लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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modi and obamaडॉ. मयंक चतुर्वेदी

किसी भी देश के लिए स्थायी सरकार के क्या लाभ हो सकते हैं, आज यह बात भारत से बेहतर कोई नहीं जान सकता। देश में जब से केंद्र में भाजपा की बिना किसी सहारे से चलने वाली ताकतवर सरकार बनी है, ऐसा लगने लगा कि भारत को देखने की वैश्विक दृष्टि बदल रही है। वास्तव में यह कहने के पीछे तमाम कारण गिनाए जा सकते हैं। देश में सरकार बने अभी छह माह पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन इन बीते 180 दिनों में देश की जनता ने देखा कि जो महंगाई काबू में नहीं आ रही थी, वह स्थि‍र हो गई। पेट्रोल और डीजल के दामों में कमी आई। देश में लम्बे समय तक चलने वाले सुधारवादी कार्यक्रम शुरू हुए। भारतीय सीमाओं में अवैध घुसपैठ में कमी देखी गई। विदेशों से हमारे संबंध लगातार मधुर हो रहे हैं। कई देश भारत के हिसाब से यहां तक कि अपने घरेलु मामलों में जरूरी बदलाव करने के लिए तैयार हो गए। इस प्रकार के अनेक नए सकारात्मक काम पिछले दिनों में विकसित भारत बनाने की दिशा में होते हुए देखे जा सकते हैं। भारत ने आतंरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर तेजी से चलना प्रारंभ कर दिया है, यह स्थि‍ति बताती है कि किसी भी देश में जनता यदि लम्बे समय तक सही तरीके से चलने के लिए आवश्यक बहुमत देकर लोकतंत्र शासन प्रणाली में अपने लिए सरकार का चुनाव करें तो वह सरकार हर नागरिक को मजबूत बनाने में सक्षम है।

यही वजह है कि आज भारत की शक्ति को अमेरिका जैसा देश भी स्वीकारने लगा है। कल तक अमेरिका जिस व्यक्ति को अपने यहां आने तक के लिए वीजा देने को तैयार नहीं था, वह उसके प्रधानमंत्री बनते ही अपनी नीतियों में परिवर्तन कर देता है। इसे आखि‍र क्या माना जाएगा, यही कि यह देश की आवाम की वह ताकत है जो उसने लोकसभा चुनावों में प्रदर्श‍ि‍त की और देश को एक स्थायी सरकार दी। अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए बहुप्रतीक्षित आव्रजन सुधारों पर कदम बढ़ा दिए हैं जो कि किसी अन्य देश के हित में हो अथवा ना हो किंतु भारत के हित में पूरी तरह है।

ओबामा के इस निर्णय के कारण अमेरिका में निर्वासन का खतरा झेल रहे लाखों भारतीय प्रवासियों को फायदा होने जा रहा है। इस कदम से तकनीकी क्षेत्र में कार्यरत भारतीयों की एक बड़ी आबादी को मदद मिलने के साथ अपनाए जा रहे नए सुधारों से उन कुशल कामगारों एवं उनके जीवनसाथियों को भी काम करने का अधिकार मिल जाएगा जिन्हें अमेरिका में अभी वैध स्थायी दर्जा (एलपीआर) मिलने का इंतजार है। यह निर्णय वस्तुत: यह उन लोगों के लिए खासतौर पर विशेष महत्व रखता है, जिनके पास एच-1बी वीजा है। वैसे भी अमेरिका में इस वक्त कुल 1.1 करोड़ अवैध प्रवासियों में आज 4.5 लाख भारतीय नागरिक हैं। अमेरिका में भारतीय मूल के अमेरिकियों की संख्या 33.4 लाख के करीब है, जो कि चीन और फिलीपींस के बाद तीसरा सबसे बड़ा एशियाई समुदाय कहलाता है।

अमेरिका में आज यदि इन तीन प्रमुख देशों की बात करते हुए आंकड़ों के हिसाब से यहां की जनसंख्या का अनुमान लिया जाए तो चीनी मूल के लोगों की आबादी 41 लाख (22 फीसदी) है, जबकि फिलीपींस मूल के लोगों की आबादी 35.9 लाख (19 फीसदी) और भारतीय अमेरिकियों की आबादी 18 फीसदी है।      यहां सबसे ज्यादा 2000 से 2012 के बीच भारतीय लोगों की आबादी 76 फीसदी बढ़ी है। अमेरिकी में भारतीय पांच प्रांतों कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क, टेक्सास, न्यूजर्सी व हवाई में सबसे ज्यादा निवास कर रहे हैं। धर्म के आधार पर वर्गीकृत करते हुए देखने पर सर्वाधिक 51 फीसदी संख्या हिंदुओं की है। दूसरे नंबर पर 18 फीसदी क्रिश्चियन हैं फिर 10 फीसदी मुस्लिम, 5 फीसदी सिख, 2 फीसदी जैन तथा 1 फीसदी बौद्ध भारतीय अमेरिका में बसे हैं।

वस्तुत: अमेरिकी राष्ट्रपति के आव्रजन सुधारवादी इस निर्णय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में सम्पन्न हुई अमेरिकी यात्रा से जोड़कर भी देखा जा सकता है। जिस प्रकार श्री मोदी का वहां स्वागत हुआ और गर्मजोशी के साथ दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर परस्पर संवाद तथा संधि‍ निर्णय लिए गए, तभी यह बात स्पष्ट हो गई थी कि अमेरिका की भारत को देखने की दृष्टि बदलना शुरू हो गई है। यदि अमेरिका अपने व्यापारिक हित भारत में देखता है तो भारत भी अमेरिका में अपने लिए बहुत कुछ पाता है। इसके बाद डब्ल्यूटीओ की बैठक में भारत ने भी स्पष्ट कर दिया था कि वह अमेरिका के साथ खड़ा है। एशि‍या सहित पूरी दुनिया में इस समय बढ़ती चीन की ताकत को भी कम करने के लिए अमेरिका को यहां अपने सबसे करीबी दोस्त की जरूरत है जो कि उसके लिए भारत से बेहतर यहां कोई और हो नहीं सकता है। वैसे भी एक नजर देखा जाय तो भारत-अमेरिका मिलन यही वर्तमान की आवश्यकता भी है जिससे कि भारत दुनिया के सबसे ताकतवर देश के साथ मिलकर अपनी शक्तियों में बढ़ोत्तरी करते हुए आने वाले दिनों में चीन को मात देने की स्थि‍ति में पहुंच सके। अच्छी बात यह है कि देश इस ओर निरंतर अपने कदम बढ़ाए जा रहा है।

आगामी गणतंत्र दिवस के लिए मुख्य अति‍थि‍ के रूप में भारत ने बराक ओबामा को आमंत्रित किया है। विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका अपने राष्ट्रपति के जरिए इस दिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र  भारत की ताकत का सीधा प्रदर्शन देखेगा। प्रधानमंत्री मोदी के आमंत्रण को स्वीकार कर कहा जा सकता है कि आज ओबामा ने एक वैश्विक संदेश तो दे ही दिया है कि अब अमेरिका-भारत साथ-साथ हैं। भविष्य में एशि‍या में उसका पक्का मित्र भारत बनने जा रहा है।

बराक ओबामा भारतीय गणतंत्र दिवस में सम्मलित होने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति होने के साथ अमेरिका के शीर्ष पद पर रहते हुए दो बार भारत आने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। उनकी यह नवंबर 2010 के बाद दूसरी भारत यात्रा होगी। इतिहास के झरोखे से देखे तो भारतीय गणतंत्र दिवस पर किसी राष्ट्रप्रमुख को बतौर मेहमान आमंत्रित करने की प्रथा 1950 में शुरू हुई थी। तब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति देश के पहले मेहमान बने थे। इसी क्रम को जारी रखते हुए इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को आमंत्रित किया है।

भारत और अमेरिका इन दोनों देशों के बीच इन दिनों रिश्तों की मिठास का अंदाजा इसी से लगने लगा है कि पिछले सितंबर में मोदी ने अमेरिका की यात्रा की थी। उसके बाद से यह मोदी और ओबामा के बीच चौथी भेंट होगी। अमेरिका के अलावा म्यांमार में आसियान शिखर सम्मेलन और आस्ट्रेलिया में  जी-20 शिखर सम्मेलन के मौके पर भी दोनों नेताओं की मुलाकाते हुई ही थीं। वास्तव में हम अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत आगमन को देश के लिए एक कूटनीतिक कामयाबी के रूप में भी देख सकते हैं। उनके आने के कारण चीन, पाकिस्तान तथा अन्य हमारे पड़ौसी देशों को भी समझमें आएगा कि भारत के साथ भविष्य में उन्हें कैसे रिश्ते बनाए रखने चाहिए।

भारत के 66वें गणतंत्र दिवस समारोह में राष्ट्रपति ओबामा की शिरकत हमारे प्रधानमंत्री की ताकत का भी प्रदर्शन करती है। लंबे समय से भारत और अमेरिका के बीच जो रणनीतिक साझेदारी में बीते कुछ सालों से सुस्ती महसूस की जा रही थी तथा जो अमेरिका कई बार भारत के निर्णयों में रोड़ा अटकाने का काम करता था वस्तुत: अब वह दौर दोनों देशों के बीच आ रही रिश्तों की मिठास से समाप्त होता दिख रहा है। वर्तमान में अमेरिका से हमारे सुधर रहे मधुर संबंधों से भारत को कई मायनों में सीधे वैश्विक लाभ होना तय है।

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