लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

भारत के कारपोरेट मीडिया और केन्द्र सरकार में एक समानता है कि ये दोनों झूठ बोल रहे हैं और एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम कर रहे हैं। मीडिया का सरकार का पूरक बन जाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मौत है। सत्य के सार्वजनिक परिदृश्य से गायब हो जाने की शुरूआत है। कायदे से मीडिया को सत्य के साथ होना चाहिए।

एनडीए ,क्षेत्रीय दलों और वाममोर्चा ने 5 जुलाई का भारत बंद जिस सवाल को केन्द्र में रखकर बुलाया है वह आम जनता के हित का बड़ा सवाल है और केन्द्र सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य बढ़ाते समय सफेद झूठ कहा है। यह बंद केन्द्र के झूठ का प्रतिवाद है साथ ही जनता के हितों की हिमायत है। हमें इसे सफल करना चाहिए। सभी ब्लॉगरों को इस विषय पर लिखना चाहिए।

इंटरनेट पर बैठे हुए आज अखबार देख रहा था और आश्चर्य हो रहा था कि भारत के अखबार भारत बंद जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक एक्शन पर चुप हैं। साधारण सी घटना पर हंगामा करने वाला मीडिया भारतबंद जैसी बड़ी घटना पर चुप रहे यह बात समझ में नहीं आती। मीडिया की जन समर्थक भूमिका होनी चाहिए। टेलीविजन चैनलों से लेकर अखबारों तक सभी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे बताएं कि भारतबंद क्यों हो रहा है, किस मसले पर हो रहा है, उसके आधिकारिक तथ्य क्या हैं,जनता के हितों के साथ बंद का क्या संबंध है और इस बंद का राजनीतिक महत्व क्या है ,इत्यादि सवालों पर विभिन्न जनहित की दृष्टियों से विचार करें।

भारत में कारपोरेट मीडिया को अपना मौजूदा जनविरोधी रवैय्या बदलना पड़ेगा। मीडिया की आदत है कि ज्यों ही कोई राजनीतिक पार्टी आंदोलन का रास्ता पकड़ती है वह आंदोलन पर हमले आरंभ कर देता है. आंदोलन का उपहास उड़ाना आरंभ कर देता है अथवा आंदोलन और जनता के बीच पैदा हुए कष्ट ,परेशानियों और मुसीबतों के बाइटस दिखाना आरंभ कर देता है। मीडिया को अपना यह नजरिया बदलने की जरूरत है। जनता के प्रतिवाद को कलंकित करना मानवाधिकारों का हनन है।

आज हिंदुस्तान की जनता बेहद तकलीफ में है। पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य बढ़ाकर और उसे बाजार के हवाले करके मनमोहन सिंह सरकार ने सीधे आम आदमी के ऊपर हमला बोला है और इसके लिए झूठे तर्कों का सहारा लिया है।

पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने के पीछे तर्क दिया गया है कि विश्व बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़े हैं। यहां भी बढ़ेंगे। सरकार सब्सीडी देने की स्थिति में नहीं है। तेल कंपनियां बोझा उठाने की स्थिति में नहीं हैं। सरकार को भी अपना बजट घाटा कम करना है इसीलिए पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में बढ़ोतरी की गई है। यह भी कहा कि तेल कंपनियां घाटे में चल रही हैं अतः मूल्य वृद्धि जरूरी है। केन्द्र सरकार के ये सारे झूठे बहाने हैं।

पेट्रोलियम पदार्थों में जो बढ़ोतरी की गई है उसका भारत की सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। नए आदेश के तहत पेट्रोलियम पदार्थों को विनियमन करके बाजार की शक्तियों के हवाले कर दिया गया है। पेट्रोलियम पदार्थों पर से सरकारी नियंत्रण हटने गरीबों की तकलीफें और बढ़ेंगी। साथ ही निजी क्षेत्र की कंपनियों को खुली लूट का मौका मिलेगा।

यदि ऊर्जा और पेट्रोलियम पदार्थों पर से सबसीडी हटा दी जाएगी तो सारे देश में अराजकता फैल सकती है । आज स्थिति यह है कि पेट्रोल,डीजल,एलपीजी गैस और केरोसीन पर से सब्सीडी हटाने या कम करने का अर्थ है गरीब को और गरीब बनाना। उसे बर्बाद करना।

भारत में इस समय 50 करोड़ लोग बिना बिजली के रहते हैं। साठ साल के विकास के दावों का यह ध्रुव सत्य है। 70 करोड़ लोग लकडी-कोयला आदि के चूल्हों पर निर्भर हैं। उसी पर खाना बनाते हैं। यही उनकी प्राइमरी ऊर्जा का आधार है। चालीस करोड़ लोग ऐसे हैं जो गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। यह वह आबादी है जिसके पास पेट्रोलियम पदार्थों को खरीदने की क्षमता ही नहीं है। कायदे से इन लोगों की क्रय क्षमता बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए लेकिन केन्द्र सरकार की नीतियों का रूख दूसरी ओर है।

केन्द्र सरकार का तर्क है कि पेट्रोलियम पदार्थों पर जितना खर्च हो रहा उतने की वसूली नहीं हो पा रही है। वे यह भी कह रहे हैं पेट्रोल,डीजल,गैस और केरोसिन को बड़ी मात्रा में सब्सिडाइज करना पड़ रहा है।

केन्द्र सरकार के आंकडों के अनुसार सरकारी राशन की दुकानों से वितरित किए जाने वाले केरोसीन तेल पर 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 970,978 और 924 करोड़ रूपये की सब्सीडी दी गयी। इसके बदले में केन्द्र सरकार ने इन्हीं सालों में क्रमशः 17883, 19,102 और 28225 करोड़ रूपये बदले में सरकारी राशन की दुकानों के जरिए हासिल किए।

इसी तरह एलपीजी गैस पर केन्द्र सरकार ने 2006-07, 2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 1554, 1663 और 1714 करोड़ रूपयों की सब्सीडी दी और बदले में इन्हीं वर्षों में उसने क्रमशः 10701, 15523 और 17600 करोड़ रूपये वसूल किए हैं। यानी केरोसीन और गैस पर कुल मिलाकर 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 2524, 2641 और 2688 करोड़ रूपये दिए गए और 2006-07,2007-08 और 2008-09 में मूल्य वृद्धि करके क्रमशः 28584,34625 और 45825 करोड़ रूपये वसूले गए।

इसी तरह डीजल के क्षेत्र में 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 18776, 35166 और 52286 करोड़ रूपये , पेट्रोल में 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 2027, 7332 और 5181 करोड़ रूपये वसूले गए।

संक्षेप में कहें तो समग्र सबसीडी और वसूले गए धन की राशि 2006-07,2007-08 और 2008-09 में क्रमशः 51911, 79764 और 105980 करोड़ रूपये आंकी गयी है। ये आंकड़े पेट्रोलियम मंत्रालय के द्वारा तैयार किए गए हैं। इन आंकडों से सरकार के इस दावे का खंडन होता है कि पेट्रोलियम पदार्थों की सबसीडी के कारण दाम बढ़ाए गए हैं। केन्द्र सरकार का कहना है कि तेल कंपनियां घाटे में चल रही हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय के बताए तथ्य यह बताते हैं कि कोई भी सरकारी तेल कंपनी घाटे में नहीं चल रही है।

मीडिया के जरिए एक मिथ यह भी गढ़ा गया है कि भारतीय लोग पेट्रोल डीजल के कम दाम देते हैं और ज्यादा दामों पर सरकार के उन्हें विदेशों से मंगाना होता है। इस प्रसंग में दिए गए सारे तर्क गलत और झूठ पर आधारित हैं।

केन्द्र सरकार का तर्क है कि वह गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों को सबसीडी देगी लेकिन जो गरीब हैं या अतिगरीबी की रेखा के ऊपर रहते हैं उन्हें सब्सीडी नहीं देगी। सवाल यह है कि बीपीएल या अतिगरीबी के तहत आने वाले कितने लोग हैं जो एलपीजी गैस का प्रयोग करते हैं ? इसी तरह किसानों को सब्सीडी कम करने की बात भी कही जा रही है और कहा जा रहा है कि किसानों को ज्यादा कृषि उपज मूल्य देकर उनकी लागत की भरपाई की जाएगी। लेकिन मझोले और हाशिए के किसानों का क्या होगा ? सच यह है 44 प्रतिशत लोगों के पास बिजली अभी तक नहीं पहुँची है इस वर्ग के लोगों को सब्सीडी बंद कर देने से गरीब और गरीब हो जाएगा। पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य में जो बढ़ोतरी की गई है उसका आधार है कीर्ति पारिख कमेटी की सिफारिशें और ये सिफारिशें गरीबों के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं। हम सभी को भारत बंद को सफल बनाना चाहिए और विपक्षी दलों को टिकाऊ ढ़ंग से दीर्घकालिक आंदोलन का कार्यक्रम बनाकर मैदान में आना चाहिए। भारत बंद केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन का आरंभ है अंत नहीं है।

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2 Comments on "क्या भारत बंद के साथ मीडिया खड़ा होगा"

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sunil patel
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चतुर्वेदी जी सही कह रहे है. सरकार को चाहिए की अपनी आँख खोले अन्यथा अगले चुनाव में अस्तित्व बचाना मुश्किल पड़ जायेगा.
काश भारत बंद की जगह इस आन्दोलन का नाम भारत उठो / जागो होता तो ज्यादा अच्छा होता.

VIJAY SONI ADVOCATE
Guest
आदरणीय चतुर्वेदी जी आपके कथन की सच्चाई इस बात से स्वमेव सिद्ध हो गई की आज ०५ जुलाई २०१० को भारत की जनता ने इस आन्दोलन में पूरी तन्मयता से शामिल होकर बंद को अभूतपूर्व सफलता दिलाई है,उम्मीद की जा सकती है की यूपीए सरकार जरुर जागेगी अन्यथा विरोधी दलों को और भी आन्दोलन के लिए आगे बढ़ना होगा ,जनतंत्र में निरंकुश निर्णयों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ना सरकार द्वारा सब्सिडी का प्रलाप कर इसे बंद करने की दिशा में कदम उठाना अनुचित और देश की जनता के साथ छलावा किया गया है… Read more »
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