लेखक परिचय

राजेंद्र बंधू

राजेंद्र बंधू

निदेशक समान- सेंटर फॉर जस्टिस एण्ड इक्वालिटी 163, अलकापुरी, मुसाखेड़ी, इन्दौर (म.प्र.) 452001

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क्रिकेट

क्रिकेट

राजेन्द्र बंधु

क्‍या क्रिकेट सिर्फ पुरूषों का खेल हैॽ यह सवाल इसलिए सामने आया कि इन दिनों सबसे ज्‍यादा चर्चा पुरूषों के टी-20 क्रिकेट मैच की ही हो रही है, जबकि महिलाओं का टी-20 वर्ल्‍ड कप मैच भी इन्‍हीं दिनों चल रहे हैं। 27 मार्च को मोहाली में भारत और ऑस्ट्रेलिया के मैच से पहले दोपहर में इसी मैदान पर भारत और वेस्टइंडीज का महिला क्रिकेट मैच था। लेकिन न्यूज चैनल पर शाम को होने वाले पुरूष क्रिकेट की ही चर्चा थीं। यह देखा गया है कि भारत में क्रिकेट के ज्यादातर दीवानों को यह जानकारी हीं नहीं है कि महिलाओं की भी भारतीय क्रिकेट टीम है। जिन्हें महिला क्रिकेट की जानकारी है, उनमें से ज्यादातर को किसी महिला क्रिकेटर का नाम भी नहीं मालूम।

ज्‍यादातर क्रिकेट प्रेमियों का सामान्य ज्ञान सिर्फ पुरूष क्रिकेटरों तक इसीलिए सीमित है, क्योंकि महिला क्रिकेटरों की जानकारी उन तक नहीं पहुंची और मीडिया तथा क्रिकेट से जुडे संगठनों ने महिला क्रिकेट को लेकर कोई उत्साहजनक वातावरण नहीं बनाया। जबकि सचाई यह है कि महिला क्रिकेट पुरूष क्रिकेट से एक कदम आगे है। दुनिया में सबसे पहले महिला वर्ल्ड कप क्रिकेट मैच 1973 में इंग्लैण्ड में शुरू हुआ और पुरूषों का वर्ल्‍ड कप क्रिकेट मैच उसके दो साल बाद 1975 में शुरू हुआ था।

यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैचों में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की बल्लेबाज मिताली राज का औसत सचिन तेन्दुलकर के बराबर 48.82 है। 157 अंतर्राष्ट्रीय वन डे मैच खेल चुकी मिताली राज पांच शतक और 37 अर्धशतक के साथ 5000 से अधिक रन बना चुकी है। कई बार विदेशी पिच पर पुरूष भारतीय क्रिकेटर कोई बड़ा स्कोर खड़ा नहीं कर पाए, जबकि महिला क्रिकेटर मिताली ने टेस्ट मैच, वन डे और टी-20 मैंचों में महत्वूपर्ण पारियां विदेशों में जाकर खेली। इन दिनों चल रहे महिला आईसीसी वर्ल्ड टी-20 मैचों में भारत की मिताली राज ने सबसे ज्यादा रन बनाए। बांग्लादेश से हुए मैच में मिताली ने एडवर्डस का रिकॉर्ड तोड़ते हुए 120 के स्ट्राईक रेट से बल्लेबाजी करते हुए 5 चौकों की सहायता से 566 रन बनाए। इस उपलब्धि पर किसी पुरूष क्रिकेटर को जितनी तवज्जो मिलती है, उतनी तवज्जों मिताली को सिर्फ महिला होने की वजह से नहीं मिली। हाल ही टी-20 वर्ल्ड कप में बांग्लादेश को एक रन से हराने वाली भारतीय पुरूष क्रिकेट के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन इसी दौरान महिलाओं के मैच में बांग्लादेश को 72 रनों से हराने वाली भारतीय महिला टीम की चर्चा कहीं सुनाई नहीं दी। भारतीय महिला टीम ने 26 जनवरी 2016 को टी-20 मैचों की सिरीज में ऑस्ट्रेलिया को पांच विकेट से हराया। सन् 2014 में इंग्लेण्ड में जब भारत की पुरूष क्रिकेट टीम बुरी तरह मैच हार रही थी, उसकी समय भारत की महिला क्रिकेट टीम ने इंग्लैण्ड की महिला टीम को छह विकेट से हराकर शानदार जीत हासिल की थी। यह तब हुआ जब बीसीसीआई ने आठ साल बाद सिर्फ एक टेस्ट मैच खेलने के लिए महिला टीम को इंग्लैण्ड भेजा था। यानी जिस महिला टीम को अयोग्य मानकर आठ सालों तक घर में बैठाए रखा उसने इंग्लैड से हुए मैच में खुद को पुरूषों से ज्यादा काबिल साबित किया।

भारत में महिला क्रिकेट टीम अल्प सुविधाओं और सीमित अवसरों के बीच खेल की तैयारी करती है। इसके बावजूद उसकी अब तक की उपलब्धियों से उसकी काबिलियत सामने आती है। यदि हम भारतीय महिला क्रिकेट टीम के इतिहास पर नजर डालें तो वह बहुत पुराना है और इसकी अब तक की यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए। सन् 1973 में भारतीय महिला क्रिकेट संघ को अंतर्राष्ट्रीय महिला क्रिकेट परिषद की सदस्यता प्राप्त हुई और उसके पांच साल बाद भारत सरकार ने मान्यता दी।

सन् 1975 से लेकर 1986 तक भारतीय महिला टीम ने अंतर्राष्ट्रीय मैंचों में शिरकत कर भारत को महत्वपूर्ण सफलताएं दिलवाई। किन्तु उसके बाद उन्हें अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने का अवसर नहीं मिला। सन् 2006 में भारतीय महिला क्रिकेट संघ को बीसीसीआई में शामिल कर दिए जाने से यह उम्मीद बंधी थीं कि व‍ह महिला क्रिकेट को भी पुरूष क्रिकेट की तरह अवसर देगी, किन्तु हकीकत में उसके विपरीत हुआ। बीसीसीआई के दायरे में आने से महिला क्रिकेट की न सिर्फ स्वायत्ता खत्म हुई, बल्कि उसकी उपेक्षा होने लगी। बीसीसीआई के पास पयाप्त धनराशि के बावजूद उसका पूरा ध्यान पुरूषों की क्रिकेट टीम पर ही केन्द्रित रहा। बीसीसीआई जहां ‘‘सी’’ वर्ग के पुरूष खिलाड़ियों को जहां 25 लाख रूपए देती है, वहीं बेहतर मानी जाने वाली ‘‘ए’’ वर्ग की महिला खिलाड़ियों केा सिर्फ 15 लाख रूपए देती है। इस तरह महिला और पुरूष खिलाड़ियों के बीच यह दोहरा मापदण्ड अपनाने वाला संगठन महिला टीम को कितना अवसर दे पाएगा?

बीसीसीआई जितनी तैयारी पुरूष क्रिकेट मैच के लाईव प्रसारण की करती है, उतनी तैयारी वह महिला क्रिकेट के लाईव प्रसारण की नहीं करती। यही कारण है कि महिला क्रिकेट टीम की मिताली राज का वन डे मैचों में रन का औसत भारत के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के औसत के बराबर होने के बावजूद मिताली को न तो पर्याप्त कवरेज मिला, न पारिश्रमिक और न प्रसिद्धि मिली।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम में सिर्फ मिताली राज ही नहीं है, बल्कि कई बल्लेबाज और गेंदबाज भी अपनी काबिलियत साबित कर चुकी है। यहां की तेज गेंदबाजों में झूलन गोस्वामी का एक बड़ा नाम है, जिन्होंने 8 टेस्ट मैचों में 263 रन देकर 33 विकेट अपने नाम किए। उनका सबसे बड़ा रिकॉर्ड इंग्लैण्ड के खिलाफ 78 रन देकर 10 विकेट लेने का है। जबकि उन्होंने 105 वनडे मैचों में 120 विकेट लिए। सन् 2007 में आईसीसी ने विश्‍व के जिन 9 सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को पुरस्कार हेतु चुना था उनमें ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग, मैथ्यू हेडन, शान टेंट, केन्या के थामस ओडोया और पाकिस्तान के मोहम्मद युसूफ के साथ भारत का कोई पुरूष खिलाड़ी नहीं, बल्कि महिला गेंदबाज झूलन गोस्वामी का नाम था। भारतीय पुरूष टीम को हमेशा ब्रेट ली, एलेन डोनाल्ड, शोएब अख्तर और वसीम अकरम जैसे तेज गेंदबाजों की तलाश रहीं है। यदि क्रिकेट में यदि महिला-पुरूषो की सीमा रेखा नहीं हो तो 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गेंदबाजी करने वाली झूलन गोस्वामी इस कमी को दूर कर सकती है।

दुनिया में तमाम ऐसे तथ्य मौजूद है जो क्रिकेट के मामले में महिलाओं को कमजोर मानने के तर्क को खारिज करते हैं। यह सभी जानते हैं कि 24 फरवरी 2010 को सचिन तेन्दुलकर ने साउथ अफ्रीका के खिलाफ बल्लेबाजी करते हुए दोहरा शतक लगाया था और पूरी दुनिया में उनकी बेहद प्रशंसा हुई थी। किन्तु हकीकत में वन डे मैच में दोहरा शतक लगाने वाले सचिन पहले बल्लेबाज नहीं है। उनसे पहले 16 दिसम्बर 1997 को ऑस्ट्रेलियाई महिला क्रिकेटर बेलिंडा र्क्लाक ने डेनमार्क के विरूद्ध 155 गेंदों में 229 रन बनाकर दोहरा शतक लगाया था। किन्तु महिला होने की वजह से उनके दोहरे शतक की चर्चा नहीं हुई। पिछले साल इंग्लैण्ड की महिला गेंदबाज केट क्रॉस ने पुरूषों की टीम के साथ खेलते हुए सात ओवर में 19 रन देकर तीन विकेट लेकर यह साबित किया कि कोई भी खिलाड़ी महिला होने के कारण कमजोर नहीं है।

आज भारत की महिला क्रिकेट टीम चाहे टी-20 वल्र्ड कप से बाहर हो गई हो। लेकिन जिन उपेक्षित परिस्थितियों में उसने अपनी काबिलियत साबित की, उससे एक बड़ी संभावना सामने आती है। बीसीसीआई के लिए यह जरूरी है कि महिला क्रिकेट को भी बेहतर कोच, बेहतर सुविधाएं और अंतर्राष्ट्रीय मैचों के अवसर उपलब्ध करवाकर ज्‍यादा सम्‍पन्‍न और बेहतर  बनाए। इसके लिए क्रिकेट का ऐसा माहौल बनाया जाए, जिससे क्रिकेट प्रेमियों के दिल में दोनों ही टीमों के लिए बराबरी का स्‍थान कायम हो।

राजेन्द्र बंधु

 

 

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