लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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 बौद्धिक आतंकवाद

बौद्धिक आतंकवाद

आजादी के 69 साल बाद भी हमारे देश का नागरिक आजाद नहीं है।देश आजाद हो गया लेकिन देशवासी अभी भी बेड़ियों के बन्धन में बन्धे हैं,ये बेड़ियाँ हैं अज्ञानता की,जातिवाद की,धर्म की,आरक्षण की,गरीबी की,सहनशीलता की,मिथ्या अवधारणाओं की आदि आदि।

किसी भी देश की आजादी तब तक अधूरी होती है जब तक वहाँ के नागरिक आजाद न हों।आज क्यों इतने सालों बाद भी हम गरीबी में कैद हैं क्यों जातिवाद की बेड़ियाँ हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं क्यों आरक्षण का जहर हमारी जड़ों को खोखला कर रहा है क्यों धर्म जो आपस में प्रेम व भाईचारे का संदेश देता है आज हमारे देश में वैमनस्य बढ़ाने का कार्य कर रहा है क्यों हम इतने सहनशील हो गये हैं कि कायरता की सीमा  कब लांघ जाते हैं इसका एहसास भी नहीं कर पाते?क्यों हमारे पूर्वजों द्वारा कही बातों के गलत प्रस्तुतीकरण को हम समझ नहीं पाते क्यों हमारे देश में साक्षरता आज भी एक ऐसा लक्ष्य है जिसको हासिल करने के लिए योजनाएँ बनानी पड़ती हैं क्यों हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षित एवं योग्य युवा विदेश चले जाते हैं। आज हम एक युवा देश हैं ,जो युवा प्रतिभा इस देश की नींव है वह पलायन को क्यों मजबूर है?

क्या वाकई में हम आजाद है?क्या हमने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है?आज आजादी के इतने सालों बाद भी हम आगे न जा कर पीछे क्यों चले गए वो भारत देश जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था जिसका एक गौरवशाली इतिहास था उसके आम आदमी का वर्तमान इतना दयनीय क्यों है?क्या हममें इतनी  क्षमता है कि अपने पिछड़ेपन के कारणों की विवेचना कर सकें और समझ सकें!दरअसल जीवन पथ में आगे बढ़ने के लिए बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता होती है।इतिहास गवाह है युद्ध सैन्य बल की अपेक्षा बुद्धि बल से जीते जाते हैं।किसी भी देश की उन्नति अथवा अवनति में कूटनीति एवं राजनीति अहम भूमिका अदा करते हैं।पुराने जमाने में सभ्यता इतनी विकसित नहीं थी तो एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए बाहुबल एवं सैन्य बल का प्रयोग होता था विजय रक्त रंजित होती थी जैसे जैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया मानव व्यवहार सभ्य होता गया।जिस मानव ने बुद्धि के बल पर सम्पूर्ण सृष्टि पर राज किया आज वह उसी बुद्धि का प्रयोग एक दूसरे पर कर रहा है।कुछ युद्ध

आर पार के होते हैं आमने सामने के होते हैं जिसमें हम अपने दुश्मन को पहचानते हैं लेकिन कुछ युद्ध छद्म होते हैं जिनमें हमें अपने दुश्मनों का ज्ञान नहीं होता,वे कैंसर की भाँति हमारे बीच में हमारे समाज का हिस्सा बन कर बड़े प्यार से अपनी जड़े फैलाते चलते हैं और समय के साथ हमारे ऊपर हावी होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।इस रक्तहीन  बौद्धिक युद्ध को आप बौद्धिक आतंकवाद भी कह सकते हैं।कुछ अत्यंत ही सभ्य दिखने वाले पढ़े लिखे सफेद पोश तथाकथित सेकुलरों द्वारा अपने विचारों को हमारे समाज हमारी युवा पीढ़ी हमारे बच्चों में बेहद खूबसूरती से पाठ्यक्रम,वाद विवाद,सेमीनार,पत्र पत्रिकाओं,न्यूज़ चैनलों आदि के माध्यम से प्रसारित करके हमारी जड़ों पर निरन्तर वार किया जा रहा है।इस प्रकार तर्कों को प्रस्तुत किया जाता है कि आम आदमी उन्हें सही समझने की भूल कर बैठता है बौद्धिक आतंकवाद का यह धीमा जहर पिछले 69 सालों से भारतीय समाज को दिया जा रहा है और हम समझ नहीं पा रहे।आइए इतिहास के झरोखे में झांकें —–

यह एक कटु सत्य है कि 1947 में जब देश आजाद हुआ तो हमारे देश की सत्ता उन हाथों में थी जिन्हें अपने हिन्दू होने का गर्व कदापि नहीं था ।आज से दो साल पहले तक हमारे देश के सर्वोच्च पदों पर ऐसे हिन्दू आसीन थे जिन्हें सेक्यूलरिज्म के कीड़े ने काटा था उन्हें अल्पसंख्यकों के हितों की चिंता हिन्दुओं के हितों से ज्यादा थी ।आज यह किसी से छिपा नहीं है कि हमारी सरकार हमारी न्याय व्यवस्था हमारा संविधान सभी के द्वारा छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिन्दू से अधिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान किया जाता रहा (कारण वोट बैंक की गंदी राजनैती )।

इस बौद्धिक आतंकवाद के परिणाम को आप एक बहुत ही सरल उदाहरण से अवश्य समझ लेंगे कि जब हमारा देश आजाद हुआ था इस देश में काम करने के लिए युसुफ ख़ान जैसी शखसियतों  को दिलिप कुमार और  महजबीन बानो जैसी अदाकारा को मीना कुमारी बनना पड़ा था   जबकि आज सलमान खान,आमिर खान ,शकहरुख खान अपने नामों के साथ सफलता के चरम पर हैं फिर भी हम असहिष्णु हैं!

मद्रास स्टेट से रोमेश थापर की पत्रिका” क्रौस रोडस “ने तत्कालीन प्रधानमंत्री की आर्थिक एवं विदेश नीतियों के खिलाफ एक लेख छापा था तो उसे प्रतिबंधित कर दिया गया था यद्यपि रोमेश थापर ने न्यायालय में मुकदमा जीत लिया था फिर भी 12 मई 1951 को संविधान का गला घोंटा गया था तब हमारे प्रधानमंत्री और सरकार असहिष्णु नहीं हुए किन्तु आज की सरकार है!

आज देश हित में बोलना, देश की संसद पर हमला करने वाले और जेहाद के नाम पर मासूम लोगों की

जान लेने वाले आतंकियों को सज़ा देना,भारत माता की जय बोलना,शहीद सैनिकों के हितों की बात करना असहिष्णुता की श्रेणी में आता है किन्तु इशारत जहाँ और अफजल गुरु सरीखों को शहिद बताना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता!

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के बयान भगवा आतंकवाद की श्रेणी में आते हैं लेकिन 26/11 के हमले में आतंकवाद का रंग बताना असहिष्णु होना हो जाता है।दादरी मे अखलाक की हत्या साम्प्रदायिक हिंसा थी लेकिन दिल्ली में डाँ नारंग की हत्या”मासूमों “द्वारा किया एक साधारण अपराध जिसे साम्प्रदायिकता के चश्मे से न देखने की सलाह दी जा रही है।तथाकथित सेक्यूलर इसे भी अभिव्यक्ति की आजादी कहें तो कोई आश्चर्य नहीं। हो सकता है कि वे कहें कि मुद्दा स्वयं को अभिव्यक्त करने का था सो कर दिया केवल तरीका ही तो बदला है,इस बार हमने स्वयं को शब्दों से नहीं कर्मों से अभिव्यक्त किया है यह स्वतंत्रता हमारा अधिकार है!

स्वतंत्रता संग्राम में बापू और चाचा ने अहम भूमिका निभाई यह पढ़ाया एवं प्रचारित किया जाता है लेकिन वासुदेव बलवन्त फड़के ,चापेकर बन्धु ,लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ,खुदीराम बोस ,अश्फाकउल्लाखान   ,भगतसिंह ,सुखदेव ,राजगुरु, सुभाष चन्द्र बोस,विनायक दामोदर सावरकर,जैसे शहीदों के बलिदान और योगदान को क्यों भुला दिया गया?क्यों हमारे बच्चों को इन दो नामों के अलावा तीसरा नाम याद नहीं आ पाता ?क्यों हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप,शिवाजी महाराज,विक्रमादित्य,चन्द्रगुप्त,बाजीराव पेशवा की वीर गाथाएँ न होकर अकबर महान होता है?यह बौद्धिक आतंकवाद नहीं है तो क्या है?

हमारे बच्चों को इतिहास में पढ़ाया जाता है कि भारत पर मुग़लों ने बार बार आक्रमण किया इस विषय में चेन्नई में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डाँ एम डी श्रीनिवास ने लिखा है कि इसलाम ने यूरोप,अफ्रीका ,इजिप्ट और एशिया के कुछ भागों पर कब्जा कर लिया था किन्तु हिन्दू सभ्यता का 600  ई ० से 1200  ई  ० तक बाल भी बाँका नहीं कर पाए थे।आसाम , ओड़िशा ,मराठा साम्राज्य,बुन्देला ,सिख ,जाट ,विजय नगर साम्राज्य,इन सभी की अद्भुत सैन्य क्षमता के आगे इसलाम ने हर बार घुटने टेके थे।300 से1400 ई० तक इस्लाम ने कई बार भारत में पैर जमाने की कोशिश की लेकिन भारतीय क्षत्रिय खून से हर बार मुँह की खानी पड़ी ।आज जो इस्लाम भारत में पैर पसार रहा है वो जेहादी इस्लाम है एक तरह का बौद्धिक आतंकवाद ।दुख इस बात का है कि इस बौद्धिक आतंकवाद के परिणाम स्वरूप हमारा क्षत्रिय खून भुला दिया गया है,हम स्वयं को असहिष्णु कहलाने से डरने लगे ।वसुदैव कुटुम्बकं समाज सेवा एवं छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में दूसरे धर्मों एवं संस्कृतियों को भारत में न सिर्फ स्वीकार किया जा रहा है अपितु फैलाने में भी सहयोग किया जा रहा है।धर्म की आड़ में बौद्धिक आतंकवाद के सहारे योजनाबद्ध तरीके से जो

धर्म परिवर्तन का खेल जारी है क्या हम इस कूटनीति को समझने की बौद्धिक क्षमता रखते हैं ?

अनेक संस्कृतियों का मिलन केवल भारत में ही क्यों स्वीकार्य है पाश्चात्य देशों जैसे आस्ट्रेलिया ,अमेरिका,ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्ष क्यों दूसरे देशों के नागरिकों से अपने देश की भाषा और संस्कृति अपनाने के लिए कहते हैं?आज से दो साल

पहले जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे,तो क्यों उन्हें अमेरिका ने वीज़ा जारी करने से मना कर दिया था? यह वहाँ रहने वाले भारतीयों को सख्त संदेश था कि अगर आपको अमेरिका में रहना है तो हिन्दूवादी सोच एवं संस्कृति से दूरी बनाकर रखनी होगी।पेरिस में आतंकवादी हमले के बाद हम सभी जानते हैं वहाँ की प्रधानमंत्री ने क्या एक्शन लिए थे तब उन्हें असहिष्णु की उपाधि नहीं दी गई क्या हम लोग इन दोहरे मापदंडों को देख और समझ पा रहे हैं?किसी भी देश को सम्पन्न बनाने का एक ही तरीका होता है, वहाँ के नागरिकों को सम्पन्न बनाना अगर भारत को सम्पन्न बनाना था तो इस देश के हर नागरिक को केवल भारतीय रहने देते,आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए नीतियों के द्वारा  इतने सालों में भारत के आम आदमी का विकास निश्चित ही हो जाता फिर क्यों हमें जातिगत आरक्षण का मीठा जहर दिया गया?भारत का विभाजन होने के बाद भी क्यों आजाद भारत के समाज को विभिन्न जातियों में विभाजित करके जाती प्रथा को जीवित रखा गया ?  इस मीठे जहर से हमारे देश की या इन पिछड़ी जातियों की कितनी तरक्की हुई है? आज जातियाँ वोट बैंक में तब्दील हो चुकी हैं जो बौद्धिक आतंकवाद का परिणाम है।1947 में जो भारत का विभाजन हुआ था वो रक्त रंजित था और आजादी के बाद जो आज तक के सफर में भारतीय समाज का विभाजन हुआ वो बौद्धिक आतंकवाद के मीठे जहर से बिना रक्त पात के सफल हुआ।

अगर हम बुद्धिजीवी हैं तो हमें यह सिद्ध करना होगा।कुछ मुठ्ठी भर लोग हम सवा करोड़ भारतीयों की बुद्धि को ललकार रहे हैं आइए उन्हें जवाब बुद्धि से ही दें।जिस दिन हम सवा करोड़ भारतीयों के दिल में यह अलख जगेगी कि हमें अपने क्षेत्रों और जातियों से ऊपर उठ कर सोचना है,उस दिन उसकी रोशनी  केवल भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में भी फैलेगी।जब हम स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेंगे तो विश्व गुरु बनने से हमें कौन रोक पायेगा?

जय हिंद जय भारत

डाँ नीलम महेंद्र

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