लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

नवरात्र का पर्व वर्ष में दो बार आता है। आश्विन शुक्ल 1 से प्रारम्भ होने वाले शारदीय नवरात्र की समाप्ति आ0शु0 9 पर होती है। इसका अगला दिन विजयादशमी भगवान राम का रावण पर विजय का पर्व है। इसी प्रकार वासंतिक नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल 1 को होकर श्रीराम के जन्म दिवस (नवमी) को समापन होता है। दोनों का संबंध एक ओर श्रीराम से तो दूसरी ओर मां दुर्गा से है। इसके साथ-साथ शारदीय नवरात्र जहां हमें शस्त्र-शक्ति के संचय के लिए, तो वासंतिक नवरात्र हमें संख्या बल बढ़ाने को प्रेरित करता है।

 

 

नवरात्र के पीछे की धार्मिक कहानी चाहे कुछ भी हो; पर आज उसे दूसरे संदर्भों में समझने की आवश्यकता है। चैत्र शुक्ल 1 से भारतीय परम्परा के अधिकांश नववर्षों का प्रारम्भ होता है। यद्यपि भारत इतनी विविधताओं वाला देश है कि यहां उत्तर-दक्षिण या पूर्व-पश्चिम में पर्वों की तिथियों में भेद हो जाना स्वाभाविक है। इसके बावजूद दोनों नवरात्रों में मां दुर्गा की विशेष पूजा सभी हिन्दू करते हैं। इस समय मौसम भी बदलता है। अतः व्रत या उपवास द्वारा पेट को कुछ विश्राम देना स्वास्थ्य के लिए भी ठीक रहता है। इसलिए अपनी आयु एवं स्वास्थ्य के अनुसार प्रायः सभी लोग उपवास करते ही हैं। हां, व्रत के नाम पर जो लोग दिन भर पेट में गरिष्ठ पदार्थ डालते रहते हैं, उनके पाखंड की बात दूसरी है।

 

 

पर केवल व्यक्तिगत रूप से कुछ नियम या व्रतों का पालन कर लेने से ही नवरात्रों की भावना पूरी नहीं हो जाती। वासंतिक नवरात्र को मनाते समय हमें भगवान राम के जीवन के दो प्रसंगों का स्मरण करना होगा। पहली घटना है अहल्या के उद्धार की। अहल्या प्रकरण में दोषी इन्द्र ही था; पर तत्कालीन पुरुष प्रधान समाज और उनके पति ऋषि गौतम ने उन्हें निर्वासन का दंड दिया। अहल्या घने जंगल में कुटिया बनाकर, कंदमूल फल खाकर, पशु-पक्षियों के बीच रहने लगी। उससे न कोई मिलने आता था और न ही वह कहीं जाती थी। अहल्या के पत्थर होने का यही अर्थ है।

 

 

पर मुनि विश्वामित्र के साथ उनके यज्ञ की रक्षा के लिए जाते समय श्रीराम को जब इस घटना का पता लगा, तो वे अहल्या के आश्रम में गये और उन्हें वहां से लाकर समाज में उनका सम्मानजनक स्थान फिर से दिलाया। मानो पत्थर बनी नारी को फिर उसके मूल रूप में जीवित कर दिया। श्रीराम चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के बड़े पुत्र थे, अतः उनके द्वारा दी गयी व्यवस्था को सबने मान लिया। ऋषि गौतम को भी अपनी भूल अनुभव हो गयी थी। वे स्वयं भी पत्नी-वियोग से पीड़ित थे; पर सामाजिक कुरीतियों से टकराने का साहस उनमें नहीं था; पर जब श्रीराम ने अहल्या का उद्धार कर दिया, तो उन्होंने भी उसे स्वीकार कर लिया।

 

 

श्रीराम के जीवन की दूसरी घटना सीता की खोज के समय की है। उस दौरान वे जब दंडकारण्य में स्थित शबरी के आश्रम में पहुंचे, तो वह इतनी भावविभोर हो गयी, कि चख-चखकर मीठे बेर उन्हें देने लगी। श्रीराम भी अपने भक्त के प्रेम में डूबकर बेर खाने लगे। फिर शबरी ने ही उन्हें सुग्रीव से मित्रता करने को कहा। इसी से आगे चलकर सीता की खोज और फिर रावण का वध संभव हुआ।

 

 

ये दोनों प्रसंग हमें बताते हैं कि श्रीराम का दृष्टिकोण दुर्बल, असहाय, निर्धन और अन्याय से पीड़ितों के प्रति क्या था ? स्पष्टतः वे इनके प्रति उदारता और सहृदयता रखते थे। उन्होंने जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र..आदि का विचार किये बिना सबको गले लगाया। ये प्रसंग हमें आज भी कुछ संकेत देते हैं। भारत में आज करोड़ों लोग हिन्दू समाज से दूर खड़े दिखायी देते हैं। उनमें से बड़ी संख्या उनकी है, जिनके पूर्वजों ने मुस्लिम आक्रमण के समय प्राणरक्षा के लिए धर्म बदल लिया था। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो छुआछूत और ऊंचनीच जैसी कुरीति से नाराज होकर उधर चले गये। अंग्रेजों के अत्याचार और उनके द्वारा दिये गये धन, शिक्षा या चिकित्सा के बदले लाखों लोग ईसाई भी बने हैं। आज इन विदेशी मजहबों को मानने वालों की संख्या इतनी बढ़ गयी है कि देश पर फिर से विभाजन के बादल मंडराने लगे हैं।

 

 

इस समस्या का समाधान यही है कि हिन्दू समाज से अब कोई व्यक्ति दूसरी ओर न जाये। साथ ही जो लोग चले गये हैं, उन्हें वापस लायें। पानी की टंकी को खाली होने से रोकने के लिए उसके रिसाव को रोकने के साथ-साथ उसमें ताजा जल आता रहे, यह प्रबंध भी करना होता है। इसलिए वासंतिक नवरात्रों में हमें अपने आसपास के सभी निर्धन, निर्बल, हरिजन, दलित, वंचित आदि वर्ग के लोगों को सपरिवार अपने घर पर भोजन पर आमंत्रित करना चाहिए। उन्हें साथ बैठाकर भोजन कराने और घर के बुजुर्ग द्वारा उन्हें वस्त्रादि भेंट देने से सबको ऐसा लगेगा कि जाति, पंथ और आर्थिक स्थिति भिन्न होने के बाद भी सब एक विशाल हिन्दू परिवार के अंग हैं।

 

 

दूसरी ओर जो लोग विधर्मी बन गये हैं, उनसे सम्पर्क कर बड़े स्तर पर परावर्तन के समारोह आयोजित किये जायें। जैन समाज में प्रचलित क्षमावाणी पर्व इस दृष्टि से बहुत अनुकरणीय है। हिन्दुओं के बड़े धर्माचार्यों तथा समाज के प्रमुखों को ऐसे लोगों से अपनी या अपने पूर्वजों की भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए उन्हें हिन्दू धर्म में लौट आने का आग्रह करना चाहिए। उन्हें यह आश्वासन भी देना होगा कि उन्हें उसी जाति, वंश तथा गोत्र में सम्मानजनक स्थान दिया जाएगा, जिसमें वे पहले थे। उनके साथ पहले जैसे रोटी-बेटी के संबंध भी स्थापित किये जाएंगे। यदि गांव-गांव में इस प्रकार के क्षमावाणी पर्व और घर वापसी समारोह आयोजित किये जायंे, तो आगामी कुछ वर्षों में भारत का चित्र बदल सकता है।

 

 

वर्ष 2006 में गुजरात के डांग क्षेत्र में आयोजित शबरी कुंभ से यह कार्य प्रारम्भ हो चुका है। उस वनवासी क्षेत्र में ईसाईयों का प्रभाव बहुत अधिक है। स्वामी सत्यमित्रानंद जी ने वहां करबद्ध होकर सभी लोगों से कहा कि यदि मेरे पूर्वजों ने कोई भूल की है, तो मैं उसके लिए क्षमायाचना करता हूं। मोरारी बापू ने तो ‘‘आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं….’’ वाला फिल्मी गीत गाकर परावर्तन की मार्मिक अपील की। फरवरी, 2011 का नर्मदा कुंभ भी इस अभियान की अगली कड़ी के रूप में सम्पन्न हो चुका है। अब जबकि साधु, संत तथा कथावाचकों ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है, तो फिर सभी स्तर पर परावर्तन समारोह आयोजित होने ही चाहिए। यह काम सरल नहीं है। आज यदि प्रयास शुरू करेंगे, तो पांच-सात साल में जाकर परिणाम निकलेगा।

 

 

कौन नहीं जानता कि भारत में बढ़ रहे आतंकवाद तथा अशांति का मुख्य कारण भारत में इन विदेशी मजहबों के अनुयायियों की संख्या बढ़ना ही है। इससे निबटने के लिए जहां एक ओर हिन्दुओं को संगठित होना होगा, वहीं दूसरी ओर इन्हें समझाकर, गले लगाकर फिर से वापस हिन्दू धर्म में लाया जाये। होली के अवसर पर सब परस्पर गले मिलते ही हैं। इसी की पूर्णाहुति वासंतिक नवरात्रों के परावर्तन समारोहों में दिखायी देनी चाहिए।

 

 

श्रीराम द्वारा अहल्या के उद्धार एवं शबरी के झूठे बेर खाने के प्रसंग का स्मरण रखते हुए गांव के मंदिरों में बड़े-बड़े सहभोज कार्यक्रम हों। महिला हो या पुरुष; बच्चा हो या बूढ़ा, सब उसमें आयें। समाज के निर्धन, निर्बल और दलित वर्ग के लोगों को आग्रहपूर्वक बुलाया जाये। अच्छा हो, वे ही भोजन बनायें और सबको वितरण करें। इससे समरसता की जो गंगा बहेगी, वह सब कलुष बहा देगी। तब ही हम श्रीराम के सच्चे अनुयायी कहलाएंगे।

 

 

यह कौन नहीं जानता कि भारत के मंदिर और तीर्थ ही नहीं, तो भारतीय संविधान और लोकतंत्र भी तब तक ही सुरक्षित है, जब तक यहां हिन्दू बहुमत में हैं। 14-15 प्रतिशत विधर्मियों के कारण ही देश का वातावरण कितना विषाक्त हो गया है ? इसलिए वासंतिक नवरात्र में परावर्तन समारोहों का आयोजन कर भारत को सुरक्षित रखने का प्रयास बड़े स्तर पर होना आवश्यक है।

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