लेखक परिचय

इक़बाल हिंदुस्तानी

इक़बाल हिंदुस्तानी

लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

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इक़बाल हिंदुस्तानी

एल पी जी नीतियों से यह मक़सद हासिल नहीं हो सकता!

सिर्फ एक क़दम उठा था गलत राहे शौक में,

मंज़िल तमाम उम्र मुझे फिर ढूंढती रही ।

0 हमारे पूर्व राष्ट्रपति जनाब ए पी जे कलाम साहब का सपना रहा है कि 2020 तक भारत विकसित राष्ट्र बन जाये। यह सकारात्मक सोच है लेकिन सपने और हकीकत में बड़ा फर्क होता है। हमारी सरकार ने विकास का जो पश्चिमी एल पी जी यानी लिबरल, प्राईवेट और ग्लोबल पूंजीवादी मॉडल अपनाया हुआ है उसके चलते अभी 2020 तक नहीं 2040 तक भी यह नेक काम होना मुमकिन नज़र नहीं आ रहा है। यह लक्ष्य तो समाजवादी सोच के ज़मीन से जुड़े किसी संघर्षशील और दूरदर्शी लीडर के नेतृत्व में ही मुमकिन हो सकता था। किसी विकसित राष्ट्र के लिये जो बुनियादी ज़रूरते हैं उनमें विशाल अर्थव्यवस्था से लेकर प्रतिव्यक्ति आय, शिक्षा, स्वास्थय, उद्योग, व्यापार, कृषि, रोज़गार, परिवहन, दूरसंचार, उूर्जा, कानून व्यवस्था और आधुनिक तकनीक का जो ढांचा विकसित किया जाना चाहिये वह अभी दूर दूर तक तैयार होता नज़र नहीं आ रहा है। आज हमारी अर्थव्यवस्था अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर आ जाने का दावा तो किया जा रहा है लेकिन इसका उपभोग केवल मुट्ठीभर अमीर भारतीय ही जब तक करते रहेंगे तब तक देश विकसित नहीं बन सकता। हमारे देश में भ्रष्टाचार, नक्सलवाद और आतंकवाद बढ़ता जा रहा है। अन्नदाता कहलाने वाला किसान लगातार आत्महत्या कर रहा है। बलात्कार और दहेज़ हत्यायें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। साम्प्रदायिकता और जातिवाद पहले से मौजूद है।

पुलिस और राजनेता पहले से अधिक संवेदनहीन होते जा रहे हैं। कार्यपालिका घोटालों और घूसखोरी के नये नये रिकॉर्ड बना रही है। हमारे पीएम खुद मानते हैं कि हमारे देश के बच्चो की बड़ी तादाद कुपोषण का शिकार है। एक पूर्व पीएम स्व. राजीव गांधी मानते थे कि सरकारी योजनाओं के हर एक रूपये में 85 पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। हालत इतनी ख़राब है कि साफ सुथरी और ईमानदार समझी जाने वाली एकमात्र न्यायपालिका का निचला हिस्सा भी तेज़ी से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरता जा रहा है। कालाधन विदेशों में आज भी जमा हो रहा है। एक तरफ देश में गरीबी का समंदर हो और दूसरी तरफ अमीरी के टापू तो देश ऐसे में कैसे आने वाले आठ सालों मंे विकसित राष्ट्र बन सकता है?

जिनके आंगन में अमीरी का शजर लगता है ,

उनका हर ऐब ज़माने का हुनर लगता है।

अगर यह कहा जाये कि सरकार अमीरों को और अमीर तथा गरीबों को और गरीब बनाने के रास्ते पर खुलेआम चल रही है तो कुछ अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह बात हम नहीं खुद आंकड़े बयान कर रहे हैं। हर साल जब करोड़पतियों के नाम जारी होते हैं तो देश में उनकी सूची पहले से और लंबी हो जाती है जबकि गरीबों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जाती है, भले ही सरकार एक सोची समझी योजना के तहत अलग अलग आयोग बनाकर उनकी तादाद को छिपाने का लगातार प्रयास कर रही है। असंगठित क्षेत्र में उद्योगों के लिये गठित राष्ट्रीय आयोग के तत्कालीन चेयरमैन अर्जुन सेनगप्ता ने 2006 की एक रिपोर्ट में देश की 77 प्रतिशत आबादी की हालत ऐसी बताई थी कि वह 20 रू0 रोज़ से कम पर गुज़ारा कर रही है। ग्रामीण मंत्रालय ने 2009 में एन सी सक्सेना की एक कमैटी इस काम के लिये बनाई तो उसका कहना था कि देश की आधी जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जी रही है।

मैं वो साफ ही ना कह दूं जो है फर्क तुझमें मुझमें,

तेरा दर्द दर्द ए तन्हा मेरा गम गम ए ज़माना।

ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव द्वारा सर्वे में यह तादाद 65 करोड़ बताई गयी है। इस स्टडी में मल्टी डायमेंशियल पावर्टी इंडेक्स का इस्तेमाल किया गया है। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार देश की 80 प्रतिशत आबादी दो डालर से कम पर गुज़ारा कर रही है जो अंतराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से बेहद गरीब है। हालत इतनी ख़राब है कि अकेले आठ उत्तरी भारत के राज्यों में ही 42.1 करोड़ गरीब रह रहे हैं जो दुनिया के 26 सबसे गरीब अफ्रीकी देशों की कुल 41 करोड़ आबादी से भी अधिक है। पहले सरकार गरीबी का पैमाना कैलोरी को मानती थी जिसके अनुसार गांव मंे 2400 और शहर में 2100 से कम कैलोरी प्रयोग करने वाला निर्धन माना जाता था। योजना आयोग छठी पंचवर्षीय योजना के समय से गरीबी निर्धरण का काम कर रहा है। इसमें राज्य और राष्ट्रीय स्तर दोनों पर ही सर्वे होता है। यह निर्धारण 1979 में गठित एक टास्कफोर्स की सिफारिश के आधार पर किया जाता है।

रोटी नहीं तो क्या हुआ तू फिक्र ना कर,

आजकल यह मुद्दा जे़रे बहस है दिल्ली में।

पहले यह सर्वे न्यूनतम आवश्यकताओं और ज़रूरी खपत के आधार पर होता था लेकिन बाद में इस पर विवाद होने पर प्रो0 लकड़वाला की एक स्पेशलिस्ट गु्रप की सिफारिशों पर संशोधन भी किये गये। आजकल गरीबी रेखा का जो पैमाना इस मामले में अपनाया जाता है उसमें भोजन के साथ साथ शिक्षा और चिकित्सा पर किये जाने वाला ख़र्च भी शामिल किया गया है। जानकारों का कहना है कि जो सरकार गरीबों की गणना करने में ही ईमानदार नहीं है वह उनका भला करने में कैसे ईमानदार हो सकती है? बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार का गरीबों पर कितना बुरा असर पड़ता है सरकार अच्छी तरह जानती है लेकिन वह आज तक राशन की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भी दुरस्त करने के लिये गंभीर नज़र नहीं आती। 2011-12 में सरकार ने फर्टिलाइज़र में 67199 करोड़, खाद्य पदार्थों में 72823 करोड़, पैट्रोलियम पदार्थों में 68481 करोड़ और आयकर में 42320 करोड़ यानी कुल 250723 करोड़ और उद्योग जगत को सीमा शुल्क में 276098 करोड़, उत्पाद शुल्क में 212167 करोड़ और कार्पोरेट कर में 51292 करोड़ की छूट देकर कुल 539552 करोड़ रू. की सब्सिडी दी गयी।

सब जानते हैं कि गरीबों के हिस्से की सब्सिडी का आधे से अधिक लाभ बिचौलिये उठा रहे हैं लेकिन सरकार ने इसलिये चुप्पी साध रखी है क्योंकि उसकी मशीनरी ही नहीं बल्कि विधायक,सांसद और मंत्री तक इस लूट में बराबर अपना हिस्सा बांट रहे हैं। 16 मार्च 2012 को वित्तमंत्री ने बताया कि अमीरों को 580724 करोड़ कर छूट दी गयी जबकि राजस्व घाटे की असली वजह यही 139744 करोड़ वसूली में 192227 की एक्साइज़ ड्यूटी की छूट और 135789 करोड़ की कस्टम ड्यूटी वसूल करके 172740 करोड़ की छूट है।

अगर कोई आदमी बीमार हो और उसे यही पता नहीं लगे कि उसको क्या रोग है तो वह अपना इलाज कैसे करा सकता है? ऐसा ही आलम हमारी सरकार का है। वह आज तक यही तय नहीं कर पा रही है कि गरीब किसे कहा जाये? सरकार का दावा है कि शहरी क्षेत्र में एक आदमी 28 और गांव में 22 रूपयों में गुजारा कर सकता है। 20 सितंबर 2011 को योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर कहा था कि यह राशि 26 और 32 रू0 है। देश की 30 फीसदी आबादी आज भी गरीब है। 35.46 करोड़ जनता 26 रू. प्रतिदिन पर गुज़ारा कर रही है। तेंदुलकर समिति के फार्मूले पर तैयार योजना आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 2004-05 में देश में 37.2 फीसदी यानी गरीबों की तादाद 40.72 करोड़ थी जबकि 2009-10 में 29.8 फीसदी यानी 35.46 करोड़ हो जाने का दावा किया जाता है। इसका मतलब यह है कि गांव के गरीबों में 8 फीसदी और शहरी गरीबों में 4.8 फीसदी गिरावट आई है।

एक तथ्य यह भी उभरकर सामने आया कि असम, यूपी, पश्चिम बंगाल और गुजरात के गरीबों में सबसे ज़्यादा मुस्लिम हैं। मिसाल के तौर पर बिहार के शहरी क्षेत्र में रहने वाले 56.5 फीसदी गरीब मुस्लिम हैं। ऐसे ही 47.4 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति, 42.3 फीसदी अनुसूचित जाति और 31.9 फीसदी पिछड़ी जाति के लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। 0 कहां तो तय था चरागा़ हर एक घर के लिये, कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिये।

आज हमारी संसद में 302 करोड़पति सांसद बैठे हैं। उनको क्या पता गरीबी किसे कहते हैं। जाहिर है कि आज चुनाव लड़ना जितना महंगा हो चुका है उससे शेष 243 सांसद भी ऑनपेपर करोड़पति भले ही न हो लेकिन उनकी हैसियत भी करोड़पति के आसपास ही होगी। दरअसल संसद की कैंटीन मंे 32 रूपये में दो टाइम का बेहतरीन खाना मिल जाता है। यही नहीं बल्कि रेलवे, योजना आयोग और केंद्र सरकार के कई विभागों में 15 रूपयों तक में शानदार खाने की थाली मिलती है। संसद में मिलने वाली 18 रूपये की थाली में सब्जी रोटी के साथ दाल चावल, रायता, अचार, पापड़, सलाद, मिठाई और दूसरे अनेक छोटे मोटे कुल दस आइटम मिल जाते हैं। अगर आप दाल रोटी खाना चाहें तो यह आपको 10 से 12 रूपये में ही उपलब्ध हो जायेगी। यह सप्लाई रेलवे की तरफ से माननीय सांसदों के लिये होती है लेकिन संसद का स्टाफ और वहां आने जाने वाले भी इस सस्ती थाली का भरपूर लाभ उठाते हैं।

मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,

तू नहीं समझेगा सियासत तू अभी नादान है।

1991 में नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से सरकार बढ़ती गरीबी के उन वास्तविक आंकड़ों को छिपाने का लगातार प्रयास कर रही है जिससे उसके उन दावों की पोल खुलती है जिसमें कहा गया था कि एक दो दशक बाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से देश में सबका भला होगा। इसमंे रोज़गार बढ़ाने के जो वादे किये गये थे वे भी हवाई साबित हो चुके हैं साथ ही महंगी चिकित्सा से हर साल मध्यमवर्ग के तीन से चार करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे जा रहे हैं। ऐसे कैसे भारत 2020 तक विकसित राष्ट्र बन सकेगा?

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,

मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिये,

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये।

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1 Comment on "2020 तक भारत विकसित राष्ट्र कैसे बन पायेगा?"

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Sandeep K. Upadhyay
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अपने जो लेख लिखे है, वो एक दम उम्दा है इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन ये भी सच है, आरक्षण का फायदा नहीं मिलने वाले बहुत लोगो को मई जनता हूँ , जिनके यहाँ अभी भी फाके पड़ते है और रहने के लिए एक छप्पर भी नहीं है, अपने उनका उल्लेख नहीं किया इसलिए थोड़ी कमी लगी, सही मनो में हमारे देश में केवल दो जातीय है अमीर और गरीब, और मेरे ख्याल से जिनकी माली स्थिति ठीक नहीं है, उसके लिए सरकार को हर सम्भय प्रयास करने चाहिए.

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