लेखक परिचय

प्रणय विक्रम सिंह

प्रणय विक्रम सिंह

लेखक श्रमजीवी पत्रकार है. सामाजिक राजनैतिक, और जनसरोकार के विषयों पर लेखन कार्य पिछले कई वर्षो से चल रहा है.

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 प्रणय विक्रम सिंह

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और गुदड़ी के लाल लालबहादुर शास्त्री के अवतरण दिवस के दिन अर्थात 2 अक्टूबर को प्रात समाचार पत्र पढ़ते ही मन व्यथित हो गया। खबर थी कि उत्तर प्रदेश के आइएएस अधिकारी शशिभूषण सुशील ने लखनऊ मेल में सफर कर रही युवती के साथ दुराचार का प्रयास किया। यह तो युवती का भाग्य था कि प्रयास ‘असफल हो गया और पीडिता व उसकी मां के साहस के कारण पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने को मजबूर होना पड़ा। शांति देवदूत के जन्म दिवस की भोर में चित्त अशांत हो गया। मन से एक आह उठी कि बापू! अच्छा हुआ तुम नहीं रहे अन्यथा तुम्हें तो आधुनिक भारत में महिलाओं पर होता अत्याचार शायद आत्म बलिदान को विवश कर देता।

खैर अब न बापू हैं और न ही उनका रामराज्य। रामराज्य होता भी तो क्या होता? उसमें भी तो माता सीता की अगिन परीक्षा ले कर राजा राम मर्यादा पुरुषोत्तम बने थे। दरअसल इस समाज की बुनियाद ही में स्त्री भोग और शोषण की र्इटें पैबस्त हैं। खैर यह किसी अधिकारी के द्वारा नारी शोषण की पहली घटना नहीं है। पंजाब की आर्इएएस अधिकारी रूपल देयोल बैनर्जी से पंजाब के ही पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल द्वारा छेड़छाड़ किये जाने की घटना काफी अरसे तक चर्चा का विषय रही। कुछ ऐसी ही कहानी हरियाणा पुलिस के आर्इजी एसपीएस राठौर द्वारा टेनिस खिलाड़ी रुचिका से छेड़छाड़ करने की भी है। कानपुर के डीएसपी रहे अमरजीत सिंह शाही ने तो एयरफोर्स अधिकारी की बेटी को अपने जाल में फंसाया और फिर उसे नशीला पदार्थ खिलाकर उसका जमकर यौन शोषण किया। अभी कुछ समय पहले ही लखनऊ के थाना माल में कस्बे की महिला के साथ दरोगा कामता प्रसाद अवस्थी द्वारा दुराचार के प्रयास का मामला सामनें आया। अंतहीन दास्तान है पुरुष द्वारा नारी शोषण की। महिलाओं के लिए काम करने वाली सेंटर फोर सोशल रिसर्च नामक एक सामाजिक संस्था ने हाल ही में महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों पर एक अध्ययन कराया है। संस्था की निदेशक और जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता डा॰रंजना कुमारी के मुताबिक पूरे देश में हर घंटे 18 महिलाओं के साथ यौन अपराध होने के मामले सामने आ रहे हैं। 0-10 वर्ष तक की लड़कियों के साथ यौन अपराध के 13 मामले सामने आये हैं। यौन अपराध के 18 मामले स्कूल और कालेज की लड़कियों के साथ देखने को मिले। विचारणीय मसला यह है कि आखिर किस गुनाह की सजा हमारा समाज अपनी ही बेटियों को दे रहा है। क्यों उन्हीं घर आंगन में पले-बढ़े लडके बाहर शोहदों का रूप ले लेते हैं। कभी वे बहनों की रक्षा के लिए आक्रामक तेवर में होते हैं तो कभी जिन्हें बहन की श्रेणी में नहीं रखा, उससे ऐश करने के लिए आक्रामक हो जाते हैं। या तो वे रक्षक बनेंगे या भक्षक, लेकिन बराबरी से एक दूसरे के प्रति सम्मान भाव रखना वह जानते ही नहीं हैं। इन सब के लिए अनेक कारण जिम्मेदार हैं किन्तु सबसे बड़ा कारण है, सनातन काल से चली आ रही पुरुष की आधिपत्यवादी दृषिट। सीता का रावण द्वारा हरण हो अथवा राम के द्वारा सीता की अगिन परीक्षा, दौपदी का ”बँटवारा हो या दुनिया को समता का संदेश देने वाले इस्लाम द्वारा औरत को बुर्के में कैद करना, सभी पुरुष आधिपत्यवाद के धोतक हैं। सभी प्रमुख अवतार पैगम्बर, मसीह, पुरुष ही थे। स्त्री सदैव इनकी अनुगामिनी और अनुचरी रही। युग बदलता रहा, किरदार बदलते रहे लेकिन स्त्री की स्थिति यथावत रही। जब भी कोर्इ युद्ध हुआ स्त्री और बचिचयाँ भी साजो समान के साथ लूटी गयी। औरत की जाँघों के ऊपर से दुश्मन फौज फ्लैग मार्च करती हुयी निकल जाती है। स्त्री ”वसुन्धरा है। पुरुष ”वीर है। अत: स्त्री भोग की वस्तु है, पुरुष द्वारा भोगा जाना ही उसकी नियति है। हमें शिक्षा भी दी गयी है कि वीर भोग्या वसुन्धरा। अत: यह बाजारों में बिकती है, चौराहों पर नचावायी जाती है। ये ”बेइज्जत चीज बड़ी आसानी से इज्जतदारों में बाँट दी जाती है। शनै: शनै: यह प्रवृत्ति समाज के संस्कार में शामिल हो गयी है।

अभी हाल ही में गुवाहाटी में एक 17 वर्ष की लडकी के साथ सौ तमाशबीनो के सामने जो गुंडों द्वारा सरेआम इज्जत उतारी गर्इ है, उससे पूरे विश्व में भारत शर्मसार हुआ है। यह घटना तो मीडिया और पुलिस में रिपोर्ट की गर्इ है, लेकिन महिलाओ के साथ प्रतिदिन पूरे देश में छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनायें होती है, जिनमे काफी मामलो में तो महिलाये लाज और शर्म के कारण रिपोर्ट ही नहीं करती और तमाशबीन (जिसमे हमारी पुलिस भी शामिल हैं) भी चुपचाप एक लडकी को अपमानित होते देख रहते है। यदि कोर्इ चोरी करते हुए पकड़ा जाये, तो लोग उसको इतना पीटते है कि वो अधमरा हो जाता है लेकिन एक महिला की इज्जत बचाने नहीं आते। ऐसी न जाने कितनी घटनाएं पहले भी हुर्इ हैं पर वर्तमान प्रतिरोध के माहौल की वजह से इन कांड के अभियुक्तों की गिरफ्तारी भी संभव हुर्इ है। कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्थिति बहुत अलग नहीं दिखती और आज भी यौन अत्याचार रोकथाम संबंधी कानून पारित नहीं हो सका है। ऐसी स्थिति में महिलाओं को यदि निराशा होती है या वे आत्महत्या को अंतिम रास्ता मान लेती हैं, तो कोर्इ आश्चर्य नहीं। लिहाजा समस्त समझदार व संवेदनशील प्रगतिवादी लोगों को सडक पर उतरना होगा। दुर्भाग्य है कि आज भी महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा को इस नाम पर जायज ठहराया जा रहा है कि वे अपनी सीमा लांघ रही हैं। पर यह कोर्इ नर्इ बात नहीं है ।

आदिकाल से ही इस पुरुषवादी समाज ने सदैव अपने पापों के लिए हव्वा की बेटियों को ही जिम्मेंदार माना है। जैसे राम-रावण युद्ध का कारण सीता का लक्ष्मण रेखा लांघना बताया गया और पूरा महाभारत æौपदी की करनी का फल था ऐसा प्रचारित किया जाता है। शायद रात के समय अहिल्या के पास इन्æ देवता पधारे, यह भी अहिल्या की गलती थी, सजा मिली, वह शिला बना दी गर्इ। बहरहाल, औरत हमेशा ही समाज का निशाना रही है। प्राचीन काल से आज तक न जाने कितनी सदियां बीत गर्इ, कितने चांद-सूरज ढल गये, कितनी सभ्यताओं ने अपने चेहरे बदले। क्या मेनका के विश्वामित्र, जाबालि के ऋषि स्वामियों से लेकर चित्रलेखा के कुमारगिरि तक बदले? क्या ये सब कुलटाएं थीं? इनके तो परिधान भी आधुनिक नहीं थे। इन सवालों को दरकिनार करते हुए दोष सित्रयों पर ही लगाया गया कि इन्होंने महान ऋषियों, ब्रह्राचारी तपसिवयों को रिझाया। दरअसल आज समाज में मूल्यों का संकट है। कहीं भी हमारे आसपास कोर्इ ऐसा व्यäतिव नहीं है, जो नए मूल्यों के निर्माण का रोल म‚डल बने। दूसरे, समाज में चरित्र निर्माण की भारी कमी है। महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार को लडके न तो घर में देखते हैं और न बाहर। यह बहुत आम है कि घर में पत्नी की मामूली सी बात पर पति उसकी पिटार्इ कर दे या उसके साथ गाली-गलौज या अमर्यादित व्यवहार करे। परिवार के अंदर ही स्त्री से दोयम दर्जे का सलूक किया जा रहा है। बच्चा अगर मां के साथ पिता या परिवार के दूसरे पुरुषों की दबंगर्इ को सामान्य व्यवहार की तरह देखता है तो आगे जाकर उसके भी ऐसे ही मानसिक व्यäतिव का निर्माण होता है। आगे ऐसा न हो इसके लिए पारिवारिक हिंसा को रोकना बहुत जरूरी है।

नए मूल्यों का निर्माण घर और समाज से ही होगा। समाज कभी भी एक वर्ग से नहीं चल सकता। न तो अकेले महिलाएं समाज चला सकती हैं और न ही पुरुष। आज जो पुरुष प्रधान समाज की बनावट दुनिया में और खासकर हमारे देश में है, उसे बदलना अपरिहार्य है। निशिचत तौर पर महिला-पुरुष की बराबरी के सिद्धांत पर ही आगे के समाज का निर्माण होना चाहिए। अगर हमें एक संतुलित समाज का निर्माण करना है तो निशिचत तौर पर समतामूलक विचारो को संस्कारों की शक्ल देनी ही होगी। महिला विरोधी पितृसत्तात्मक मूल्यों पर प्रतिघात करना अत्यंत आवश्यक है वरना संस्थाएं ही नहीं, हर व्यä निैतिक पुलिस बनकर औरतों के जीवन में हजारों बंदिशें लगाएगा और हव्वा की बेटीयों की अस्मत पर घर की चारदीवारी से लेकर कंक्रीट के खुले जंगलों में यूं ही डाका पड़ता रहेगा।

 

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