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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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श्रीश देवपुजारी

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत की शिक्षा पद्धति को लेकर विचार-विमर्श चलता आ रहा है। हमने जो भी पाठ्यक्रम बनाएँ उनके परिणामों की समीक्षा से यह बात उभरकर आती है कि पश्चिमी देशों की आवश्यकताओं के अनुरूप हमने अपने युवाओं को ढाला है । परिणामस्परूप, भारतीय युवा अमेरिका और यूरोपीय देशों में भारतीय प्रतिभाओं का परचम फहरा रहे हैं। विभिन्न देशों में वे महत्वपूर्ण स्थानों पर आसीन होकर भारत का नाम चमका रहे हैं।

किन्तु विचारणीय प्रश्न हैं कि प्रतिभा प्रदर्शन करने वाले भारतीय युवा क्या सच में भारतीय हैं? मैं नागिरकता के संदर्भ मे प्रश्न नहीं उठा रहा हूँ। मैं भारतीयता को पिछड़ते देख चिन्तित हूँ। भारतीयता के कई मायने हैं। उनमें से प्रसंगवश अत्यल्प बातों की अोर ध्यान दिलाना चाहता हूँ।

भारत कहते ही हमें अपने मनीषियों का स्मरण होता हैं। ग़ोत्र का उच्चारण करते ही एक ऋषिकुल से हम अपने-आप को जोडते हैं। ऋषि का अर्थ है ज्ञान की गवेषणा, अनुसंधान एवं शोध में निमग्न व्यक्ति संपादित ज्ञान को नयी पीढ़ी को दान करने और ज्ञान परम्परा को अक्षुण्ण रखने वाला नाम तथा इस एकान्तिक ज्ञान साधना के लिए मन एवं इंद्रियाें को एकाग्र रखने का प्रयास करनेवाला आचार्य। प्रकृति पर विजय प्राप्त कर मनुष्यों के उपभोग के लिए साधनाें का अंबार खड़ा करनेवाला सृष्टि विनाशक वैज्ञानिक नहीं, तो प्रकृति के साथ सह अस्तित्व मन विश्वास रखने वाला और पृथ्वी पर संचालित जीवनधारा को पुष्ट करने वाला ब्रह्मज्ञानी।

किन्तु, क्या आजका भारत इस प्रकार के ऋषियों का भारत हैं। अपवाद रुप में निश्चित कुछ की गणना की जा सकती हैं। किन्तु कीर्ति, सत्ता, धनाकांक्षा के बिना केवल मानव कल्याण की प्रेरणा से अज्ञेय रहकर कार्यमग्न लोग यह अब भारत की पहचान नहीं रही है । अतः हमें पुनः ऋषियों का निर्माण करना होगा। यह साधने का अभिनन्दनीय उपक्रम है चेत्रन्नहल्ली नामक ग्राम में चलने वाला ”वेद विज्ञान गुरूकुलम्”।

1997 में उध्दाटित यह प्रकल्प वेद, शास्त्र, संस्कृत भाषा, आधुनिक विज्ञान, सङ्गणक, आङ्ग्ल भाषा इत्यादी की पढ़ाई कराता है । प्राचीन एवं अर्वाचीन का यह सुहावना संगम है। यहाँ वेदों में कृष्ण यजुर्वेद और शास्त्रों में न्याय वेदान्त, योग एवं व्याकरण पढ़ाया जाता है । प्रवेश हेतु अर्हता है मेट्रिक की परीक्षा उतीर्ण मेधावी छात्र, जो मेट्रिक तक संस्कृत विषय पढ़ा हो। वर्षों के इस पाठयक्रम के समय वह 20 वर्षों तक विद्यार्थी के रुप में विश्वविद्यालय की परीक्षा देकर स्नाकोतर की उपाधि प्राप्त करता है । यदि इच्छा है तो आगे 3-4 वर्ष वह गुरुकुल में रहकर पी.एच.डी. कर सकता है । शोध की व्यवस्था गुरुकुल का ही एक हिस्सा है । गुरुकुल से निकले छात्र नौकरी की याचना करने वाले छात्र न बनें अपितु आचार्य बनें यह घुट्टी उन्हें पिलाई जाती है ।

वेदविज्ञान गुरुकुल में अब तक कनार्टक राज्य के छात्रों को ही प्रमुख रूप से प्रवेश दिया जाता था। किन्तु अब गुरुकुल में अधिकाधिक राज्यों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए ऐसा निर्णय न्यास ने लिया है। अपने पुत्रों को ऋषि परम्परा से जोड़ने और सत्यार्थ मन वशिष्ठ, कौडिन्य, अत्री इत्यादिऋषियों का गोत्र रुप में उच्चारण कर सकने की चाह रखने वाले अभिभावकों को चाहिए कि वे शीघ्रातिशीघ्र स्वयं पाल्य के साथ इस प्रकल्प का प्रत्यक्ष दर्शन करने और संतुष्ठ होने पर प्रवेश के लिए आवेदन करें। 20 मई के पश्चात् आवेदनकारी विद्याथियों का साक्षात्कार होगा। चयनित विद्यार्थियों का शिक्षा सत्र जून से प्रारम्भ होगा । सभी जाति के विद्यार्थी आवेदन कर सकते हैं। केवल बालकों का हीं प्रवेश सम्भव है। शिक्षा पूर्णरूपेण निःशुल्क है।

उपरोक्त शिक्षा पूर्ण रूपेण गुरूकुल पध्दति द्वारा दी जाती है। सुंदर उपवन में स्थित इस गुरुकुल में सादगी, स्वच्छता एवं अनुशासन पर जोर दिया जाता है, जैसा कि प्राचीन काल में था । गुरुकुल परिसर में एक मंदिर एवं एक साधना केंद्र भी है जो पिरामिड के आकार का है । उसे ‘शिखिरणी’ कहते हैं। प्रातः 5 बजे से लेकर रात्रि 10 बजे तक अध्ययन चलता रहता है ।

यद्यपि दूरदर्शन, इंटरनेट इत्यादी उपकरण गुरुकुल में उपलब्ध हैं, दशेंद्रियों की सारी शक्तियाँ केवल अध्ययन पर केंद्रित होने के कारण विचिलत करने वाले ये आधुनिक आकर्षण बाधा नही पहुँचाते । विद्याथियों को पढ़ाने के लिए आचार्यों की संख्या पर्याप्त हैं। गुरुकुल में पढ़ाने एवं संवाद का माध्यम संस्कृत है । वर्ष में दो बार गुरुकुल में अवकाश रहता है। एक बार दीपावली के समय एवं दूसरी बार ग्रीष्मकाल में।

(लेखक संस्‍कृत भारती से जुड़े हैं)

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