लेखक परिचय

पीयूष पंत

पीयूष पंत

लेखक राजनैतिक, आर्थिक और विकास के मुद्दों पर केन्द्रित पत्रिका 'लोक संवाद' के संपादक हैं।

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सरकारी फैसलों को अपने हित में प्रभावित करने के लिए कॉरपोरेटी दबाव बनाने की बात कोई नई नहीं है। पूरी दुनिया में लंबे समय से चलता आ रहा है। इसके लिए कंपनियों और उद्योगपतियों द्वारा संपर्क साधने उपहार देने जैसे तरीके अपनाए जाते रहे हैं। लेकिन आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि अब कॉरपोरेट ताकतें सरकारों को निर्देश देने लग गई हैं कि कैसी नीतियां बनाई जानी हैं या मौजूदा नीतियों में कैसे बदलाव किए जाने हैं। जाहिर है, भारत में आर्थिक उदारीकरण की रफ्तार तेज होने के साथ इसने और आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है, हालांकि पहले भी यह कोटा-लाइसेंस राज के रूप में मौजूद था। पचास और साठ के दशक में जहां टाटा और बिड़ला का नाम लिया जाता था, वहीं सत्तर के दशक में अपने कारोबारी हितों को पुष्ट करने के लिए सरकारी तंत्र को प्रभावित करने का काम धीरूभाई अंबानी जैसे लोगों ने किया। भले ही अंबानी की कामयाबी को फर्श से अर्श के रूप में पेश किया जाता रहा हो, लेकिन यह बात अब सार्वजनिक है कि उनका साम्राज्य जबर्दस्त गिरोहबंदी और बजटीय प्रावधानों में हेर-फेर से खड़ा हुआ था। वित्तीय और निर्यात-आयात तंत्र में यह हेरा-फेरी इतनी चालाकी से बड़े पैमाने पर की गई कि अंबानी परिवार ने जिस कारोबार में हाथ डाला, उसमें उन्होंने अपना एकाधिकार कायम कर लिया। वर्चस्व की यह कहानी पहले पॉलिस्टर धागों के क्षेत्र में लिखी गयी, जो आज पेट्रो-कैमिकल और प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में लिखी जा रही हैं। धीरूभाई के शब्दों में, ”मैं एक चालबाज़ था। एक बहुत अच्छा चालबाज़।” आखिर हम सत्यम के मालिकों द्वारा की गई चालबाज़ी को कैसे भूल सकते हैं, जो उनके लोभ का पैमाना छलक जाने पर आखिरकार उजागर हो गई।

भारत में सरकारी नीतियों को प्रभावित करने और हेरा-फेरी का यह खेल काफी गोपनीय तरीके से चलता आ रहा है। कोई नहीं जानता कि कौन सी कंपनी कहां चालबाजी कर रही है। दूरसंचार क्षेत्र में स्पेक्ट्रम आवंटन के गोपनीय सौदे इसका सबसे बेहतर उदाहरण हैं जहां जवाबदेही का ढोंग तक नहीं रचा गया। भारत में ऐसी हेरा-फेरी के पसंदीदा क्षेत्रों में हम तेल और गैस, ऊर्जा, उत्खनन व विमानन क्षेत्रों को गिना सकते हैं। यूपीए सरकार को समर्थन देने के बदले एक कॉरपोरेट घराने की तरफ से समाजवादी पार्टी द्वारा की गई मांग को नहीं भुलाया जा सकता। भारतीय कॉरपोरेट ताकतों द्वारा चालबाजी के इतिहास में यह मामला मील का पत्थर है। भारत-अमेरिका परमाणु सौदे को मिली मंजूरी के बाद जिस तरीके से परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रस्तावों और सौदों की बाढ़ आ गई, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि न सिर्फ अमेरिकी और यूरोपीय, बल्कि भारतीय कंपनियां भी समझौते को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए पर्याप्त गुटबाजी में लगी हुई थीं।

दरअसल हो ये रहा है कि कॉरपोरेट ताकतें अब अपने कारोबारी हितों को राजनीति में स्थान दिलवाने में लग गई हैं ताकि वे सरकार की नियामक संस्थाओं पर कब्जा कर के खुद उन्हें नियामित कर सकें। फिक्की के पूर्व अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर के शब्दों में, ”उदारीकरण ने ‘एक नए किस्म का’ उद्यमी नहीं पैदा किया है जो कॉरपोरेट सुशासन और ईमानदारी को मानक मानता हो। वास्तव में इसका उलटा हो रहा है कि बढ़े हुए अवसरों, राजनीतिक प्रभाव और धन के सृजन से जुड़ी सार्वजनिक नीति ने और ज्यादा लोभ को जन्म दिया है और तमाम कॉरपोरेट सही और गलत के बीच तनी हुई रस्सी पर चल रहे हैं, आर्थिक उदारीकरण का यह भद्दा पक्ष है।”

कारोबारियों और उद्योगपतियों के लिए अब यह चलन सा बन गया है कि बजट आने से पहले वे वित्त मंत्री के चैंबर का चक्कर लगा कर उन्हें परामर्श देते हैं कि उद्योगों को क्या रियायतें मिलनी चाहिए या फिर कुछेक कारोबारी घरानों के फायदे के लिए क्या प्रावधान बना

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