लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

हाल ही में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ब्लूमवर्ग मार्केट मैगजीन ने दुनिया में आर्थिक क्षेत्र में प्रभावशाली 50 नेताओं में स्थान दिया है और लिखा है कि भारत में केन्द्र सरकार की नीतियों को प्रभावित करने वाली वह ताकतवर नेत्री है। बिडम्बना यह है कि यही ताकतवर नेत्री राज्य के लिए औद्योगिक घरानों को आकर्षित करने में असमर्थ रही है। बल्कि यह कहें तो ज्यादा सही होगा कि आज ममता सरकार की नीतिहीनता सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आई है। ममता बनर्जी के आने के बाद औद्योगिक विकास एकदम बंद हो गया है।पश्चिम बंगाल के औद्योगिक दुर्दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे।

हाल की घटनाएं बताती हैं कि ममता सरकार जिस तरह काम कर रही है उससे औद्योगिक समस्याएं हल होने की बजाय उलझती जा रही हैं। मंत्रियों से लेकर नौकरशाह तक सभी को नीतिगत दिशाहीनता ने असहाय बनाकर रख दिया है।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब शासन संभाला था आमलोगों में उनको लेकर जबर्दस्त उत्साह था और यह उम्मीद भी जगी थी कि वे कुछ बेहतर और नया करेंगी लेकिन उद्योगपतियों से लेकर राजनेताओं तक,साधारण ग्रामवासी लेकर फैक्ट्री मजदूर तक सबको निराशा हाथ लगी है।

विगत डेढ़ साल में ममता सरकार की साख में गिरावट आई है। इस गिरावट के दो बड़े कारण हैं ,पहला , विगत वाममोर्चा सरकार की सही नीतियों की बजाय गलत नीतियों का अनुसरण करना ।दूसरा ,केन्द्र सरकार की नीतियों के प्रति नकारात्मक नजरिया। इन दोनों कारणों की वजह से आज ममता सरकार देश सबसे निष्क्रिय राज्य सरकार के नाम से जानी जाती है। आमलोग इसे खोखली घोषणाओं और जलसों की सरकार कहते हैं।

यही वह परिदृश्य है जिसमें राज्य के उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी ने विगत सप्ताह इंफोसिस के मुख्यालय जाकर इस कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की। राजनीतिक हलकों में इस बैठक को लेकर कई तरह के सवाल उठे हैं। पहला सवाल यह उठा है कि आखिर राज्य के उद्योगमंत्री को एक कंपनी के मुख्यालय जाने की क्या जरूरत थी ?यदि बात ही करनी थी तो वे अपने कोलकाता स्थित दफ्तर में कंपनी के अधिकारियों को बुलाकर बात कर सकते थे। दूसरा सवाल इंफोसिस के मालिक ने उनसे मुलाकात क्यों नहीं की ?तीसरा सवाल पार्थ चटर्जी ने ऐसा नया क्या प्रस्ताव पेश किया जिसको कंपनी ने नहीं माना ।

यह सवाल भी उठा है कि उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कंपनी को दिए अपने नए सुझावों को पत्रकारों को क्यों नहीं बताया ? उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी जिस तैयारी और भरोसे के साथ इंफोसिस अधिकारियों के पास गए थे उससे उनकी असफलता सामने आई है और इसके कारण देर-सबेर उनकी कुर्सी जाने का खतरा है। उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के नए प्रस्तावों को कंपनी ने एकसिरे से खारिज कर दिया है और साथ ही राज्य सरकार के रूख की तीखी आलोचना की, उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के बार बार तर्क किए जाने पर भी उन्होंने इंफोसिस के दूसरे कैम्पस को खोलने के बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। इंफोसिस के अधिकारियों ने उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी से दो-टूक शब्दों में कहा बताते हैं कि राज्य सरकार का यही रवैय्या रहा तो वे दूसरा कैम्पस चालू नहीं कर पाएंगे और वापस चले जाएंगे । अधिकारियों ने नाराजगी जताई है कि उनके द्वारा खरीदी गयी जमीन के पूरे दाम का भुगतान कर दिए जाने के बाद भी मालिकाने के कागजात कम्पलीट होकर उनके पास नहीं आए हैं। कंपनी चाहती है कि उनके मालिकाने के कागज जल्दी दिलवाए जाएं अन्यथा उनका जमा पैसा ब्याज सहित वापस दिलवाया जाय।उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी के पास उनकी मांगों के बारे में कोई सटीक उत्तर नहीं था।

उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने इंफोसिस के अधिकारियों से अपील की कि वे कुछ समय और दें और राज्य सरकार और कंपनी के अधिकारी मिलकर दिल्ली जाएं और नए विकल्पों की खोज करें।यही वजह है कि इंफोसिस के मुख्यालय से बाहर निकलकर उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने एक सामान्य सा बयान दिया कि इंफोसिस के अधिकारियों ने राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करने का वायदा किया है। सच यह हैकि उन्होंने कोई वायदा नहीं किया बल्कि यह कहा है कि उनके औद्योगिक प्रस्ताव को मानो तो काम करेंगे वरना चले जाएंगे इस पर उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा था कुछ समय और दो और वे इसके लिए राजी हो गए।

उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने इंफोसिस की समस्याओं के समाधान के लिए दिल्ली जाने और केन्द्रीय वित्त और उद्योग मंत्रालय के अधिकारियों से मिलने का सुझाव रखा जिसे इंफोसिस ने मान लिया। जानकार सूत्रों का कहना है कि इंफोसिस के अधिकारी आगामी दिल्ली यात्रा को लेकर किसी नयी आशा की संभावनाएं नहीं देख रहे हैं। इसका प्रधान कारण ममता बनर्जी का केन्द्र सरकार के नीतिगत सुधारों में अडंगा डालनेवाला रवैय्या। मनमोहन सरकार का सभी मंत्रालयों को अप्रत्यक्ष निर्देश है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की अनुमति के बिना ममता सरकार के किसी भी प्रस्तावित पर कोई फैसला न किया जाय।

उल्लेखनीय है कि इंफोसिस ने विगत वाममोर्चा सरकार के अंतिम साल में विशेष आर्थिक क्षेत्र योजना के तहत 50 एकड़ जमीन खरीदी थी और तत्कालीन राज्य सरकार ने उनको सेज के तहत मिलने वाली सभी सुविधाएं देने का वायदा भी किया था लेकिन ममता सरकार आने के बाद इंफोसिस के साथ किए गए समझौते को राज्य सरकार ने रद्द कर दिया और इंफोसिस को विशेष आर्थिक क्षेत्र के तहत सुविधाएं देने से मना कर दिया और बाद में सेजनीति को राज्य में लागू न करने का फैसला ही कर डाला और इस सबके कारण एक खास परिस्थिति पैदा हुई हैकि जो कंपनियां सेजनीति के तहत पूंजीनिवेश करने आने वाली थीं या जिनके प्रस्ताव राज्यसरकार के पास पड़े थे वे सभी प्रस्ताव रद्दी की टोकरी में डाल दिए गए।

उल्लेखनीय है कि सेज नीति को केन्द्र सरकार ने तैयार किया है और उसने राज्यों से उस नीति की संगति में राज्यसेज नीति बनाने का अनुरोध भी किया है। पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार ने बड़ी आनाकानी के बाद सेज नीति को लागू किया था,लेकिन ममता सरकार आने के बाद पुनःराज्य विधानसभा में पास की गयीनीति को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया और राज्य फिर से नए औद्योगिक संकट में फंस गया है। पुरानी औद्योगिक नीति में औद्योगिक विकास की गुंजायश कम थी इसलिए केन्द्र सरकार ने सेजनीति बनायी थी और अधिकांश राज्यों ने उस नीति का पालन भी किया था।

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