लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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-आलोक कुमार- road

सड़कों के मामले में बिहार की हालत अभी भी चिंतनीय ही हैl “राष्ट्रीय स्तर पर प्रति लाख आबादी पर 257 किलोमीटर सड़क है, जबकि बिहार में प्रति लाख आबादी पर मात्र 90 किलोमीटर सड़क ही हैl” फिर भी पूरी दुनिया में ये शोर है कि बिहार में सडकों का जाल बिछा दिया गया है l प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में जहां दूसरे राज्यों में 60 फीसदी काम हुआ है, वहीं बिहार की उपलब्धि मात्र 35 फीसदी ही हैl पूरे प्रदेश में सड़कों की गुणवत्ता पर सवालिया निशान उठते रहे हैं l ग्रामीण इलाकों में लोग अक्सर ये शिकायत करते हुए मिल जाते हैं कि सड़कें निर्माण के चंद महीनों बाद ही टूट जा रही हैं l सीएजी ने भी पूर्व में इस बारे में सवाल खड़े किए थेl बिहार के ज़्यादातर इलाकों में राजमार्गों और बड़ी सड़़कों को ग्रामीण इलाकों से जोड़ने वाली छोटी और मध्यम सड़कें बदहाली की स्थिति में हैं l यहाँ एक उदाहरण उद्धृत करना चाहूँगा ( वैसे तो अनेकों उदाहरण मौजूद हैं लेकिन इस उदाहरण की महत्ता इस लिए भी ज्यादा है कि ये प्रदेश की राजधानी से बिलकुल सटा हुआ इलाका है ) , बिहार की राजधानी पटना से सटे सोनमई ग्राम पंचायत से एक12 फुट चौड़ी सड़क पटना-गया राष्ट्रीय राजमार्ग तक आती है। यह सड़क इस क्षेत्र की बहुत पुरानी सड़क है तथा यह इस पंचायत के साथ अन्य 3 पंचायतों के 12 ग्रामों के निवासियों के लिए “लाइफ –लाईन” है। यह सड़क इस समय इतनी बुरी हालत में है कि महज 2 किलोमीटर का रास्ता तय करने में ही केवल सवार ही नहीं, बढि़या से बढि़या गाड़ी भी हांफ जाती है। इस क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि बरसों से हम इस सड़क की मरम्मती का टेंडर पास हो जाने की खबरें तो सुनते चले आ रहे हैं, लेकिन खबरें सिर्फ और सिर्फ खबरें बनकर ही रह गयी हैंl बनायी गई सडकों के बारे में पूर्व में खुद सरकार ने सदन में स्वीकार किया है कि राज्य में बनाई गयी सड़कों की गुणवत्ता काफी घटिया स्तर की है। ज्यादातर सड़कों पर कोलतार की परत चढ़ाकर देखने में अच्छा बना दिया जाता है, वस्तुतः जिसकी उम्र दो से चार महीने से ज्यादा की नहीं होती। हर बार बरसात गुजरने के बाद प्रदेश के सड़कों की दशा देखी जा सकती है। हाल ही में पटना से छपरा – सीवान जाने के क्रम में मैंने जब छपरा के एक स्थानीय निवासी से छपरा, सीवान सड़क की खराब दशा के बारे में पूछा तो उन्होंने शायराना अंदाज में कहा “सब माया है सड़कों के जाल बिछाने का, कोई इस सूरते-ए-हाल का सबब ‘हूजूर’ से तो पूछे ?”

प्रदेश के नक्सल प्रभावित जिलों के अधिकांश इलाकों में (जमुई, मुंगेर, गया, नवादा , औरंगाबाद , जहानाबाद , अरवल, रोहतास, शिवहर, सीतामढ़ी, पश्चिमी चंपारण इत्यादि) ग्रामीण सड़कों का निर्माण कार्य भी अरसे से ठप्प ही पड़ा है। इन जिलों में गंभीर नक्सल समस्या के चलते सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण के लिए कोई ठेकेदार नहीं मिलने से काम शुरू ही नहीं हो पाता है। ये एक गंभीर मसला हैl इन इलाकों में सड़कों के न बनने से इन क्षेत्रों का विकास पूरी तरह ठप है और निवासीयों को मूलभूत जरूरतें भी बड़ी मुश्किल से मुहैया हो पाती हैं। प्रदेश की सरकार की उदासीनता से हालात और खराब हुए हैं। ठेकेदारों को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने में प्रदेश सरकार की नाकामी की वजह से ना तो नयी सड़कों का निर्माण ही पा रहा है ना ही पुरानी सड़कों की मरम्मती। पुरानी सड़कें गड्ढों में तब्दील हो गई हैंl

सुशासन के ‘अंधभक्त’ अकसर NHAI के द्वारा बनाई गई सड़कों का श्रेय भी प्रदेश की सरकार को ही देते हुए दिखाई देते हैं और राजधानी पटना की वीआईपी या अन्य शहरों की चंद सड़कों की दुहाई देते हैं l ऐसे लोगों से मेरा सवाल है कि जब आप समग्र विकास की गंगा बहाने का दावा कर रहे हैं तो विकास तो सभी जगहों पर परिलक्षित होना चाहिए! सुशासनी समर्थक एवं यहाँ तक की सूबे के मुखिया भी अनेक अवसरों पर पूर्व के लालू – राज की सड़कों से अपने कार्य-काल की सड़कों को बेहतर बताते हुए दिखते हैंl इस संदर्भ में मैं सूबे के मुखिया से पूछना चाहता हूं कि वो तो घोषित “जंगल-राज” था और इसी वजह से जनता ने आप को मौका दिया, आप उससे अपनी तुलना क्यूं करते हैं ? आप विकास के मामले में नंबर वन होने का दावा करते हैं तो अपनी तुलना विकसित प्रदेशों की सड़कों से क्यूं नहीं करते ? जहां और जब आप की परियोजनाएं फेल होते हुई दिखती हैं तो आप ठीकरा केंद्र की सरकार पर फोड़ते हुए दिखते हैं या विपक्षीसाजिश का रोना रोते हैं, लेकिन श्रेय लेने का एकाधिकार सदैव अपने पास ही रखते हैं ऐसा क्यूं ?क्या आप जवाब दे सकते हैं कि पिछले साढ़े आठ सालों के दौरान आपके द्वारा ही घोषित और शिलान्यास किए हुए कितनी फोरलेन-सड़कों का निर्माण कार्य पूरा हो पाया है ? मेरे हिसाब से एक भी पूर्ण रूप से निर्मित नहीं हुई हैl क्या साढ़े आठ सालों का कार्य-काल अपर्याप्त होता ,है फोरलेन सड़़कों के निर्माण के लिए ? चंद सालों में जब वर्ली सी–लिंक एवं मेट्रो रेल जैसी महती और वृहत परियोजनाओं का निर्माण संभव हो सकता है तो क्या फोरलेन सड़कों के निर्माण के पीछे कोई गूढ़ विज्ञान छिपा है ?

 

अंत में मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि बिहार के किसी एक जिले में सड़कें अगर किसी चर्चित अभिनेत्री के गालों सरीखी चिकनी हैं तो वो एकमात्र जिला सूबे के मुखिया का गृह – जिला नालंदा है , बाकी जगहों की अधिकांश सड़कें ओम पुरी जी की गालों के माफिक ही हैं l

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