर तक इकाई के रूप में माना जाने लगा है। सरकार का ख्याल है कि इसे किसान के खाते के स्तर तक सीमित किया जाये और इसे इकाई माना जाये। इससे किसान को होने वाली क्षति फसल की हानि का भुगतान कराने में आसानी होगी। यह क्रांतिकारी परिवर्तन मध्यप्रदेश के किसानों को सुकून लेकर आया है।

मध्यप्रदेश में निजाम बदलने का आगाज बुनियादी परिवर्तनों से मिलता है। इसके लिए प्रदेश में व्यवस्था को जनोन्मुखी बनाया गया है। जिनमें जनदर्शन, राज्य स्तर पर समाधान ऑनलाइन, जिला कार्यालयों में समाधान एक दिन, सुराज मिशन और लोक कल्याण षिविरों के आयोजन को विषेष सहायता मिली है। जनदर्शन कार्यक्रमों का ही नतीजा है कि सरकार गांव गांव तक पहुंची और उसे जनता की समस्याओं की मौके पर जानकारी मिली। जिनका समाधान करना सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता के रूप में स्वीकार किया है। सरकार के सभी काम आम आदमी पर ही केन्द्रित हो रहे है। आदिवासियों के खिलाफ बरसों से दर्ज मामले राज्य सरकार ने वापिस लेकर आदिवासियों को सम्मान दिया है। हजारों झुग्गी वासियों को उनकी आधिपत्य की भूमि के अधिकार पत्र सौंपकर और आदिवासियों को वन भूमि पर अधिकार पत्र सौंपकर उनकी जिन्दगी में सुकून पहुंचाया है। पांच वर्षो में राज्य सरकार ने बिजली प्रदाय पर 4600 करोड रूपये की सब्सिडी प्रदान कर बिजली मंहगी होते हुए भी बिजली की पूर्ति सुनिष्चित की है और बिजली की पूर्ति को आसान बनाया है।

मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है और अधिकांश आबादी 52117 गांवों में निवास करती है। कृषि के आर्थिक और सामाजिक ताने बाने को सरसता पूर्वक चुस्त दुरूस्त करने के लिए राज्य सरकार ने क्रांतिकारी परिवर्तन करने का संकल्प लिया है, जो राज्य सरकार द्वारा आयोजित मंथन बैठकों में मुखरित हुआ है। सरकार की प्रमुख सात प्राथमिकताएं है जिनमें खेती को लाभकारी व्यवसाय बनाना, स्वास्थ्य शिक्षा, अधोसंरचना विकास जैसे कार्यों को शामिल किया गया है। मंथन बैठकों की समूह बैठकों में जो निर्णय लिये गये है उन पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है और इनके क्रियान्वयन से निष्चय ही गांव में समरसता का वातावरण बनेगा। किसानों और ग्रामवासियों को राजस्व प्रकरणों के लिए बार-बार जिला और तहसीलों के चक्कर लगाने और न्यायालयों में माथापच्ची करने से निजात मिलेगी। मंथन बैठको में लिये गये निर्णय और अनुषंसाओं पर प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से विचार किया जा रहा है। इनका अमल समयबद्ध कार्यक्रम में होने से प्रशासन जहां चुस्त होगा वहीं जन-जन को सहज सरल और पारदर्षी प्रशासन का आभास होगा। प्रदेश में ग्रामीण सचिवालय व्यवस्था को सृदृढ बनाने के प्रयास किये जाने का विचार है। गांव में सार्वजनिक निस्तार भूमि के प्रबंधन में पंचायतों की भागीदारी खसरा और नक्षा की प्रति, ग्रामसभा में रखी जाने का प्रावधान, अतिक्रमण करने वाले व्यक्ति का नाम सार्वजनिक किए जाने, ग्रामसभा के सम्मेलन हर माह बुलाए जाने, गांव का खसरा एवं नक्षा हर वर्ष जुलाई में खातेदारों को वितरित किए जाने जैसी अनुशंसाओं पर विचार किया जा रहा है। राजस्व कार्यालयों के आधुनिकीकरण और सुदृढीकरण के किए जाने से पटवारी से लेकर तहसीलदार तक को जवाबदेह बनाया जायेगा और इससे निर्धारित समय में किसान को राहत मिलेगी। जवाबदेह प्रशासन हकीकत बनेगा। प्रदेश में पहली बार राजस्व से जुड़े मुद्दों पर इतनी गहरायी से मंथन और चिंतन किया गया है जिससे आभास होता है कि सरकार किसानों की है। गांव, गरीब और किसान ही प्रषासन की धुरी बन चुके है। मध्यप्रदेश में पहली बार 17 किलोमीटर प्रतिदिन सड़के बनने का कीर्तिमान बना है। इसी तरह प्रदेश में विद्युत पूर्ति और उपभोग का रिकार्ड पांच वर्षों में बना है। वर्ष 2009-10 में 2303 किलोमीटर लंबी सड़के बनाकर गांव में बारहमासी सड़क संपर्क सुनिष्चित किया गया है। स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में चालू वर्ष के दस माह में 273 करोड रूपये का कर्ज बांटा गया। 11138 हितग्राहियों को लाभान्वित किया गया। स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत 44554 अनुसूचित जाति जनजाति के व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया। इसी तरह 55000 महिला स्वरोजगारी और अल्पसंख्यकों के 168007 व्यक्तियों के अलावा 3342 निशक्तजन स्वरोजगारी व्यक्तियों को लाभ पहुंचाया गया।

मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका योजना के अंतर्गत गांवों में कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया। मजे की बात है कि पहली बार सुदूर अंचल में रहने वाले आदिमजाति के 32 बैगा परिवारों को हाथकरघा का प्रशिक्षण देकर उन्हें दस्तकार बनाया गया। इसी क्रम में आजीविका हाट विकसित किये गये। स्थानीय संसाधनों से कुटीर शिल्प विकसित किये गये। मंडला, श्योपुर, मुरैना और डिंडोरी जैसे आदिवासी जिलों में रस्सी बनाने, काष्ठ की सामग्री बनाने जैसे कार्य उपलब्ध कराये गये। मध्यप्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी परिवर्तन किया गया है। इसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में बुन्देलखण्ड में पहला मेडीकल कालेज सागर में खोला गया है। जिससे बुन्देलखण्ड में स्वास्थ्य और चिकित्सा की अधोसंरचना का विकास होगा। शनै:-शनै: जनता को स्वराज से सुराज की अनुभूति हो रही है। प्रशासकीय तंत्र को जनतंत्र की आकांक्षाओं के अनुसार प्रभावी बनाने में राज्य सरकार की पहल कारगर साबित हो रही है।

– भरत चंद्र नायक

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