लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

रेल बजट के तत्काल बाद पेश किए आमबजट ने भी उतरोत्तर महंगाई बढ़ाने का ही काम किया है। जनता के रोजमर्रा के सरोकारों से जुड़े सामान उपभोक्ता की जेबें ढीली करेंगे। इन दोनों बजटों ने जनता के ऊपर 80 से 90 हजार करोड़ का बोझ बढ़ाया है। क्योंकि खानपान से लेकर घेरलु इलेक्ट्रोनिक उपकरण और स्त्री-पुरूष के व्यक्तिगत श्रृंगार के सामान महंगे हुए हैं। हालांकि कृषि और आवासीय सुविधाओं को प्रोत्साहित किए जाने के उपाय इस बजट में झलक रहे हैं, लेकिन उनकी चमक और दमक विदेशी पूंजी निवेश की संभावनाओं पर टिकी है। खुदरा व्यापार में निवेश की चिंता भी बजट में परिलक्षित है। लेकिन आम सहमति के बाद कंपनियों की हिस्सेदारी करने का प्रस्ताव है। पहली बार रक्षा बजट में संतोषजनक बढ़ोतरी की गई है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि चीन लगातार रक्षा बजट में बढ़ोतरी करता हुआ हमारे सीमांत प्रदेशों में खतरा बनकर पेश आ रहा है। सब कुल मिलाकर यह बजट समावेशी विकास के अजेंडे को सफलतापूर्वक लागू करने में नाकाम ही है, क्योंकि इसका सारा दारोमदार आर्थिक प्रगति पर टिका है, जो बेमानी है। क्योंकि अभी तक सरकार का ध्यान महज सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी बढ़ाने में रहा है, जबकि समग्र विकास पर जोर होना चाहिए था, जिससे लोगों को बड़े स्तर पर रोजगार मिलता। शिक्षा और आजीविका के साधन हासिल करने के उपाय सरल होते तो इसे आम आदमी का बजट कहा जा सकता था। कालेधन की वापिसी पर गोलमाल जवाब देकर उसे इसी-सत्र में श्वेत-पत्र जारी करने तक सीमित कर दिया गया है।

मौजूदा हालातों में देश के सामने रोजगार आधारित विकास को गति देने की जरूरत थी, जिससे मंहगाई, रोजगार और विकास में संतुलन दिखाई देता। ऐसा होता तो इसे समावेशी विकास की संज्ञा भी दी जा सकती थी। हालांकि आर्थिक सुधार और सामाजिक जरूरतें इतनी आसान भी नहीं हैं, जिनके लक्ष्य एक झटके में हासिल कर लिए जाएं। विकास यदि समावेशी दिशा में हो तो एक सतत प्रक्रिया जारी रखते हुए अनेक समस्याओं के निदानों में सफलता पाई जा सकती है। लेकिन जब बजट केवल जीडीपी बढ़ाने के उपायों तक ही सीमित हो तो उसके लक्ष्यों की पहली शर्त प्राकृतिक संपदा के अटूट दोहन और उद्योग जगत के लिए आर्थिक पैकेज तथा करों में भारी छूटों पर टिकी होती हैं। ये दिशाहीन उपाय बुनियादी सरोकारों से भटकर क्षेत्रीय, सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक विषमताओं को बढ़ाने वाले साबित होते हैं।

अब तक केंद्र सरकार सरकारी नौकरीपेशाओं के लिए दुधारू गाय साबित हो रही थी। छठे वेतनमान लागू होने के बाद तो उनकी बल्ले-बल्ले थी। उम्मीद से ज्यादा वेतन-भत्ते बढ़ने के बाद इस वर्ग को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से उम्मीद थी कि तीन से पांच लाख वेतन पाने वालों को आयकर मुक्त रखा जाएगा। इसके अलावा यदि वे बीमा व अन्य सवधि योजनाओं में निवेश करते हैं तो उन्हें करो में अतिरिक्त छूट मिलेगी। लेकिन मंहगाई की मार झेल रही सरकार ऐसा नहीं कर पाई। वित्त मंत्री ने कर्मचारियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। आयकर छूटों की जो सारिणी पेश आई है, उसमें कोई वृद्धि नहीं की गई है। जो मामूली वृद्धि हुई भी है, वह बढ़ती मंहगाई के अनुपात में ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है। तिस पर भी रोजमर्रा की अनिवार्य सेवाओं के इस्तेमाल पर सेवाकर की मार भी पड़ने, जा रही है। वित्त मंत्री अच्छे से जानते हैं कि आम उपभोक्ता पर जबरदस्त मंहगाई की मार पड़ने वाली है इसलिए उन्होंने बजट भाषण में कुटिल चतुराई से ऐसे संकेत दिए हैं कि चीजों की आसान उपलब्धता और सस्ती होने के लिए जरूरी है कि मानसून भी साथ दे, तभी नीतियों की बेहतरी सामने आएगी और खाद्य सामग्री व अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के दामों में गिरावट बनी रहेगी।

यह बजट सामान्य निगाह से देखने में ऐसा नजर आ रहा है कि खेती-किसानी की चिंता सरकार को है। लेकिन यह समझना एकाएक मुश्किल है कि सरकार सीधे किसान मजदूर के हित साधना चाहती है, अथवा कृषि उत्पादों को बाजारवाद के हवाले करना चाहती है। क्योंकि इस क्षेत्र में प्रणव मुखर्जी ने जो घोषणाएं की हैं, वे कृषि उत्पादों की वितरण प्रणालियों और उसे तकनीकी दृष्टि से सक्षम बना देने के उपायों पर ज्यादा टिकी हैं। वितरण के लक्ष्य को एक लाख करोड़ रूपए से बढ़ाकर 5 लाख 75 हजार करोड़ रूपए कर दिया गया है। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में तीन हजार करोड़ रूपए की वृद्धि की गई है। ग्रामीण बैंकों की पूंजी बढ़ाने के लिए भी 15 हजार करोड़ रूपए की पूंजी सरकार निवेश करेगी। चूंकि ग्रामीण बैंकों की ज्यादातर शाखाएं ग्रामीण अंचलों में हैं, इसलिए जाहिर है यह धनराशि ग्रामीण विकास और किसान हित साधने के काम आएगी। लेकिन दूसरी तरफ ऐसा लगता है कि यह राशि अप्रत्यक्ष तौर से औद्योगिक जगत को उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण बैंकों को सौंपी जाएगी। क्योंकि सरकार ने फसलों की वितरण प्रणाली को मजबूत करने के लिए कृषि कर्ज और वितरण के लक्ष्य में आशातीत वृद्धि की है। सरकार का दावा है कि इससे कृषि उत्पादनों के सही दाम किसान को मिलेंगे। क्योंकि फसल व सब्जी के भण्डारण की श्रृंखला तैयार हो जाती है तो व्यापारी सीधे किसान से फसल खरीदकर शीतालयों में रखेंगे। इससे फल-सब्जीयों की बरबादी तो रूकेगी ही, किसानों को बिचैलिए भी नहीं ठग पाएंगे। कृषि क्षेत्र में नवोन्वेषी उपाय बताते हुए जो तीन हजार करोड़ रूपए का बढ़ावा किया गया है, उस तारतम्य में किसान को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाएगा। जिससे किसान को खाद, कैरोसिन और रसोई गैस की जो छूटें अब तक कंपनियों के जरिए मिलती है, वह उसे सीधे मिल जाएं। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए किसानों के पास बैंकों के जो क्रेडिट कार्ड हैं, उन्हें स्मार्ट कार्ड से जोड़ा जाएगा। इस तकनीक से जुड़ने के बाद किसानों को खेती के लिए जिन अनुदानों के प्रावधान केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किए गए हैं, वे अनुदान (सब्सिडी) के लाभ सीधे उसके खाते में स्थानांतरित हो जाएं। इस तकनीक को अमल में लाने की दृष्टि से ही तीन हजार करोड़ रूपए कृषि क्षेत्र को अतिरिक्त दिए गए हैं। इस तरह के उपायों की मांग कई समाज सेवी संगठन व राजनीतिक दल अर्से से कर रहे हैं। इस बजट ने इन उपायों को गति दी है।

इस बजट में आवासीय उद्योग में सुधारों के लिए गति दी गई है। जो जरूरी भी थी। क्योंकि भवन निर्माण एक ऐसा क्षेत्र है जिसके बूते कई किस्म के उद्योगों को जीवनदान मिलता है। इसमें लोहा, सीमेंट, लकड़ी, पत्थर, ईंट सेनेट्री और लकड़ी जैसे उद्योगों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा मिलता है। लेकिन आवासीय व्यवस्था के लिए जरूरी है कि बचत के उपाय भी प्रोत्साहित हों। इस बजट में यह विरोधाभास है कि करों के रूप में जेबें ढीली करने के उपाय ज्यादा किए गए हैं। पिछले दो बजट पेश होने से पहले तक बचत 36 फीसदी थी, जो अब घटकर 32 फीसदी रह गई है। वित्त मंत्री करों में कठोरता नहीं बरतते तो बचत राशि में भी बढ़त होती और आवास क्षेत्र को भी मजबूती मिलती।

इस बजट को रक्षा उपायों की दृष्टि से अच्छा कहा जा सकता है। देश के सैन्य बलों के आधुनीकिकरण के लिए आम बजट में करीब तीस हजार करोड़ रूपए की बढ़ोतरी के साथ रक्षा मंत्रालय का बजट एक लाख 96 हजार करोड़ रूपए कर दिया गया है। सुरक्षा के लिए आधुनिक हथियारों की खरीद के लिए 80 हजार करोड़ रूपए का प्रावधान है। इस बार रक्षा बजट में 17.6 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, जबकि पिछले साल यह वृद्धि 11.58 फीसदी थी। यह वृद्धि इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि चीन लगातार अपने बजट को बढ़ा रहा है। चीन के कुल बजट का 30 प्रतिशत खर्च अकेले रक्षा बजट के लिए रखा गया है। इस लिहाज से भारत को रक्षा बजट बढ़ाना जरूरी था। रेल बजट में भी चीन के भारत पर दवाब की झलक देखने को मिली है। इसलिए रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने अपने बजट भाषण में चीन की गलत मंशा का संकेत देते हुए पूर्वोत्तर भारत में रेल की आवाजाही बढ़ाने के लिए रेल का विस्तार सीमांत प्रदेशों में किए जाने का उल्लेख किया था।

हालांकि बजट को केवल आम आदमी अथवा मध्यवर्ग की चिंताओं और सरोकरों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इनके अलावा भी देश है और उसके शिक्षा, स्वास्थ्य व रक्षा से जुड़े सरोकार हैं, इसलिए इस बजट में अखिल भारतीय परिदृश्य में जो संस्थान हैं, जिनमें केवल खर्च होता है, का भी ख्याल भी रखा गया है। इसलिए बजट को केवल आयकर व सेवाकर के दायरे में रखकर नहीं परखना चाहिए। इस बजट में जो सबसे ज्यादा खलने वाली कमी है, वह है कि इसमें घोषित किए किसी भी लक्ष्य को समय सीमा में पूरा करने का भरोसा नहीं जताया गया है। चूंकि बजट एक वित्तीय दस्तावेज होने के साथ राजनीति दस्तावेज भी होता है इसलिए इसे संकेतों में उलझाने की बजाए इसमें संपूर्ण पारदर्शिता बरतने की जरूरत थी।

 

 

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