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आर. पी. सिंह

विकासशील देशों में निवेश हेतु संसाधनों की जरूरत सामान्‍यत: घरेलू उपलब्‍ध संसाधनों से ज्‍यादा होती है। भारत में ऐतिहासिक तौर पर सकल घरेलू निवेश (जीडीआई) सकल घरेलू बचत (जीडीएस) की तुलना में कम रहा है। यहां प्रतिवर्ष सकल घरेलू उत्‍पाद (जीडीपी) की महज 1.2 से 1.3 फीसदी राशि ही निवेशित हो पाती है। ऐसे में बड़े निवेश और उत्‍पादन क्षमता में तेज वृद्धि के लिए ये देश घरेलू बचत के पूरक के रूप में विदेशी पूंजी के आगमन को प्रोत्‍साहित करते हैं। इस हेतु प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को सबसे पसंदीदा रास्‍ता समझा जाता है, क्‍योंकि यह अपने साथ प्रबंधन के नए तरीके और नई तकनीकें लेकर आता है। उत्‍पादन क्षमता बढ़ाने के अलावा यह देश की निर्यात क्षमता या आय में भी वृद्धि करता है।

1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण ने देश की प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश नीति व्‍यवस्‍था को काफी उदार बना दिया है। पिछले कुछ सालों में भारत विदेशी निवेश के पसंदीदा स्‍थान के रूप में उभरा है। कार्यकुशल माहौल और पारदर्शी खुली नीति व्‍यवस्‍था ने अर्थव्‍यवस्‍था का स्‍थायी विकास सुनिश्चित किया जिससे बाजार विस्‍तृत हुआ। इसने भारत के निवेश हेतु पसंदीदा देश बनने में भी महती भूमिका अदा की। भारत की एफडीआई नीति प्रणाली का संचालन गतिशीलता से होता है। जरूरतों और निवेशकों की अपेक्षा के मद्देनजर समय-समय पर इसकी समीक्षा की जाती रही है। इस प्रक्रिया के एक भाग के रूप में एफडीआई नीति को निरंतर क्रमिक रूप से उदार बनाया जा रहा है, ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा उद्योगों में स्‍वत: अनुमोदित मार्ग के तहत एफडीआई को मंजूरी दी जाए। सन् 2000 में सरकार ने ज्‍यादातर गतिविधियों के लिए स्‍वत: अनुमोदित मार्ग से शत-प्रतिशत तक के एफडीआई को मंजूरी दी। साथ ही, उन क्षेत्रों मे जहां स्‍वत: अनुमोदित मार्ग मौजूद नहीं था या जिन क्षेत्रों में सीमित एफडीआई था, उनके लिए एक छोटी सी ‘नकारात्‍मक सूची’ अधिसूचित की गई। तब से आहिस्‍ता-आहिस्‍ता एफडीआई नीति को सरल और युक्तिसंगत बनाया गया है और कई अन्‍य क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोला गया है।

एफडीआई नीति में हुए हालिया बदलाव

भारत को लगातार आकर्षक और निवेशकों के अनुकूल बनाने हेतु हाल में एफडीआई नीति प्रणाली में कई महत्‍वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। फरवरी 2009 में, प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश की गणना (प्रेस नोट 2 और 4) के लिए देश की एफडीआई व्‍यवस्‍था में ‘स्‍वामित्‍व’ और ‘नियंत्रण’ का युग्‍म-सिद्धांत केंद्रीय सिद्धांत के रूप में स्‍वीकार किया गया। इससे भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेश या ‘डाउनस्‍ट्रीम’ निवेश पाने के लिए सरकार की या विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड (या अन्‍य कुछ) की मंजूरी हासिल करने का आवेदन सरल, एकरूप और समान नियमों वाला हो। संवेदनशील क्षेत्रों में अनिवासी इकाइयों को स्वामित्व या नियंत्रण के हस्‍तांतरण पर 2009 का ‘प्रेस नोट-3’ लाया गया। 2009 के प्रेस नोट-6 ने लघु और सूक्ष्‍म उद्यमों (एसएमई) में एफडीआई प्रवेश को उदार बनाया है। इसमें स्‍पष्‍ट किया गया है कि अब एसएमई में एफडीआई की अनुमति है, हालांकि अन्‍य उपयोगी नियमन बने रहेंगे। 2009 के प्रेस नोट के जरिए रॉयल्‍टी का समस्‍त भुगतान, प्रौद्योगिकी के हस्‍तांतरण के लिए एकमुश्‍त फीस और स्‍वत: अनुमोदित मार्ग के तहत ट्रेडमार्क या ब्रांडनेम का उपयोग बगैर सरकारी अनुमति के करने का प्रावधान किया गया है।

वर्ष 2010 में सरकार ने 2010 के प्रेस नोट-1 के जरिए निर्णय लिया कि अब 1,200 करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी पूंजीनिवेश की विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड (एफआईपीबी) की सिफारिश को ही आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) के समक्ष प्रस्‍तुत किया जाएगा। इससे पहले यह सीमा आधी यानी 600 करोड़ रुपये की थी। इस नोट के जरिए कई श्रेणियों को सरकारी मंजूरी लेने से छूट दे दी गई।

एफडीआई नीति का एकत्रीकरण

सरकार ने 31 मार्च, 2010 को एफडीआई पर मौजूद सभी विनियमनों का एक दस्‍तावेज में एकत्रीकृत करने और इसे प्रकाशित करने के रूप में एक बड़ा कदम उठाया। एफडीआई नीति पर मौजूद सभी सूचनाओं की उपलब्‍धता एक ही जगह सुनिश्चित करने के लिए ऐसा किया गया है। सरकार के इस कदम से विदेशी निवेशकों और क्षेत्रीय नियामकों के बीच विदेशी निवेश नियमों की बेहतर समझ बनेगी और परिणाम बहुत साफ होंगे। इस दस्‍तावेज को हर छह महीने में नवीकृत किया जाएगा। 30 सितंबर, 2010 को दस्‍तावेज का संशोधित दूसरा संस्‍करण जारी किया गया।

एफडीआई नीति पर अंशधारकों से विचार-विमर्श

सरकार ने अब अंशधारकों से विचार-विमर्श की शुरुआत की है। इस प्रक्रिया के तहत क्षेत्रीय नीतियों समेत एफडीआई नीति के विभिन्‍न पहलुओं पर सुझाव आमंत्रित किए हैं। खुदरा और रक्षा क्षेत्रों में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश, भारत में मौजूद उपक्रम या गठबंधन के मामले में विदेशी या तकनीकी सहयोग की मंजूरी, सीमित उत्तरदायित्‍व साझेदारी (एलएलपी) में एफडीआई आदि मसलों पर विमर्श पत्र अंशधारकों के सुझावों के लिए जारी की जा चुकी है।

औद्योगिक नीति और संवर्द्धन विभाग

औद्योगिक नीति और संवर्द्धन विभाग निवेश बढ़ाने के लिए कई तरह के कदम उठा रहा है। इसमें संयुक्‍त आयोग की बैठकों का आयोजन, व्‍यापार और निवेश संवर्द्धन कार्यक्रम का संगठन, परियोजना प्रबंधन, क्षमता निर्माण, जी2बी (गर्वनमेंण्‍ट टू बिजनेस) पोर्टल या ई-बिजनेस पोर्टल की स्‍थापना, निवेश संवर्द्धन के लिए देश केंद्रित डेस्‍क की स्‍थापना, मल्‍टीमीडिया-ऑडियो-विजुअल अभियान का आयोजन, निवेश संवर्द्धन को समर्पित एजेंसी का सृजन आदि उपाय शामिल हैं। केंद्रित, विस्‍तृत और संगठित रूप में भारत में विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए ‘इन्‍वेस्‍ट इंडिया’ नामक समर्पित निवेश संवर्द्धन एजेंसी 23 दिसंबर 2009 से शुरू की गई है।

भारत की वैश्विक स्थि‍ति

सरकारी प्रयासों और उदारीकरण के उपायों का बेहतर परिणाम निवेशकों की जबरदस्‍त प्रतिक्रिया और 2003-04 से एफडीआई पूंजी के प्रवाह में खासी वृद्धि के रूप में मिला। तब से पिछले वित्त वर्ष यानी 2009-10 तक एफडीआई लगभग 13 गुना बढ़ गया था। एफडीआई गणना की अंतरराष्‍ट्रीय पद्धति के अनुसार भारत में 2009-10 के दौरान लगभग 37.18 अरब डॉलर का प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश आया। वैश्विक आर्थिक मंदी के बावजूद पिछले तीन साल में देश में एफडीआई आगमन लगभग समान बना रहा। यह स्थिति तब है जब अंकटाड की विश्‍व निवेश रिपोर्ट, 2009 के अनुसार 2008 में पूरी दुनिया में एफडीआई आगमन में 2007 के मुकाबले 14 फीसदी की भारी कमी हुई। 2007 में एफडीआई का स्‍तर 1979 अरब डॉलर पर था जो 2008 में घटकर 1697 अरब डॉलर हो गया। बाद में अंकटाड ने वर्ष 2009 में भी एफडीआई प्रवाह में वर्ष 2008 के मुकाबले 30 फीसदी की कमी का अनुमान व्‍यक्‍त किया। वहीं अंकटाड की रिपोर्ट के अनुसार, एफडीआई प्रवाह की वैश्विक तालिका में वर्ष 2001 में भारत का स्‍थान 32 था जो 2009 आते-आते 9 हो गया। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों में एफडीआई प्रवाह के लिहाज से भारत की रैंकिंग 2005 में 13 थी, जो 2009 में 4 हो गई है। वर्ष 2005 में भारत का एफडीआई प्रवाह दुनिया के एफडीआई प्रवाह का महज 0.78 प्रतिशत था, जो 2009 में 3.11 प्रतिशत हो गया है।

भारत को आज पूरी दुनिया में सबसे आकर्षक निवेश स्‍थल के रूप में आंका जा रहा है। अंकटाड की विश्‍व निवेश रिपोर्ट, 2010 ने अपने विश्‍लेषण में अनुमान जताया है कि 2010-12 के दौरान भारत एफडीआई के लिहाज से विश्‍व में दूसरा सबसे आकर्षक देश रहेगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2009-11 के दौरान दुनिया के 5 सबसे आकर्षक देशों में चीन शीर्ष पर, भारत दूसरे एवं ब्राजील, अमरीका और रूसी महासंघ क्रमश: तीसरे, चौथे और पांचवें स्‍थान पर रहेंगे। जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन की ओर से 2009 में जापानी निवेशकों के मध्‍य किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार विदेशी कारोबार संचालन के मामले में भारत दूसरा आशाजनक स्‍थान बना हुआ है।

जीडीपी विकास की अपनी तीव्रता बनाए रखने के लिए भारत को एफडीआई प्रवाह का आकार बड़ा बनाए ही रखना होगा। (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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