लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

1यों तो नरेंद्र मोदी जबसे प्रधानमंत्री बने हैं, दर्जनों विदेशी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भारत-यात्रा कर चुके हैं लेकिन ऐसा लगता है कि जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल की यह यात्रा औरों से अलग सिद्ध होगी। उनकी यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 18 समझौते किए हैं। उनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है– सौर-ऊर्जा संबंधी समझौता। यदि जर्मनी अपने संकल्प के अनुसार सवा दो अरब डाॅलर सौर-ऊर्जा लाने के लिए भारत में लगा देगा तो भारत का नक्शा ही बदल जाएगा। खुद जर्मनी परमाणु-ऊर्जा के प्रयोग में काफी आगे था लेकिन वह उसे अब छुट्टी दे रहा है। उसके खतरों का पता रुस के चेर्नोबिल और जापान के फुकुशिमा कांडों ने सारी दुनिया को दे दिया है। भारत धूप का देश है। यहां असीम सौर-ऊर्जा है। यदि जर्मनों से हमने सौर-ऊर्जा के इस्तेमाल के गुर सीख लिये तो सारे दक्षिण एशिया की दशा बदल सकती है।

 

लेकिन सबसे बड़ी समस्या वह है, जिसे जर्मन कंपनी मालिकों ने हमारे प्रधानमंत्री के सामने दो-टूक शब्दों में रख दिया है। भारत से व्यापार करने और यहां पैसा लगानेवालों को इतनी असुविधाओं का सामना करना पड़ता है कि वे भाग खड़े होते हैं। भारत के साथ जर्मनी का व्यापार 20 अरब डाॅलर का है और उसने 10 अरब यूरो का विनिवेश कर रखा है। यदि उसे उचित सुविधाएं मिलें तो यह पलक झपकते ही दुगुना हो सकता है। जर्मनी यूरोप का सबसे सशक्त और मालदार राष्ट्र है। भारत के साथ उसके इतने घनिष्ट संबंध रहे हैं कि कभी उससे अंग्रेज भी खौफ खाता था। जर्मन जनता और भारतीय नागरिकों के बीच एक आत्म-स्वीकृत ‘आर्यन संबंध’ तो बरसों से चला ही आ रहा है लेकिन आज से लगभग 100 साल पहले काबुल में बनी भारत की प्रवासी सरकार ने अंग्रेजी राज के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की जो योजना बनाई थी, उसमें जर्मनी का बड़ा योगदान था। विनायक दा. सावरकर ने अंडमान-निकोबार की जेल में बैठे-बैठे उस क्रांति की योजना बनाई थी। जर्मन विद्वानों ने वेद, उपनिषद, दर्शन, ब्राह्मण-ग्रंथ और संस्कृत साहित्य का जितना गहरा अध्ययन किया है, आज तक किसी देश के विद्वानों ने नहीं किया है। भारत और जर्मनी के बीच एक आंतरिक हार्दिक तार जुड़ा हुआ है। द्वितीय महायुद्ध के बाद जर्मनी को जो हक मिलना चाहिए, अभी तक नहीं मिला है। जो हाल यूरोप में जर्मनी का है, वही एशिया में भारत का है। इसीलिए दोनों राष्ट्र एक-दूसरे को सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बनवाने के लिए खम ठोक रहे हैं। जर्मनी ने भारत को परमाणु-राजनीति में भी खुलकर मदद करने की घोषणा की है। मर्केल ने दुर्गा की एक 10वीं सदी की मूर्ति भी भेंट की है, जो कश्मीर से चोरी करके जर्मनी ले जाई गई थी। जर्मनी में बच्चों को संस्कृत और भारत में जर्मन पढ़ाई जाए, इससे बढि़या बात क्या हो सकती है। हमारे युवजन अंग्रेजी का रट्टा लगाने की बजाय अगर यूरोपीय लोगों की तरह काम-धंधों का प्रशिक्षण लेने लगें तो अगले पांच साल में बेरोजगारी पूरी तरह खत्म हो सकती है।

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