लेखक परिचय

देवेन्‍द्र स्‍वरूप

देवेन्‍द्र स्‍वरूप

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़े देवेन्‍द्र जी दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में इतिहास के प्राध्‍यापक एवं पांचजन्‍य साप्‍ताहिक पत्र के संपादक रहे हैं।

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देवेन्द्र स्वरूप

पिछले पखवाड़े दोनों प्रमुख भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों (माकपा और भाकपा) के राष्ट्रीय अधिवेशन सम्पन्न हुए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की 21वीं कांग्रेस पटना शहर में 28 से 31 मार्च तक चली, जबकि 1964 में जन्मी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने उत्तरी केरल के कोझीकोड नगर में 4 से 9 अप्रैल तक आयोजित छह दिवसीय कांग्रेस को 20वीं कहा। इस संख्या में वे अपने जन्म से पहले, (1943 से 1961 तक) सम्पन्न हुई छह राष्ट्रीय कांग्रेस को भी पता नहीं क्यों सम्मिलित करते हैं। भाकपा के पटना कांग्रेस के मंच पर फारवर्ड ब्लाक, माकपा (माले) और आरएसपी के नेतागण भी मौजूद थे। भाकपा के 86 वर्षीय महासचिव ए.बी.वर्धन और फारवर्ड ब्लाक के महासचिव देवव्रत विश्वास ने सभी मार्क्सवादी दलों के एकीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया। पर यह किसी ने नहीं बताया कि पिछले 34 साल से वाममोर्चे के झंडे तले एक ही कार्यक्रम के आधार पर साथ-साथ चुनाव लड़ने, साथ-साथ सरकार चलाने, साथ-साथ विपक्ष की भूमिका निभाने के बाद भी, मार्क्सवाद के प्रति निष्ठा की कसम खाने वाले ये दल वामपंथी एकता का नारा लगाते हुए भी, एक झंडे और दल के रूप में संगठित क्यों नहीं हो पाते? मार्क्स के सुप्रसिद्ध नारे ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ’ की तोता-रटंत करते हुए भी ये स्वयं एक क्यों नहीं हो पाते हैं? ऐसा भी नहीं है कि इनमें से किसी भी दल की हैसियत पहले से आगे बढ़ी हो। प्रत्येक का प्रभाव क्षेत्र वही का वही है, हार-जीत का आंकड़ा भी वही है। मार्क्सवाद की विचारधारा के प्रति निष्ठा का तकाजा यह मांग करता है कि पहले तो उन्हें टूटना ही नहीं चाहिए था, और यदि किसी तात्कालिक आवेश में उन्होंने अपनी अलग दुकान खोलना आवश्यक समझा भी, तो चुनावी राजनीति में लम्बे साथ के बाद तो उन्हें एक हो ही जाना चाहिए था। यदि तब भी वे एक नहीं हो पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि मार्क्सवाद एक आवरण मात्र है, उनकी मुख्य प्रेरणा कुछ और है- नेतृत्व की चाह या सम्पत्ति का मोह। पिछले 34 वर्षों से उन्हें मिलकर काम करने की प्रेरणा विचारधारा से नहीं, सत्ता प्राप्ति की कामना में से मिल रही है।

एक भी नहीं, नेक भी नहीं

सत्ता के लम्बे उपभोग के कारण कम्युनिस्टों का चारित्रिक स्खलन हुआ है। सुरा और सुंदरी के प्रति आकर्षण बढ़ा है, विलासिता की प्रवृत्ति पैदा हुई है। भ्रष्टाचार और गुटबाजी भी बढ़ी है। माकपा के तीसरी बार महासचिव चुने जाने के बाद 64 वर्षीय प्रकाश करात ने अपने साथियों को शराब से दूर रहने और चारित्रिक पतन को रोकने की नेक सलाह दी। उनकी यह सलाह स्वयं ही पार्टी की आंतरिक स्थिति को उजागर कर देती है। केरल में माकपा के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं पर यौनाचार के आरोप लग चुके हैं। वैभव और विलासिता पसंद राज्य सचिव पिनरई विजयन और अपनी सादगी व आदर्शवाद के लिए सम्मान पाने वाले 86 वर्षीय वी.एस.अच्युतानंदन के बीच गुटबंदी अनेक वर्षों से चर्चित है। पिनरई गुट के दबाव के कारण पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद पर आसीन वयोवृद्ध नेता अच्युतानंदन को पार्टी ने टिकट से वंचित करने का निर्णय लिया, जिसे पार्टी कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों के विरोध प्रदर्शन के कारण वापस लेना पड़ा। अच्युतानंदन के नेतृत्व में ही पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ा और उनकी जनप्रिय छवि के कारण ही पार्टी सत्ता से वंचित रहकर भी अपने जनाधार को बचाये रख सकी। इस समय भी वही वयोवृद्ध अच्युतानंदन केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। 1964 में जिन 32 कम्युनिस्ट नेताओं ने संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी से बाहर निकलकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को जन्म दिया था, अच्युतानंदन उनमें से एक है, अर्थात वे माकपा के जन्मदाता हैं। किन्तु आंतरिक गुटबंदी के कारण उन्हें 2009 में पार्टी पोलित ब्यूरो से बाहर कर दिया गया और इस कांग्रेस में भी उन्हें पोलित ब्यूरो में शामिल नहीं किया गया, जिससे आहत होकर वे पालित ब्यूरो के नये नामों की घोषणा होते ही कोझीकोड छोड़कर तिरुअनंतपुरम वापस चले गये और समापन जनसभा में महासचिव प्रकाश करात के भाषण में उपस्थित नहीं रहे।

दोमुंही राजनीति के दो चेहरे

एक ओर विचारधारा एवं आदर्श जीवन के प्रति निष्ठावान वयोवृद्ध अच्युतानंदन को बार-बार अपमानित किया जा रहा है तो दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व की खुली अवहेलना करने वाले और प.बंगाल में अपने मुख्यमंत्री काल में पार्टी की लुटिया डुबोने वाले बुद्धदेव भट्टाचार्य को कोझीकोड कांग्रेस में उपस्थित न रहने के बाद भी 15 सदस्यीय पोलित ब्यूरो में सम्मिलित किया गया है। पिछले कई वर्षों से बुद्धदेव कोलकाता के बाहर आयोजित पार्टी की महत्वपूर्ण बैठकों में सम्मिलित नहीं हो रहे हैं। बताया जा रहा है कि उन्होंने पार्टी आलाकमान को सूचित कर दिया है कि स्वास्थ्य कारणों से वे कोलकाता के बाहर किसी भी कार्यक्रम में जाने में असमर्थ हैं। पर वास्तविक कारण कुछ और ही हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए ही बुद्धदेव ने सार्वजनिक घोषणा की थी कि प.बंगाल में उनकी सरकार विकास का जो रास्ता अपना रही है वह मार्क्सवाद का नहीं, पूंजीवाद का रास्ता है। उनके इस कथन को किताबी मार्क्सवादी हजम नहीं कर पाये थे और बुद्धदेव उनकी नजरों से गिर गये थे। प.बंगाल में वाममोर्चे की लगातार जीत का एक बड़ा कारण वहां के 25 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक का समर्थन था, किन्तु नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण करके और उर्दू को बंगाल की दूसरी राजभाषा घोषित करने की मुस्लिम मांग की उपेक्षा करके बुद्धदेव ने मुस्लिम वोट बैंक को नाराज कर दिया और यह वोट बैंक ममता बनर्जी के पीछे खड़ा हो गया। यह सब होने के बाद भी माकपा की प.बंगाल इकाई मानती है कि बुद्धदेव से अधिक लोकप्रिय कोई दूसरा नेता उनके पास नहीं है, अत: उसके दबाव में ही बुद्धदेव को अनुपस्थित रहने के बावजूद पोलित ब्यूरो में नामांकित किया गया। वी.एस.अच्युतानंदन एवं बुद्धदेव भट्टाचार्य माकपा की सत्ताभिमुखी दोमुंही राजनीति के दो चेहरे हैं। वस्तुत: कम्युनिस्ट पार्टियां नेतृत्व के संकट से गुजर रही हैं। भाकपा के 86 वर्षीय नेता ए.बी. वर्धन ने 16 वर्ष बाद महासचिव का पद छोड़कर आंध्र प्रदेश के सिद्धेश्वर रेड्डी को उस पर बैठाया तो माकपा ने 64 वर्षीय प्रकाश करात को तीसरी बार महासचिव बनाए रखा है। यद्यपि पहली बार पार्टी के संविधान में संशोधन करके एक महासचिव का कार्यकाल तीन बार से आगे बढ़ाने को निषेध कर दिया गया है।

घटता प्रभाव

सच तो यह है कि मार्क्सवादी विचारधारा का अधिष्ठान तो बहुत पहले ही ढह चुका था, अब तो केवल उसका खोखला शब्दाचार रह गया है। अनेक दलों में बिखरे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की एकमात्र प्रेरणा सत्ता की प्राप्ति ही रह गयी है। यदि ऐसा न होता तो सैद्धांतिक आधार पर भारत-अमरीका आणविक संधि के विरोध में सोनिया-मनमोहन की यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के निर्णय को 2009 के लोकसभा चुनावों में वाममोर्चे की भारी पराजय का एकमात्र कारण न माना जाता। वाममोर्चे के सभी घटक और माकपा के समर्थक बुद्धिजीवी उस दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय के लिए अकेले प्रकाश करात की हठधर्मी को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके अनुसार यूपीए से अलग हट जाने के कारण ही वाममोर्चा सत्ता पर अपना प्रभाव खो बैठा, जिसका परिणाम हुआ कि लोकसभा में उनकी सदस्य संख्या 65 से घटकर 2009 में केवल 24 रह गयी, स्वयं माकपा घटकर 16 पर पहुंच गयी।

माकपा के चारित्रिक पतन और लोकसभा व प.बंगाल तथा केरल में सत्ता खोने से माकपा एवं वाममोर्चे के अन्य घटकों में इस समय निराशा का जो वातावरण छाया हुआ है, वह मुझे 1968 की अपनी बंगाल यात्रा का स्मरण दिला जाता है। 1967 के चुनावों में पहली बार अजय मुकर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस के एक बागी धड़े के कंधों पर सवार होकर नवस्थापित माकपा प.बंगाल पर कांग्रेस शासन का एकाधिकार तोड़ने में सफल हो गयी थी। इस अप्रत्याशित सत्ता परिवर्तन से पूरा देश सकते में आ गया था। बंगाल तो एक प्रकार से मूर्छा की स्थिति में पहुंच गया था। तभी हमने पाञ्चजन्य का एक बंगाल विशेषांक प्रकाशित करने का निर्णय लिया और उस विशेषांक के लिए सामग्री एकत्र करने के लिए मुझे कलकत्ता जाना पड़ा। वहां श्री असीम कुमार मित्र को साथ लेकर कलकत्ता और जादवपुर विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, प्रसिद्ध इतिहासकार डा.रमेश चन्द्र मजूमदार जैसे बुद्धिजीवियों से भेंट वार्ता की। उसकी क्रम में जोधपुर पार्क में (स्व.) प्रदीप बोस से वार्तालाप का अवसर मिला। वे कम्युनिस्टों की इस सफलता से बहुत प्रसन्न थे, उन्होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि उन्हें कम से कम तीन वर्ष तक सत्ता का सुख मिले तब सब ठीक हो जाएगा।’ मैंने कहा, ‘आप कैसी बात कर रहे हैं? सब लोग तो कम्युनिस्टों की जीत से दु:खी और भयभीत हैं, आप अकेल प्रसन्न हैं।’ तब उन्होंने कहा, ‘भारतीय कम्युनिस्टों का नेतृत्व उच्च-मध्यम वर्ग से आता है, उनमें से लगभग सभी इंग्लैण्ड में उच्च शिक्षा प्राप्ति के समय कम्युनिस्ट साहित्य पढ़कर मार्क्सवादी बने हैं, किंतु उनकी जीवन प्रेरणाएं मध्यमवर्गीय हैं। यदि उन्हें दो-तीन साल तक सत्ता में रहने का अवसर मिला तो सत्ता मोह उन्हें ग्रस लेगा और तब वे मार्क्सवादी क्रांतिकारी विचारधारा को भूलकर सत्ताकामी हो जाएंगे। सत्ता ही उनकी एकमात्र प्रेरणा होगी, मार्क्सवादी विचारधारा एक शाब्दिक आवरण मात्र रह जाएगी।’ और आज वैसा ही हो रहा है। यदि भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की मुख्य प्रेरणा सैद्धांतिक होती तो उनका जनाधार पूरे भारत में समान रूप से दिखायी देता, वह केवल प.बंगाल, केरल और नन्हे से त्रिपुरा तक सीमित नहीं रह जाता। कभी कम्युनिस्ट पार्टियां आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बहुत शक्तिशाली हुआ करती थीं, पर अब वहां उनका नामलेवा भी नहीं है। प.बंगाल और केरल में भी उनकी चुनावी सफलता का कारण मार्क्सवादी विचारधारा न होकर कुशल वोट बैंक रणनीति है।

कालबाह्य विचारधारा

यदि उनकी निष्ठा विचारधारा के प्रति होती तो यूगोस्लाविया, रोमानिया, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, सोवियत संघ और चीन में कम्युनिस्ट सरकारों के पतन व पूंजीवादी बाजार व्यवस्था की ओर अंधी दौड़ को देखकर भारत के कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी और पार्टियों के भीतर एक जबर्दस्त वैचारिक द्वंद्व दिखायी देता, पर ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने यह समझने का प्रयास ही नहीं किया कि सोवियत संघ में 70 वर्ष लम्बा मार्क्सवादी प्रयोग असफल क्यों हुआ? क्यों मिखाइल गोर्वाचोब के ‘ग्लास्तनोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोईका’ ने सोवियत संघ के विघटन की स्थिति पैदा कर दी? वामपंथी बुद्धिजीवी सोवियत संघ के विघटन के पीछे केवल अमरीकी पूंजीवाद का षड्यंत्र सूंघते रहे। इसके बाद माकपा ने अपनी निष्ठा सोवियत संघ से हटाकर कम्युनिस्ट चीन को अर्पित कर दी। जब चीन ने माओवाद को दफनाकर चार सूत्री आधुनिकीकरण के नाम पर पश्चिम के पूंजीवादी बाजार मॉडल को पूरे मन से अपना लिया, तब भी ये माकपाई चीन के सैद्धांतिक विचलन की कारण-मीमांसा करने की बजाय पिछले 30 वर्षों से उसकी पूंजीवादी प्रगति का ही गुणगान कर रहे हैं। उन्होंने कभी इस सत्य का साक्षात्कार नहीं किया कि मार्क्सवाद का जन्म उन्नीसवीं शताब्दी में औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के पहले चरण की प्रतिक्रिया में से हुआ था। उसका दार्शनिक आधार भौतिक विज्ञान की उस काल की सीमाओं और जर्मन दार्शनिक हीगेल के भौतिकतावादी दर्शन पर खड़ा था। इन डेढ़ सौ वर्षों में विज्ञान की प्रगति के आलोक में वह दार्शनिक आधार पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुका है। विज्ञान का क्षितिज देश और काल से परे विद्यमान किसी अदृश्य सत्ता में प्रवेश कर रहा है। पिछले डेढ़ सौ वर्षों के अनुभवों से यह प्रमाणित हो गया है कि मार्क्स की यह धारणा कि, मनुष्य मूलत: आर्थिक प्राणी है, गलत है। मनुष्य की वास्तविक जीवन प्रेरणा अर्थ से बहुत आगे जाती है। जहां तक सभ्यता के विकास माडल का संबंध है, मार्क्स द्वारा कल्पित सभ्यता का चित्र पूंजीवादी माडल से भिन्न नहीं था। रूसी विद्वान सोल्झेनित्सन ने सोवियत संघ के सर्वेसर्वा एन्ड्रापोल को लिखे एक पत्र में बहुत पहले ही इस सत्य को प्रस्तुत किया था कि राज्य द्वारा आरोपित समानता कृत्रिम और क्षणिक होती है। 15 या 16 मार्च, 1931 को बम्बई में गांधी जी के लिए आयोजित एक जनसभा में जब कम्युनिस्टों ने बी.टी. रणदिवे के नेतृत्व में उनके मंच पर लाल झंडा गाड़ दिया था, तब गांधी जी ने उस झंडे के नीचे बैठकर ही मार्क्सवाद के वैचारिक आधार की अपूर्णता का जो विवेचन किया था, वह सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय और महादेव देसाई की डायरी के खंड 12 में उपलब्ध है। प्रत्येक कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी को उस भाषण को अवश्य पढ़ना चाहिए।

दिवास्वप्न देखते मार्क्सवादी

आशा की जा रही थी कि माकपा की कांग्रेस में गंभीर सैद्धांतिक विचार दोहन किया जाएगा। इस कांग्रेस के काफी दिन पहले से सीताराम येचुरी के एक सैद्धांतिक दृष्टि-पत्र की मीडिया में चर्चा हो रही थी। माकपा की कांग्रेस में सैद्धांतिक मुद्दों की चर्चा करने वाला एक प्रस्ताव आया जरूर, पर उस पर कोई बहस नहीं हुई। 802 प्रतिनिधियों में से केवल एक ने उसके विरुद्ध मत दिया, दो ने मतदान का बहिष्कार किया। उस प्रस्ताव में पश्चिम के पूंजीवादी जगत में संकट की स्थिति को मार्क्सवाद की विजय के रूप में प्रस्तुत किया गया। कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों का चिंतन कितना पूर्वाग्रही होता है, इसका ताजा उदाहरण है जनसत्ता (11 अप्रैल) में किन्हीं अजेय कुमार का ‘इस सदी में समाजवाद’ शीर्षक से प्रकाशित लेख, जिसमें लेखक 2008 से पश्चिम के आर्थिक संकट के परिप्रेक्ष्य में फुकुयामा और नोम चोम्स्की के मतों को उद्धृत कर पूंजीवाद के पतन और मार्क्सवाद की विजय का दिवास्वप्न देख रहे हैं। यह मानते हुए भी कि, ‘मार्क्सवाद में भी शोध होना चाहिए और जरूरत हो तो नई परिस्थितियों के अनुसार उसमें बदलाव भी लाने चाहिए’, उनका आग्रह है कि, ‘यह ध्यान रखने की जरूरत है कि बदलाव ऐसे न हों कि मार्क्सवाद इसके बाद मार्क्सवाद ही न रह जाए। उसकी शक्ल सूरत पूरी तरह बदल जाए और वह पहचान में भी न आए। कुछ लोग गांधीवाद, अम्बेडकरवाद, लोहियावाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद आदि का एक मुरब्बा तैयार करने की सलाह देते हैं। सभी वाद महत्वपूर्ण हैं लेकिन इन सब पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण से ही बात हो सकती है।’ अच्छा होता कि विद्वान लेखक यह भी बताते कि मार्क्सवादी दृष्टिकोण क्या है और मार्क्सवाद की अपरिवर्तनीय शक्ल- सूरत क्या है? वे यह बताते तो बहस आगे बढ़ती। (पांचजन्‍य के सौजन्‍य से)

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4 Comments on "भारतीय कम्युनिस्ट – सत्ता बिन सब सूना"

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shaikh mohammad
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शाबाश पट्ठे

हिदू भक्ति हो तो ऐसी. न जमीन न आधार. जनता के लिए कुछ न कीजिये बस कम्युनिस्टों को गरियाते रहिये. पाखंड की भी कोई सीमा तो होगी धूर्त बंधू.

Satyarthi
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aadarneeya devendra swaroop ji
maan-beta party par aapki lekhmaala samaapt karne ka to ishaara aapne nahin diya tha iseeliye agla lekh padhne ko adheer hoon. Is shrinkhala ka pratham bhaag aapki agaadh vidvatta ka parichayak hai. Kripaya likhte rahiye.

डॉ. मधुसूदन
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सत्ता बिन सूना, कैसे?
जल बिन मछली जैसे।
कम्युनिस्टों को संघ की भांति कोइ रचनात्मक कार्य थोडे ही करना होता है?
बहुत तर्क शुद्ध लेख, आपका कीर्तिमान।

Bipin Kishore Sinha
Guest

देवेन्द्र स्वरूप जी हमेशा विचारोत्तेजक लेख लिखते हैं। उनके लेख में तथ्य भरे होते हैं, अकाट्य तर्क भि होते हैं। इस विद्वान लेखक की कलम से अनगिनत सुन्दर लेख निकले हैं। उन्हीं लेखों की शृंखला में यह एक उत्तम लेख है। उन्हें कोटिशः बधाई।

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