लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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हरिकृष्ण निगम

 

क्या बंग्लादेशियों से भारत के अनेक नगरों व सीमावर्ती क्षेत्रों में अरसे से योजनाबध्द रूप से होने वाली घुसपैठ पर हमारी राजनीतिक उपेक्षा नए जनसांख्यिक दबाव डालकर असम को मुस्लिम बहुल प्रदेश बना सकती है और हमारे महानगरों को भी असुरक्षित बना देगी? सारे देश में ये घुसपैठिए जैसे-जैसे फैलते जा रहे हैं, हमारी सरकार व राजनेताओं का ढुलमुल रवैया, ऐसा प्रतीत होता है, अपने वोट बैंक बढ़ाने के कारण उन्हें भारत का नागरिक बनाने हेतु भी सक्रिय है। एक आंकड़े के अनुसार लगभग 3 करोड़ से अधिक बंग्लादेशी देश में अवैध रूप से घुसे हैं और यह सिलसिला आज भी चल रहा है। सर्वाधिक शर्मनाक बात यह है कि इस पूरी-गैर कानूनी प्रक्रिया में हमारे अनेक राजनीतिकबाज और बुध्दिजीवी उनके मानवीय संघर्ष और अच्छी जिंदगी की ललक के नाम पर इसे तर्क-सम्मत ठहरा रहे हैं और इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि आतंकवादी संगठन उन्हें मोहरों की तरह प्रयुक्त करते हैं। क्या विश्व के किसी भी देश में, जानने पर भी क्या किसी देश की विदेशी नागरिक को एक दिन के लिए भी रहने दिया जा सकता है? यह विडंबना है कि आज भी इस व्यापक अवैध घुसपैठ में सरकारी संगठन और व्यवस्था स्वयं आंखों पर पट्टी बांधने को तैयार हैं। चाहे आसाम का करीमगंज हो या बिहार का किशनगंज इनकी जनसंख्या का दबाव व घनत्व स्पष्ट हैं। एक आकलन के अनुसार ये अवैध बंग्लादेशी पूर्वोत्तर भारत के लगभग 20 लोकसभा क्षेत्र तथा 100 विधान सभा क्षेत्रों के चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। यहां के सामाजिक जीवन को भी ये विदेशी नागरिक प्रदूषित कर रहे हैं। उग्रवादियों से मिलकर वे बड़ी आसानी से पाकिस्तानी मुद्रित भारतीय मुद्रा और हथियार भेजते रहते हैं। सरकार तो इतनी असहाय और मूकदर्शक सी बनी हुई है कि उन्हें विदेशी नागरिकों के अधिनियम के अंतर्गत नोटिस भी नहीं दिए जाते हैं। सरकार की दृष्टि में सीमाबंद करना या बाड़ लगाकर अवैध घुसपैठ की समस्या हल की जा सकती है। पर न राजनैतिक इच्छाशक्ति है और न ही भौगोलिक दृष्टि से सीमा बंद करने का समाधान और इसलिए शायद हम कुछ कर सकेंगे जब तक पानी सिर से ऊपर न हो जाए।

 

हाल में बंग्लादेश से मुंबई तक के अवैध सफर की प्रक्रि्रया और इस महानगर पर पड़नेवाले संभावित खतरे का आकलन एक सर्वेक्षण में किया गया था। उसी का सारांश देने का प्रयास किया गया है। मुंबई में आनेवाले 90 प्रतिशत से अधिक बंग्लादेशी यहां पहले से रह रहे बंग्लादेशी, उनसे जुड़े दलालों और भ्रष्ट शासन के सहयोग से आकर अपनी रिश्वत देने की क्षमता के कारण राशनकार्ड अथवा पहचान-पत्र आदि बनवाने में भी सफल हो जाते हैं। उनकी प्रारंभिक यात्रा दलालों के संपर्क से जैसे ही वे पश्चिम बंगाल की सीमा में पहुंचते है, हावड़ा स्टेशन से सीधे मुंबई आनेवाली ट्रेनों में सवार होकर थाणे या क्षत्रपति शिवाजी टर्मिनल के लिए रवान होने से शुरू होती है।

 

मुंबई में रह रहे कई बंग्लादेशियों ने पुलिस को बताया कि दलाल प्रति व्यक्ति 2.5 हजार रूपये लेता है। यह रेट हाल ही में बढ़ा है। पहले दो हजार था। दलाल एक अकेले व्यक्ति की बजाय ज्यादा से ज्यादा लोगों को ले जाना पसंद करता है। ज्यादा लोग ज्यादा दलाली। सात से आठ साल की कम उम्र के बच्चों का कोई पैसा नहीं लगता क्योंकि इनका ट्रेन टिकट नहीं लगता। अपने बार्डर पर यह दलाल पहले बंग्लादेशी राईफल्स को 600 रूपये देता है। इसके बाद हीं बंग्लादेशी बॉर्डर पार करने दिया जाता है। अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर वह इन लोगों को सीमा पार करवाने में कामयाब हो जाता है। भारत में पहुचकर स्थानीय बसों द्वारा ये लोग हावड़ा तक पहुंचते हैं। यहां से ये मुंबई आने वाली ट्रेनों में सवार हो जाते हैं। मुंबई पहुचकर दलाल इन लोगों को ऐसे इलाकों तक पहुंचा देता है जहां पहले से ही बंग्लादेशी मुस्लिम बहुल इलाके में होते हैं। पहले से बसे ये बंग्लादेशी नए आये लोगों को रोजगार दिलवाने में पूरी मदद करते हैं। जिन इलाकों में बंग्लादेशी रहते हैं वहां दलाल नियमित रूप से चक्कर लगाते रहते हैं ताकि जिन्हें वापस जाना हो उनको दलाल आसानी से मिल जाए। बंग्लादेश से मुंबई तक के पूरे सफर के दौरान ये दलाल लगातार इनके साथ ही रहता है। एक और दलाल है जो इनके द्वारा यहां कमाए हुए रूपये इनके घर(बंग्लादेश)तक पहुंचाता है। किसी तरह की मुसीबत पड़ने पर ये दलाल इनके घरों से पैसा यहां तक पहुंचाते हैं। ये पूरा लेन-देन हवाला के जरिए संपन्न होता है। हवाला की जरूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि ये गैर-कानूनी बांग्लादेशी भारत के किसी भी बैंक में खाता नहीं खुलवा सकते। हवाला की प्रक्रिया इतनी मजबूत और तीव्र है कि मुंबई से बंग्लादेश या बंग्लादेश से मुंबई यह पैसा केवल 10 मिनट में पहुंच जाता है।

 

नई दिल्ली में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ विषय पर कई वर्ष पहले हुए सम्मेलन में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ध्यान महाराष्ट्र में बढ़ रही बंग्लादेशियों की जनसंख्या की ओर खींचने का पूरा प्रयास किया था ऐसा करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह हमें आतंकवादी और आई.एस.आई के एजेंटों की गतिविधियों पर पूरा ध्यान देना चाहिए(जो मौका मिलते ही देश की आर्थिक राजधानी को निशाना बनाते हैं) उसी तरह हमें बंग्लादेशियों के मसले को नजर-अंदाज नहीं करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से इस मसले पर गुहार लगाई थी। इसी तरह महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्यमंत्री आर. आर. पाटिल ने भी डांस बारों का बंद कराना जायज ठहराया था और सफाई दी थी कि इन बारों में अधिकांशतः बांग्लादेशी लड़कियां काम करती है। भाजपा चाहती है कि केंद्र सरकार इस समस्या को हल करने हेतु कोई ठोस कदम उठाये हालांकि कांग्रेस पार्टी की प्रतिक्रिया मिली जुली रही है। कांग्रेस के अधिक तर नेता बांग्लादेशी समस्या से वाकिफ हैं पर कुछ ऐसे नेता भी हैं जिनका मानना है कि इससे पार्टी की छवि अल्पसंख्यकों में खासतौर पर मुसलमानों में खराब होगी।

 

महाराष्ट्र में बांग्लादेशियों की धरपकड़ सिर्फ सांकेतिक और सतही रही है। यद्यपि उनसे खतरे से वे अवगत हैं। महाराष्ट्र गृह मंत्रालय ने बताया कि वर्ष 2004 में मुंबई में सिर्फ 626 बंग्लादेशी पक ड़े गये थे। स्पेशल ब्रांच के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 सालों में मात्र 5 हजार बांग्लादेशियों को पकड़कर वापस बांग्लादेश भेज दिया गया था। सन् 1995 से 2007 तक मात्र एक हजार के आसपास बांग्लादेशी पकड़े गये थे। इसमें सर्वाधिक संख्या 897 बांग्लादेशियों को 1996 में पकड़ा गया था और न्यूनतम संख्या में 266 को 2001 में पकड़ा था। कुछ समय पहले पुलिस ने भांयखाला स्टेशन से पकड़ा था इसमें से अधिकांश को वे बांग्लादेश लौटाने का दावा करते हैं पर तुरंत बाद उनमें से ही अनेक और दूसरे अनेक बांग्लादेशी बेहिचक फिर मुंबई, ठाणे व पूणे आ जाते हैं।

 

कुछ प्रसिध्द सक्रिय समाजसेवी हैं, उन्होंने बताया कि इनकी बढ़ती आबादी के खिलाफ सत्ता में कांग्रेस तथा एनसीपी ने आवाज उठाई है। शिवसेना तो समय-समय पर बोलती ही है। बांग्लादेशी उन जगहों को अपना अड्डा बनाते हैं जहां मुसलमान समुदाय की आबादी अधिक होती है। तो क्या इसका मतलब है कि बांग्लादेशियों क ो भारतीय मुसलमान शरण दे रहे हैं? लेकिन यह भी सच है कि लोकशाही में भ्रमों को ज्यादा और सच्चाई को कम महत्व मिलता है। इस बात का बोध हमारे नेता मंत्रियों को सबसे ज्यादा हैं जिस तरह शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे, मनसे नेता राज ठाक रे के साथ मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख मुंबई में स्वयं बांग्लादेशियों के खिलाफ औपचारिक बयानबाजी करते हैं पर लगता है कुछ करना नहीं चाहते। इनके कारण देश में इनकी भीड़ लगातार बढ़ रही है। हालांकि ऐसा कहीं होता हुआ नजर नहीं आता लेकिन हमारी चिंता करने वाले नेताओं को साफ नजर आता है। ऑफिशियल रिकॉर्ड बताते हैं कि सन् 2004 में 626 बांग्लादेशी मुंबई में थे। मुंबई की 1 करोड़ की आबादी सिर्फ 626 बांग्लादेशी? और नेताओं की मानें तो यह संख्या बहुत ही खतरनाक है। दरअसल, सच्चाई यह है कि बांग्लादेशी तो नहीं लेकिन हमारे भ्रष्ट सरकारी अधिकारी देश के लिए असली खतरा हैं ।

 

आज मुंबई की सन् 2006 में पश्चिमी रेलवे के सीरियल बम विस्फाेंटों की शृंखला को लोग भूल चुके हैं पर उसमें भी उस समय के समाचार पत्रों में बांग्लादेशी आतंकवादियों की बात उठी थी। 11 जुलाई, 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेन में हुए बम विस्फोटों में लगभग 200 लोगों की जान चली गई थी। कहते हैं कि इन विस्फोटों में बांग्लादेशी आतंकवादियों का भी हाथ था। मुंबई पुलिस एंटी-टेरेरिस्ट स्क्वॉयड के प्रमुख के. पी. रघुबंशी ने बताया था कि कई बांग्लादेशी नागरिक कानूनी तौर पर भारत घूमने आते हैं और फिर अचानक गायब हो जाते हैं ओर फिर उनका कोई सुराग नहीं मिलता। इन्होंने यह भी बताया था कि 11 जुलाई बम विस्फोट की तफतीश में पकड़े गए कमल अंसारी और मोहम्मद मजीन ने आतंकवदियों को भारत-बंग्लादेश बॉर्डर पार कराकर मुंबई तक पहुंचाया था। इन्हीं आतंकवादियों का हाथ 11 जुलाई के बम विस्फोटों में भी था।

 

मुंबई में झोपड़ी का फैलाव एक नासूर है। यहां झोपड़ियों की समस्या इतनी जटिल है कि आजादी के बाद से आज तक कोई भी सरकार इसे खत्म नहीं कर सकी है। ऐसे में गैर-कानूनी तौर पर रह रहे बांग्लादेशियों के लिए झोपड़पटि्टयां फायदे का सौदा साबित होता है। जिन लोगों ने सरकारी और निजी जमीन पर कब्जा करके 1995 से पहले झोपड़ियां बनाई थी उन लोगों को वहां से हटाकर सरकार पुनर्वसन करने की तैयारी में रहती है। इन जगहों पर एक बड़ा प्रतिशत बांग्लादेशी रहता है। गैर-कानूनी ढंग से रहने वाले बांग्लादेशियों के जिन ठिकानों पर छापे पड़े थे उनमें डोंगरी, पायधुनी, मस्जिद रोड, चीता कैं प, ट्रांबे, लालभाटी और वडाला मुख्य थे पर हाल में नए दर्जनों स्थानों का नाम भी लिया जा रहा हैं। जिनमें उत्तर-पूर्वी मुंबई के एकता नगर, चिखलवाड़ी, साईबाबा नगर, गोंवडी और मानखुर्द भी है।

 

केंद्र जानता है कि जो स्थिति मुंबई में है, अवैध बांग्लादेशी कि उपस्थिति दूसरे प्रांतों में उससे कहीं बुरी है। भारत और बांग्लादेशी के बीच करीब 1600 कि. मी. की खुली सीमा है। समुद्री सीमा भी बांग्लादेश के साथ लगती है। बांग्लादेश के अलावा पश्चिम में बंगाल की सीमा नेपाल, भूटान और सिक्किम से भी सटी हुई है। उत्तर पूर्व के भारत विरोधी तत्वों को हथियार प्राप्त करने के लिए यह सुरक्षित अभयारण्य है। इस चौराहे पर पशु तस्कर, आई. एस. आई. एजेंट, हथियारों के सौदागर, मादक पदार्थों और जाली नोटों के तस्कारों के साथ-साथ आतंकवादियों की सरगर्मी भी चलती रहती है। बिहार, नेपाल सीमा के दोनों ओर मुस्लिम जनसांख्यिक दबाव स्पष्ट है और रक्सौल, जयनगर, निर्मली, पूर्णिया, किशनगंज तथा जोगबनी, अटरिया, कटिहार आदि जगह में नए मुस्लिम पाकेट बन चुके हैं। वहां के स्थानीय प्रशासन द्वारा स्वीकार किया जा चुका हैं कि वहां कुल 15 लाख बंग्लादेशी मुसलमान बस गए हैं। उनके संबंध महानगरों के कई आपराधिक संगठनों से भी जुड़ते जा रहे हैं। एक ओर तुष्टीकरण की नीति तो दूसरी ओर वोटबैंक की लोलुपता ने आज भी राजनीतिबाजों की आंखों पर पटि्टयां बांध दी हैं।

 

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