लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under आर्थिकी.


आज जनता बेहाल है। बढ़ती कीमतों से वह परेशान है। जीवनावश्यक खाद्यान्नों के दामों में मानों जैसे आग लगी है। कीमत थमने का नाम ही नहीं ले रही है। रोज की सुबह बढ़ते दामों के समाचार पढ़कर ही शुरूआत होती है। कल के दामों के हिसाब से पैसे लेकर बाजार में जाए, तो गणित गड़बड़ा जाता है। 100 रूपए प्रति किलो अरहर की दाल, 80 रूपए प्रति लीटर तेल, 44 रूपए प्रति किलो चीनी, 20 रूपए प्रति किलो आटा, चाय पत्ति 200 रूपए प्रति किलो, पैट्रोल 45-50 रूपए प्रति लीटर और डीज़ल 32-38 रूपए प्रति लीटर यह सब मानों अजब देश की गजब कहानी है। किसी ने सपने में भी इतने दाम होने के बारे में नहीं सोचा होगा।

महंगाई के अनेक गंभीर परिणाम हैं। सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 70 फीसदी लोगों की आय प्रतिदिन 20 रूपए से कम है। ऐसे में गरीब तबके के लोग इस महंगाई के दौर में क्या खाएंगे और कैसे रहेंगे? पहले से अपने देश में कहा जाता है, ”दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ”। लेकिन, अब दाल-रोटी खाना ही गरीब के लिए मुश्किल हो गया है। मध्यम वर्ग के घरों से भी सब्जी, फल, दूध गायब हो रहा है। महंगाई लोगों की वास्तविक आय को घटाती है। जीवन यापन पर विपरीत परिणाम डालती है। गरीब वर्गों में कुपोषण बढ़ता है। महंगाई में ऐसी आग क्यों लगती है?

अर्थशास्त्र के अनुसार वस्तुओं दाम तभी बढ़ने चाहिए जब उसकी आपूर्ति कम होगी। और अगर आवश्यकता से ज्यादा आपूर्ति होगी तब दाम घटते है। अर्थशास्त्र में इसी को ”मांग-आपूर्ति का सिध्दांत” कहते है। लेकिन, अपने देश में लगता है यह सिध्दांत भी काम नहीं करता है। आपूर्ति ज्यादा होने पर भी दाम बढ़ते है। ऐसा उल्टा-पुल्टा क्यों होता है?

कांग्रेस सत्ता में आई की महंगाई बढ़ी

इसके अनेक उत्तर है, जिसकी हम चर्चा करेंगे। लेकिन, लोगों का यह अनुभव है कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में आई है महंगाई बढ़ती है और जब-जब भाजपा की सरकार आई है महंगाई घटती है।

सन् 1970 से महंगाई बढ़ने लगी है। लोगों का जीना हराम हुआ। तब कांग्रेस सत्ता में थी। 1977 में जनता सरकार आई और महंगाई गायब हो गई। लोगों के लिए यह अनुभव चमत्कार जैसा ही था।

सन् 1980 में कांग्रेस सत्ता में आई और फिर महंगाई बढ़ने लगी। 1989 तक लगातार महंगाई बढ़ती ही रही। लोग बेहद परेशान हुए। 1989 में सत्ता बदलते ही महंगाई एकदम कम हो गई।

सन् 1991 में कांग्रेस फिर सत्ता में आई और फिर महंगाई की कहानी शुरू हो गई। महंगाई को झटका लगा तभी जब श्री अटल जी ने 1998 में सत्ता संभाली। 1998 से 2004 तक इन छह वर्षों में महंगाई की चर्चा भी नहीं हुई। बाजार में सभी वस्तुओं का भंडार लबालब था। सरकारी गोदाम भी भरे हुए थे और बाजार में प्रत्येक वस्तु आसानी से उपलब्ध थी। राशन और बाजार के दामों में ज्यादा अंतर नहीं था। आज भी लोग याद करते है कि महज छह साल पहले जो दाल 30 रूपए में मिलती थी, अब 100 रूपए की हो गई है। 2004 में तेल 35 रूपए था, आज 80 रूपए हो गया है। श्री अटल जी के समय में आटा 10 रूपए था, आज 20 रूपए हो गया है। एनडीए के समय में चावल 10 रूपए था, आज 40 रूपए हो गया है। भाजपा की सरकार में चाय पत्ति 100 रूपए में मिलती थी, अब 200 रूपए हो गई। उस समय पेट्रोल 30 रूपए और डीज़ल 20 रूपए में मिलता था, आज पेट्रोल के दाम 45-50 और डीज़ल के 32-38 रूपए हो गए। बेसन जो 20 रूपए में मिलता था, आज उसी के लिए 60 रूपए चुकाने पड़ते है।

दो सरकारों की यह दो कहानियां है। आज जो महंगाई बढ़ी है इसका कारण कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की नीतियां है। कांग्रेस सट्टोरियों, सट्टेबाजों, मुनाफाखोरों और मील मालिकों की चिंता करती है। किसान को भी मारती है और ग्राहक को तो लूटती ही है। कांग्रेस चुनाव में वोट किसान और ग्राहक से लेती है, लेकिन सत्ता में आते ही सट्टोरियों, मुनाफाखोरों और मील मालिकों को फायदा पहुंचाने की नीति अपनाती है। इनकी मिलीभगत का नुकसान जनता को उठाना पड़ता है। जनहित विरोधी कांग्रेस की नीतियों का पर्दाफाश हम करेंगे। लेकिन, एक बात साफ है कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में आती है महंगाई बढ़ती है और जब-जब भाजपा सत्ता में आती है तब-तब महंगाई गायब होती है।

मीठी चीनी की कड़वी कहानी

उदाहरण के तौर पर अभी चीनी के दामों में जो आग लगी है, उसके कारण अगर समझेगें तो कांग्रेस और महंगाई का क्या नाता है इसकी पोल खुल जाएगी। देश को हर साल 220 लाख टन चीनी की जरूरत है। इस साल देश में 240 लाख टन चीनी उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में चीनी के दाम बढ़ने नहीं चाहिए। लेकिन बढ़ रहे है। जनवरी 2010 के पहले 10 दिनों में दाम 10 रूपए प्रति किलो बढ़े। हां, यह सही है कि पिछले और इस वर्ष में गन्ने की खेती कम हुई है और गन्ने की उपलब्धता में कमी आई है। लेकिन, हमें भूलना नहीं चाहिए कि 2 साल पहले जब किसान 120 रूपए प्रति क्विंटल दाम की मांग कर रहा था, तब यूपीए सरकार ने देशभर में आंदोलनकारी किसानों को दाम देने की बजाए उन पर लाठियां बरसाई। गन्ने की खेती किसान के लिए नुकसानदायी हो गई। और इसके परिणामस्वरूप किसानों ने गन्ने की बजाए दूसरी फसलों की ओर रूख किया।

महंगाई का असली गणित लोगों को पता होना चाहिए। इस साल जो चीनी हम 44 रूपए में खरीद रहे हैं, वह पिछले साल की निर्मित है। पिछले साल किसानों को 160 रूपए दाम मिला था। चीनी का निर्माण, यातायात, विभिन्न कर, मील मालिक-थोक व्यापारी, खुदरा व्यापारी इन सबका मुनाफा मिलाकर भी यह चीनी 25 रूपए में बाजार में मिलनी चाहिए। यह स्थापित गणित है। लेकिन, सरकार और सटोरिए तथा मुनाफाखोरों की अभद्र मिलीभगत के कारण जो चीनी 25 रूपए में मिलनी चाहिए, वह आज 44 रूपए में मिल रही है।

इस सरकार की हद तो यह है कि दाम कम करने की बजाए दाम कैसे बढ़ेगें यह बताने की होड़ मंत्रियों में लगी है।

यूपीए सरकार मार्च 2009 तक यह बताती रही कि देश में चीनी का अपार भंडार है और 2 साल तक कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। इसलिए सरकार ने चीनी निर्यात की इजाजत दी। 48 लाख टन चीनी 12 रूपए प्रति किलो की दर से निर्यात भी हो गई। अब पिछले 6 महीनों से सरकार को लगा कि चीनी की कमी होगी अब आयात करने का निर्णय किया। और कैसी विडंबना है कि आज वही चीनी 30 रूपए प्रति किलो की दर से आयात हो रही है। कुल 70 लाख टन चीनी आयात हो रही है।

यह नीति नहीं घोटाला है। अगर सही जांच होगी तो कांग्रेस सरकार की पूरी पोल खुल जाएगी। चीनी की कमी अचानक एक दिन में नहीं होती। गन्ने की कितनी बुआई होती है यह सरकार को एक साल पहले पता होता है। लेकिन, यह सरकार है कि जिसकी नीति निजी हित और भ्रष्टाचार है।

एक और विडंबना देखिए, यह विदेशी ग्राहक को 12 रूपए में चीनी बेचती है और देश के ग्राहकों को 44 रूपए में परोसती है।

आसमानी नहीं सुल्तानी है

मांग-आपूर्ति सिध्दांत के विपरीत अगर देश में महंगाई बढ़ रही है तो उसका कारण सरकार नीतियां है।

श्री अटल जी के समय सरकार किसान से गेहूं और चावल की खरीद करती थी। खाद्य निगम के सारे भंडार और गोदाम पूरे भरे थे। इससे सरकार दो काम कर सकी। पहले तो 4 करोड़ गरीब परिवारों को 35 किलो अनाज 2/- और 3/- रूपए की कम कीमत पर देने का एतिहासिक फैसला सरकार ने किया। यह केवल घोषणा मात्र नहीं थी, इस पर अमल भी हुआ। इससे गरीब को खाद्य सुरक्षा मिली। कुपोषण समाप्त हुआ और उसको बाजार में जाने की जरूरत नहीं पड़ी। दूसरा, जब कभी बाजार में दाम बढ़ने लगते थे, तब सरकार तुरंत हरकत में आकर अपने अपार भंडार से गेहूं या चावल बाजार में सीधे लाते थे। जिससे तुरंत दाम घटते थे और जनता महंगाई से बचती थी। सरकार अगर जनहित को ध्यान में रखकर काम करती है तो ऐसे निर्णय होते है।

लेकिन, कांग्रेसनीत यूपीए सरकार आते ही नाम की ही तरह सब उल्टा-पुल्टा हो गया। सरकार ने निजी कम्पनियों को किसानों से अनाज खरीदने की मोहलत दी। कारगिल, मोन्सेंटों जैसी विदेशी तथा रिलांयस, अडानि जैसी देशी कम्पनियों ने किसान को चार-आठ आने ज्यादा दाम देकर बहुत मात्रा में अनाज खरीद लिया। यूपीए सरकार के पहले चार साल सरकारी गोदाम खाली रहे और निजी गोदाम भरे रहे। फिर जो होना था वही हुआ। निजी गोदामों में भंडारण होता रहा बाजार में कृत्रिम कमी आई और दाम बढ़ने लगे। सरकारी गोदाम खाली होने से वह बाजार में प्रभावी रूप से हस्तक्षेप नहीं कर सकी, जिससे कीमतों को लगाम लगाया जा सकता था। सरकारी गोदाम खाली रहने से गरीब को भी 35 किलो प्रति माह अनाज मिलने की बजाए 15-20 किलो मिलने लगा। उसको भी बाजार में आना पड़ा और कीमतों में आग लगी। देखने की बात है कि प्रति व्यक्ति खाद्यान्नों की उपलब्धता में भारी कमी आई है। सरकार की नीतियों के कारण जहां प्रति व्यक्ति उपलब्धता 186 किलो थी वह आज मात्र 152 बनकर रह गई है।

महंगाई के लिए सरकार की नीतियां कैसे जिम्मेवार होती है इसका यह एक सबूत है। सरकार की नीतियां बड़े पैमाने पर महंगाई बढ़ाती या घटाती है। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की नीतियां जन-विरोधी होने के कारण यह महंगाई बढ़ रही है।

किसान मर रहा है, ग्राहक लूटा जा रहा है

महंगाई की चर्चा में कांग्रेस हमेशा तर्क देती है कि उनकी सरकार ने कृषि उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया और इस कारण थोड़ी सी महांगई लाज़मी है।

लेकिन, यह सच नहीं है।

पहला, पिछले 6 साल में कृषि के लागत मूल्य में बहुत अधिक बढ़ोतरी हुई है। बीज, खाद, दवा, पानी, बिजली, डीज़ल, पशु खाद्य ऐसे कृषि लागत के हर घटक के दाम बेतहाशा बढ़े हैं। खाद की ऐसी दुर्दशा हुई है कि खाद है कि जो मिलता नहीं। दुकानदार किसान को महंगी दवा खरीदने के एवज में ही खाद देता है यह सब किसानों का अनुभव है। मिश्र खाद की ऐसी किल्लत जानबूझकर तैयार की है कि खुले बाजार में यह नहीं मिलता लेकिन, काला बाजार में उपलब्ध होता है। किसानों ने खाद का ऐसा संकट पहले कभी अनुभव नहीं किया। यह कांग्रेस सरकार की देन है। विदेशी कम्पनियां हर साल बीज के नए-नए नमूने लाती है और किसानों से ज्यादा दाम एंठती है। केन्द्र सरकार की गलत नीतियों के चलते देशभर में बिजली की किल्लत है और किसान उसका भुग्तभोगी है। डीज़ल के दाम 20 रूपए से 32-38 रूपए करने का पाप भी इसी कांग्रेस सरकार का है। कांग्रेस सरकार ने दवा के दाम बेतहाशा बढ़ाने की छूट विदेशी कम्पनियों को दे रखी है, जिससे किसान मर रहा है। जब लागत के दाम इतनी मात्रा में बढ़ेगें तो न्यूनतम समर्थन मूल्य में होने वाली थोड़ी वृध्दि किसान को क्या न्याय देगी? इसलिए, कांग्रेस का यह दावा खोखला है। कागज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य में जो बढ़ोतरी हुई वह बढ़ती लागत खा गई। किसान को कोई मुनाफा नहीं हुआ इसलिए, वह हर साल फसल बदलने को मजबूर हुआ है। अगर सचमुच किसान को बहुत अच्छे दाम मिलते तो कर्ज के बोझ में हजारों की तादाद में वे आत्महत्या नहीं करते।

दूसरा, यह सरकार अगर चाहती तो स्वामीनाथन फार्मूला अपनाकर किसान को न्याय दे सकती थी। एनडीए सरकार में जब श्री राजनाथ सिंह मंत्री थे तो उन्होंने स्वामीनाथन कमिशन की नियुक्ति की थी। किसानों को जब तक लाभकारी मूल्य नहीं मिलता है, तब तक कृषि क्षेत्र तथा ग्रामीण भारत का उदय नहीं होगा, यह समझते हुए इस कमिशन की नियुक्ति हुई। स्वामीनाथन कमिशन ने किसान को न्याय देने के लिए एक लाभकारी मूल्य तय करने का एक क्रांतिकारी फार्मूला दिया है। इसके तहत समर्थन मूल्य के बजाए किसान लाभकारी मूल्य का हकदार है। ”लाभकारी मूल्य = लागत का खर्चा + 50 फीसदी”, यह वह फार्मूला है, जो किसान को मिलना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने इस फार्मूले को लागू करने के लिए कांग्रेस नीत यूपीए सरकार पर लगातार दबाव बनाया है लेकिन, अभी तक किसान के इस हक को सरकार ने मंजूरी नहीं दी है। किसान का स्थायी हित कांग्रेस के एजेंडे में नहीं है। सरकार ने स्वामीनाथन फार्मूला अपनाने की बजाय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की जगह उचित मूल्य (FRP) ऐसा नाम बदलने का खेल खेला। किसान को मारने का अपना मिशन जारी रखा।

तीसरा, इस सरकार की नीतियों की विडंबना देखो, देश के किसानों को जब गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 800 रूपए दिया जा रहा था, तब विदेशी किसान को 1600 रूपए दाम देकर गेहूं का आयात हो रहा था। पिछले साल अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य देशी किसान के लिए 23 रूपए है, जबकि विदेशी किसान को 56 रूपए दाम देकर आज दाल का आयात हो रहा है। पिछले साल माननीय लालकृष्ण आडवाणी जी के नेतृत्व में जब एक प्रतिनिधि मंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मिला तो उसने मांग की कि धान को 1000 रूपए समर्थन मूल्य देना चाहिए। तब प्रधानमंत्री ने कहा, ”इतना दाम देंगे तो चावल की कीमत बढ़ेगी”। आज वास्तविकता क्या है? किसान को धान के लिए 10 रूपए मिल रहे हैं और ग्राहक को चावल के लिए 40 रूपए चुकाने पड़ रहे हैं।

चौथा, अगर कृषि का विकास होना है तो पानी की सुरक्षित उपलब्धता जरूरी है। आजादी के 63 साल बाद देश की केवल 40 फीसदी खेती को सिंचाई का लाभ होता है। किसान को न्याय देने का यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है। सिंचाई का विस्तार न करने का यह पाप कांग्रेस का है।

पांचवा, कांग्रेस के एजेंडे में किसान का हित नहीं है। अभी सम्पन्न हुए संसद सत्र की शुरूआत में कांग्रेस सरकार ने गन्ना कीमत के बारे में एक अध्यादेश लाई। अभी तक राज्य सरकार किसान के लिए न्यायपूर्ण कीमत को घोषित करने का अधिकार रखती थी और मील मालिकों को उसी कीमत पर गन्न खरीदना पड़ता था। लेकिन, इस विचित्र अध्यादेश से सरकार ने यह घोषित किया कि अगर राज्य सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा कीमत घोषित करती है तो फर्क की रकम राज्य सरकार को चुकानी पड़ेगी। कैसा है यह कांग्रेस का खेल? गन्ना खरीदेगा मील मालिक, चीनी बनाएगा मील मालिक, चीनी बेचेगा मील मालिका, मुनाफा कमाएगा मील मालिक और रकम चुकाएगी राज्य सरकार। इस काले अध्यादेश का जमकर विरोध हुआ क्योंकि इसके रहते फिर किसान को न्यायपूर्ण कीमत मिलने की उम्मीद ही नहीं थी। किसानों और सभी विपक्षी दलों ने जमकर विरोध किया। संसद में और संसद के बाहर सबने घेरा तभी इस सरकार ने काले अध्यादेश को वापस लिया।

लेकिन, वापस लेते समय भी एक खेल सरकार ने कर ही दिया। आज तक मील के मुनाफे में किसान 50 फीसदी का हकदार था। किसान के इस हक को सरकार ने हटा दिया। इसके लिए हास्यास्पद तर्क दिए गए। सरकार द्वारा यह कहा गया कि मील मालिक किसान को मुनाफा नहीं देते, इसलिए हमने इस विधि को हटा दिया। सरकार का काम होता है कि जो विधि किसान के हित में है उस पर अमल हो। अगर मील मालिक किसान को मुनाफे का हिस्सा नहीं दे रहे हैं, तो ऐसे मील मालिकों को सजा दे। लेकिन, इसके बदले सरकार ने किसान के हित वाली इस विधि को ही हटा दिया। इस सरकार के किसान विरोधी और निहित स्वार्थों से मिलीभगत का इससे और कारगर सबूत क्या हो सकता है?

नाच ना जाने आंगन टेढ़ा

सरकार महंगाई को रोक नहीं सकती तो अब बहाने ढूढ़ने में लगी है। एक बहाना यह है कि राज्य सरकार भंडारण के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है और दूसरा यह बयान कि एनडीए के समय भंडारण के नियम बदले। दोनों तर्कों की वास्तविकता देखनी चाहिए। आज की आवश्यकता के अनुसार नीति तय करना केन्द्र सरकार का काम है। 6 साल सत्ता में रहने के बाद भी एनडीए के नाम का रोना रोना खुद के निकम्मेपन को कबूल करने जैसा है। एनडीए के समय में अभाव नहीं था पर्याप्त उपलब्धता थी। सरकारी गोदाम भरे थे। समय की आवश्यकता के अनुसार उस समय सरकार ने निर्णय लिए। अगर आज स्थिति बदली है तो समयोचित निर्णय करने को किसने रोका है? लेकिन, सरकार बहाने बनाना चाहती है। खुद की जिम्मेवारी से बचना चाहती है। और इसलिए कभी एनडीए को, कभी राज्य सरकारों को जिम्मेवार समझने का खेल खेल रही है।

भारत में हो रही महंगाई के लिए यह सरकार दुनिया को जिम्मेवार बता रही है। श्रीमती इंदिरा जी के शासन में जब भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वर्गीय जयप्रकाश जी ने बिगुल बजाया तब उन्होंने कहा था कि दुनियाभर में भ्रष्टाचार है। यही कुतर्क अब यह निकम्मी सरकार दे रही है। वास्तविकता अलग है। दुनियाभर में खाद्यान्नों के दाम कम हो रहे हैं और भारत में बढ़ रहे हैं।

चालीस चोर और एक-दूसरे के खिलाफ शोर

जैसा हम देख रहे हैं यह स्पष्ट है कि आज की महंगाई के लिए मुख्यत: यूपीए सरकार की नीतियां जिम्मेदार है। लेकिन, अब उन्होंने नया खेल शुरू किया है। टीवी चर्चाओं पर और दबी आवाज में महंगाई का ठीकरा शरद पवार के माथे फोड़ने का काम शुरू हुआ है। शरद पवार खाद्य मंत्री के तहत पूरी तरह से विफल रहे हैं और वे इस स्थिति के लिए जिम्मेवार भी है। लेकिन, यह अर्ध सत्य होगा। प्राइवेट कम्पनियों को किसान से खरीद की इजाजत देना, भंडारण संबंधी नियमों में बदलाव न करना, गन्ने के मामले में काला अध्यादेश लाना, स्वामीनाथन फार्मूला न अपनाना, बाजार में अनाज न लाना, यह सब सरकार के सामूहिक निर्णय हैं। कांग्रेस विश्वामित्र की भूमिका में जाकर जिम्मेवारी से भागना चाहती है।

वास्तविकता यह है कि यह अली बाबा और चालीस चोरों का राज है। भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। देश में जब चावल की कमी है, तो 25 लाख टन चावल वाणिज्य मंत्रालय द्वारा निर्यात किया गया। अफ्रीकी देशों को मानवीय आधार पर चावल निर्यात करने की योजना में जमकर घोटाला हुआ है। विभिन्न मंत्रालयों द्वारा मना करने के बावजूद भी वाणिज्य मंत्रालय ने अफ्रीकी देशों को मानवीय न्याय देना उचित समझा। देश में मानवीय न्याय नहीं मिलेगा लेकिन, विदेश को मिलेगा। वास्तविकता यह है कि यह घाटालों की सरकार है। लूटपाट मची है। और जब जन-आक्रोश सामने आता है तो भागने के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण करते है। सच्चाई एक है। एक ही है कि यह सरकार ही महंगाई के लिए पूरी तरह से जिम्मेवार है।

सरकार की करनी – महंगाई बढ़नी

पेट्रोल-डीज़ल के दाम सरकार तय करती है। दुनिया में सबसे महंगा पेट्रोल-डीज़ल भारत में मिलता है। क्योंकि पेट्रोल-डीज़ल की कीमत ने आधा हिस्सा करों का है। दुनिया में कहीं भी किसी भी वस्तु पर और खासकर जरूरतमंद वस्तुओं पर 100 फीसदी टैक्स नहीं लगाया जाता। लेकिन, अपने देश में यह हो रहा है। आज पेट्रोल की वास्तविक कीमत 22-25 रूपए होनी चाहिए। वह आज 45-50 है क्योंकि सरकार कर भारी मात्रा में है। सीधे-सीधे सरकारी नीतियों के कारण यह दाम बढ़े है। इसके बारे में भी अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कीमतों का बहाना बनाया जाता है। लेकिन, जब सितम्बर 2005 में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 60 डॉलर प्रति बैरल दाम था तब यहां 43 रूपए में पेट्रोल मिलता था। लेकिन, दिसम्बर 2008 में जब दाम 43 डॉलर प्रति बैरल इतना कम हुआ तब देश में पेट्रोल 50 रूपए के दाम से बेचा गया।

श्री अटल जी के शासन में 6 साल में गेहूं आयात करने की नौबत कभी नहीं आई। यूपीए की गलत नीतियों के कारण गेहूं आयात करने की नौबत आई। और आयातित गेहूं ऐसा था कि जो खाने लायक भी नहीं था। गोदामों में सड़ गया। लोगों ने फेक दिया। मात्र इस आयातित गेहूं के साथ नई-नई खरपतवार आई, जो कृषि को आने वाले सालों में तबाह करेगी।

तेल की यही कहानी है। 2003 तक देश में तेल आयात नहीं होता था। तेल के मामले में देश स्वयंपूर्ण था। लेकिन, यूपीए सरकार की किसान विरोधी नीति से तेल का मिशन डूब गया। इस सरकार को आयात-निर्यात करने में रूची है। तिलहन की खेती को लंबे समय के लिए कीमतों की गारंटी करने की बजाय, इस सरकार ने तेल आयात की इजाजत दी। शुरू में आयातित तेल सस्ते में आया। देश का तेल उद्योग खत्म हुआ। मलेशिया से बिना कस्टम डयूटी भारत में तेल नहीं आ सकता। लेकिन, श्रीलंका और मेलशिया में फ्री ट्रेड होने के कारण वहां तेल आना शुरू हुआ। भारत के कारखाने बंद हुए। उन्हीं मालिकों ने श्रीलंका में कारखाने शुरू किए। श्रीलंका और भारत में फ्री ट्रेड है इसलिए मलेशिया का तेल व्हाया श्रीलंका आना शुरू हुआ। आज जरूरत का 60 फीसदी तेल आयात हो रहा है। एक स्वयंपूर्ण देश को यूपीए ने परावलंबी देश बना दिया। दाल और तेल में स्पेशल मिशन बने, लेकिन कमिशन हावी रहा। इसलिए देश के किसान को न लाभकारी मूल्य मिला, न शोध द्वारा उत्पादकता बढ़ाने में यश मिला, न ही सुरक्षित पानी मिला। इतना ही नहीं सरकार की आयात-निर्यात नीति में कोई कारगर नीति नहीं है।

सरकार हर साल समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन देरी से। यह समर्थन मूल्य हमेशा ही बाजार मूल्यों से बहुत कम रहे हैं। 2009 में अरहर दाल का समर्थन मूल्य 2300 रूपए, जबकि बाजार में 9000 है। उड़द दाल का समर्थन मूल्य 2520 और बाजार में 6000 रूपए है। मूंग दाल का समर्थन मूल्य 2760 और बाजार में मूल्य 6200 रूपए है। इस साल गन्ने का उचित मूल्य 129 रूपए और किसान को आज 229 रूपए मिल रहे है। इसका मतलब सरकारी समर्थन या उचित मूल्य समुचित नहीं है, अपर्याप्त है और किसान विरोधी है।

यह भी देखने की बात है कि सरकार कैसा प्रबंधन करती है। पिछले साल सरकार ने 10 लाख टन दाल आयात की और आयात की कीमत से 15 रूपए छूट देकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली से लोगों को देने की घोषणा की थी। लेकिन, दाल आयात तो हुई लेकिन, ज्यादा दाल विभिन्न बंदरगाहों पर सड़ती रही। लोगों को न मिली दाल, न राहत, न छूट।

आंकड़ों का खेल और गैर-जिम्मेदार बयानबाजी

पहले तो यह सरकार मानने को ही तैयार नहीं थी कि महंगाई बढ़ रही है। थोक व्यापार सूचकांक के आधार पर सरकार लगातार यह बताती रही कि महंगाई की दर मात्र 1 या 2 प्रतिशत है और महंगाई नहीं है। लेकिन, यह आंकड़ें 220 वस्तुओं से मिलकर होते है और वह भी थोक व्यापार के होते है। ग्राहक तो खुदरा बाजार में खरीद करता है। महंगाई सामने न आए इसलिए सरकार ने छुपाने की बहुत कोशिश की। लेकिन, सच्चाई सामने आ ही गई। खाद्यान्न पदार्थों की कीमतें 20 फीसदी से बढ़ रही हैं, यह साबित हो गया। अनेक वस्तुओं के दाम तो सालभार में दुगने हो गए, यह जनता का अनुभव था।

ऐसी स्थति में महंगाई रोकने के लिए सरकार को ठोस उपाय करने चाहिए थे। लेकिन, सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। उल्टे गैर-जिम्मेदाराना बयान देने लगे। प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, खाद्य मंत्री और अन्य मंत्री भी, ”महंगाई और बढ़ेगी” ऐसा कहने लगे। महंगाई बढ़ेगी, यह बताने के लिए मंत्रियों की क्या जरूरत है? मंत्री का काम होता है कि महंगाई को कैसे रोकेगें, यह बताना। इसके विपरीत मंत्रियों के बयान से महंगाई में और आग लग गई। ऐसी गैर-जिम्मेदार सरकार कभी किसी ने नहीं देखी होगी।

सरकार के कुछ मंत्री और प्रवक्ता यह तर्क देने लगे कि, ”महंगाई का बोझ जनता पर नहीं है, क्योंकि चुनाव तो हम जीत रहे हैं।” इतना हास्यास्पद तर्क कभी नहीं हो सकता। कांग्रेस चुनावी सफलता को महंगाई बढ़ाने का जनादेश मान रही है। जनता को भी इसके बारे में सोचना होगा।

सरकार के मंत्री कहते है कि फारवर्र्ड ट्रेडिंग से किसान को लाभ होता है। लेकिन, अपने देश में यह अनुभव नहीं है। जो कारोबार कुछ साल पहले 62 हजार करोड़ का था, वह आज 37 लाख करोड़ का हो गया है। यह भी देखना जरूरी है कि कितने किसान फारवर्ड ट्रेडिंग में भाग लेते है।

श्री शरद पवार ने तो यहां तक बयान दिया कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश में अनाज का उत्पादन कम हुआ है। यह भी कुतर्क है क्योंकि इतने बड़े देश में कुछ मात्रा में सूखा और बाढ़ जैसी नैसर्गिक आपादाएं आती है और इसलिए सरकार बफर स्टॉक की योजना करती है।

सरकार के कुछ मंत्री तो यहां तक कह रहे हैं कि लोग अब ज्यादा खा रहे हैं। यह बयान तो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश के बयान जैसा ही है, जिन्होंने कहा था कि भारत के लोग अब ज्यादा खाने लगे हैं। हम सरकार से पूछना चाहते है कि क्या गरीब को दो वक्त खाने का अधिकार नहीं है? सरकार को ऐसी गैर-जिम्मेदार बयानबाजी तुरंत समाप्त करनी चाहिए।

हमारी मांगें

महंगाई गरीब की दुशमन है। गरीब एवं मध्य वर्ग का जीवन दुभर कर देने वाला संकट है। 1. किसान को लाभकारी मूल्य, 2. ग्राहक को सही कीमत और 3. सट्टोरियों-मुनाफाखोरों पर लगाम, इस त्रिसूत्री में भारतीय जनता पार्टी विश्वास करती है।

1- ग्राहकों को तुरंत राहत देने के लिए सब्सिडी देकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बीपीएल तथा एपीएल परिवारों को 5 किलो चीनी, 5 किलो दाल, 5 किलो तेल, 30 किलो चावल/गेहूं वाजिब दामों में उपलब्ध कराने चाहिए।

2- खाद्यान्नों की फारवर्ड ट्रेडिंग बंद होना चाहिए।

3- सट्टेबाजों एवं मुनाफाखोरों पर लगाम कसनी चाहिए।

4- सरकारी गोदामों का अनाज बाजार में तुरंत लाना चाहिए।

5- महंगाई को रोकने के लिए वित्तीय नीति में आवश्यक बदलाव करने चाहिए।

6- खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसानों को लाभकारी मूल्य मिलना चाहिए और इसके लिए स्वामीनाथन फार्मूला लागू होना चाहिए।

7- कृषि लागत यानी खाद, बीज, दवा इनकी दरों को नियंत्रित किया जाए।

8- देश की जरूरत पूरा करने के लिए कृषि उत्पादकता बढ़ाने के सार्थक प्रयास एवं तेज गति से सिंचाई का विकास होना चाहिए।

9- सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरूस्त बनाना चाहिए। वहां से बाजार में चोरी होने वाले अनाज के व्यापार पर रोक लगानी चाहिए।

लेखक : प्रकाश जावडेकर

(लेखक भाजपा के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता व सांसद हैं)

Leave a Reply

4 Comments on "महंगाई : कांग्रेस की काली करतूत"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
पंकज झा
Guest
डॉ. प्रो. मधुसूदन आपके सवाल का सीधा और सपाट जबाब ये है कि हाँ, बिल्कुल सौ फीसदी जनता, खासकर मतदाता मुर्ख ही है. आज अगर नेतागण जनता को शोषित कर पा रहे हैं तो इसलिए कि वास्तव में वो हैं ही इसी लायक. जो चीज़ें नंगी आँखों से देखे जाने लायक है वो अगर मतदाता को नज़र नहीं आ रही हो तो उनको अपने हाल पर छोड़ देना ही बेहतर. अगर जीत-हार ही पैमाना होता तो लालू-रबरी की सरकार तो 15 साल से मूंग दलत आ रही थी बिहार की छाती पर. मोटी बात ये है कि आप जिस लायक… Read more »
पंकज झा
Guest
डॉ. प्रो. मधुसूदन आपके सवाल का सीधा और सपाट जबाब ये है कि हाँ, बिल्कुल सौ फीसदी जनता, खासकर मतदाता मुर्ख ही है. आज अगर नेता गण अगर जनता को शोषित कर पा रहे हैं तो इसलिए कि वास्तव में वो हैं ही इसी लायक. जो चीज़ें नंगी आँखों से देखे जाने लायक है वो अगर मतदाता को नज़र नहीं आ रही हो तो उनको अपने हाल पर छोड़ देना ही बेहतर. अगर जीत हार ही पैमाना होता तो लालू-रबरी की सरकार तो 15 साल से मूंग डालती रही थी बिहार पर. मोटी बात ये है कि आप जिस लायक… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest
प्रकाश जावडेकर: “सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश के ७० फीसदी लोगों की आय प्रतिदिन २० रूपए से कम है।(यह आजका सच है, क्या?) ऐसे में गरीब तबके के लोग इस महंगाई के दौर में क्या खाएंगे और कैसे रहेंगे?”— बडा चौंकानेवाला यह बिंदु है।यदि इसमे कुछ मात्रामेंभी सच्चाई है, तो फिर किस आधारपर यु पी ए चुनकर आती है? क्या जनता इतनी मूरख है? राजनैतिक पक्षोंसे एकहि निवेदन कि सामान्य जनताकी प्राथमिक आवश्यकताओंको केंद्रमे रखते हुए, और इस ७० प्रतिशत जनताको केंद्रमें रखते हुए योजनाएं होनी चाहिए। स्थापित हित शायद आपको चुनावी चंदा देते हैं, इसलिए आप… Read more »
एल. आर गान्धी
Guest

आपके आलेख में अंतिम मांग ही सबसे महत्तवपूर्ण है ;
-सार्वजानिक वितरण प्रणाली यथार्थ में काला बाज़ार प्रणाली है. सरकारी डिपुओं का अधिकाँश सामान काले बाज़ार में बिक जाता है। जिन्हें इस सामान की दरकार है उनका तो राशन कार्ड ही नहीं बन पाता। यदि इसे बंद कर दिया जाए तो सरकार का करोड़ों रूपया बच जायगा -इस राशि से देश के सबसे निर्धन लोगों को दो जून की रोटी जुटाई जा सकती है। यह राशि निर्धन जनता को सब्सिडी टोकन के रूप में मुहया करवाई जा सकती है।

wpDiscuz