लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा.indian culture राधेश्याम द्विवेदी

विश्व की सर्वोत्तम बातें, ज्ञान, विचार चिन्तन और आचरणों को जानना , विचार करना, चिन्तन करना तथा अपने जीवन का अंग बनाना ही संस्कृति होती है । इससे शारीरिक,मानसिक वैचारिक एवं अध्यात्मिक शक्तियों का अर्जन, प्रशिक्षण, दृढीकरण , उन्नयन और विकास होता है । मन आचार आचार और रूचियां परिष्कृत होती हैं तथा सभ्यता के रूप में प्रकट या उद्घटित होती हैं। प्रकृति द्वारा प्रदत्त गुणों – इर्ष्या, मोह ,क्रोध , राग, द्वेष, मत्सर आदि को नियंत्रित एवं विकासोन्मुख बनाना भी संस्कृति होती है । संस्कृति का रूप एक दिन के प्रयास या प्रयोग से प्रकट नहीं होता है ।यह एक सामान्य विचार से अंकुरित होकर दस, बीस , सौ, पचास वर्शों में विकसित होती है । यह परस्पर आदान प्रदान , आचार विचार , खान पान , बस्त्राभूशण , पर्यटन कला तथा धर्म के माध्यम से प्रकट होती है और निरन्तर बृद्धि को प्राप्त होती रहती है । यह जिन्दगी का एक तरीका होता है जो सदियों से जमा होते-होते समाज को आच्छादित करते रहता है । जीवन के न रहने पर भी संस्कृति जीवित रहती है और पीढी दर पीढी आगे बढती जाती है। इतना ही नहीं हमारा पुनर्जन्म भी हमारे संस्कृति एवं संस्कार के अनुरूप ही होता है । एक ही माॅ बाप से पैदा हुए जुडवा बच्चों की प्रकृति उनके पूर्व जन्म के संस्कार के अनुरूप अलग अलग दिखाई देती है । संस्कार अथवा संस्कृति यद्दपि षरीर पर घटित होता है परन्तु यह आत्मा से उत्प्रेरित होता है तथा जन्म जन्मान्तर तक चलता रहता है ।
संस्कृति जलाषय की भांति होती है जिसमें हमेशा नयी नयी संभावनाओं का जल संचित होता रहता है । यह पूर्ण होने पर बाहर निकलकर औरों को भी लाभान्वित करता रहता है । एसे जलाशय में स्वच्छ जल हमेशा लहराते रहते हैं और कमल के फूल भी खिलते रहते हैं । संस्कृति चलती भी है तथा एक देश से दूसरे देश में भी जाती है । फारस के तुर्को से फारसी , मुस्लिमों से उर्दू, अंग्रेजों से अंग्रेजी हमारे देश में आयी है इसी तरह ज्ञान विज्ञान एवं शिक्षा चिकित्सा की संस्कृति का विस्तार और विकास हुआ है । परस्पर आदान प्रदान की प्रक्रिया ही संस्कृति की जान होती है और इसी प्रक्रिया से यह अपनेको जिन्दा रखती है तथा समन्वय एवं नये ज्ञान को आत्मसात करने की योग्यता भी रखती है।
जिस राज्य एवं देश में जितनी विविधता होती है उसकी संस्कृति उतनी ही समृद्धि होती है। भारत भी एक विशाल विविधता वाला देश है ।इसमें तरह तरह की संस्कृतियों का अद्भुत सामंजस्य एवं संगम दिखाई देता है । इतना होते हुए भी भारत दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वन्दी शक्तियों से जूझता भी रहता है । एक- बाह्य सत ज्ञान को आत्मसात कर समन्वय की भावना को बलवती बनाती है और राजनीतिक एवं सांस्कृतिक एकता के प्रयास में लगी रहती है । दूसरा -यह जीवन में विच्छेद एवं भेदभाव को बढावा भी देती है । यह हिन्दू मुस्लिम ईसाई जैसी पृथक संस्कृति का नाम देकर पहली शक्ति का विरोध भी करती है । इन दोनों संस्कृतियों का एक साथ विकसित एवं पुष्पित पल्लवित होना , भारतीय संस्कृति की निजी विशेषता है ।
भारत मे आर्यों के आगमन से पूर्वं द्रविणों की संस्कृति एवं ज्ञान प्रसारित होता आया है । आर्यों की संस्कृति भी इसी को आत्मसात कर अद्भुत समन्वय की संस्कृति बना ली े । पहलवी और संस्कृत भाषा दोनों मध्य एशियाा से जन्मी थीं परन्तु संस्कृत भारत की राष्ट्रभाषा होकर जनता के विचाार और धर्म का प्रतीक एवं सांस्कृतिक एकता का संवाहक रही । यद्यपि आम जन में यह ज्यादा समय तक बोली नहीं जाती रही फिर भी हमारी संस्कृति में गहरी पैठ जमाकर प्रचुर प्रभाव डालती रही है ।
आर्य एवं अनार्य के अलावा देश की अनेक जाति वर्ग समुदाय कबीलों ने भी भारतीय संस्कृति को विविध एवं स्थाई बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रस्तुत किया है। विदेशों से आये मंगोल और यूनानी वैदिक या बौद्ध संस्कृति को अंगीकार कर लिये । यूनानी राजा मिलिन्द एक वडा बौद्ध धर्मावलम्बी था । राजा हेलियोडोरस वैष्णव था तथा रूद्रदामन ,जयदमन तथा हूण आदि भारतीय संस्कृति के रंग में पूर्ण रूप से घुल मिल गये थे । इन सबका कारण भारत की विविध भौगोलिक परिस्थिति तथा वैदिक अथवा हिन्दू धर्म की शास्वत सहिष्णुणता एवं एवं स्वत्रंतता है जहाॅ कोई पूर्वाग्रह नहीं है ।
भारत में आज जो कुछ है उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक वर्गों एवं निवासियों का योगदान रहा है ।यदि हम भारतीय संस्कृति के बुनियादी तत्वों को समझ न सके तो हमारे भाव , विचार और कार्य सब अधूरे एवं एकांगी रह जायेंगे । देश का सम्यक एवं प्रभावपूर्ण सेवा भी नहीं कर सकेंगें । अतएव सब विविधताओ में अद्भुत तालमेल बैठाकर हमें भारतीय संस्कृति के शास्वत चिन्तन को निरन्तर आगे अग्रसर करते रहना चाहिए ।

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