लेखक परिचय

कन्हैया झा

कन्हैया झा

(शोध छात्र) माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल मध्य प्रदेश

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-कन्हैया झा-
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आम-चुनाव 2014 के दौरान विकास के गुजरात मॉडल, बिहार मॉडल, आम-आदमी पार्टी का स्वराज मॉडल, आदि चर्चा में रहे. परन्तु चुनाव की गहमा-गहमी तथा आरोप प्रत्यारोपों के मध्य शायद उनमें से किसी पर भी गंभीरता से विचार नहीं हो किया गया. अब कुछ ही राज्यों में मतदान रह गए हैं तथा पिछले एक वर्ष की गतिविधियों से सत्ता में आने वाली पार्टी भी लगभग तय है. इसलिए इस मई के महीने में, नयी सरकार बनने से पहले देश को विकास के बारे में अवश्य सोचना चाहिए.

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए “सर्वे भवन्तु सुखिनः” कड़ी के पूर्व के पांच लेखों में वेद-सम्मत विकास की भारतीय दिशा के आधारभूत सिद्धांतों का वर्णन किया गया था. विकास के लिए शासन एवं जनता के बीच विश्वास बहुत जरूरी है. चुनाव द्वारा सरकार बना लेने से जनता का शासन के प्रति विश्वास सिद्ध नहीं होता. और ना ही शासन हर निर्णय के लिए जनता के समक्ष उपस्थित हो सकता है. पक्ष एवं विपक्ष दोनों को ही जनता के विश्वास के लिए, अगले पांच वर्ष के अपने मुद्दों की स्पष्ट चर्चा के लिए, मीडिया अथवा रैलियों का उपयोग करना चाहिए. इन कार्यों से जनता भी जल्दी ही निश्चिंत हो अपने कामों में लगेगी.

संसद में प्रधानमन्त्री अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों, अन्य सांसदों आदि की तुलना में First among Equal हो सकते हैं, परन्तु जनता की निगाह में उनका एक विशेष दर्ज़ा है. यह विश्वास प्रधानमन्त्री की मुश्किल समय में काम आने वाली व्यक्तिगत पूंजी है, परन्तु उनकी ज़रा सी असावधानी से यह काफूर भी हो सकती है. सभी सांसद उनके अपने होते हुए भी अगले पांच वर्ष उनके लिए सतत कुरुक्षेत्र है. अपने या पराये – गलती कोई भी करे, जनता उन्हीं पर प्रश्न चिन्ह लगाएगी. विकास में बाधा न आये, इसके लिए उन्हें मंत्रिमंडल एवं विपक्ष के साथ बैठ सभी पर समानता से लागू होने वाले कुछ मानक तय करने होंगे. पिछली सरकारों के कार्यकलापों को लेकर एक दूसरे पर आक्षेप करना भूतों को दावत देना होगा. जनता के बीच भ्रम फैलाने के सन्दर्भ में मीडिया के प्रमुख लोगों से बात करना भी जरूरी होगा.

हर चुनाव की तरह इस बार भी प्रत्येक क्षेत्र में लोगों ने अपने जातीय, व्यक्तिगत आदि अनेक समीकरणों के आधार पर वोट दिए होंगे. परन्तु जनता के लिए चुनाव के बाद उन सभी समीकरणों को भुलाने में ही भलाई होगी. तभी शासन स्वतंत्र होकर विकासोन्मुख हो पायेगा. पिछली अनेक सदियों से भारत भूमि में रहते हुए सभी मतों के लोग यहां के प्राचीन शास्त्रों को श्रद्धा से देखते रहे हैं. इसलिए विकास की भारतीय दिशा अथवा मॉडल में सभी की श्रद्धा होनी चाहिए.

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