लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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लेखक- डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्रीआतंकवादियों ने मुंबई पर पूरी योजना से आक्रमण कर दिया और देखते ही देखते उन्होंने मानो पूरी मुंबई को बंधक बना लिया हो। विश्वविख्यात ताज होटल, ओबराय होटल के अतिरिक्त उन्होंने अस्पतालों में जा कर भी गोलियां बरसाईं। छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पर उन्होंने अंधाधुध गोलियां बरसाईं। सारी मुंबई को दहला देने के बाद उन्होंने ताज होटल और ओबराय होटल में मोर्चा संभाल लिया। उसके बाद एनएसजी और सेना के लडाकुओं के साथ उनकी लगभग 40 घंटे भिडंत होती रही। ये आतंकवादी समुद्र के रास्ते कराची से आये थे और अपनी योजना को अंजाम देने के लिए लगभग एक साल से मोर्चाबंदी कर रहे थे। कुछ सूत्रों का यह भी कहना है कि एक अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसी ने भारत सरकार को अरसा पहले यह बता दिया था कि इस्लामी आतंकवादी भारत पर समुद्र के रास्ते से आक्रमण कर सकते हैं। अंततः सशस्त्र बलों ने स्थिति पर काबू पा लिया। इस आक्रमण में डेढ सौ से भी ज्यादा लोग मारे गये और चार सौ से भी ज्यादा गंभीर रुप से घायल हुए। हालात पर काबू पाने के लिए नौ सेना और वायु सेना की भी सहायता लेनी पडी। सशस्त्र बलों के अनेक जांबाज इस आक्रमण में शहीद भी हुए।
देश को इस बात का फख्र है कि सशस्त्रबल के सपूतों ने अपनी जान पर खेल कर भारत पर हुए इस आक्रमण को विफल कर दिया है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे भारत पर आक्रमण बताते हुए देश के खिलाफ छेडा गया युध्द कहा है। भारत सरकार ने भी इस युध्द से लडने का संकल्प दोहराया है। लेकिन यह सब कुछ तथ्यों का विवरण मात्र है। यह महज समाचार हैं। मीडिया ने यह समाचार अपने अपने ढंग से देश की जनता तक भी पहुंचा दिये। इस दृष्टि से उसने भी अपने कर्तव्य की पूर्ति कर ली है। यह अलग बात है कि जब मुठभेड चल रहे थी तो किसी चैनल की किसी नगमा ने इस आक्रमण के पीछे अंडरवर्ल्ड का हाथ होने का शगूफा भी छोडना शुरु कर दिया था। यह आक्रमणकारियों और इस पूरे आक्रमण में पाकिस्तान की भूमिका को हल्का करने का एक बढिया तरीका था। एक अंग्रेजी अखबार के बहुत ही बडे स्वनामधन्य संपादक जिनका नाम गुप्त रखना ही श्रेयस्कर होगा क्योंकि वह अपने आप को पत्रकारिता के शिखर पर मानते हैं अपने संपादकीय में सारा जोर यह बताने में लगा दिया कि यह आक्रमण कुछ व्यक्तिवादी गुंडों या ठगों द्वारा किया गया आक्रमण था। यह अलग बात है कि संपादक महोदय ने उसके बाद यह संकल्प भी दोहराया कि सारा राष्ट्र मिल कर साहस से इसका मुकाबला करेगा।
कांग्रेस के प्रवक्ता और सांसद राजीव शुक्ला का इस आक्रमण को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान पाकिस्तान के अखबार डेली टाइम्स में छपा है। राजीव शुक्ला का कहना है कि भारतीय मीडिया को रिपोर्टिंग करते हुए संयम का परिचय देना चाहिए और इस आक्रमण में पाकिस्तान का नाम घसीटने की जरुरत नहीं है क्योंकि इससे पाकिस्तान और भारत दोनों के संबंध खराब होने का खतरा पैदा हो जाता है। भारत सरकार की सबसे बडी दिक्कत यह है कि वह आतंकवाद व आतंकवादियों से लडना तो चाहती है लेकिन आतंकवाद के इस आंदोलन और इसके उद्देश्य और इसमें संलग्न व्यक्तियों व ताकतों की शिनाख्त करने से बचना चाहती है। हो सकता है कि भारत सरकार ने शिनाख्त कर भी ली हो, लेकिन राजनीतिक कारणों से वह उनका नाम भी नहीं चाहती और वह उनसे प्रत्यक्ष रुप से लडना भी नहीं चाहती। आखिर बिना ऐसे किये इस आतंकवाद से कैसे लडा जाएगा?
आतंकवाद का यह इस्लामी जेहादी आंदोलन है। भारत इसका शिकार आठवीं शताब्दी से ही हो रहा है। जब इस्लाम की अरबी सेनाओं ने भारत पर आक्रमण किया था। यह आक्रमण उस समय और उसके बाद के वर्षों में सैनिक दृष्टि से सफल रहा और भारत पर इस्लामी ताकतों का कब्जा हो गया। सात-आठ सौ सालों में उसने भारत के जितने हिस्से का इस्लामीकरण कर दिया 1947 में उतने हिस्से को भारत से अलग करवा दिया। लेकिन यह आक्रमण रुका नहीं। इसका स्वरुप बदलता गया। 20वीं शताब्दी उत्तरार्ध में जब इस्लाम का यह आंदोलन पूरी दुनिया में पुनः जागृत हो गया तो भारत पर उसने अपना आक्रमण पुनः प्रारंभ कर दिया। यह आक्रमण भारत को इस्लामी देश बनाने के लिए किया गया आक्रमण है और जिहादी इसके लिए अपने प्राण तक न्योछाबर करने के लिए तैयार हैं। यह कुछ सिरफिरे भटके हुए दुःसाहसी मुसलमान युवकों का आतंक मचाने के लिए किया गया कारनामा मात्र नहीं है जैसा की भारत सरकार और अंग्रेजी पत्रकारिता के संपादक विश्वास करने के लिए कहते हैं। इस आंदोलन के पीछे एक पूरा वैचारिक दर्शन है, यह इस्लाम का दर्शन है। इस दर्शन के पीछे उसे क्रियान्वित करने के लिए मुसलमान युवकों की सेना है जो अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्राण देने तक के लिए नहीं हिचकती। यह उद्देश्य भारत को दारुल हरब की श्रेणी से निकाल कर दारुल इस्लाम की श्रेणी में लाना है। जब तक ऐसा हो नहीं जाता तब तक 8वीं शताब्दी से चला हुआ इस्लामी आक्रमण का यह आंदोलन सफल नहीं कहला सकता। इसे इस्लाम का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि इस्लामी आक्रामक सेना दुनिया के जिस देश में भी गई, उसे कुछ ही वर्षों में इस्लामी देश में परिवर्तित कर दिया। परंतु भारत में उसे आंशिक सफलता ही मिली। भारत के कुछ हिस्से तो इस्लामी हो गये, लेकिन भारत का बडा हिस्सा इस्लामीकरण से बचा रहा और अपने मूल भारतीय स्वरुप में ही बना रहा। इस्लामी आतंकवाद का यही दर्द है। पुराने युग में बाकायदा इस्लाम की सेनाएं इस काम को पूरा करने के लिए भारत में आती थीं, लेकिन आधुनिक युग में आक्रमण का स्वरुप व स्वभाव दोनों ही बदल गये हैं।
अब इस्लाम की शक्तियां आतंकवाद के माध्यम से भारत पर परोक्ष आक्रमण कर रही है। क्या भारत सरकार की इच्छा आक्रमणकारियों को पहचानने और उनके वैचारिक आधार पर आक्रमण करने की है। इन आतंकवादी हमलों के कारण और उद्देश्य इस्लामिक इतिहास में ही देखने होंगे क्या भारत सरकार की संकल्प शक्ति है? शायद ऐसा नहीं है। अभी भी भारत सरकार इस्लाम के मूल स्वरुप को पहचान नहीं सकी है। सरकार की और कांग्रेस की अपनी राजनीतिक विवशता हो सकती शायद इसी विवशता के चलते भारत सरकार असली आतंकवादियों को छोड कर साधुसंतों में और भारतीय सेना में आतंकवादियों की तलाश कर रहीं है। यह कांग्रेस की राजनीतिक विवशता हो सकती है कि उसे वोटों की खातिर येन-तेन प्रकारेण कुछ हिन्दू आतंकवादी चाहिए। इतना ही नहीं वह कुछ व्यक्तियों की सत्य असत्य गतिविधयों को प्रचारित करके यथार्थ इस्लामी आतंक के मुकाबले काल्पनिक हिन्दू आतंकवाद का हौआ खड़ा कर रही है हो। हो सकता है कांग्रेस को कुछ वोटें मिल जाए लेकिन देश मुंबई बनने की ओर अग्रसर हो जाएगा भारत सरकार मुंबई को तो बचाना चाहती है लेकिन इस्लामी आतंकवाद के राक्षस से लड़ने से कतरा रही है इतना ही नहीं वह उसे आतंकवादी मानने से ही कुछ सीमा तक इंकार कर रही है। शायद यही कारण था जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अफगानिस्तान गए तो वहां बाबर की कब्र पर भी वह श्रध्दा सुमन अर्पित कर आए। भारत तो बच ही जाएगा। उसने 800 सालों तक इस्लामी आतंकवाद को झेलते हुए अपनी अस्मिता को बचाए रखा और अपनी निरंतरता में विद्यमान है।
भारत अपनी भीतरी उर्जा से बचेगा लेकिन भारत सरकार और कांग्रेस पार्टी की कलंक गाथा इतिहास में उसी तरह अमर हो जाएगी जिस तरह जयचंद और मीरजाफर की कलंक गाथा अमर हो गई है। एक बात और भी ध्यान में रखनी चाहिए कि यदि कल इस्लामी आतंकवाद के कारण भारत की भीतरी स्थिति में कुछ परिवर्तन होता है तो वे लोग जो इस्लामी आतंकवाद को कुछ सिरफिरे व्यक्तिवादी युवकों का दुसाहस बता रहे हैं, उनको नये शासकों के दरबारी बनने में पल भर का समय भी नहीं लगेगा। भारत माता ने मुगलकाल और ब्रिटिशकाल में ऐसे ही नवरत्नों को उस समय के विदेशी राजाओं के दरबारों में शोभित होते हुए देखा है। लडाई अंततः भारत के लोगों को ही लडनी है और मुंबई के आक्रमण के समय भारतीयों ने उसी संकल्प शक्ति का परिचय दिया है। यकीनन भारत विजयी होगा और इस्लामी आतंकवाद पराजित होगा। (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

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1 Comment on "भारत विजयी होगा लेकिन इस्लामी आतंकवाद की शिनाख्त जरुरी है"

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Sanjeev Sharma
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आपने जो लिखा है वह देश के करोडों नागरिकों की भावनाओं से मेल खाता है। अब देश में एक स्वतः स्फूर्त प्रयास की आवश्यकता है जो इस भावना के अनुरूप काम कर सके।

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