लेखक परिचय

राम सिंह यादव

राम सिंह यादव

लेखों, कविताओं का विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। सामाजिक / सरकारी संगठनों के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों तथा पर्यावरण जागरूकता में सक्रिय हिस्सेदारी। ’राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं सूचना स्त्रोत संस्थान नई दिल्ली से प्रकाशित राजभाषा पत्रिका संचेतना में ‘‘वन-क्रान्ति-जन क्रान्ति’’ लेख प्रकाशित।

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-राम सिंह यादव-
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आज जब सारी मानवता पर विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा है तब चिर युवा भारत एक नए जोश के साथ अंगड़ाई ले रहा है। शताब्दियों की परतंत्रता के बाद एक साधु ने राजनीति की कमान संभाली है। अद्भुत ब्रह्मांड की सजीव संरचना पृथ्वी के ठीक मध्य में स्थित भारत की पारलौकिकता को सिद्ध करना शायद शब्दों और यथार्थ के सामर्थ्य से भी परे है. भारत उद्गम है विश्व का और जीवों का पोषक भी। मानवता को स्थिर – शांत रखने वाली गंग सिंचित धरा कभी इतनी विरल नहीं हो पायी, जितनी वर्तमान में इसकी हालत इसी के बुद्धिमान, व्यावसायिक और महत्वाकांक्षी संतान ने कर दी।

भारत… मेरी कल्पनाओं और आधार का संसार साथ ही उस अद्भुत चरम वैज्ञानिक संस्कृति का वाहक जो संसार की समस्त सभ्यताओं के लिए स्वप्न मात्र है। अरबों को गिनती सिखाता, यूरोप का पुनर्जागरण करता और पूर्वी विश्व को अध्यात्म की शिक्षा देता ये भारत हजारों सालों से अक्षुण्ण संस्कृति की अलख जगा रहा है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि हजारों वर्षों से परखी शिक्षा आज की मात्र तीन शताब्दियों पहले बनी शिक्षा पद्धति को विकास का संवाहक समझ रही है। कितनी तेज़ी से पनपा विश्व कितनी तेज़ी से नर्क के गर्त की ओर बढ़ चला? कौन था इस पटकथा का लेखक?

जंगलों में बैठा मेरा भारत कितना अलग है इस नश्वर विश्व से ! हे कृष्ण, कितनी सत्य है तुम्हारी गीता वर्तमान के संदर्भ में. अर्जुन की शंका के समाधान हेतु दिखाया गया ब्रहमस्वरूप उस पुरा इतिहास से वर्तमान तक बिल्कुल वैसा ही है. उस वक्त जिस प्रकार कौरवों के कटे छंटे, रक्त से सने शव तुम्हारे बाएं मुख से अंदर जा रहे थे और दाहिने मुख से पांडव व अन्य विद्वान मनीषि जन्म ले रहे थे. क्या इसी प्रकार वर्तमान की परिस्थितियां भी सात अरब मनुष्यों को अपने लपेटे में ले चुकी हैं? विश्व के लगभग सभी देश दो खेमों मे बंट चुके हैं, एक ओर मानव है और दूसरी ओर राक्षस!
धर्म, सत्ता और व्यवसाय की लालसा लिए ये मूर्ख जातियाँ सरेआम गर्दनों को काटती, उनसे फुटबाल खेलती, सिरों को गोलियों से उड़ाती, ड्रोन के विस्फोटों से धूसरित बच्चों – समुद्र तट पर खेलते नौनिहालों के रॉकेट से छलनी शवों को देख अट्टहास करती राक्षसी मानसिकता उन मनुष्यों पर हावी हो रही है जहां स्त्री आँचल में अपने दुधमुहें बच्चे को समेटे दुलार रही है या वो हीन पिता जो सुबह से शाम हाड़तोड़ मेहनत करके कमाए पैसे से कुछ फल, मिठाई लेकर घर की ओर दौड़ता है, अपने बच्चे और पत्नी के चेहरे को मुस्कुराहट से भरने।

सत्य है, हे विश्वरूप, आज भी मानव तुम्हारी वेदी मे प्राण दे रहा है और दूसरी तरफ उसका जन्म हो रहा है. इतिहास कभी नहीं बदला। कोलोसियम में भूखे शेरों का ग्रास बनते मानव के विक्षत अंगों को देख उल्लास से ताली बजाता रोमन साम्राज्य, सोने के अथाह भंडारों का दंभ भरती इंका सभ्यता, विशाल त्रिकोणों में ऊर्जा के सिद्धान्त को खोजता मिस्त्र या दुनिया को बारूद और किताब की शक्ति से परिचित कराती चीन की कहानी। कितनी दूर तक इनकी यात्रा चली? हजारों सालों के इतिहास में कोई भी सभ्यता अपनी पाँच पीढ़ियाँ भी नहीं बढ़ा पायी। कभी प्रकृति की निर्ममता ने तो कभी मानव के अपने कट्टर दंशों ने इनके अस्तित्व को मिटा दिया। कैसा इतिहास और कैसा भविष्य था उनका? इसे लिखने में समाज के ठेकेदारों की कलम जरा भी नहीं कांपी?

हे कृष्ण, तुम्हारा युग तो अनंत युगों का विज्ञान था, हम हिग्स बोसॉन में उलझे हैं परंतु तुम तो प्राण और आत्मा तक पहुंच गए थे। ब्रह्मांड और सृष्टि की व्याख्या करने वाले हे परम पूज्य, हमारा विज्ञान बहुत बौना है अभी। लेकिन तुम्हारे चरम विज्ञान को भी तो मानवीय लालसा ने नहीं बख्शा था। धर्म और अधर्म के युद्ध में किसकी विजय हुई थी? इतिहासकार क्यों शांत हैं?

“महाभारत” का “भारत” जंगलों में छिप गया और गगनचुंबी चट्टानें रेत में बदल गईं। वही मानव जिसकी वृत्ति राक्षसी थी, मानवता की दुहाई देता जंगलों की ओर भागा और अस्त्र छोड़ उपदेशों की कहानियां लिखने लगा। शनैः शनैः विकास की सीढ़ियां चढ़ता विश्व पुनः उसी ऊंचाई पर पहुंच चुका है, जहां से उसके पुरखे ज़मींदोज़ हुये थे। सिर्फ भारत ही इसका अपवाद है. हजारों सालों से संस्कृति समेटता मानव विध्वंस को झेलता, फिर वही बरगद और पीपल की छांव में गंगा का पानी पिलाकर मानव को प्राण देता, ये भारत कभी खत्म नहीं हो पाया।

कौरवों-पांडवों का महाभारत, शैव-वैष्णवों का संग्राम, कलिंग की लाशें…. यवन, शक, कुषाण, हूण, मंगोल, सीथियन, अरबियों की कटारें…. सब यहाँ अपनी संस्कृति और धर्म फैलाने आए लेकिन इसके उलट भारत ने इन्हें ही कालचक्र के पाश में जकड़ कर आत्मसात कर लिया. इनकी अपनी संस्कृति कहाँ विलुप्त हो गयी और कब ये भारतीय हो गए पेड़ों के नीचे ध्यान लगाने वाले. इसकी व्याख्या करना आज नामुमकिन है।

हे भारत तेरी प्रासंगिकता हजारों वर्षों बाद भी जस की तस है, आज भी तेरे विचार और तेरे सूक्ष्म विज्ञान की विश्व को आवश्यकता है. तेरा अध्यात्म आज भी विश्व के मानवों की आत्म संतुष्टि का चरम लक्ष्य है। हे भारत, सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र तक फैले तेरे दो अरब वंशज शायद अपने इतिहास को पहचान सकें और बचा लें कुछ जीवों को निकट महाप्रलय से। हमारी संस्कृति मालों और व्यवसाय की नहीं है। हमारे प्रत्येक कर्म में प्रकृति और समाजिकता का सम्मान रहता था, हम उतना ही कमाते और संचय करते थे जितने में हमारे परिवार, अतिथि और साधुओं का पोषण हो सके बाकी समय हम अध्ययन, चिंतन, सामाजिक कार्यों आदि के लिए रखते थे।

आज की अतिवादी संस्कृति से जितनी जल्दी दूर हो जाएँ उतना ही अच्छा है वरना जिन चरम स्थितियों की दस्तक भारत के द्वार पर है उसके बाद भारतीय सिर्फ प्रारब्ध को ही कोस रहे होंगे। प्लास्टिक, डिब्बा बंद खाद्य व पेय पदार्थ, एयर कंडीशंड वातावरण, डिटरजेंट, कास्मेटिक्स, पेट्रोल तथा डीजल पर निर्भर जीवन, जहरीली खाद, झूठी वैज्ञानिकता से उत्पन्न विकृत बीज, सपाट छतों वाली अट्टालिकाएं, सुबह से शाम तक फर्श चमकाते कीटनाशक और उसके बाद जहरीली गैसों, गंदगी से बजबजाते नाले…….. हमारी पराकाष्ठा का इम्तिहान ले रहे हैं।

– सात अरब मनुष्य सीधे-सीधे काल का ग्रास बनता दिख रहा है, छद्म ऊर्जा पर जीता हमारा जीवन वास्तव में अकाल मृत्यु की ओर भागते कदम हैं। इराक युद्ध और कोयले की कमी, अधिकतर भारतीयों को गर्मी और वाहनों की चिंता में डुबोए हुए हैं, लेकिन मुझे पीने के पानी के लिए तड़पते, लड़ते और मरते हुये लोग दिख रहे हैं. घर से कुछ दूर सरकारी हैंडपंप था वो भी सूख चुका है. क्या होगा जिस दिन बिजली नहीं आएगी? चाहे सरकारी नलकूप हों चाहे घरों की मोटरें… कैसे बुझाएंगे मेरे सिंधुस्थान के दो अरब सूखे कंठ?

जवाब सिर्फ इतना है की तोड़ दूं सीमेंट, कंक्रीट और डामर की परतों को और पेड़ लगा दूं, गड्ढे करके तालाब बना दूं ताकि जमीन पर पानी ठहर सके और सूखी धरती को बरसता पानी फिर गहराई तक सींच दे।

– हर तरफ स्त्री अस्मिता की चीख पुकार मची हुई है, आखिर हमारी संस्कृति का भी वही हाल हो रहा है जिसकी आदी पश्चिमी सभ्यता है। बारह वर्ष की आयु तक कौमार्य भंग कर देने वाली संस्कृति अंततः हमारे परिवेश को तोड़ देने में सफल होने लगी है. हमारी कन्या, हमारी मां, हमारी बहन आज के युग में स्त्री क्यों हो गयी? सांस्कृतिक प्रदूषण का इससे बड़ा आघात क्या होगा कि पिता, भाई और बेटे का रिश्ता तक कलंकित हो चुका तो बाहरी रिश्तों का विश्वास कहां बचा?

स्त्री आजादी के लिए चिल्लाने वाली विदेशी मंच पर आसीन संस्थाएं, धीरे-धीरे हमारी पारिवारिक व्यवस्था को ध्वस्त कर चुकी हैं. वास्तव में भारत की पारिवारिक व्यवस्था वो थी जिसमे स्त्री परिवार का केंद्र होती थी। पुरुष कमाता था जिसे स्त्री को देता था और स्त्री उस मुद्रा से पुरुष, बच्चों तथा वृद्धों का पालन-पोषण करती थी। स्त्री को बाहरी कार्यों से बचाया जाता था क्योंकि स्त्री परिवार का गौरव थी। स्त्री के सम्मान का ही परिणाम रामायण व महाभारत हैं।

स्त्री को बाहर दिखने वाली वस्तु बना कर चाहे वो फिल्मों, रियलिटी शो, विज्ञापनों, चीयरगर्ल, पब-बार आदि में उभार कर वास्तव में उसका चारित्रिक हनन कर रहे हो। जिस कन्या को जन्म से तुतलाती आवाज में पिता खिलाता हो, जिसे गले लगा कर अपना वात्सल्य प्रकट करता हो. उसी की फिल्म को देखते हजारों लोगों के भद्दे व अश्लील शब्दों को सुनकर क्या उसका कलेजा नहीं फटता? ऐसा तो नहीं था भारत।

पुलिस, डिफेंस आदि में स्त्रियों को नौकरी देकर किसका फायदा हो रहा है? कुछ दिनों पहले उड़ीसा की हिंसा में एक महिला पुलिसकर्मी के वस्त्र फाड़ दिये गए, आए दिन यौन उत्पीड़न से ग्रस्त महिलाएं अपना विरोध दर्ज करा रही हैं।

हे मां, हे बहन, हे देवी वास्तव में तुम्हें आजादी के नाम पर छला जा रहा है. पुरुष अपनी मनः संतुष्टि के लिए तुम्हें पैसे देकर बाहर निकाल रहा है. तुम्हें तात्कालिक धन और सुविधाएं तो दिख रही हैं, लेकिन अनजाने में तुम ऐसा अपराध कर रही हो जिसके लिए तुम्हें भारत का भविष्य कभी नहीं क्षमा करेगा। तुम्हारी औलाद की संवेदनहीनता, उसके ड्रग्स की हर कश, उसके गंदे चरित्र पर उठती उंगली, किसी के जेब काटते हाथ, किसी के घर में चोरी करते, किसी को ठगते, अवसाद में फंसे आत्महत्या करते इंसान की शिक्षक तुम ही थीं।

भारतीय विज्ञान प्रकृति का प्रतिरूप है. प्रकृति की सारी व्यवस्था में हर जगह दो आवेश हैं एक ऋणात्मक और दूसरा धनात्मक. दोनों कभी एकात्म नहीं हो सकते लेकिन सदैव एक दूसरे की तरफ आकर्षित होकर सृष्टि को चलायमान रखते हैं। सूर्य व पृथ्वी फिर दक्षिण व उत्तरी ध्रुव एक पुरुष और स्त्री की भांति जुगलबंदी करते हुए पृथ्वी में प्रजातियों को जीवन दे रहे हैं। पृथ्वी में भी उत्तरी ध्रुव एक स्त्री की भांति अपनी संतानों के घनत्व के प्रति उत्तरदायी है।

इसी प्रकार वृहद से लेकर सूक्ष्म जीव को देखने में पता चलता है की पुरुष चाह कर भी वो व्यवस्था उत्पन्न नहीं कर सकता जहां वो अपनी औलाद का शिक्षक अथवा पोषक बन सके और न ही संतान का अपने पिता से वो भावनात्मक रिश्ता बन सकता है जिससे वो माँ के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु पर्यंत जुड़ा रहता है।

सच कितनी विलक्षण है माँ, शरीरों के दोलन के पश्चात एकत्रित शुक्र और डिंब की ऊर्जा को अपने गर्भ समेटकर उस प्राण को मांस और मेद का जामा पहनाती नौ महीने तक अपने रक्त से सींचती है।

हे माँ, ले चलो हमें उस गौरवमयी इतिहास के पास जहां यशोदा नन्दन कृष्ण ने आध्यात्मिक विज्ञान संसार को दिया था, हमें महाभारत काल के उस हिस्से पर छोड़ दो जहां हम फिर से अन्वेषण में लग जाएँ कि मनुष्य के जीवन का लक्ष्य क्या है।

ऐसा भी नहीं की स्त्री को चारदीवारी में कैद कर उसका शोषण करो बल्कि उसका अपने अस्तित्व के लिए महत्व समझो। सारी सृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सिर्फ स्त्री ही है। स्त्रियों को उनकी गरिमानुकूल रोजगार मे अवसर दिये जाएँ, जैसे कि शिक्षा, साहित्य, सामाजिक शोध आदि सुरक्षित दफ्तरों वाली नौकरियां. लेकिन स्त्रियों को अपने विवेक से यह तय करना होगा कि खुले में पुरुष कि चक्षु वासना को तृप्त करने कि अपेक्षा उस संतान के लिए अधिक जिम्मेदार है जिसकी वो भगवान है। संतानोत्पत्ति के पश्चात स्त्री अपनी संतान को ही अपना भविष्य समझे और जिस प्रकार सृष्टि में स्थित प्रत्येक जीव की माँ अपनी औलाद को जिंदगी जीने की कला में प्रवीण करती है उसी प्रकार अपने कर्तव्य का निर्वहन करे। बैंगलोर जैसे कारपोरेट शहरों में आत्महत्या करने की बजाय अपने बच्चों को दुलरायेँ।

हे मांओं, संचार करो करुणा, नैतिकता, प्रेम और ममता का कठोर पुरुषों में-पीढ़ियों में। बचा लो मृत होते विश्व से भारत को। छोड़ दो अपनी नौकरियों का मोह और बचा लो अपनी संतानों को।

तुम स्वयं ध्वस्त कर दो उस संस्कृति को जो भारत की माँ, बेटी और बहन को स्त्री बना रही है। तिरस्कार करो उस नवीन अश्लीलता का जिसे तुम्हारा बच्चा अपना आदर्श समझ रहा है. फिल्मों-नाटकों-विज्ञापनों का वासनामय प्रदर्शन उन अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का तो कुछ नहीं बिगाड़ रहा लेकिन कामाग्नि का मदांध अनुसरण करते तुम्हारे पुत्र तथा पुत्रियाँ अपना व अपने परिवार के भविष्य की हत्या कर रहे हैं। स्त्री और पुरुष के मध्य आकर्षण प्रकृति प्रदत्त गुण है यदि इनका एकांत सामीप्य हुआ तो निश्चित ही अश्लीलता के श्रेणी में आएगा। हमारे ग्रन्थों के आधार पर परस्पर दृष्टि डालना भी संभोग माना जाता था जो मन को विचलित करता है और कर्तव्य पथ से डिगा देता है।

माँ, सामाजिक मूल्य और मर्यादाओं को पुनः उस स्तर पर स्थापित कर दो जहां हम मातृ, बहन, पुत्री व पत्नी के मध्य भेद कर सकें।

– हे मां, आने वाले भविष्य में भारत एक गंभीर संकट की ओर अग्रसर है। कलम और कम्प्यूटर को विराम देकर घरों में क्यारियां बना दो जो तुम्हारे परिवार का पेट भर सके, पेड़ लगा कर जमीन में पानी भर दो, पीढ़ियों के ज्ञान विज्ञान और पारंपरिक औषधियों को आने वाली पीढ़ियों के लिए संकलित कर दो जिससे तेरी सन्तानें अल्प आयु में कैंसर, हृदयाघात, मधुमेह आदि का ग्रास न बन जाएं।

हे माँ, अपने परिवार को सुबह जवारे का आहार दो जो उसको कैंसर जैसे रोग से बचा ले, हे माँ तुलसी का पत्ता खाली पेट खिलाओ ताकि वो कभी वायरस जनित रोगों से न मरे (बहुत संभव है की एड्स तक का वायरस भी तुलसी खत्म कर सकती है), केलाग्स-बोर्नविटा-हॉर्लिक्स-कंपलान आदि रसायनिक नाश्ते को फेंक कर प्राकृतिक दलिया का आहार दो जिससे तुम्हारा बच्चा जवान होते ही हृदयाघात का शिकार न हो जाये. जिस हल्दी, नीम, अशोक, अश्वगंधा, घृतकुमारी, भूमि आंवला आदि को अमेरिका पेटेंट कराता घूम रहा है उसे तुम अपनी पीढ़ियों के विज्ञान में लिख दो और योगदान दो भारतीय संस्कृति के संकलित कोश में।

हे मांओं भारत की ऊर्जा आवश्यकता को न्यून कराओ और बिजली की खपत करने वाले उपकरणों का उपयोग कम से कमतर करती जाओ. स्वेच्छा से बिजली कटौती का समय निर्धारित कर दो।

– हमारा भारत भौतिक ऊर्जा का गुलाम हो चुका है. हर क्षण इसी ऊर्जा के सहारे हमारा आधार जीवित है. खाड़ी देशों पर आघात होते ही अपना देश महंगाई के भंवर में घिर जाता है। हर वस्तु के लिए हम ट्रांसपोर्ट पर निर्भर हैं. अब वक्त आ गया है की हमें अपनी साइकिलें निकाल लेनी चाहिए और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करके बहुमूल्य तेल बचाना होगा, अन्यथा कोयले के अभाव और तेल की कमी से उत्पन्न होने वाले संकट का सामना करने के लिए भारत तैयार नहीं है।

– हे नीति निर्धारकों, मीडिया पर सेंसर लगाना मानवता के लिए अपरिहार्य हो चुका है. समाज के लिए ये अब विध्वंसक बन चुके हैं. रेटिंग और व्यवसाय बढ़ाने की लालसा में ये नैतिक – अनैतिक सभी तरह के विचारों का प्रसारण कर रहे हैं जिसका प्रसारण अत्यंत ही गंभीर है. स्वामी निगमानन्द की मृत्यु पर ये मीडिया शांत था लेकिन अन्ना का अनशन फिल्मा रहा था, क्योंकि वहां उसे विदेशी फंडों से हिस्सा मिल रहा था। वो यहां भी उन्हीं परिस्थितियों को पनपा रहा था जिसका परिणाम मिस्त्र, सीरिया या यूक्रेन के वासी भुगत रहे हैं। साईं-शंकराचार्य विवाद को सुबह से शाम तक नमक मिर्च लगाकर सुनाने वाले लोग भारतीय समाज को विभाजित कर रहे हैं. चाहे वैदिक-हाफ़िज़ मुलाक़ात को तूल देना हो अथवा भारत-चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश के बीच छोटे से विवाद को भी ऐसा मुद्दा बना देते हैं जिसकी परिणति संग्राम तक पहुंच सकती है, मलेशिया का विमान भले ही तकनीकी खराबी से ध्वस्त हुआ हो, अथवा भूलवश मिसाइल का हमला हो लेकिन आज रूस व अमेरिका विश्वयुद्ध की तैयारी में जुटे हैं तो सिर्फ मीडिया के व्यर्थ वाद की वजह से, रोटी के टुकड़े में भी खबर ढूंढ़ कर धर्म से जोड़ने वाले, असम हिंसा की भेंट चढ़े लोगों का धार्मिक वर्गीकरण करने वाले, मुजफ्फरनगर – मुरादाबाद में झूठी सच्ची कहानियां लिखने वाले संवेदनहीन मनुष्य नहीं जानते की इनके मुख से निकले वाक्य का परिणाम क्या होगा, कैसा होगा, किसके हित में होगा? वास्तव में ये सोचना इन क्षुद्र बुद्धि मानवों की मति से परे है। ये मीडिया, कथित एन॰जी॰ओ’ज़ व वैश्विक लालची कंपनियों की आँख, कान व जिह्वा हैं, जिन्हें क्या बोलना है, क्या दिखाना है ये ऐसे समूह तय करते हैं जिनके भीतर भारत की संस्कृति को खत्म करके अपना व्यवसाय स्थापित करने की ललक है। इस मीडिया के चक्रव्युह को तोड़ना बहुत सरल है, प्रत्येक स्तर के विद्यालय से कम से कम दो मेधावी छात्रों का चयन कर जिले स्तर के समूह बनाएँ जाएँ जिनका उपयोग सरकार व जनता के मध्य सीधा संवाद स्थापित करने में किया जाये।

– सारा विश्व इसी युवा शक्ति को केन्द्रित कर अपनी नीतियाँ बना रहा है, क्योंकि ये बहुत सरल और आज्ञाकारी होता है इन युवा समूहों को जरा सी दिशा दिखा कर उनकी ऊर्जा को अपने मुताबिक इस्तेमाल किया जा सकता है। आई॰एस॰आई॰एस॰, मुजाहिदीन, लश्कर, बोको हरम अथवा साधु गांधी को मारने वालों जैसे असंख्य नौजवान गलत दिशा की ओर भटक कर मानवता के विरुद्ध हो गए। लेकिन भारत को अपनी युवाशक्ति का प्रोत्साहन, चिर-नवीन भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा विश्वयुद्ध की परिस्थितियों के मध्य मानवता को नए युग में ले जाने के लिए करना होगा।

– हमें अपने परिवारों, समाजों, गावों, पीढ़ियों, परिचितों के मध्य प्रचलित ज्ञान-विज्ञान, औषधियों, तंत्र-मंत्र (मनोवैज्ञानिक निदान), पौराणिक रीतियों, कर्म कांडों का संकलन करके उनका भारतीय वैज्ञानिक तर्कों व तथ्यों से शोधन कर भारतीय संस्कृति का महाकोश तैयार करना होगा। भारत के एकांत जंगलों में नालंदा व तक्षशिला जैसे वैदिक शोध विश्वविद्यालय स्थापित करने होंगे जो धार्मिक रूढ़ियों से विरत होकर उस प्राचीन भारतीय आविष्कारों और आयुर्वेदीय शोधों से विश्व का परिचय कराएंगे जो समय और बाह्य सांस्कृतिक आक्रमणों के कारण लुप्तप्राय हो गए थे।

– समय आ गया है कि अब प्लास्टिक युग को थामा जाये। जिस जमीन को खोदने पर कभी जड़ें, पत्ते, मिट्टी और कार्बनिक पदार्थ मिलते थे वो अब काँच, सीमेंट, डामर, प्लास्टिक की पन्नियों, पेस्टिसाइडों तथा अघुलनशील अकार्बनिक पदार्थों का जखीरा बन चुके हैं. बहुत समय से हमारे समाज में धारणा है कि यदि व्यक्ति कोई अपराध करता है तो ये उसके संस्कारों और सामाजिक वातावरण का दोष होता है. निश्चित ही ये अकाट्य वैज्ञानिक सत्य है जो सारे संसार के लिए प्रत्यक्ष है, दो अरब की संख्या लिए हुये भी हम सबसे सहिष्णु और ममत्वपूर्ण हैं. इसके लिए जिम्मेदार हैं हमारी नदियां, उपजाऊ जमीन, प्रचुर अनाज और मन को शांत रखने वाला हरा रंग लिए जंगलों का वातावरण।

प्लास्टिक का समुचित पुनर्चक्रण करने के लिए जवाबदेह उन कंपनियों और दुकानों को बनाया जाये जहां से इनकी पैकिंग होती है। इसके लिए हम जिन दुकानों से इन्हे लाये हैं, अनुपयोग की स्थिति आने पर इनको वही पर रखे डिब्बे में वापस किया जाये ताकि ये अपने उद्गम प्रक्रिया स्थल पर वापस पहुँच कर पुनः उपयोग लायक बन जायें। दुकानों, मालों आदि पर प्लास्टिक के थैलों का प्रचलन बंद किया जाये और लोग घरेलू थैलों का इस्तेमाल शुरू करें. ध्यान दें कि ये अतिवादी सोंच हमारे वंशजों के विनाश का कारण बन रही है और उन स्थितियों को जन्म दे रही हैं जहां अन्न उत्पादन हेतु भूमि जहरीली होती जा रही है. इससे उत्पन्न अनाज और सब्जियाँ न केवल कैंसर उद्दीप्त करेंगे वरन आनुवांशिक विकृतियों का प्रकोप भी बढ़ाएंगे।

– ऊर्जा के उपयोग को सीमित करना शुरू कर दें, ए॰सी॰ आदि का बहिष्कार करें तथा स्वेच्छा से ऊर्जा कटौती का स्वागत करें, जैसे सुबह पांच बजे से ग्यारह बजे तक और सायं चार बजे से सात बजे तक घरेलू बिजली की कटौती की जा सकती है। घरों में हवादानों तथा रौशनदानों का प्रचुर प्रयोग किया जाये। ये निश्चित है कि भविष्य में हम परमाणु ऊर्जा पर पूर्णरूपेण निर्भर होने जा रहे हैं। बहुत डर है मन में इसके दुष्परिणामों को लेकर. हमारे पौराणिक इतिहास में भगवततुल्य पीपल एवं बरगद के वृक्ष ही संभवतः ऐसे स्तम्भ हैं जो परमाणु जनित आकस्मिक दुर्घटनाओं से हमे बचा सकते हैं। हालांकि इनका न्यूक्लियर रिएक्टर के घेराव लिए बंध तकनीकी तथा रेडिएशन से बचाने वाले अन्य पौधों पर और भी शोध व अध्ययन की आवश्यकता है।

– गैर व्यावसायिक निजी उपभोग किए जाने वाले पेट्रोल तथा डीजल पर सब्सिडी खत्म करके पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर दी जाये जिससे जनता अपने वाहनों की अपेक्षा जन वाहनों का प्रयोग करे। साथ ही कड़े सरकारी नियंत्रण में सारे भारत में समान किराया लागू किया जाये जो निजी वाहनों की अपेक्षाकृत काफी सस्ता हो। इससे न केवल महंगाई तथा प्रदूषण कम होंगे वरन भारत आत्मनिर्भर भी बनेगा।

– भारत को घृणित संचार युद्ध से भी बचाना होगा जिसकी जद में विश्व के सभी देश हैं. आज सूचना व संचार का अंध उपयोग गंभीर परिणाम दे रहा है. सोशल साइटें, अश्लील साइटें, सच्चे-झूठे समाचारों से पटी साइटें, गोपनीय सूचनाओं को साझा करते हैकर्स, बढ़ता इंटरनेट व्यापार, स्मार्टफोनों और कंप्यूटरों के जरिये अपनी आजादी और निजता का दांव एक ऐसा खतरनाक भविष्य दिखा रहे हैं जो हमें खत्म कर देगा। भारत को इसके मुक़ाबले के लिए अपना स्वयं का नेटवर्क तथा शक्तिशाली सर्वर विकसित करना होगा, अपना अलग संचार तंत्र और उपग्रह स्थापित करना होगा जो अभेद्य हो. विशेष परिस्थितियों में ही पूरी निगरानी में विश्व की अन्य साइटों के साथ सूचनाएं साझा करनी होंगी जिनका सामाजिक, आर्थिक व व्यावसायिक दुरुपयोग न हो सके।

– बड़े-बड़े खेतों को रौंदकर बने शिक्षा के व्यावसायिक केंद्र कुकुरमुत्ते की तरह सारे भारत में फैल चुके हैं. कहने को तो ये बी॰एड॰, बी॰फार्मा, बीटेक, एमबीए जैसे रोजगारपरक कोर्स करा रहे हैं, परंतु इनकी वास्तविकता शाम होते ही इन कालेजों के पास की सड़कों, होटलों, बारों, होस्टलों में दिखने लगती हैं. लाखों रुपये खर्च करके अभिवावक अपने बच्चों को यहाँ पढ़ने भेजते हैं परंतु सामाजिक दबाव की अनुपस्थिति में छात्र-छात्राएं ड्रग, बियर, अश्लीलता तथा अपराधों के भंवर मे फंस रहे हैं। किसी भी देश की शक्ति उसकी युवा आबादी होती है, परंतु जब ये युवा शक्ति खोखली जाये तो उस देश का भविष्य क्या होगा, ये बताने की आवश्यक्ता नहीं है।

– हमारी शिक्षा व्यवस्था आज भी गुलामी और परतंत्रता की राह पर चल रही है। भारत में एक नवीन शिक्षा पद्धति को लागू करने की जरूरत है जिसमें संसार के नवीनतम शोधों का समावेश हो साथ ही पुश्तैनी रोजगार की शिक्षा का अनुभव भी। यहाँ पर अभिवावकों तथा गुरुजनों का सम्मिलित सहयोग मिलेगा छात्रों को जिससे ये भविष्य में रोजगार को ढूँढने में अवसादग्रस्त नहीं होंगे बल्कि अपने रुचिनुकूल काम करते हुए भारत को सर्वसंपन्न करेंगे।

– नदियां जोड़ने का उपक्रम बहुत अच्छा है जिसमें भविष्य में पानी का जाल फैलाकर जमीन, फसल तथा पानी की कमी से मानव को बचाया जा सकेगा। संभवतः ये ऐसा प्रोजेक्ट साबित होगा जो भारत की तकदीर बदल देगा। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता क्योंकि जियो मैपिंग करके नदियों को जो दिशा और ढाल दी जाएगी उससे बहुत हद तक पानी की समस्या से तात्कालिक निजात मिल जाएगी। लेकिन एक बात नहीं समझ आती कि बड़ी नदियां शरीर में स्थित धमनी की भांति हैं जिनका प्रवाह हृदय से रक्त खींच कर प्रत्येक हिस्से तक पहुंचाना होता है। इसी प्रकार नदियां भी राष्ट्र की धमनी होती हैं, इनका प्रवाह भौगोलिक ढाल पर निर्बाध होना चाहिए जिससे इनके उद्गम से लेकर अंत तक निरंतर गतिज ऊर्जा से भरपूर दौड़ता जल भूमि की गहराई में और पोषित जीवों तक पहुंचता रहे।

मानव चाहे जितनी भी कोशिश कर ले, प्राकृतिक ढाल की बराबरी कृत्रिम मानव निर्मित ढाल से नहीं हो सकता. इसका परिणाम यह होगा की चाहे जितना भी पैसा खर्च कर दिया जाये परंतु अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। और अगर नदियां किसी तरह जुड़ भी जाएँ तो सिल्ट और गाद निरंतर नदियों का बहाव अवरुद्ध करेंगे, बाढ़ ज्यादा आएंगी, ड्रेजिंग की सदैव आवश्यकता पड़ेगी तथा जैव विविधता की अपूर्णीय क्षति होगी। कुल मिला कर ज्यादा दूर तक इस परियोजना का भारत को लाभ नहीं मिल पाएगा। कोशिश ये की जाये कि लगातार पचास सालों के जियोमैप का अध्ययन किया जाये, उसमें प्राकृतिक ढालों को अच्छी तरह परख कर पहले कुछ छोटी नदियों और नहरों को जोड़ कर उनका परिणाम देखा जाये। एक दूसरा सुझाव ये भी है कि इन प्राकृतिक ढालों वाली जगहों को पहचान कर गहरी झीलें व तालाब बनाए जाएँ जिनका खर्च कई हज़ार गुना कम आएगा और जैव विविधता भी नीति निर्माताओं को सदैव ऋणी रहेगी। जिस जैव विविधता के लिए भारत सारे विश्व में सबसे अलग, सार्थक और मानव-प्रकृति प्रेम की अनूठी संस्कृति हेतु सुविख्यात है।

हे नीति निर्धारकों, भारत सिर्फ मनुष्यों का ही नहीं है, ये तो उन भरत का है जिन्होंने सिंह की हिंसक वृति को प्रेम स्पर्श की ऊर्जा से खत्म किया था, ये तो शिव का है जिनका सेवक ऋषभ था जो नंदीश्वर थे जिनके गले पर भुजंग आश्रय लेता था, ये तो राम का है जिनके प्रेम को वानर और भालूओं का साथ मिला था, ये तो कृष्ण का है जिन्हें कालिया नाग अपने फन पर झूलाता हुआ नदी से बाहर लाया, ये दुर्गा का है जिनकी रक्षा के लिए शेर और कंदरायें तत्पर थीं जो शक्ति थीं, ये भारत सिद्धार्थ का है जिनका कलेजा बाण से बिंधे हंस के लिए रोया था, ये भारत विष्णुदत्त का है जिन्होंने मानवता को नैतिक शिक्षा देने के लिए पंचतंत्र लिखी और जीवन के हर पहलू को शिक्षा में डाला, इनके छोटे छोटे वाक्यों को पुनः उद्धत करके पश्चिमी समाज सुधारक सुवाक्य बनाते घूमते हैं. विडम्बना ही है की हम अपनी संस्कृति के महापुरुषों की अपेक्षा पश्चिमी सुधारकों के वाक्यों का अपने भाषणों मे बड़े गर्व के साथ उल्लेख करते हैं, अपनी योग्यता की उच्चता को प्रदर्शित करने में इनको अपरिहार्य मानते हैं।

जबकि वास्तविकता यह है कि,

भारत- अद्वितीय है, जीव-मनुष्यों का ब्रह्मांड है, परिणति है विज्ञान का और चरम है अध्यात्म का।

मेरा सौभाग्य – भारत

वन क्रान्ति – जन क्रान्ति

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1 Comment on "भारत"

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Anjana
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निश्चित ही भारत अद्भुत एवं अतुलनीय है। हमे गर्व है की इस देश मे हमे जन्म मिला।

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