लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

Posted On by &filed under विविधा.


-पंकज झा

आजकल जहां सभी समाचार माध्यमों पर जन-सरोकारों से दूर चले जाने का आरोप लग रहा है, वही कथात्मक माध्यम ‘सिनेमा’ कभी-कभार बड़ा सन्देश दे जाता है. अभी आमिर खान की फिल्म “पिपली लाइव” अपने एक गीत द्वारा ऐसा ही सन्देश देने में सफल रही है. “सखी सैयां तो खूबे कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है “ केवल इस गीत के माध्यम से ही आज के महंगाई की विकरालता समझ में आ जाती है. इस गाने में महंगाई को ‘डायन’ का विशेषण शायद इसीलिए दिया गया है क्योंकि राक्षसियां भी कम से कम अपने बच्चों या परिजनों को नहीं खाती, जबकि अपने भी बच्चों पर रहम नहीं करने वाली को ‘डायन’ कहते हैं. उपरोक्त शब्दों को केवल ‘रूपक’ के रूप में लेते हुए बिना किसी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा देते हुए केवल इतना कहना होगा कि वास्तव में महंगाई आज-कल डायन का शक्ल ही अख्तियार की हुई है. अब इसको बढ़ावा देने का जिम्मेदार जो सरकार है उसे आप क्या कह सकते हैं, खुद ही विचार ले. वास्तव में आम आदमी के साथ केंद्र की कोंग्रेस नीत सरकार द्वारा किये जा रहे विश्वासघात को परिभाषित करने में कोई भी नकारात्मक विशेषण कम होगा. बस यही कहा जा सकता है कि संप्रग की हर तरह के कूनितियों के बाद भी अगर बांकी कुछ बच गया था तो उसको महंगाई मार गयी.

आप कल्पना करें कि यह महंगाई तो उन मुट्ठी भर नागरिकों के लिए ‘डायन’ है, जिनके सैंया खूब कमात हैं’. लेकिन उनकी हालत क्या जिनके ‘सैयां’ देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं में शामिल है? हो सकता है पूर्ववर्ती चिदंबरम के कथित विकास दर ने कुछ समृद्धि के द्वीपों का निर्माण कर दिया हो. महंगाई के औचित्य-निरूपण के लिए कई बार सरकार की तरफ से लोगों के ‘खूब कमाने’ वाले जुमले का इस्तेमाल भी किया जाता है. लेकिन देश के मेहनत-कश किसान, गाँव के उन गरीबों के बारे में सोचिये जिन्हें इस कथित विकास से कोई लेना-देना नहीं है. रोज कमाने और खाने वाले लोगों के लिए किस तरह कोढ़ में खाज साबित होता होगा महंगाई यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. जमाखोरों और बिचौलियों को प्रश्रय देने वाली केंद्र कि इस सरकार में ही संभव है कि जहां हर उपभोक्ता वस्तुओं के भाव आसमान छू रहे हो वही उसको उपजाने वाला किसान, फसल का उचित मूल्य ना मिलने के कारण, कर्ज़दार हो आत्महत्या कर रहा हो. विडंबना यह कि अपना ‘चीनी’ बेच लेने के बाद इन चीज़ों के जिम्मेदार कृषि मंत्री को क्रिकेट से ही फुर्सत नहीं. उसी तरह जैसे ‘अपना बंगाल’ हासिल करने की फिराक में ममता जी को हादसों या हमलों में रेल यात्रियों के मरते जाने की फिकर ही नहीं.

सोनिया जी के संरक्षण में चलने वाली मनमोहन जी कि इस सरकार को इस भद्दे मजाक के लिए भी जाना जाएगा कि जहां कृषि मंत्री के क्षेत्र में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते हों वही रेल मंत्री के सूबे में सबसे ज्यादा रेल हादसे/हमले होते हो. आप सोचेंगे तो ऐसे क्रूर मजाकों की श्रृखला आपको नज़र आयेगी. मोटे तौर पर यही कहा जा सकता है कि केंद्र कि इस जन विरोधी सरकार के रहते लोगों की न जान सुरक्षित है और ना ही महंगाई के कारण उसका माल. महंगाई का यह करेला ही क्या कम था कि उसमे फिर से पेट्रोलियम पदार्थों के दाम में जबरदस्त वृद्धि कर नीम भी चढ़ा दिया गया है. तो पता नहीं यह सरकार अपने ही लोगों से किस जनम का बदला भंजा रही है. जैसा कि तथ्य है कि महंगाई के इस चोर कि मां होती है पेट्रोलियम पदार्थों का महँगा होना. केवल एक इस मूल्य वृद्धि से ही ढुलाई खर्च बढ़ जाने, सिचाई आदि महंगा हो जाने के कारण चीज़ों के दाम में गुणात्मक वृद्धि हो जाती है. लेकिन चैन की वंशी बजाते किन्ही मनमोहनी ‘नीरो’ को इन सब चीज़ों का परवाह करने की ज़रूरत ही क्यू हो?

वैसे यह संतोष की बात है कि कुम्भकर्णी इस सरकार का नींद तोड़ने के लिए इस बार लग-भग सम्पूर्ण विपक्ष, अपनी वैचारिक आग्रह-दुराग्रह को भुला कर मैदान में कूद पड़ा. भाजपा की अगुआई में वामपंथी से लेकर सभी दल के लोगों ने जिस तरह से भारत बंद का आयोजन कर सरकार को जगाने की कोशिश की, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह एक उपलब्धि ही माना जाना चाहिए. उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार थोड़ा सा सम्ह्लेगी अन्यथा जनता को चाहिए कि मौका मिलते ही केंद्र की इस जनविरोधी सरकार को उखाड फेके. इस सरकार का सत्ता में बने रहना वास्तव में देश के पीढीयों को महँगा पड़ने वाला है. केंद्र के इस सरकार को वोट देने के लम्हों की खता को शायद देशवासी सदियों तक की सज़ा के रूप में भोगने को अभिशप्त होंगे.

Leave a Reply

9 Comments on "महंगाई डायन खाय जात है"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
sunil patel
Guest
श्री पंकज जी ने हमेशा की तरह बहुत अच्छा लिखा है. धन्यवाद. * वास्तव में दो साल पहले के बाजार के गिरने से पुरे विश्व में वस्तुओ के दाम घाट गए थे. फिर पिछले एक – सवा साल में इतनी महंगाई क्यों. * कुछ जगहों और एकाध फसलो को छोड़कर पुरे देश में उत्पादन लगभग सामान्य रहा है – फिर इतनी महंगाई क्यों. * वर्षा भी लगभग सामान्य ही हुई है. मौसमी सब्जी महंगी हो सकती है, किन्तु खाद्य पदार्थो की कीमतों में इतना उछाल क्यों. * क्या पिछले और अगले चुनाव का सारा खर्च एक ही साल में वसूल… Read more »
दीपा शर्मा
Guest

Shandar haqiqat he ye. Sachmuch un logo ki kya istithi hogi jinko kaam nahi ya jinki kamai kam he. Agar bundelkhand k kisaano ko hi len to last 5 yr me 5000 kissan sucide kar chuke hen. Aur ye ankda kahi zyada ho sakta h. Laanat esi sarkar par.

पंकज चतुर्वेदी
Guest

aap pankaj ho to achchha hi likhoge
gud one
pankaj chatuevedi bhopal

सुमित कर्ण
Guest

pankaj bhaiya nice artical……………..

wpDiscuz