लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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  डॉ0 कुलदीप चंद अग्निहोत्री

पिछले दिनों 4 अगस्त, 2011 को ओडीशा उच्च न्यायालय ने 3 साल पहले 23 अगस्त, 2008 को स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड की जांच में दखलंदाजी करते हुए जांच अधिकारी को आदेश दिया कि वह इस पूरे हत्याकांड की नए सिरे से जांच करें और यदि जरुरत पड़े तो इस सिलसिले में न्यायालय में नया आरोपपत्र भी दाखिल किया जाए । ब्रह्मचारी माधव चैतन्य ने ओडीशा उच्च न्यायालय में गुहार लगायी थी कि सरस्वती जी के असली हत्यारों को पकड़ने के लिए न तो जांच अधिकारी सही दिशा में जांच कर रहे हैं और न ही सरकारी तंत्र न्यायालय से दोषियों को सजा दिलवाने के उद्देश्य से सबूत और गवाह पेश कर रहे हैं। यह ब्रह्मचारी माधव चैतन्य ही थे जिन्होंने स्वामी जी की हत्या की प्रथम सूचना रपट थाने मे दर्ज करवायी थी और वे इसके चश्मदीद गवाह भी हैं। स्वामी जी की इस याचिका के बाद विश्व हिंदू परिषद् के ओडीषा शाखा के अध्यक्ष दुर्गा प्रसाद कर ने भी उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि उन्हें भी इस मामले में अपना पक्ष प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की जाए । न्यायालय ने उनकी इस प्रार्थना को भी स्वीकार कर लिया था ।

दरअसल, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या को लेकर ओडीशा सरकार का जो रवैया रहा है, उससे आम लोगों में यह धारणा पनपी है कि स्वामी जी के हत्यारे, जांच अधिकारी और लोक अभियोजक तीनों आपस में गहरे तालमेल से चल रहे हैं । और इन तीनों का उद्देश्य हत्यारों को पकड़ना और सजा दिलाना नही हैं, बल्कि इसके विपरीत उनको कानून की गिरफ्त से सुरक्षित करना है। ब्रह्मचारी माधव चैतन्य और दुर्गा प्रसाद कर की उच्च न्यायालय में दी गयी याचिका आम लोगों में उपजे इसी जनाक्रोश का परिणाम थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस हत्याकांड की जांच कर रहे पहले जांच अधिकारी को बदलकर जब नए जांच अधिकारी को यह जिम्मेवारी सौंपी गयी तो उसने जांच की प्रारम्भिक महत्वपूर्ण सामग्री को एकदम से दरकिनार कर दिया। विधिवेत्ता यह अच्छी तरह जानते हैं कि हत्या के मामलों में इस प्रकार की प्रारम्भिक सामग्री कितनी महत्वपूर्ण होती है। जांच अधिकारी के इस रवैये से ही यह अंदेशा होने लगा था कि जांच किस दिशा मे जाएगी। स्वामी जी की हत्या के पूर्व पहाड़ी मंच नामक किसी संस्था ने उनको हत्या करने का धमकी भरा पत्र लिखा था। हत्या से पूर्व पिछले कुछ सालों में स्वामी जी पर चर्च के गुंडों ने लगभग 8 बार अलग-अलग स्थानों पर कातिलाना हमले किए थे। हत्या से एक महीना पहले ही कंधमाल जिला के तुमडीबंद नामक स्थान पर कुछ लोगों ने चर्च की शह पर गोकशी की थी। स्वामी जी जब उसका विरोध करने के लिए वहां पहुंचे तो चर्च के उन्हीं गुंडों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी। जाहिर है कि चर्च पिछले लम्बे अर्सें से स्वामी जी की हत्या का प्रयास कर रहा था। लेकिन जब स्वामी जी की हत्या हुई तो ओेडीशा सरकार के प्रतिनिधि ने हत्या के कुछ घंटे बाद ही यह घोषणा कर दी कि यह हत्या माओवादियों ने करवायी है। जाहिर है कि बिना किसी प्रमाण के सरकार द्वारा की गयी इस घोषणा से जांच अधिकारी को स्पष्ट संकेत मिल गए कि उसे अपनी जांच को किस दिशा में लेकर जाना है। शायद, इसीलिए उच्च न्यायालय में याचिककर्ताओं ने यह प्रश्न खडा किया कि जांच अधिकारी माओवादियों को हत्या के लिए दोषी तो ठहरा रहा है लेकिन इस हत्या के पीछे माओवादियों का उद्देश्य या ‘मोटिव’ क्या है? इसको स्थापित नहीं कर पा रहा। लम्बे अरसे से फौजदारी मुकदमों से बावस्ता जांच अधिकारी और लोक अभियोजक इतना तो जानते ही हैं कि हत्या के मामले में जब तक मोटिव या उद्देश्य सफलतापूर्वक स्थापित न कर दिया जाए तब तक हत्यारों के बच निकलने की पूरी संभावना रहती है। लेकिन जांच अधिकारी जानते -बूझते इस पक्ष को अनदेखा कर रहा है और लोक अभियोजक इसमे उसकी सहायता कर रहा है। जबकि इसके विपरीत स्वामी जी की हत्या में चर्च का उद्देश्य या मोटिव बिल्कुल स्पष्ट है । चर्च लम्बे अर्से से ओडीशा के जनजातीय समाज को मतांतरित करके वहां एक नए ईसाई राष्ट्र की स्थापना में जुटा हुआ है। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती उनके इन अराष्ट्रीय प्रयासों में दीवार बनकर खडे हो गए थे । ऑल इण्डिया क्रिश्चियन काउंसिल के महासचिव जॉन दयाल और सोनिया गांधी की कृपा से राज्यसभा सदस्य बने मतांतरित राधाकांत के बयानो में सरस्वती जी को लेकर चर्च की छटपटाहट स्पष्ट ही देखी जा सकती है। इन दोनों की गतिविधियों से ही कोई भी सरकार अंदाजा लगा सकती थी कि चर्च स्वामी जी की हत्या के प्रयत्न कर रहा है। कंधमाल जिला के ही घुंसर उदयगिरी ब्लॉक में बट्टीकला गांव के चर्च में, स्वामी जी हत्या से तीन दिन पहले बाकायदा एक बैठक में प्रस्ताव पारित करके हत्या करने का निर्णय लिया गया। और इस प्रस्ताव को बाकायदा कार्रवाई रजिस्टर में भी दर्ज किया गया। कहा जााता है कि इस बैठक में राज्य सरकार का एक अधिकारी भी उपस्थित था। बट्टीकला चर्च की इस बैठक की मीडिया में भी काफी चर्चा हुई थी। इसी प्रकार राइकिया चर्च में हत्या से पहले हुई बैठक में इसी प्रकार की चर्चा हुई। लेकिन सरकारी जांच अभिकरणों ने बट्टीकला चर्च में स्वामी जी की हत्या के लिए पारित इस प्रस्ताव का नोटिस लेना भी जरुरी नहीं समझा।

कंधमाल जिला में चर्च की एक गैरसरकारी संस्था जनविकास काफी लम्बे अर्से से संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त है। इस संस्था ने स्वामी जी की हत्या के कुछ दिन पहले भारतीय स्टेट बैंक से 1 करोड़ रुपया निकलवाया। आखिर उस 1 करोड़ रुपए का क्या किया और उसे निकलवाने का उद्देश्य क्या था? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि हत्या में चर्च की संलिप्तता को लेकर मिलने वाले इन स्पष्ट संकेतों को और तथ्यों को जांच अधिकारी ने एकदम से दरकिनार कर दिया। हत्या के बाद चर्च ने अनेक गांवों में हत्या पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सार्वजनिक भोजों का आयोजन किया। उक्त सभी घटनाएं हत्या में चर्च की षडयंत्रपूर्ण भूमिका की ओर संकेत करती हैं। माओवादियों की इस हत्या में केवल एक ही भूमिका हो सकती है, वह यह कि चर्च ने उनको इस हत्या के लिए सुपारी दे दी हो। ओडीशा में माओवादियों की कार्यप्रणाली का अध्ययन करने वाले विद्वान अच्छी तरह जानते हैं कि अनेक स्थानों पर माओवादी पैसा लेकर भाड़े के हत्यारों के रुप में बदल गए हैं। इस हत्याकांड में उनकी भूमिका भाडे के हत्यारों की ही हो सकती है, षडयंत्रकारियों की नहीं। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को चर्च ने ही अपना दुश्मन न.-1 घोषित किया हुआ था और जॉन दयाल तो सार्वजनिक रुप से यह कहते रहे कि चर्च का विरोध करने के कारण लक्ष्मणानंद सरस्वती को जेल में डाला जाना चाहिए लेकिन जांच अधिकारी और लोकअभियोजक हत्या के असली षडयंत्रकारियों को जांच के दायरे से बाहर करने में जुटे हुए हैं और भाडे के हत्यारों को केस कमजोर करके सजा से बचाने की मशक्कत में लगे हुए हैं।

हत्या के एक दिन बाद नवगांव थाना के अंतर्गत गुंजीवाड़ी गांव में लोगों ने दो व्यक्तियों को पकडा था जो गांव के जौहड में खून से सने कपडे धो रहे थे। उसके पास से नकाब भी बरामद हुए और हथियार भी। गांव के लोगों ने उनको पकडकर पुलिस के हवाले किया लेकिन पुलिस ने उनको छोड ही नहीं दिया बल्कि जांच करने वालों ने उनको किसी प्रकार की जांच में शामिल नहीं किया। इसी प्रकार कंधमाल जिला के बाराखमा गांव में हत्या के कुछ दिन बाद लोगों ने कुछ अपराधियों को पकड़कर पुलिस के हवाले किय। लेकिन पुलिस ने बिना किसी जांच के उन्हें भी भगा दिया। ध्यान रहे, हत्या के उपरांत उस समय की अपराध शाखा के आईजी ने स्पष्ट रुप से यह कहा था कि स्वामी जी की हत्या एक गहरी साजिश का नतीजा है। इसकी साजिश केरल में हुई थी। एक ग्रुप ने हत्या के साजिश की और पूरी योजना बनायी और दूसरे गु्रप ने इस हत्या को अंजाम दिया। ताज्जुब है कि बाद में पुलिस ने अपनी जांच में इसको नजरंदाज किया। कुलमिलाकर पुलिस ने अभी तक इस हत्या में दो आरोपपत्र दाखिल किए हैं। पहले आरोपपत्र में 7 अभियुक्त में हैं और दूसरे पूरक आरोपपत्र में अन्य 7 माओवादी मसलन सव्यसांची पांडा, आंध्रपदेश के दो माओवादी दूना केशवराव आजाद, पोलारी रामराव व छत्तीसगढ के तीन माओवादी दुसरु, लालू और लकमू के नाम शामिल हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अभी तक उनकी भी शिनाख्ती परेड नहीं हुई। पुलिस ने हत्या के बाद हत्यारों का जो स्केच जारी किया था उससे भी इन अभियुक्तों का मिलान नहीं किया गया। यदि सरकार सचमुच केस में रुचि रखती होती तो इन अभियुक्तों को शिनाख्त के लिए चश्मदीद गवाह ब्रह्मचारी माधव चैतन्य के सम्मुख जरुर प्रस्तुत किया जाता क्योंकि हत्या के चश्मदीद होने के कारण वही इस स्थिति में थे कि ये 14 लोग हत्या में शामिल थे या नहीं। या फिर इसमे से कौन-कौन लोग हत्या में शामिल थे? अभियोजन पक्ष ने शिनाख्ती परेड की बात तो दूर चश्मदीद गवाह माधवचैतन्य को अपना पक्ष रखने का सही अवसर भी नहीं दिया । जाहिर है कि सरकार कि मंशा सत्य को न्यायालय से छिपाने की रही होगी न कि उसे न्यायालय के सामने लाने की। बहुत ही स्पष्ट साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य सबूतों के बावजूद ओडीषा सरकार ने इस हत्या से चर्च को बडी सफाई से बचा लिया।

ब्रह्मचारी माधव चैतन्य ने 2009 में अंततः उच्च न्यायालय में याचिका दायर की कि इस हत्या की जांच किसी निश्पक्ष जांच अभिकरण या सीबीआई से करवायी जाए ताकि स्वामी जी के असली हत्यारे पकडे जाएं और उसके पीछे छिपे षडयंत्रकारियों का भांडाफोड भी हो। याचिकाकर्ता के अनुसार विक्रम दीगाल, विलियम दीगाल और प्रदेश कुमार दास की इस हत्या में प्रमुख भागीदारी थी। लेकिन जांच अधिकारी ने इनके खिलाफ सरसरी तौर पर ही जांच की। यदि सरकार के पास छिपाने के लिए सचमुच कुछ नहीं था तो उसे तुरंत यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए थी और पूरी जांच सीबीआई या किसी अन्य जांच एजेंसी को सौंप देनी चाहिए थी। इससे सरकार की छवि पर हत्या में शामिल अपराधियों को बचाने का कलंक भी धुल जाता और पर्दे के पीछे के देश विरोधी तत्व भी सामने आ जाते। लेकिन ओडीशा के लोगों को सबसे ज्यादा ताज्जुब तब हुआ जब सरकार ने इस याचिका का डटकर विरोध करना शुरु कर दिया । उच्च न्यायालय ने सरकार से याचिका में उठाए गए तमाम मुद्दों पर शपथ-पत्र दाखिल करने के लिए कहा। सरकार ने अपने शपथ-पत्र में कहा, जांच के दौरान प्राप्त हुए सबूतों ने प्रथम दृष्टतया यह स्थापित कर दिया है कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और आश्रम के दूसरे लोगों की हत्या कट्टर माओवादियों ने अपने समर्थकों के साथ किया है। जाहिर है कि इस शपथ-पत्र से किसी की संतुष्टि नहीं हो सकती थी अतः न्यायालय ने सरकार को स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में जो मुद्दे उठाए हैं वे अभी तक अनुत्तरित है। एक नए शपथ-पत्र में उन सभी का संतोषजनक उत्तर दिया जाए। इस पर सरकार इन मुद्दों का उत्तर देते हुए शपथ-पत्र दाखिल करने का साहस नहीं कर सकी। ओडीशा सरकार के महाधिवक्ता ने तकनीकी आधारों पर याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्यों से बचने का और उन्हें किसी भी तरह हत्याकांड से संबंधित चल रहे केस में न शामिल किए जाने का भगीरथ प्रयास किया। परन्तु याचिकाकर्ताओं द्वारा हत्याकांड से संबंधित सामग्री इतनी पुख्ता और प्रामाणिक थी कि अंततःउच्च न्यायालय की एकल पीठ के न्यायाधीश श्री एम.एम.दास ने जांच अधिकारी को नए सिरे से हत्या की जांच करने का आदेश दिया और यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने जो सामग्री उपलब्ध करवायी है, उसको ध्यान में रखते हुए जांच को आगे बढ़ाया जाए।

जाहिर है कि इससे ओडीशा सरकार के हत्यारों को बचाने के प्रयासों को धक्का लगा है। लेकिन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती कि हत्या के षडयंत्रकारियों के खिलाफ इस लड़ाई का अंत नहीं हुआ है। दूध का दूध और पानी का पानी तभी होगा जब जांच अधिकारी को हटाकर यह जांच किसी स्वतंत्र जांच अभिकरण को सौंप दी जाती है। लगता है इसके लिए भारत के लोगों को चर्च के षडयंत्रकारियों और उनके पीछे छिपी भारत विरोधी शक्तियों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़नी होगी।

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2 Comments on "स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड में उच्च न्यायायलय की फटकार"

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डॉ. राजेश कपूर
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कमाल है ! इस सोनिया सरकार की कीर्ति मैं एक और सितारा लग गया. हिन्दू संतों की ह्त्या सरकार के सहयोग से चर्च के गुंडों द्वारा करवाई जाती है. जांच के नाम पर कुछ भी उलटा-सीधा चलता रहता है. हत्यारे आराम से सुरक्षित घुमाते रहते हैं. आतंक्व्व्दियों को सरकारी सुत्रक्षा मिलाती है. जिहादियों को मारने वाले नरेंद्र मोदी जैसे देशभक्त झूठे मुकद्दमें झेलते हैं. ऐसा कमाल तो इस देश में इससे पहले कभी नहीं हुआ. धन्य हो सोनिया जी. आप सचमुच महानता की देवी हैं. जो भारत में कभी कोई नहीं कर सका आपके प्रताप से वह सब आज हो… Read more »
shakt dhyani
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कुलदीप जी चर्च के संजाल से कई बार पाठकों को आगाह करते रहे हैं हमारे साधू समाज के पीछे सर्कार तो पेचे पड़ी हे है मीडिया भी उन्हें खलनायक बनाकर प्रस्तुत करता है लाक्स्मानानंद जी का जीवन प्रेरणाप्रद है इस जानकारी के लिए कुलदीप जी का dhanyavad

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