लेखक परिचय

पियूष द्विवेदी 'भारत'

पीयूष द्विवेदी 'भारत'

लेखक मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के निवासी हैं। वर्तमान में स्नातक के छात्र होने के साथ अख़बारों, पत्रिकाओं और वेबसाइट्स आदि के लिए स्वतंत्र लेखन कार्य भी करते हैं। इनका मानना है कि मंच महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण होते हैं विचार और वो विचार ही मंच को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

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-पियूष द्विवेदी-
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देश में आम चुनावों का मतदान जारी है। अब तक जितने चरणों का मतदान हुआ है, उसमे सबसे खास बात ये रही है कि गिने-चुने एकाध क्षेत्रों को छोड़ दें तो लगभग सभी जगहों पर मतदान के प्रतिशत में उत्तरोत्तर वृद्धि ही हुई है। इनमें ऐसे भी तमाम राज्य व क्षेत्र हैं जहां नक्सल, माओ, उल्फा आदि उग्रवादी संगठनों का भीषण खौफ है, लेकिन बावजूद इस खौफ के लोगों ने लोकतंत्र में अपनी आस्था दिखाते हुए बढ़-चढ़कर अपने मताधिकार का प्रयोग किया है और परिणामतः उन जगहों पर पहले की तुलना में रिकॉर्ड मतदान हुआ है। जैसे अभी हाल ही में संपन्न हुए 5वें चरण के मतदान के दौरान झारखंड में हुए नक्सली धमाके के बावजूद भी वहां के मतदाता पीछे नहीं हटे और वहां पिछले चुनाव की तुलना में ५५ प्रतिशत का भारी मतदान हुआ। इसमें तो कोई दो राय नहीं कि मतदान का ये बढ़ रहा ग्राफ लोकतंत्र की मजबूती के लिए काफी बेहतर संकेत है। क्योंकि, ऐसे दौर में जब हमारा लोकतंत्र दो खेमों लोक और तंत्र में बंटा सा नज़र आ रहा है और जब लोकतंत्र के कमजोर होने की बातें भी होने लगी हैं, लोगों का मतदान के प्रति ये बढ़ता रुझान कहीं ना कहीं उनकी लोकतांत्रिक आस्था और जागरूकता को ही दर्शाता है। अब अगर राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो इस बढ़ रहे मतदान प्रतिशत पर हर दल की निगाहें टिकी हुई हैं। हर दल इसे बदलाव का द्योतक तो मान रहा है, लेकिन साथ ही में ये भी उम्मीद लगाए बैठा है कि ये बढ़ा मतदान उसके ही पक्ष में आने वाला है। अब अगर सत्तारूढ़ दल कांग्रेस जिसके प्रति देश में काफी सत्ता विरोधी रुझान माना जा रहा है, की बात करें तो उसका कहना है कि ये बढ़ा मत प्रतिशत युवाओं और गरीबों का है जिनके नेता राहुल गांधी हैं, अतः इसका लाभ कांग्रेस को ही मिलेगा। लेकिन ऐसा कहते वक्त शायद कांग्रेसी नेता ये भूल जाते हैं कि अभी हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी ये मतदान प्रतिशत ऐसे ही बढ़ा था और राहुल गांधी ने तब भी खूब प्रचार किया था, लेकिन परिणाम क्या आया कि पांच में से चार राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया। ऐसे में ये मानना कठिन है कि ये बढ़ा मतदान कांग्रेस के पक्ष में जाएगा। इसी क्रम में कांग्रेस के बाद अब अगर मुख्य विपक्षी दल भाजपा की बात करें तो भाजपा तो इस बढ़ रहे मत प्रतिशत को अपना बताने में सबसे आगे है। भाजपा का तो पूरी आश्वस्तता से ये मानना है कि मतदान का ये बढ़ता प्रतिशत मौजूदा यूपीए सरकार के कुशासन के प्रति लोगों में भर रहे आक्रोश का प्रतीक और नरेंद्र मोदी की देशव्यापी लहर का परिणाम है, लिहाजा इसमें से सर्वाधिक मत उसीके पक्ष में जाएगा। भाजपा की इस बात पर अगर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि सही मायने में वो भी सिर्फ मोदी लहर का ख्याली पुलाव पकाने में ही मशगूल है। क्योंकि, पांच राज्यों के बीते विधानसभा चुनावों में भी हम देख चुके हैं कि जिन-जिन राज्यों में भी भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला, वो किसी मोदी लहर के कारण नहीं, उस राज्य के स्थानीय नेतृत्व की लोकप्रियता व सशक्तता के कारण मिला। उदाहरणार्थ, मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और राजस्थान में वसुंधरा राजे पूरी तरह से लोकप्रिय हैं। हां, दिल्ली एक ऐसा राज्य था, जहां भाजपा के पास कोई मजबूत व कद्दावर नेता नहीं था, तो यहां उसे पूर्ण बहुमत के आंकड़े से दूर रहना पड़ा। सवाल ये है कि अब अगर इतनी ही मोदी लहर थी तो उसके दम पर दिल्ली में भी पूर्ण बहुमत क्यों नहीं आया जबकि दिल्ली में मोदी ने अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे ज्यादा जोर भी लगाया था ? कहना गलत नहीं होगा कि ये बढ़ा मतदान प्रतिशत किसी भी लहर के दायरे से बाहर का है। कांग्रेस-भाजपा के अलावा नई नवेली आम आदमी पार्टी (आप) की तरफ से भी ये दावा किया जा रहा है कि ये बढ़ रहा मतदान उन लोगों का है जो अब तक विकल्पहीनता की स्थिति में थे। लेकिन अब उन्हें आम आदमी पार्टी के रूप में एक ईमानदार और प्रभावी विकल्प मिला है, इसलिए वे मतदान को निकल रहे हैं और ये सारा मत आम आदमी पार्टी को ही मिलने वाला है। जाहिर है कि इस बढ़े मतदान प्रतिशत से ये सभी दल अपने-अपने तर्कों के आधार पर उम्मीदें जता रहे हैं, लेकिन यथार्थ के धरातल पर आकर देखें तो स्पष्ट होता है कि ये बढ़ा मत प्रतिशत इनमे से किसी एक दल की तरफ नहीं जाने वाला, बल्कि अधिक संभावना ये है कि ये बढ़ा मतदान किन्ही दो या तीन हिस्सों में विभाजित होकर पड़ रहा है। इन सबके बाद एक सत्य ये भी है कि जैसे-जैसे हर चरण में मतदान का ये प्रतिशत बढ़ रहा है, वैसे-वैसे सभी राजनीतिक दलों की धकधकी भी बढ़ रही होगी। कारण कि चाहें कोई कुछ भी दावा करे, पर सही मायने में इस बात का अंदाज़ा किसीको नही है कि ये बढ़ रहा मतदान प्रतिशत किस तरह के मतदाता का है और किसकी तरफ जा रहा है ?

अब ये बढ़ा मतदान किसको-कितना लाभ पहुंचाएगा, पुख्ता तौर पर तो ये बात चुनाव बाद ही पता चलेगी, लेकिन फ़िलहाल ये तो तय है कि मतदान का ये बढ़ता ग्राफ काफी हद तक चुनाव आयोग और मीडिया के प्रयासों का परिणाम है। चुनाव आयोग द्वारा जिस तरह से निरंतर दूरदर्शन, एफएम, मोबाइल मैसेज व इंटरनेट आदि के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों से मतदान करने की अपील की जा रही है, कहीं ना कहीं उससे लोगों में मतदान के प्रति काफी जागरूकता आयी है। साथ ही, न्यूज चैनल्स व अख़बारों के जरिए भी लोग मतदान के प्रति जागरुक हो रहे हैं और समझ रहे हैं कि ये न सिर्फ उनका अधिकार है, बल्कि देश के प्रति कर्तव्य भी है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि अब चुनाव बाद चाहें जो दल हारे-जीते, पर फ़िलहाल मतदान के ये बढ़ता स्तर यही दिखाता है कि लोकतंत्र विजयी है।

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