लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

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भाग दो से आगे

हमारी राष्ट्र की परिभाषा का मुख्य आधार संस्कृति है, जीवन मूल्य हैं, यह हम ऋग्वेद में देख चुके हैं। अथर्ववेद में‌ इसी‌ भावना का विस्तार है; इस के कुछ सूक्त इस परिभाषा को और सुदृढ़ करते हैं, जब वे जन मानस में मानसिक एकता तथा समानता का उपदेश देते हैं। अथर्ववेद के निम्नलिखित सूक्त राष्ट्र की‌ भावनात्मक एकता के लिये बहुत ही उपयोगी ज्ञान/ उपदेश देते है। वैसे तो यह ज्ञान मनुष्य मात्र की एकता का आह्वान करता है, किन्तु विभिन्न देशों की प्रतिद्वन्द्वता को देखते हुए तथा कुछ देशों के जीवन मूल्य इन भावनाओं के विपरीत होते हुए इऩ्हें हमारे राष्ट्र की रक्षा के लिये अनिवार्य शिक्षा मानना चाहिये ।

अथर्ववेद में मनों में समानता (सांमनस्यं) के होने पर बहुत बल दिया गया है। इच्छाओं, विचारों, उद्देश्यों, सकल्पों आदि की एकता के लिये जन मानस में‌ उनके मनों का द्वेषरहित होना, आपस में प्रेम भावना का होना आवश्यक है; निम्नलिखित सूक्त दृष्टव्य हैं :

अदार सृद भवतु सोमा स्मिन्यज्ञे मसतो मृअतान:।

मा नो विददभिमा मो अशस्तिमां नो विदद् वृजिना द्वेष्या या।। अथर्व १-२०-१

”हे सोमदेव! हम सबमें से परस्पर की फूट हटाने वाला कार्य होता रहे। हे मरूतो! इस यज्ञ में हमें सुखी करो। पराभव या पराजय हमारे पास न आवे। कलंक हमारे पास न आवे और जो द्वेष भाव बढ़ाने वाले कुटिल कृत्य है, वे भी हमारे पास न आयें।” यह दृष्टव्य है कि फ़ूट पड़ने के बीज हमारे भीतर पड़ते रहते हैं, किन्तु उऩ्हें हमेशा हटाते रहना है।

सं जानी ध्वं सं प्रच्य घ्वं सं वो मनोसि जानताम्।

देवा भागं यथा पूर्वे संजानाने उपासते। (अथर्व 6-64-१)

तुम समान ज्ञान प्राप्त करो, अर्थात शिक्षापद्धति में कोई भेदभाव न हो, क्योंकि शिक्षार्थी ज्ञान तो अपनी योगुअता तथा क्षमता के अनुसार अलग अलग प्राप्त करेंगे। समानता से एक दूसरे के साथ संबंध जोड़ो, समता भाव से मिल जाओ। तुम्हारे मन समान संस्कारों से युक्त हों। कभी एक दूसरे के साथ हीनता का भाव न रखो। जैसे अपने प्राचीन श्रेष्ठ लोक के समय ज्ञानी लोग अपना कर्तव्य पालन करते रहे, वैसे तुम भी अपना कर्तव्य पूरा करो।

समानो मंत्र: समिति समानी समानं व्रतं सहचित्तमेषाम।

समानेन वो हविषा जुहोमि समानं चेतो अभिसंविश्ध्वम् ।। (अथर्व 6-64-२)

तुम्हारे विचार समान हों अर्थात तुम्हारे लक्ष्य एक हों तथा उनके प्राप्त करने के लिये विचार भी एक समान हों। तुम्हारी सभा सबके लिए समान हो, अर्थात सभा में किसी के साथ पक्षपात न हो और सबको यथा योग्य सम्मान प्राप्त हो। तुम सबका संकल्प एक समान हो। तुम सबका चित्त एक समान-भाव से भरा हो। एक विचार होकर किसी भी कार्य में एक मन से लगो। इसीलिए तुम सबको समान छवि या मौलिक शक्ति मिली है।

समानी व आकूती: समाना हृदयानि व:।

समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।। (अथर्व 6-64-3)

तुम सबका संकल्प एक जैसा हो। तुम्हारा हृदय समान हो, तुम्हारा मन समान हो। तुममें परस्पर मतभेद न हो। तुम्हारे मन के विचार भी समता युक्त हों। यदि तुमने इस प्रकार अपनी एकता और संगठन स्थापित की तो तुम यहां उत्तम रीति से आनंदपूर्वक रह सकते हो और कोई शत्रु तुम्हारे राष्ट्र को हानि नही पहुंचा सकता है।

सहृदयं सामनस्यम् विद्वेषं कणोमि व:।

अन्यो अन्यभाभिहर्यत वत्सं जातमिवाघ्या।। (अथर्व. ३-३०-१)

तुम्हारे हृदय में समानता हो, मनों में द्वेष न हों, सब परस्पर स्नेह करें जैसे एक गौ अपने नव जात बछड़े को करती है । समानता की अवधारणा कठिन है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई छोटा और बड़ा नहीं होता, सब बराबर हैं। छोटे और बड़े तो अपने कर्मों के अनुसार होते ही‌ हैं। किन्तु समानता का अर्थ है कि बिना पक्षपात के, सब के साथ उनकी‌ क्षमता, योग्यता तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुसार व्यवहार करना।

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षमा स्वसारमुत स्वसा।

सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।। अथर्व 3-३०-३

भाई भाई से द्वेष न करें, बहन बहन से द्वेष न करें। एक विचार वाले होकर और एक कर्म वाले होकर हम सब आपस में बातचीत एवं व्यवहार करें। यहां जो मनों की एकता बतलैइ गई है, वही एकता पूरे समाज के साथ रखना है।

ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः ।

अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्वः संमनसस्क्र्णोमि । । अथर्व।३-३०-५

बड़ों की छत्र छाया में रहने वाले एवं उदारमना बनो । कभी भी एक दूसरे से पृथक न हो। समान रूप से उत्तरदायित्व को वहन करते हुए एक दूसरे से मीठी भाषा बोलते हुए एक दूसरे के सुख दुख मे भाग लेने वाले ’एक मन’ के साथी बनो ।

समानी प्रथा सहवोउन्नभाग समाने योक्तें सहवो युनज्मि।

समयञ्चो अग्निं समर्यतारा नाभिमिवा मित:।। (अथर्व. ३-३०-६)

’ तुम्हारे जल पीने का स्थान एक हो और तुम्हारे अन्न का भाग भी साथ साथ हो। मैं तुम सबको एक ही जुए में साथ साथ जोड़ता हूं। तुम सब मिलकर ईश्वर की पूजा करो। जैसे पहिए के अरे केन्द्र स्थान में जुड़े रहते हैं, वैसे ही तुम भी अपने समाज में एक दूसरे के साथ मिलकर रहो।’ यह महत्वपूर्ण है कि सभी‌ का खाना – पीना और पूजा साथ साथ हो, क्योंकि ऐसे कार्यों से स्नेह बढ़ता है, भेदभाव घटता है, जो यदि हो तो स्पष्ट दिख जाता है। इन मंत्रों से स्पष्ट है कि खान पान तथा पूजा में‌ जो भेदभाव आज हमारे व्यवहार में आ गए हैं वे हमारे धर्मग्रन्थों की‌ महानता तथा किऩ्हीं कारणों से हो गए हमारे भ्रष्ट आचरण को दिखलाते हैं। यह समानता और एकता वैसी‌ है जैसी कि एक पहिये के अरे पहिये में अलग अलग स्थान पर होने के बाद भी वे पहिये को अपनी पूरी शक्ति देते हैं।

सध्रीचीनान् व: संमनसस्कृणोम्येक श्नुष्टीन्त्संवनेन सर्वान्।

देवा इवामृतं रक्षमाणा: सामं प्रात: सौमनसौ वो अस्तु।। (अथर्व. ३-३०-७)

तुम परस्पर सेवा भाव से सबके साथ मिलकर पुरूषार्थ करो। उत्तम ज्ञान प्राप्त करो। योग्य नेता की आज्ञा में कार्य करने वाले बनो। दृढ़ संकल्प से कार्य में दत्त चित्त हो तथा जिस प्रकार देव अमृत की रक्षा करते हैं। इसी प्रकार तुम भी सायं प्रात: अपने मन में शुभ संकल्पों की रक्षा करो।

क्रमश: सं वो मनांसि सं व्रता समाकूती न मामसि।

अभी ये विव्रता स्थान तान्व: सं नयमामसि।। अथर्व 3-8-5

तुम अपने मन एक करो। तुम्हारे कर्म एकता के लिए हों, तुम्हारे संकल्प एक हों, जिससे तुम संघ शक्ति से युक्त हो जाओ। जो ये आपस में विरोध करने वाले हैं, उन सबको हम एक विचार से एकत्र हो झुका देते हैं।

दत्ते दहं मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।

मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य समीक्षामहे।।शुक्ल यजुर्वेद ३६-१८.

सब व्यक्ति मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सभी व्यक्तियों को मित्र की दृष्टि से देखूं। सभी परस्पर मित्र की दृष्टि से देखा करें। हे दृढ़ता के देव ! आप हमें दृढ़ता दीजिये।

 

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3 Comments on "भारत की सही पहचान – ३"

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डॉ. मधुसूदन
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आदरणीय तिवारी जी
बहुत बहुत सुन्दर।
धन्यवाद।

संगच्छद्धव संवद्ध्वं —– आपसे कहीं अन्य भाग में लिया गया है?

Anil Gupta
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भाग २ मैंने पढ़ा था,लेकिन भाग १ कहीं नहीं मिला,कृपया बतायें।

डॉ. मधुसूदन
Guest

अनिल जी निम्न कडी पर आप को भाग एक मिल जाएगा।
http://www.pravakta.com/the-true-identity-of-india-part-1

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