लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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21_04_2013-rape19aशैलेन्द्र चौहान

हम रोज ही समाचारों में पढ़ते और देखते हैं कि महिलाओं और युवतियों पर कहीं एसिड अटैक होता है कहीं बलात्कार और हत्याएं होती हैं और अनेकों परिवारों में या कार्यस्थलों पर वे लगातार उत्पीडित भी होती हैं। कभी कभार शोर भी होता है, लोग विरोध प्रकट करते हैं, मीडिया सक्रिय होता है पर अपराध कम होने का नाम नहीं लेते क्यों। हम देख रहे हैं कि एक ओर भारतीय नेतृत्व में इच्छाशक्ति की भारी कमी है तो वहीँ नागरिकों में भी महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को लेकर कोई बहुत आक्रोश या इस स्थिति में बदलाव की चाहत भी नहीं है। वे स्वाभाव से ही पुरुष वर्चस्व के पक्षधर और सामंती मनःस्थिति के कायल हैं। तब इस समस्या का समाधान कैसे संभव है?

यद्दपि इन वर्षों में अपराध को छुपाने और अपराधी से डरने की प्रवृत्ति खत्‍म होने लगी है। इसिलए ऐसे अपराध पूरे न सही लेकिन फिर भी काफी सामने आने लगे हैं। अन्यायी तब तक अन्‍याय करता है, जब तक कि उसे सहा जाए। महिलाओं के प्रति अपराध में यह स्‍थिति अभी कम है। महिलाओं में इस धारणा को पैदा करने के लिए न्‍याय प्रणाली और मानसिकता में मौलिक बदलाव की भी जरूरत है। देश में लोगों को महिलाओं के अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी नहीं है और  इसका पालन पूरी गंभीरता और इच्‍छाशक्‍ति से नहीं होता है। महिला सशक्तीकरण के तमाम दावों के बाद भी महिलाएँ अपने असल अधिकार से कोसों दूर हैं। उन्‍हें इस बात को समझना होगा कि दुर्घटना व्‍यक्‍ति और वक्‍त का चुनाव नहीं करती है और यह सब कुछ होने में उनका कोई दोष नहीं है।

धीमे और गैरजिम्‍मेदाराना अन्वेषण, लंबी और बोझिल कर देने वाली वकीलों की बहसें जो महिलाओं को अपमानित करने में कोई लज्जा नहीं महसूस करते और देर से दिए गए निर्णय भी महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए चिंताजनक रूप से जिम्‍मेदार हैं, ये महिलाओं की न्‍याय पाने की इच्‍छाशक्‍ति को कमजोर कर देते हैं।

भारत में रजिस्‍टर नहीं कराए गए मामले भी काफी होते हैं। पुलिस का रवैया न केवल सामंती होता है बल्कि बेहद अपमानजनक और हताश करने वाला भी होता है। महिला अपराध से संबंधित मामलों में जल्‍द कार्रवाई और सुनवाई नहीं होने के कारण अपराधी को भागने और बचाव करने का मौका मिल जाता है। दूसरी ओर इन मामलों में देरी होने से पीड़ित महिला पर अनुचित दबाव डाला जाता है या प्रताड़ना दी जाती है।

महिलाओं के विरुद्ध अपराध का एक पहलू समाज का नकारात्‍मक दृष्‍टिकोण भी है। अक्‍सर लोगों में धारणा होती है कि अपराध होने में महिला का दोष है या यह उनके उकसाने के कारण हुआ होगा। साथ ही छोटे से बड़े हर स्‍तर पर असमानता और भेदभाव के कारण इसमें गिरावट के चिन्ह कभी नहीं देखे गए।

इसके लिए कानून को और प्रभावी बनाए जाने की बात भी बार-बार सामने आती है। महिला आयोग की अध्‍यक्ष रहीं पूर्णिमा अडवाणी ने इस संबंध में अपनी चिंता प्रकट की थी। परन्तु बार बार बात सरकार के पास पहुँच कर रुक जाती है।

इस बाबत कुछेक बदलावों, सुधारों और उनके सख्ती से अनुपालन की महती जरूरत है जैसे –

दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के अंतर्गत कई राज्‍यों में दहेज प्रतिषेध अधिकारी भी नियुक्‍त नहीं हैं। हालाँकि अधिनियम में इस संबंध में बखूबी प्रावधान दिए गए हैं।

इंमॉरल ट्रैफिकिंग एक्‍ट, 1986 के बावजूद वेश्‍यावृत्ति में कोई कमी नहीं आई है। इस अधिनियम की धारा 8 में महिला को ही आरोपी माना गया है, वहीं इसे संचालित करने वाले और दलाल बच निकले में सफल हो जाते हैं। ऐसी महिलाओं के ससम्मान भरण-पोषण के लिए कोई प्रावधान सरकार के पास नहीं है।

बंधुआ मजदूरी के खिलाफ कानून बनाए जाने के बाद भी इस पर पूरी तौर पर रोक नहीं लग सकी है।

यहाँ एक बात समझने वाली है कि महिला अपने संबंधों और पद के पहले एक महिला है, वो भी अपनी प्रतिष्ठा और अधिकारों के साथ। लेकिन सामाजिक जागरूकता की कमी और लोगों में दिन-ब-दिन घटते नैतिक मूल्यों व आचरण के कारण महिलाओं की स्‍थिति दोयम बनी हुई है। जिसके लिए हमारा नेतृत्व और व्यवस्था दोनों जिम्मेदार हैं। कानून में महिलाओं को प्रतिष्‍ठा और एकाधिकार के साथ जीने की गारंटी के साथ जीने के आश्‍वासन के बाद भी असल जिंदगी में इसका लोप दिखता है।

ऐसा नहीं हैं कि महिलाओं के प्रति होने वाले अत्‍याचार केवल भारत में होते हैं। सभी देश चाहे वो विकसित हों, विकासशील या फिर गरीब, महिलाओं की स्‍थित कमोबेश एक जैसी है। परन्तु अंतर यह है कि विकसित की कानून व्यवस्था इतनी लचर नहीं है। इसलिए वहां अपराध कम होते हैं और उनपर शीघ्र कार्यवाही होती है, न्याय प्रक्रिया भी वहां इतनी जटिल नहीं है।

आमतौर पर देखा जाता है कि अपराध का अन्वेषण पीड़ित की ओर फोकस रहता है, वहीं पैरवी आरोपी पर फोकस होती है। उसे लगातार अपमानित किया जाता है। उसका मनोबल सायास ख़त्म किया जाता है। यहाँ भी बदलाव की जरूरत है। क्‍या अपराध के होने में पीड़िता का दोष है। दुर्घटना कभी भी और किसी के साथ हो सकती है। वैसे इन बातों की हर समाज, सभ्‍यता और परिवेश के लिए अलग-अलग धारणाएं हैं या अवधारणा है। हर समय काल में यह समस्या अलग तरीके से समझी जाती रही है। इस अवधारणा को भारतीय कानून में अधिगृहीत किया गया। लेकिन समय और अपराधों की गंभीरता और उनमे लगातार हो रही बढ़ोत्तरी को समझते हुए इसमें बदलाव की जरूरत है।

हाल के दिनों में जेंडर जस्‍टिस की बात हवा में उछली है। पहले भी यह होता रहा है। क्‍या इससे सही न्‍याय मिलने में कोई आसानी हुई है? वैसे अक्सर यह भी देखने को मिलता है कि मुखर होने पर न्‍याय मिलता है और इज्‍जत भी लेकिन इसके खतरे भी  हैं जिन्हें इस व्यवस्था को देखना होगा। दुर्भाग्य से इस बारे में व्यवस्था की जम्मेदारी संदेह से परे नहीं दिखती। भारतीय कानून में यूं तो जेंडर जस्‍टिस समता और प्रतिष्‍ठा के अधिकार के तहत मौलिक अधिकारों में समाहित हैं, लेकिन त्‍वरित न्‍याय और उचित अनुपालन से ही इसको बल मिल सकेगा यह बात समझना अत्यंत आवश्यक है। एक समन्वित प्रयास के बिना इन जघन्य अपराधों पर रोकथाम बहुत मुश्किल है।

औपनिवेशक कानूनों का अब तक जारी रहना आखिर क्या दर्शाता है ?

आजादी के बाद से ही भारतीय लोकतंत्र में लोक की यह अपेक्षा रही है कि यहां के लोगों/नागरिकों को सही सुरक्षा और न्याय मिले। आम भारतीय पर्याप्त लंबे समय से न्यायपालिका और पुलिस जिन्हें औपनिवेशिक व्यवस्था में शासन का अंग माना गया था, दोनों ही संस्थानों से आतंकित और हताश है। आज समाज की संवेदनहीनता के कारण आज दुर्घटना और हिंसक अपराधों के पीड़ित दम तोडते रहते हैं। उनकी सहायता करने से तथाकथित सभ्य लोग कतराते हैं। वह इस कारण नहीं कि हम अमानवीय हैं परन्तु इस उत्पीडन कारी आपराधिक न्याय संस्थान व पुलिस के भय के कारण। भारत के आम नागरिक न्यायपालिका और पुलिस की उस कार्य संस्कृति से पूरी तरह से भयभीत हैं जो उसे औपनिवेशिक युग से विरासत में प्राप्त हुई है। इसलिए वे औरों के दुःख-तकलीफ में असंवेदनशील हैं। आज भी देश के करोड़ों भारतीय नागरिकों को शासन का उपेक्षापूर्ण रवैया और अकूत शक्ति अति भयभीत कर रही हैं। 

न्यायपालिका लोकतान्त्रिक मूल्यों को नए ढंग से परिभाषित करने के स्थान पर औपनिवेशिक संस्था की तरह तत्कालीन प्रोटोकोल और परम्पराओं को ही आगे बढ़ा रही है और आम आदमी का संस्थागत न्यायिक विलम्ब के निर्बाध कुचक्र के माध्यम से उसका आर्थिक शोषण कर कर रही है। काले कोट वाले अधिवक्ता और पैरवीकार मात्र हानिकारक भ्रष्टाचार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं, जनता का शोषण कर रहे हैं। यह सब पुलिस, प्रशासन और न्याय तंत्र के औपनिवेशिक नजरिये के कारन ही हो रहा है। औपनिवेशिक काले कानूनों और उनकी भाषा का अब तक जारी रहना करोड़ों भारतीयों के लिए आज भी एक सवाल है अतः भारतीय समाज और समुदाय का लोकतान्त्रिक मूल्यों के साथ टकराव जारी है। इन औपनिवेशिक काले कानूनों के माध्यम से किया जाने वाला तथाकथित न्याय हमारे सामाजिक तानेबाने से नहीं निकला है अपितु वह सत्रहवीं और अठारवीं सदी के यूरोप की उपज है जो कि कानून और न्याय के नाम पर बड़ी संख्या में मानवजाति को गुलाम बनाने की पश्चिमी सामाजिक रणनीति रही है। ये समस्त कानून भारतीयों पर थोपे गए एकतरफा अनुबंध मात्र हैं जो प्रभावशाली लोगों को सुरक्षा प्रदान करने के सिद्धांत पर राज्य की स्थापना करते हैं। पुलिस की ओर से आनेवाली गोलियों को आज भी विशेष संरक्षण प्राप्त है। भारतीय शासकवर्ग इसे बरकरार रखे हुए है, क्यों ? यह लज्जाजनक है।

दुर्भाग्य यह भी है कि आम लोगों को ऐसी भाषा में न्याय दिया जा रहा है जिसे वे जानते ही नहीं हैं। इंग्लॅण्ड में इतालवी या हिंदी भाषा में न्याय देने का दुस्साहस नहीं किया जा सकता किन्तु भारत में 66 वर्षों से यह सब कुछ जारी है। क्योंकि 2 फरवरी 1835 को थोमस बैबंगटन मैकाले ने यह ईजाद किया था कि हमें एक ऐसा वर्ग तैयार करने का भरसक प्रयास करना है जो हमारे और करोड़ों भारतीयों के बीच अनुवादक का कार्य कर सके जिन पर हम शासन करते रहें – एक ऐसा वर्ग जो रक्त और रंग से तो भारतीय हो परन्तु विचारों, नैतिकता और रूचि से अंग्रेज हो। आज की भारतीय न्याय व्यवस्था मैकाले के सपनों को साकार करने में ही अपना योग कर रही है। आज भी भारतीय न्याय प्रणाली काले उपनिवेशवादी कानूनों, प्रोटोकोल और परम्पराओं को जारी रखे हुए है जिनमें एक गरीब न्यायार्थी की स्थिति मात्र किसी लाचार गुलाम जैसी होकर रह जाती है। अत्याचारी सत्ता, प्रशासन, पुलिस, जो चाहे अत्याचार कर सकते हैं व निर्भीक होकर हत्याएं करा सकते है। ऐसी सभी मनमानी हत्याओं को एक सुरक्षा के आवरण में ढंक दिया जाता है, जैसा कि ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों में लगातार देखा जा रहा है। अफसोस कि इस अन्याय और अत्याचार को न्याय और कानून के समक्ष समानता और लोकतंत्र कहा जाता है। क्या अब छियासठ वर्ष बाद भी इस बात की आवश्यकता नहीं है इस दूषित आपराधिक पुलिस तंत्र और न्याय व्यवस्था को भारतीयों के सम्मान और अस्मिता का ध्यान में रखते हुए तदनुसार बदल दिया जाये? वे भी स्वतंत्रता का अहसास कर सकें। समानता और लोक तंत्र पर विश्वास कर सकें। लेकिन जब यह सब सायास हो रहा हो तो हम ऐसी उम्मीद भी कैसे कर सकते हैं।

आज इस बात की जरूरत है कि आम भारतीय को सत्य की पहचान करनी चाहिए। इस उपनिवेशवादी-मुकदमेबाजी उद्योग की चक्की में पिसते जाने का उसे भरपूर विरोध करना चाहिए ताकि सम्मानपूर्ण जीवन जिया जा सके। स्वतंत्र भारत के सम्पूर्ण काल का जिक्र करना यहां बेमानी हो जाता है जब मात्र 1990 से लेकर 2007 तक के बीच करीब 17000 हजार आरोपी व्यक्ति, यदि पुलिस की अन्य ज्यादतियों और यातनाओं को छोड़ भी दिया जाये तो प्रतिदिन औसतन 3 व्यक्ति पुलिस हिरासत में मर जाते हैं और एकाध अपवाद छोड़कर शायद ही किसी पुलिसवाले का बाल भी बांका होता हो। यहाँ तक कि यदि प्रमाण स्वरूप घटना का वीडियो भी उपलब्ध करा दिया जाये तो भी पुलिस का कुछ नहीं बिगडता क्योंकि हमारी आपराधिक राजनीति की तासीर और संस्कृति भी वही है जो अंग्रेज आततायियों की थी। आखिर पुलिस अंग्रेजी शासनकाल से आम भारतीयों के दमन और शोषण का एक अचूक हथियार है। हम यह भलीभांति जानते हैं कि पुलिस कोई स्वायत्त संस्था या इकाई नहीं है उसकी मानसिकता शासक वर्ग की मानसिकता का ही प्रतिरूप है। लेकिन अब बहुत हो चुका, अब हमारी इस विकृत, लोकतंत्र  विरोधी और अनुपयुक्त प्रणाली में तुरंत परिवर्तन करने की महती आवश्यकता है। उन समस्त उपनिवेशवादी काले कानूनों और परम्पराओं की पहचान कर निरस्त किया जाना चाहिए जो वर्ग भेद करते हैं व कानून में विश्वास करने वालों में भय उत्पन्न करने वाली पैशाचिक शक्ति और छवि का प्रदर्शन करते हैं और अपराधियों को प्रेरित-पोषित करते हैं।

आज राष्ट्रद्रोह-कानून को चंद सत्ताधारियों की मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता जो अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठने वाले स्वरों को दबाने कुचलने लिए जनविरोधी उपनिवेशवादी कानून का उपयोग करते हों। उन सभी उपनिवेशवादी कानूनों के अंतर्गत संज्ञान लिया जाना बंद होना चाहिए जिनका निर्माण शासक वर्ग द्वारा शोषण और अत्याचारों के विरुद्ध उठने वाले विरोधी स्वरों को दबाने के लिए किया जाता है। विशेषतया दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 46, 129, 144, 197 आदि, और वे सब उधर लिए विशेष कानून जो मुट्ठी भर जनविरोधी सत्ताधारियों ने लोगों की स्वतन्त्रता और समानता छीनने के लिए बनाये हों। एक लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में राज्य के ऐसे पक्षपाती आपराधिक कानून कभी भी लोक की सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकते बल्कि वे विशेष लोगों के हित में ही उपयोग में किये जाते हैं। अब तक औपनिवेशक कानूनों का जारी रहना हमारी शोषक और जनविरोधी मानसिकता का प्रतीक हो सकता है।

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