लेखक परिचय

ललित कुमार कुचालिया

ललित कुमार कुचालिया

लेखक युवा पत्रकार है. हाल ही में "माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता विश्विधालीय भोपाल", से प्रसारण पत्रकारिता की है और "हरिभूमि" पेपर रायपुर (छत्तीसगढ़) में रिपोर्टिंग भी की . अभी हाल ही में पत्रकारिता में सक्रीय रूप से काम कर है

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महात्‍मा गांधी अन्‍तरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में विदेशी शिक्षकों के लिए हिंदी प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन ३१ अक्टूबर को प्रारंभ हुआ। दस दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला में देश के हिंदी विशेषज्ञ इन विदेशी शिक्षकों को हिंदी की बारीकियों के बारे में बताएंगे। कार्यशाला में हिस्सा लेने आईं रूस की इंदिरा गाजिएवा,जो रूस के रुसी मानवीय सरकारी विवि में हिंदी पढ़ाती है। इस खास मौके पर एम. फिल. जनसंचार के शोधार्थी ललित कुमार कुचालिया ने इंदिरा गाजिएवा से बातचीत की। उसी के कुछ अंश –

 

प्रश्न – रूस में हिंदी के प्रति युवाओं में किस तरह की लोकप्रियता है?

उत्तर – जहां तक लोकप्रियता का सवाल है सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहती हूँ रुसी लोगों को भारतीय संस्कृति अच्छा लगना, दूसरा दोनों देशों के आपसी मैत्री संबंध अच्छे होना, ये दोनों ही बाते उनको भाती है। लेकिन रुसी लोग जब भारत आते हैं चाहे टूरिस्ट के उद्देश्य से आए, चाहे व्यापार के उद्देश्य से आए या फिर पढ़ाई के उद्देश्य से भारत आए तो कहीं न कहीं ये सब चीजें उनको अपनी और आकर्षित करती है। इसीलिए वहां के युवाओं में हिंदी के प्रति काफी लोकप्रियता बनी हुई है।

प्रश्न – सोवियत संघ के दौरान रूस में हिंदी और उर्दू के काफी स्कूल थे लेकिन अब क्या स्थिति है?

उत्तर – देखिए जब से सोवियत संघ का विघटन हुआ है तब से स्थिति में काफी सुधार आया है। इससे पहले रूस के कई स्कूलों में हिंदी, उर्दू पढ़ाई जाती थी लेकिन अब इनके अलावा भारत में बोली जाने वाली तमिल, तेलगू, बंगला, और मराठी भाषाएं रूस के छ: विवि में पढाई जाती है। आप देखिए कि सोवियत संघ के विघटन होने बाद कितनी भाषाएं रूस में पढाई जाने लगी जबकि पहले ऐसा संभव नहीं था। और मैं तो मानती हूँ कि रूस के लिए यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

प्रश्न – रूस में हिंदी को पढ़ाने के लिए हिंदी व्याकरण – अनुवाद के किस ढांचे का उपयोग किया जाता है ?

उत्तर – रूस में हिंदी पढ़ाने के लिए इतने टीचर ही कहां थे। कम ही लोग थे जो हिंदी साहित्य के बारे जानकारी रखते थे लेकिन आज भी हिंदी पढ़ाने के हिंदी साहित्य का सहारा लिया जाता है। कुछ वर्षों में हिंदी व्याकरण और अनुवाद का ढांचा एक मौखिक रूप धारण का चुका है। लोग मौखिक ही बोलना चाहते हैं, लिखना नहीं इसीलिए रुसी के युवा 6 महीने या एक साल में ही हिंदी सीखने की लालसा रखते हैं। एक तरह से देखा जाए तो हिंदी सीखने को लेकर उनमे होड़ मची है। हिंदी पढ़ाने के लिए पाठ्य पुस्तक अमेरिका, ब्रिटेन से मंगाई जाती है लेकिन जो किताबें रुसी विद्वानों द्वारा लिखी गई उनकी हिंदी कुछ अलग ही तरह की है जिसको पढ़ाने में दिक्कत आती है लेकिन अब ऐसा नहीं है।

प्रश्न – रुसी मीडिया का हिंदी भाषा के प्रति क्या नजरिया है?

उत्तर – कोई ऐसी खबर, सूचना, जानकारी है कि हिंदी विश्व भाषा होनी चाहिए। मैं एक हिंदी टीचर होने के नाते इस बात से सहमत हूँ कि या फिर मेरी दूसरी राय है कि भविष्य में शुद्ध इंग्लिश और हिंदी नहीं चलने वाली। बल्कि हिंग्लिश भाषा प्रचलन में आएगी, जिसको इंग्लिश और हिंदी से मिलाकर बनाया जायेगा। शुद्ध हिंदी तो साहित्य में ही सिमट कर रह जाएगी। हिंग्लिश का ही भविष्य उज्जवल है। बीस सालों के दौरान रुसी भाषा एकदम परिवर्तन आया है। क्योंकि ये सब सूचना तकनीकी क्रांति की देन है। आप देखेंगे रुसी मीडिया में हर महीने हिंग्लिश भाषा के शब्द देखने और सुनने को मिल जायेंगे। वहां की न्यूज़ पेपर, इंटरनेट न्यूज़ पोर्टल और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में भी हिंग्लिश के शब्द काफी प्रचलित हैं।

प्रश्न – भारतीय खबरों को रूस में किस तरह से पेश किया जाता है ?

उत्तर – जब तक सोवियत संघ था तब वहां पर कम्युनिस्ट न्यूज़ पेपर चलता था जिसका नाम “जनयुग” था, जो ज्यादातर भारतीय खबरों को प्राथमिकता देता था। लेकिन उस न्यूज़ पेपर को केवल वही लोग पढ़ते थे जो हिंदी पढना और बोलना जानते थे। हाल ही में रूस में इस तरह का कोई न्यूज़ पेपर नहीं है जो भारतीय खबरों को प्राथमिकता दे। भारत में जब से टीवी की शुरुआत हुई उसी दौरान से भारतीय खबरों को इंटरनेट के ज़रिए उठाकर दिखाया जाता है।

प्रश्न – सितम्बर 2011 में पंद्रह छात्र हिंदी सीखने के लिए भारत आए, क्या उनका उद्देश्य सिर्फ नौकरी पाना है कि फिर रूस में जाकर हिंदी को बढ़ावा देना ?

उत्तर – जिन पंद्रह छात्रों की बात आप कर रहे है वो मेरे ही छात्र हैं, जिनको मैंने हिंदी में बीए करने लिए भारत भेजा है, कुछ छात्रों ने दिल्ली विवि और कुछ ने हैदराबाद विवि में दाखिला लिया है। मैं हर चार साल के बाद अपने छात्रों को हिंदी सिखाने के लिए भारत भेजती हूँ। और रही बात उद्देश्य की, तो हर छात्र हिंदी सीखने के लिए अलग – अलग उद्देश्य लेकर भारत आता है। मैं देखती हूँ कि यहाँ की शिक्षा पाकर उन्हें अच्छा लगता है और इस बार रूस से कुछ छात्र हिंदी में एम.फिल. करने के लिए भारत आए हैं।

प्रश्न 7 – भारत की कला संस्कृति से आप कितनी प्रभावित हैं?

उत्तर- भारतीय कला संस्कृति के बारे में बयां कर पाना थोड़ा मुश्किल है। विषय ही इतना बड़ा है। वैसे हर हफ्ते मास्को के रूसी-भारतीय सांस्कृतिक संगठन “दिशा”, भारतीय दूतावास, सेंट्स पिटरबर्ग में भारतीय कला संस्कृति के कार्यक्रमों को हम लोग देखने के लिए जाते है। जो लोग नृत्य, कलाकार वहां आते हैं। उनको देखते हैं, उनके बारे में पढ़ते हैं। उनसे काफी कुछ सीखने को मिलता है। अभी एक दो महीनों से मास्को में कला संस्कृति के कार्यक्रम हो रहे है भारत के अलग – अलग प्रदेशों के कलाकार वहां पर कार्यक्रम की प्रस्तुति दे रहे हैं।

प्रश्न – भारत- रूस के संबंध के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी ?

उत्तर – देखिए, हम दोनों देश हमेशा से एक भाई – बहन की तरह हैं। रुसी लोग, जो अब सोवियत संघ में चले गए है वो भी भारत को काफी मानते है। जब हम लोग जनवरी में गोवा घूमने, हिंदी दर्शन सीखने या नृत्य सीखने के लिए यहाँ आते है तो हम आपने आपको कहीं न कहीं भारत से जुड़ा हुआ पाते हैं। इसीलिए मैं कहूँगी कि भारत और रूस के संबंध हमेशा से अच्छे हैं।

प्रश्न – प्रवक्ता डॉट कॉम से बातचीत करने के लिए आपने समय निकला, इसके लिए आपका बहुत – बहुत शुक्रिया।

उत्तर- जी धन्यवाद।

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