लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

विदेशी निवेश को आमंत्रित करती मंहगार्इ

मंहगार्इ के परिप्रेक्ष्य में भारत बंद कमोवेश पूरे देश में सफल रहा। राजग व बामदलों समेत अनेक व्यावारी संगठनों ने भी स्वेच्छा से बंद का समर्थन किया। करीब पांच हजार वाणिज्य संगठनों ने पेटोल की बड़ी हुर्इ कीमतें वापिस लेने के लिए धरणा एवं प्रदर्षनों में भागीदारी की। इस असर को भांप कर सरकार की ओर से संकेत मिल रहे है कि वह दो रुप्ये प्रति लीटर तक पेटोल की कीमतें घटा सकती है। हाल ही में तीन तेल कंपनियों की जो बेलेंस शीटआर्इ है उससे सार्वजनिक हुआ है कि इन कंपनियों को बीते वित्तीय साल में अरबों का लाभ हुआ है फिर सरकार कैसे कह रही है कि कंपनियां कच्चे तेल में उछाल के कारण लगातार घाटे में हैं। दरअसल यह सफेद झूठ विदेशी निवेश को आंमत्रित करने के लिए बोला जा रहा है।

शराबियों के खुमार को उतारे के लिए जिस तरह से नशे की एक और खुराक की जरुरत पड़ती है, कुछ ऐसे ही बदतर हाल में हमारे आर्थिक सुधार पहुंचते दिखार्इ दे रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा मंहगार्इ बढ़ाते रहने का खेल ऐसे हालात बना देने का पर्याय रहा है, जिसके परिवेश में बहुराष्टीय कंपनियों और प्रत्यक्ष पूंजी निवेश को आमंत्रित किए जाने का वातावरण बना रहे इसलिए केंद्र द्वारा मंहगार्इ थामने के जो भी उपाय किए गए, आखिर में वे मंहगार्इ बढ़ाने वाले और रोजगार में लगे लोगों को रोजगार से बाहर कर देने के कारक ही साबित हुए। बीते कुछ दिनों में मानव विकास की मौजूदा स्थिति की हकीकत को बयान करने वाले जितने भी सर्वेक्षण सामने आए हैं, वे भारत के कथित आर्थिक विकास का ऐसा विद्रूप चेहरा सामने लाते हैं, जो भय और लाचारी की शिकनों से भरा है। विकास की ऐसी ही क्रूर सच्चार्इयों पर पर्दा डालने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बार-बार विदेशी पूंजी निवेश की जरुरत पड़ रही है। चूंकि अब निवेश आधारित कथित विकास के परिणाम, प्रत्यक्षरुप से घातक दिखार्इ देने लगे हैं, इसलिए इनसे बचने की जरुरत है, न कि इन्हें दोहराने की।

दरअसल केंद्र सरकार जान-बूझकर ऐसी नीतियां अपनाकर, ऐसे हालात उत्पन्न करने में लगी है, जिससे मंहगार्इ उत्रोत्तर बढ़ती रहे और बहुराष्टीय कंपनियों को आमंत्रण की पृष्ठभूमि तैयार होती रहे। नवउदारवादी नीतियों के अतंत: पूरी दुनिया में यही परिणाम निकले हैं। इसीलिए लोकसभा में मंहगार्इ पर कर्इ मर्तबा चर्चा होने व सरकार द्वारा बार-बार भरोसा जताए जाने के बावजूद नतीजा शून्य ही रहा है। यह भी तब है जब भारत गेंहू, चावल और दूध उत्पादन में शिखर पर है। इसी बूते भारत इतना सक्षम है तथा उसके पास इतने प्राकृतिक संसाधन हैं कि उसे न तो विश्व बैंक और अंतरराष्टीय मुद्रा कोष से कर्ज लेने की जरुरत है और न ही अधो-संरचना के विकास व विस्तार के लिए विदेशी पूंजी निवेश की जरुरत है ?

मंहगार्इ पर नियंत्रण के लिए सबसे पहले उस विदेशी सोच से मुकित पाने की जरुरत है, जिस सोच को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, योजना आयोग के उपाघ्यक्ष मोंटेंक सिंह आहलूवालिया और गृहमंत्री पी.चिदंबरम की तिगड़ी गलत नीतियां अपनाकर इसे आगे बढ़ाने का काम करती रही है। इन नीतियों पर अंकुश लगाने के साथ वायदा कारोबार और नकली नोटों के बढ़ते चलन पर भी लगाम लगाने की जरुरत है। किसानों की दुर्दशा और मंहगार्इ बढ़ने के प्रमुख कारणों में वायदा को जिम्मेबार बताया जा रहा है, बावजूद, ऐसी कौन-सी लाचारी है, जिसके चलते इस डब्बा-कारोबार को प्रतिबंधित नहीं किया जा रहा ?

भूमण्डलीय नवउदारवादी मुक्त-अर्थव्यवस्था के चलते यह एक बार माना जा सकता है कि इस कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है। लेकिन इसके नतीजे समावेशी विकास के पर्याय नहीं रहे, नतीजतन बेतहाशा असमानता का सामना देश के उस गरीब को करना पड़ा जो सदियों से लाचारी और जिल्लत का जीवन जीने को मजबूर रहा है। भारत के परिप्रेक्ष्य में इस हकीकत को बयान उस पूंजीवादी ‘आर्थिक सहयोग व विकास संगठन ने भी किया है, जिसके सदस्यों में अमीर देशों के पूंजीपति बहुमत में हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक 1992 से पहले, मसलन उदारवादी नीतियों के देश में आगमन से पहले हमारे यहां उच्च और निम्न लोगों की आमदनी के बीच महज दोगुने का फर्क था, जो अब बढ़कर 12 गुना हो गया है। बतौर मिसाल यदि 1992 से पूर्व उच्च आय वर्ग का व्यकित 20 रुपए रोज कमाता था, तो निम्न आय वर्ग का व्यकित 10 रुपए आसानी से कमा लेता था। जबकि मौजूदा दौर में उंची आय के लोग 120 रुपए रोज कमा रहे हैं। मसलन आय में अंतर 12 गुना बढ़ा है। इस रिपोर्ट की एक और खासियत यह है कि इस अध्ययन में उच्च आयवर्ग का व्यकित उसे माना गया है, जो उच्च आय वर्ग से थोड़ा नीचे और निम्न मध्य वर्ग से थोड़ा-सा उपर जीवन-यापन कर रहा है। यदि देश के उधोगपति, राजनेता या नौकरशाह की आमदनी से निम्न आय वाले व्यकित की तुलना की जाए तो यह हैरतअंगेज अंतर रेखांकित करने वाला साबित होगा ? इसलिए इस तुलना को अव्यावहारिक नहीं कहा जा सकता है।

लोकसभा में बढ़ती मंहगार्इ पर सफार्इ देते हुए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि विभिन्न वैशिवक घटनाओं का प्रभाव भारतीय अर्थवयवस्था पर पड़ने की वजह से सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर नौ फीसदी से घटकर 6.5 फीसदी रह गर्इ। जबकि जीडीपी में यह गिरावट बेलगाम हुए भ्रष्टाचार के कारणों से आर्इ है। घोटालों की निरंतरता ने देश के उभरते स्वरुप पर जबरदस्त आघात किया है। घोटालों के कारण न केवल आर्थिक विकास की रफतार सुस्त हुर्इ, साथ ही सरकार प्रशासनिक दखल को महत्व देने में भी विवश नजर आर्इ। नतीजतन आर्थिक क्षेत्रों में चहूं ओर गिरावट दिखार्इ दे रही है। यही वजह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की देश से पिछले तीन वर्श से तीन गुना से अधिक की निकाषी हो रही है। विदेशी बहुराश्टीय कंपनियों ने वर्श 2009 में मात्र 3.1 डालर की देश से निकाषी की, जो 2010 में बढ़कर दो गुना से अधिक बढ़कर 7.2 अरब डालर पहुंच गयी और वर्श 2011 में यह राषि बढ़कर 10.7 अरब डालर के आंकड़े को छू गयी। ये आंकड़े बाजार का अध्ययन करने वाली कंपनी नोमुरा ने दिये है। नोमुरा का दावा है कि भारी राजकोशिय घाटा और बढ़ते चालू खाता घाटे के साथ ही आर्थिक विकास में सफलता एवं सुधार प्रकि्रया थम जाने के कारण निवेशक पूंंजी निकाल रहे है। इसी कारण डालर की तुलना में रुप्ये में गिरावट आ रही है।

खनिज उत्खनन के क्षेत्र में तीन फीसदी की गिरावट कर्नाटक, उड़ीसा और गोआ जैसे राज्यों में न्यायालयों द्वारा लौह अयस्कों के खनन पर पाबंदी लगा देने के कारण आर्इ है। ये हालात गैर-कानूनी ढंग से उत्खनन किए जाने के पैदा हुए। यही हालत मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में निर्मित होने जा रहे हैं। खनिज के बाद विकास दर में जो गिरावट दर्ज की गर्इ है, वह विनिर्माण क्षेत्र है। उंची बैंक ब्याज दरें और बेलगाम मंहगार्इ की वजह से इस क्षेत्र में वृद्धि दर 8 फीसदी से गिरकर 2.7 फीसदी पर आ गर्इ। कृषि क्षेत्र में भी बदतर हालात हैं।यही कारण है कि किसान कर्ज के जाल से उभर नहीं पा रहा है।

राष्टीय नमूना सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश के आधे से ज्यादा किसान कर्ज में इस हद तक डूबे हैं कि केंद्र द्वारा राहत पैकेज दिए जाने के बावजूद वे ऋण-मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे किसानों की सर्वाधिक संख्या उत्तर-प्रदेश में है। हाल ही में सुषमा स्वराज ने संसद में जानकारी दी कि विदर्भ में 13 कपास किसानों ने कपास के वाजिब मूल्य न मिल पाने के कारण आत्महत्या की है। इन्हीं सब हालातों की पड़ताल करके अंतरराष्टीय पारदर्शिता संस्थान ने भी यह तस्दीक की है कि भारत में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है। भ्रष्टाचार संबंधी 183 देशों की वार्षिक रिपोर्ट में, पिछले साल भारत जहां 87 वें अनुक्रम पर था, वह अब गिरकर 95 वे नंबर पर आ गया है। जब देश भ्रष्टाचार से जुड़े किसी भी मुददे पर मुस्तैदी से लड़ता दिखार्इ नहीं दे रहा है, तो विकास को पारदर्शिता की कसौटी पर कसने से तो यही परिणामों की उम्मीद की जाएगी ? बहरहाल केंद्र सरकार यदि भ्रष्टाचार पर पुरजोरी से लगाम कसने का वीड़ा उठाले तो उसे आर्थिक सुधारों के लिए विदेशी पूंजी की जरुरत नहीं रह जाएगी। क्योंकि आखिरकार तो हमारी मांग और आपूर्ति स्थानीय खनिज संसाधनों और कृषि से ही पूरे होते हैं ?

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