लेखक परिचय

रोहित श्रीवास्तव

रोहित श्रीवास्तव

रोहित श्रीवास्तव एक कवि, लेखक, व्यंगकार के साथ मे अध्यापक भी है। पूर्व मे वह वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के निजी सहायक के तौर पर कार्य कर चुके है। वह बहुराष्ट्रीय कंपनी मे पूर्व प्रबंधकारिणी सहायक के पद पर भी कार्यरत थे। वर्तमान के ज्वलंत एवं अहम मुद्दो पर लिखना पसंद करते है। राजनीति के विषयों मे अपनी ख़ासी रूचि के साथ वह व्यंगकार और टिपण्णीकार भी है।

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21वी शताब्दी है ‘इंटरनेट और वेब मीडिया’ की ……..

 कहा जाता है मनुष्य सभी जीवों मे सबसे श्रेष्ठ जीव है। आदि-मानव के काल से आज कलयुग की 21वी शताब्दी मे ‘वह’ कहाँ से कहाँ पहुँच गया है। हर एक शताब्दी अपनी किसी न किसी चीज़ के लिए पहचानी जाती है। ऐसे ही 21वी शताब्दी ‘इंटरनेट और वेब मीडिया’ के युग की शताब्दी मानी जा रही है। अब आपको रेल टिकट, हवाई टिकट के लिए लंबी कतार मे लगने की आवश्यकता नहीं है। झट से कुछ सेकंड मे इंटरनेट के माध्यम से टिकट आपके हाथ मे होता है। मॉल, बाज़ार या दुकान जाने से थक जाएंगे तो घर बैठे ऑनलाइन ऑर्डर कर शॉपिंग कर सकते है। मानो तो इंटरनेट ने मनुष्य के जीवन को एकदम सरल और सुगम बना दिया है। इन सारी सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए आपको एक सक्रिय इंटरनेट कनैक्शन वाला जीपीआरएस समर्थ वाला फोन या कम्पुटर लेने की आवश्यकता होती है। इसके बाद सारी दुनिया ‘वेब की उँगलियों’ पर नाचती है। सच कहूँ तो इंटरनेट ने सूचना एवं प्रोढ़ोगिकी के क्षेत्र मे एक क्रांति लाने का काम किया है।

 

‘वेब मीडिया’ के विभिन्न रंग…….

 

इंटरनेट के वैसे तो बहुत सारे कार्यकारी अंग है अपितु उनमे से सबसे उत्तम और प्रभावी आज के आधुनिक दौर के प्रपेक्ष मे वेब (सोशल) मीडिया और सर्च इंजिन है। विशेष रूप से अगर भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो हाल के कुछ वर्षो मे वेब मीडिया का महत्व अपेक्षानुसार जरूर बढ़ा है। सर्च इंजिनो मे ‘गूगल’ सबसे सर्वश्रेष्ठ है। आप दुनिया के किसी भी कोने से, कही से भी, कैसी भी, कोई भी जानकारी प्राप्त करना चाहते है तो ‘गूगल बाबा’ से पूछिये आपकी हर एक समस्या का निवारण उनके पास है। आज गूगल ने हर वर्ग, हर क्षेत्र, हर उम्र के आदमी का काम आसान बना दिया है। किसी का भी गूगल के बिना काम नहीं चलता है। क्या नेता, क्या अभिनेता, क्या विध्यार्थी, क्या महारथी, क्या बीवी, क्या पति सबको छोटे से छोटे काम के लिए अब गूगल चाहिए। आज दुनियाभर के कई लोगो की नौकरी पूर्णत: गूगल पर निर्भर है। गूगल पर एक ‘गूगल-श्लोक’ बनता है। गूगल ही ‘अन्नदाता’ गूगल ही ‘माता’….’गूगल बाबा के बिना अब किसी का काम नहीं चल पाता’।

बात की जाए गूगल के परिवार की जिसमे जीमेल की ईमेल सर्विस लोगो को सूचनाओ के आदान-प्रदान करने मे बड़ी कारगर साबित हुई है। आप अपने संदेश के साथ विडियो,फोटो, कैसी भी फ़ाइल संलग्न करके कितनी भी दूरी पर बैठे व्यक्ति को भेज सकते है। आपका संदेश प्राप्त करने मे उस व्यक्ति को कुछ क्षण ही लगते हैं। आदमी देश-विदेश मे रोजगार के अवसरो के कारण जाता है, प्रतिबध्द्ता के कारण, अपने कार्यालयी कर्तव्यों को निभाने के लिए वह अपने घर-स्वदेश नहीं आ पाता। यह ‘विडियो-चैट’ तकनीकी उस मन की व्यथा को कही हद तक दूर करती है। हम अपने परिजनो को स्पर्श तो नहीं कर पाते पर उनके दिलो को जोड़ भी लेते है और छू भी लेते है अपनी मन की आँखों से। दूरिया कम हो जाती है ऐसा लगता है कोसो दूर बैठा आपका कोई अपना आपके पास आ गया हो। आज इतनी व्यस्त ज़िंदगी मे यह नई तकनीकी बड़ी प्रभावकारी है। सच मायनों मे आज इस आधुनिक युग मे इंटरनेट और वेब मीडिया को पूर्ण रूप से स्वीकार कर अपना लिया है। पिछले कुछ वर्षो मे इसकी महत्ता और स्वीकार्यता दोनों बढ़ी है। आज आप देखेंगे तो पाएंगे लगभग देश-विदेश के हर सरकारी, गैर-सरकारी, निजी संस्था का कंप्यूटरीकरण हो गया है। उन सभी का संचालन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इंटरनेट की सेवाओ पर निर्भर है।

 

भारत मे मीडिया का प्रसार

 प्राचीन काल से सूचनाओ का आदान-प्रदान करने के लिए बहुत तरीके अपनाए गए है। राजाओ से लेकर मुग़लो के दौर मे उनका संदेश दूसरे राज्य या नगर मे एक दूत लेकर जाता था। रामायण की पौराणिक कथा के अनुसार रामभक्त हनुमान भी पुरुषोत्तम के आदेशानुसार रावण की लंका मे दूत बन के गए थे। कई लोग पुराने समय मे अपना संदेश पहुंचाने के लिए कबूतर का भी प्रयोग करते थे। ऐसी ना जाने कितनी प्रचलित तरीके थे जिससे लोग अपनी बात एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा सकते थे। युगान्तर मे संचार के साधनो मे काफी परिवर्तन आया है। मानव ने अपनी सुविधानुसार कई चीज़ों का आविष्कार किया। स्कॉटलैण्ड के अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने 1876 मे ‘टेलीफ़ोन’ का आविष्कार किया। मानव के प्रगतिशील विकास की राह मे उन दिनो मे यह एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा था। प्रगति पथ पर आगे जाकर ना जाने कितने आविष्कार हुए और कितनी खोजे जिसने मानव जीवन के कितने राज खोलते हुए उसके जीवन को साधारण से उत्कृष्टता की और धकेल दिया।

नवयुग मे चल पड़ा था अखबारों का दौर, कागजो पर छपने लगी तस्वीरे और खबरें। भारत मे ब्रिटिश शासन मे अँग्रेजी भाषा मे कलकत्ता गेजेट (1784), बंगाल जर्नल (1785), मद्रास कोरिएर (1785), बॉम्बे हेराल्ड (1979) जैसे साप्ताहिक अखबार विभिन्न शहरों मे प्रकाशित होने लगे थे। उस दौर मे कुछ हिन्दी प्रमुख अखबारों दैनिक जागरण (1942) दैनिक नवज्योति (1936) मराठी और बंगाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओ मे भी प्रकाशन होता था। आजादी की लड़ाई मे इन सभी अखबारों मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वो एक ऐसा समय था जब आम जनता को देश की अहम गतिविधियों की जानकारी हफ्ते के हर 7 दिन बाद मिलती थी। गाँव-देहात मे रेडियो के माध्यम से खबरे पहुँच पाती थी। अंग्रेजों का देश की स्वतंत्र पत्रकारिता पर पूर्ण नियंत्रण था उन्हे डर था ‘कागज़ का एक टुकड़ा’ आज़ादी की चिंगारी को हवा दे सकता था। ब्रिटिश काल मे प्रैस के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई संवैधानिक प्रावाधान भी मौजूद नहीं था। 1947 मे देश मे आज़ादी के बाद एक स्वतंत्र सरकार स्थापित हुई। भारतीय बुद्धिजीवियों की कड़ी-मेहनत के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत का अपना संविधान पास हुआ। संविधान विधिकर्ताओं ने दूरदर्शी सोच के साथ प्रैस की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए कई कड़े प्रावधान दिये शायद उन्हे लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ के भविष्य के प्रपेक्ष मे महत्व का आभास था। आज भारत मे प्रैस को निष्पक्ष एवं स्वतंत्र पत्रकारिता की पूर्ण रूप से आज़ादी है।

 

आधुनिक युग मे भारतीय मीडिया

एक वो दौर था और एक आज का दौर है। जहां पहले ‘अखबार’ साप्ताहिक था, हफ्ते मे एक बार खबरें मिलती थी। अब ब्रेकिंग न्यूज़ के साथ मिनट-मिनट मे पल-पल क्षण-क्षण देश-विदेश कोने-कोने की खबर मिलती है। पहले एक जमाना था टीवी पर केवल दूरदर्शन आता था। अब रिमोट हाथ मे आते ही समझ नहीं आता हमारे नज़रों की सुई किस चैनल पर जाकर रुकेगी। पत्रकारिता का अंदाज़ बिलकुल बदल गया है आज घटना बाद मे होती है खबर पहले छप जाती है। आजकल खबरों का स्केल बढ्ने से अखबारो, पत्रिकाओ और न्यूज़ चैनलस की संख्याओं मे इजाफा हुआ है। आज जितनी तो दिन मे खबरे नहीं होती उतने तो आपके केबल नेटवर्क पर चैनल उपलब्ध है। रेडियो की भी दुनिया भी बदली-बदली लगती है। एक समय था जब विविध-भारती के सुप्रसिद्ध ‘हवा-महल’ प्रोग्राम को सांयकाल मे बड़ी चाव से सुनते थे अब उधर भी ‘एफ़एम’ के ‘रेडियो मिर्ची’ ‘एफ़एम रेनबो’ ‘रेडियो सिटि’ जैसे तरह-तरह के चैनल आ गए है।

 

सोशल मीडिया का जन्म

आधुनिकता और प्रतिष्पर्धा के इस दौर मे जहां पहले से खबरों की स्रोतों के इतने सारे माध्यम मौजूद थे वहाँ एक ‘सोशल मीडिया’ नाम की बला ने भी जन्म ले लिया था और 2014 आते-आते इस बला ने पूरी तरह से सबको पछाड़ते हुए अपनी ‘अद्वितीय-पहचान’ भी बना ली है। ‘सोशल मीडिया’ जो लोगो की पहली पसंद बन गया है। इसके शाब्दिक अर्थ का सीधा मतलब निकल कर आता है ‘जनता की अपनी आवाज़’। वो आवाज़ जो उसके अपने लोगो से ही निकाल कर उसे सुनाई जाती है। न कोई चैनल……. न कोई अखबार….. सिर्फ आप की खुद की आवाज़ आपकी खबरों के ज्ञान की भंडार।

आइये सोशल मीडिया के घटको की बात करते हैं। आज इंटरनेट की दुनिया मे लोगो के पास असंख्य सोशल मीडिया प्लैटफ़ार्म उपलब्ध हैं। जहां लोग एक-दूसरे से आसानी से संपर्क बना सकते है। अपनी सूचनाओ एवं खबरों को सरलता से आपस मे साझा कर सकते हैं। उनमे से सबसे प्रचलित फेसबूक और ट्वीटर सबसे कही आगे है। फेसबूक से पहले गूगल परिवार का ‘ऑर्कुट’ सोशल प्लैटफ़ार्म का सबसे बड़ा नाम था पर ‘एफ़बी’ के करिश्माई प्रभाव ने इस साल उसके अस्तित्व को ही खत्म कर दिया। गूगल ने इस साल 30 सितंबर 2014 को ऑर्कुट की सेवाए एकदम से समाप्त कर दी। आज फेसबूक लोगो की (विशेष तौर पर ज़्यादातर भारतीयों की) पहली पसंद है। दूसरा नंबर आता है टिवीटर का जिसे ‘सेलेब्रिटीयों का अड्डा’ भी कहा जाता है। नेता से लेकर अभिनेता एवं जानी-मानी हस्तियाँ सब आपको ‘टिवीटर’ पर मिलेंगे वो भी ‘ओरिजिनल’!

यहाँ एक अजीब सा प्रश्न मुझे और शायद आपको भी परेशान करता होगा कि मीडिया के इतने साधनो के बाद भी ‘सोशल मीडिया’ अस्तित्व मे क्यों आया ? क्या पहले से मौजूद मीडिया के स्रोत निरर्थक और असक्षम हो गए थे जो सोशल मीडिया का जन्म हुआ? ऐसे कितने प्रश्न है जो मन को चिंतन करने को विवश करते है। वैसे असल मे आत्म-चिंतन और अवलोकन तो प्रिंट और टीवी मीडिया वालों को करना चाहिए जिनकी निष्पक्षता और स्वतंत्र पर बार-बार दाग लगे है शायद उसी ‘दाग’ को साफ करने के लिए ही ‘सोशल मीडिया’ ने जन्म लिया। बहुत लोगो को ‘पैड-न्यूज़’ का भी दोषी पाया गया। कई चैनल हाउस पर पैसे लेकर न्यूज़ दबाने का आरोप लगा। लोकतन्त्र के महत्वपूर्ण अंग की नीलामी को रोकने के लिए ही ‘सोशल मीडिया’ अस्तित्व मे आयी दिखती है।

सोशल मीडिया का वर्तमान प्रपेक्ष मे महत्व एवं स्वीकार्यता

एक रिपोर्ट के अनुसार केवल भारत मे फेसबूक और टिवीटर पर सक्रिय भारतीयों के सदस्यों की संख्या क्रमश: 100 मिलियन और 33 मिलियन के पार हैं। यह आंकड़ें अचंभित करने वाले हैं सोचिए इतने सारे लोगो के बीच सूचनों के आदान-प्रदान की सीमा क्या होगी? भारतीय दृष्टिकोण से देखने पर मालूम चलता है कि पिछले कुछ वर्षो मे मे ‘सोशल मीडिया’ ने भारतीय परिसीमा मे ‘गेम-चेंजर’ की भांति कार्य किया है। चाहे बात हो राजनीति की या व्यापार या फिर शिक्षा की हर क्षेत्र मे ‘सोशल मीडिया’ ने अपनी अद्भुत्त शक्ति दिखाई है। आज लोग फेसबूक के माध्यम से अपने व्यापार का प्रचार, चुनाव का प्रचार प्रभावी तौर पर कर पा रहे हैं। शिक्षा एवं स्वास्थ्य की जानकारीयां सोशल मीडिया से प्राप्त हो रही है। पहले लोग करोड़ो विज्ञापन पर खर्च करते थे और उम्मीद के मुताबिक उन्हे रिज़ल्ट भी नहीं मिल पता था आज लोग अपने बिजनेस का फेसबूक पेज के माध्यम से कम लागत मे ही प्रचार कर रहे हैं जिनका उन लोगो को सही दिशा मे सकरात्मक परिणाम भी मिल रहा है। आइए हम उन सभी परिणामों का बारी-बारी निष्पक्ष विश्लेषण और आकलन क्रमानुसार करने की कोशिश करते हैं।

 

  • ‘नमो’ की ‘सोशल मीडिया’ सेना का कमाल  लोकसभा चुनावो मे सोशल मीडिया के प्रभाव को अधध्यन करने पर कई चौकाने और चकराने वाले तथ्य एवं आंकड़े बाहर आए है। चुनाव आयोग की लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद केवल फेसबूक पर 29 मिलियन लोगो ने 227 मिलियन बार चुनाव से संबन्धित पारस्परिक क्रियाए (जैसे पोस्ट लाइक, कमेंट, शेयर इत्यादि) की। इसके अतिरिक्त 13 मिलियन लोगो ने 75 मिलियन बार केवल नरेंद्र मोदी के बारे मे बातचीत की। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है की 814 मिलियन योग्य मतदाताओ वाले देश भारत मे सोशल मीडिया का प्रचार का पैमाना लोकसभा चुनावों के दौरान विशालमय था। तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी लोकसभा चुनावो मे सोशल मीडिया के रोल को स्वीकारा और सराहा था।

 

  • ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे शायद आज भी नहीं भूल पाये होंगे आप। यह नारा सोशल मीडिया के प्लैटफ़ार्म पर आग की तरह फ़ेल गया था जिसकी लपेट मे सारी विपक्षी पार्टियां भारतीय जनता पार्टी के तेज मे जलकर भस्म सी हो गई। ‘हर हर मोदी…घर घर मोदी’ जैसे विवादास्पद नारों को लेकर विरोधियों ने मोदी को निशाना बनाने का असफल प्रयास जरूर किया पर वो करवा रुका नहीं अंतत: चलता रहा । जितना प्रचार ‘धरातल’ पर नहीं हुआ उससे 100 गुना प्रचार ‘सोशल मीडिया’ पर मोदी की ‘वर्चुअल सेना’ करती नज़र आती थी। परिणामस्वरूप सभी की मेहनत रंग लाई और 16 मई 2014 को मोदी ने इतिहास रच दिया। अकेले दम पर दो-तिहाई से ज्यादा 282 सीट के साथ बीजेपी को जनता का पूर्ण बहुमत मिला था। यह जनादेश सही मायने मे काँग्रेस के खिलाफ जनता के आक्रोश के रूप मे भी देखा गया जिसने मानो काँग्रेस को जड़ से ही उखाड़ फेका हो। सत्तारूढ़ दल को मात्र 44 सीटों के साथ संतोष करना पड़ा था। यह सोशल मीडिया का जोश ही थे जिसने मोदी के पक्ष मे ऐसी हवा बनाई की उसके झोके मे सब उड़ से गए। बीजेपी के अंदर भी मोदी-विरोधियों की बोलती बंद करने मे भी ‘सोशल मीडिया’ का अहम योगदान रहा है। एक तरह मोदी के विरोध मे चुनाव से पहले कई वैबसाइट की शुरुआत हुई तो मोदी सेना भी पीछे नहीं रही उसके जवाब मे उन्होने कई वैबसाइट ,न्यूज़ पोर्टल, फेसबूक पेजो को जन्म दिया।
  • नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा चुनावों मे अप्रत्यासित जीत मे वेब (सोशल) मीडिया की भूमिका को आप दरकिनार नहीं कर सकते है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया के महत्व की कई मंचो पर स्वयं स्वीकृति दी है। विपक्षियों ने तो उन सभी लोगो को जो नमो का सोशल मीडिया प्लैटफ़ार्म पर समर्थन करते नज़र आए उनको ‘नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया सेना’ के सदस्य के रूप मे संबोधित करना शुरू भी कर दिया था। जिस ‘मोदी लहर’ की मीडिया वाले आए-दिन अपनी ‘न्यूज़-डिबेट’ मे चर्चा करते है उस लहर को आक्रामक बनाने मे ‘सोशल मीडिया’ का अहम किरदार रहा है। आपको नहीं भूलना चाहिए चुनावो से पहले मोदी के खिलाफ राजनेता से लेकर अभिनेता, समाजसेवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, पूर्वाग्रहीत मीडिया ने जमकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मोदी का जमकर विरोध किया था। यह वही ‘सोशल मीडिया’ है जिसने ऐसे सभी मोदी विरोधी समूहो के प्रभाव को या तो पूरी तरह से खत्म कर दिया या फिर कम करने का काम किया था
  • गुरु-चेले को पहुंचाया ‘फर्स से अर्श’ पर  

 

  • हम यहाँ बात कर रहे है अन्ना हज़ारे और आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल की। इन दोनों को ‘जीरो’ से ‘हीरों’ बनाने मे सोशल मीडिया का अहम योगदान रहा है। बात की जाए अन्ना के भ्रष्टाचार आंदोलन की जिसने देशव्यापी लोगो मे एक जुनून सा पैदा कर दिया था। लोग अन्ना के समर्थन मे सडको पर आ गए थे। जो हुजूम रामलीला मैदान पर जमा वो देखने ही वाला था। मानो (जैसा अन्ना हज़ारे बोलते थे) ‘दूसरी आज़ादी’ अर्थात भ्रष्टाचार से देश को आज़ाद कराने के लिए देश के बच्चे-बूढ़े, नौजवान मैं हूँ अन्ना…तू है अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना के साथ हज़ारे के अनशन के साथ खड़ा हुआ नज़र आया था। गौरतलब है की जनलोकपाल बिल को पास करने के लिए समाजसेवी अन्ना हज़ारे रामलीला मैदान पर अनशन पर बैठे थे। इस आंदोलन मे उनके सारथी और सहयोगी अरविंद केजरीवाल थे। यह सोशल मीडिया का ही करिश्मा था की छोटी सी चिंगारी को उसने जनाक्रोश मे तब्दील कर दिया था। तत्कालीन यूपीए सरकार दबाव मे आ गयी थी। सरकार ने भी सोशल मीडिया की शक्ति को स्वीकारा था। कई लोगो की आवाज़ को सोशल मीडिया पर दबाने की नापाक कोशिशे भी नाकाम रही थी। दुर्भाग्यवश, अन्ना और केजरीवाल की जोड़ी ‘जनलोकपाल’ को उसके अंजाम तक नहीं पहुंचा पायी। जिससे कुद्ध होकर केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बना डाली। दिल्ली मे 2013 के विधान सभा चुनावो मे केजरीवाल की ‘आप’ ने सबको भौचक्का करते हुए 28 सीट के साथ काँग्रेस के समथन के सहयोग से पहली ही बार मे दिल्ली मे सरकार बना डाली। इस ऐतिहासिक जीत मे भी सोशल मीडिया ने अहम किरदार निभाया था। केजरीवाल की ‘केजरी सेना’ का ही कमाल था कि इतने कम समय मे ही पार्टी ने न सिर्फ दिल्ली मे उम्मीद से बढ़ कर सीटे जाती बल्कि आगे जाकर सरकार भी बनाई। केजरीवाल कि बढ़ती आकांक्षाओ कहे या फिर ‘जनलोकपाल के मुद्दे’ पर ‘आप’ को शहीद घोषित करवाना उन्होने सिर्फ 49 दिन शासन करने के बाद खुद को दिल्ली की सत्ता से बेददखल कर लिया। 17 फरवरी 2014 से दिल्ली मे राष्ट्रपति शासन लागू है।
  • सामाजिक बुराइयों के खिलाफ एकजुट सोशल मीडिया

 

सोशल मीडिया ने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई मे एक ‘मेसेंजर’ बन के अहम किरदार निभाया है। लोगो की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने मे सोशल मीडिया कभी पीछे नहीं रहा है। सोशल मीडिया ने सामाजिक कुरुतियों को उजागर करने और जागरूकता फैलाने मे अहम भूमिका निभाई है। सरकार के ऊपर दबाव बनाने का जरिया बन गया है सोशल मीडिया। ‘आरुषि-हेमराज’ हत्याकांड, ‘दामिनी बलात्कार कांड’, गीतिका-गोपाल काँड़ा’ जैसे ना जाने कितने मामले है जहां सोशल मीडिया ने इंसानियत के नाते इंसाफ की जंग लड़ी है। कुछ मामलो मे तो यह कामयाब भी हुईं।

दिल्ली के दिलदहला देने वाले दामिनी बलात्कार कांड को लेकर सबसे ज्यादा आक्रोश सोशल मीडिया पर ही दिखा। लोगो ने सरकार और बलात्कारियों के खिलाफ एकजुटता के साथ एक मुहिम सी खोल दी थी। लोग आरोपियों पर कड़ी कार्यवाही कि मांग करने लगे थे। यह सोशल मीडिया का ही प्रभाव कहे या दबाव कि तत्कालीन सरकार ने आनन-फानन मे कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। पूरा देश और सोशल मीडिया दामिनी के साथ खड़ा था। ‘दामिनी को इंसाफ दो…….दामिनी को इंसाफ दो’ के नारे समूचे सोशल मीडिया पर फ़ेल गए थे। देश-विदेश से ऐसी घटनाओ के खिलाफ माहौल बनाने का पूरा श्रेय सोशल मीडिया को ही जाना चाहिए।

वेब (सोशल) मीडिया का भविष्य एवं स्वीकार्यता

इसमे तनिक भी संशय नहीं है कि सोशल मीडिया का भूतकाल कीर्तिमय था वर्तमान समृद्ध है, भविष्य उज्ज्वल और यशस्वी होगा। जिस तरह से आज समाज के हर वर्ग ने सोशल मीडिया को अपनी स्वीकृति दी है उससे पूरी संभावना है कि आने वाले समय मे इसकी ‘स्वीकार्यता’ और ‘उपयोगिता’ बड़े पैमाने पर और बढ़ेगी। सोशल मीडिया के भविष्य मे व्यापक स्तर पर पैर पसारने के पूरे आसार है। जो लोग अभी भी इसके महत्व को स्वीकारने मे हिचकिचाते है उन्हे काँग्रेस कि तरह (जो हर समय सोशल मीडिया को काम आँकती थी) भविष्य मे भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। अंत मे सिर्फ इतना कहना चाहूँगा वेब (सोशल मीडिया) के महत्व एवं उपयोगिता को स्वीकारने मे ही फायदा है क्योंकि जमाना तो है मेम्बर ‘फेसबूक’ ‘टिवीटर’ और ‘जी-मेल’ का।

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