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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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– हरिकृष्ण निगम

सच देखा जाए तो हम आज अपराधों की एक नई प्रकृति की दुनियां में जी रहे हैं। यह वे सफेदपोश अपराध हैं कि जिसकी धोखाधड़ी में न तो हिंसा है, न खून बहाना, न बंदूक या पिस्तौल और न ही घायलों या मृतकों की संख्या। पर ऐसे अपराधी हमारे बीच में स्वयं उन्हें सम्मानित भी करते रहते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि हमारे समाज के अंग में कैंसर की तरह विद्यमान हैं। ऐसे अपराधों की एक खास बात यह है कि इन असमाजिक कार्यों में लिप्त लोगों को रोकने वाले भी इन अपराधियों को अपना सहयोग एवं संरक्षण देते दिखते हैं। मजे की बात यह है कि ऐसे सफेदपोश अपराध को अधिकांश जनता साधारण रूप से स्वीकार भी करती है।

हमारे वित्तीय क्षेत्र में यह धुन अरसे से लगा हुआ है और यह हमारे इतने नजदीक है कि कदाचित इस बारीकी से दृष्टि करना भी अधिकांश लोगों के लिए संभव नहीं हो पा रहा है। कभी कोई कहता है कि स्थानीय संदर्भों को व्यापक बनाने के से क्या फायदा? कोई दूसरा बेफिक्र होकर टिप्पणी करता है कि राजनीति बाजों को भी सफेदपोश अपराधियों की जरूरत पड़ती है, इसमें विस्मय की क्या बात है? आदि आदि!

पहले हम व्यवसायिक क्षेत्र में मात्र एक ही अपराध से परिचित थे जिसे टैक्सों की चोरी कहा जाता था। पर आज देश में आर्थिक सुधारों और वैश्वीकरण की प्रक्रिया में करों का अपवंचन की बात पुरानी पड़ गयी है। अब तो बड़ी-बड़ी कंपनियों की बैलेंसशीट में अपनाए गए पूटिकटों की चर्चा भी खुलकर होती है। एक अंतर्राष्ट्रीय परामर्श क्षेत्री कंपनी अर्नेस्टि एंड यंग के हाल में किए गए सर्वेक्षण में यहां तक कहा गया है कि देश की 42 प्रतिशत कंपनियां जानती है कि अंदरूनी साठगांठ, भष्टाचार व घूस के माध्यम से उनके अपने संसाधनों का दोहन निजी लाभ के लिए किया जाता है। भ्रष्टाचरण का सबसे बड़ा जोखिम आर्थिक आंकड़ों को मनचाहे तरिके से प्रकाशित करते समय होता है जिसमें कतर ब्यौत के साथ परिणामों को लेखे-जोखे में समाविष्ट करने की कोशिश की जाती है। सर्वेक्षण की गई लगभग 15 प्रतिशत कंपनियों ने स्वीकार किया है कि गत दो वर्षों में अंदरूनी धोखाधड़ी के प्रकरणों में काफी वृद्धि हुई है।

जहां तक बीमा और बैंकिंग उद्योग का प्रश्न है काले धन को वैध बनाने की प्रक्रिया या धन को अवैध लेन-देन और आपराधिक गतिविधियों का मूल उद्देश्य छिपाने का मंतव्य एक चर्चित मुद्दा बन चुका है। ऐसी असमाजिक गतिविधियों में, प्रतिष्ठित, चतुर और बहुधा सफेदपोश धनाड्य-व्यक्ति भी लिप्त होते हैं जो भलीभांति जानते हैं कि किसी भी संभावित दांडिका कार्यवाही से पैसा खर्च कर या अपने प्रभाव से बच निकलेंगे। सामाजिक कलंक की बात तो दूर वे आज के जटिल, व्यापक और अनियंत्रित आर्थिक परिदृश्य में अपने उपर आंच भी नहीं आने देते हैं। आज विभिन्न वित्तीय संस्थानों जैसे बैंक, जीवन व साधारण बीमा कंपनियों के लोग का इस प्रकार प्रयोग कर सकते हैं कि कुछ शृंखलाबद्ध लेन-देन के बाद मनचाही रकम किसी इच्छित व्यक्ति के नाम हो जाती हैऔर वह पूर्ण रूपेण वैध संपत्ति के रूप में दिखाई जा सकती है। यही वह खतरा है जिसे ‘मंनीलांडरिंग’ कहा जाता है और इस प्रकार के धन का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों के लिए भी सहजता से हो सकता है। खुफिया एजेंसियों को ज्ञात है कि मादक-द्रव्यों की तस्करी, आतंकवाद और बीमा कंपनियों की चैनलों का उपयोग हुआ है।

जीवन बीमा व्यवसाय में अपार वृद्धि कंपनियों की उस गलावट प्रतिद्वंदिता के कारण भी हैं जिसमें अनेक असावधानियां या लपरवाही कभी भी देश के लिए खतरा बन सकती है। स्वयं बीमा नियामक व विकास प्राधिकरण अनेक चेतावनियां दे चुका है। जीवन बीमा उद्योग के सफेदपोश अपराधों को भी सूचीबद्ध किया जा चुका हैपर इस क्षेत्र के विस्फोटक रूप से हो रहे विकास के बीच इनकी ओर दृष्टिपात करने को किसको समय है? मूलिय निवेशकों को आज की उमफन का जिम्मेदार नियामक प्रधिकरण ही है। समान्य बीमा क्षेत्र में आज मोटर-वाहन बीमा जो कानून के तहत हर कार रखने वाले के लिए अनिवार्य है-आर्थिक अपराधों की जन्मभूमि बना है। कुल बीमा करवाने वालों का मात्र 20 प्रतिशत आज दावों का शत प्रतिशत लाभ ले रहा जब कि 80 प्रतिशत ईमानदार 80 प्रतिशत बीमाधारी एक पैसे की बीमित राशि नहीं लेते है जो लोग साठगांठ नहीं कर पाते या पेट पुजा नही चढ़ा पाते वे कोई दावा भूगतान नहीं पाते हैं। एक वरिष्ट बीमा अभिकर्ता के अनुसार आज सामान्य बीमा क्षेत्र में मोटर वाहन का ”थर्ड पार्टी” बीमा अनेक कंपनियां नही करती है। जब उनके पास कोई वाहन का मालिक बीमा करवाने जाता है तो वे मना कर देते हैं। यदि कोई प्रभावशाली वर्ग अथवा भीतर का अधिकारी अथवा कर्मचारी बीमा कराने वाले का पक्ष लेता है तो कदाचित वाहन का बीमा होता है अथवा ग्राहक से 200-300 रुपये वाहन सर्वेक्षण के नाम पर अलग से ली जाती है और यह राशि रसीद भी मांगने पर हीं मिलती है। सच तो यह है कि कार का सर्वेक्षण होता ही नहीं है।

बीमा सेवा के स्तर में, संगणीकरण के बावजूद काफी गिरावट आई है। पश्चिम की अनेक कंपनियों में बीमाधारक और अभिकर्ताओं को उनके काम में अपेक्षित सहयोग न देना भी भ्रष्टाचार माना जाता है और ऐसी शिकायत पर पूरी जांच होती है जबकि दूसरे क्षेत्रों में नकल के बावजूद हमने उनसे यह पक्ष नहीं सीखा है।

बीमा उद्योग के सामान्य अपराधों में बीमा कराने वाले व्यक्ति तो अस्वस्थ होने पर भी उसे बीमा पॉलिसी बेचना या फर्जी डॉक्टरी जांच काफी सामान्य बात है। एक अनुमान के अनुसार किसी भी कंपनी के कम-से-कम 10 प्रतिशत मृत्युदावे उन बीमाधारियों के उत्तराधिकारों को दिए जा रहे हैं जिनके बीमाधारी जीवन बीमा प्राप्त करने के योग्य नहीं थे। प्रीमियम दिए गए मन अनेक बीमा अभिकर्ता 40 से 50 प्रतिशत उसे बीमाधारक को रिबेट की तरह वापस कर देते है। यह दंडनीय है ओर बीमा अधिनियम 1930 से लेकर आज तक के अधिनियमों में दंडनीय अपराध है। पर यह एक बिडंबना है कि गत लगभग साठ दशकों में यद्यपि यह प्रावधान बीमे के हर प्रस्ताव पत्र पर छपता है पर तब से अब तक एक भी अभिकर्ता या बीमाधारक इस अवैद्य लेनदेन में दंडनीय हुआ है। क्या यह अवैद्य रिबेट देकर जीवन बीमा करना एक सफेदपोश अपराध नहीं है?

वास्तव में निचले स्तर पर नियंत्रण लाए बिना वित्तीय क्षेत्र में पनपते दलदल को सुखाया नहीं जा सकता है। आर्थिक संगठन चाहे वे सार्वजनिक क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के, भ्रष्टाचार की जांच-पड़ताल के लिए गठित होने वाली मशीनरी ऐसे भी लोगों का प्रवेश करा देते हैं जिनकी अपनी पृष्ठभूमि संदिग्ध रही है। जांच एजेंसियों या प्राधिकरणों में ईमानदार एवं निष्पक्ष व्यक्ति के रहने पर ही शिकायतों का निपटारा भलीभांति हो सकता है। साफ है कि भ्रष्टाचार का एकमात्र कारण नेता या अधिकारियों की आर्थिक मजबूरियां नही होती। यह केवल मानसिकता का परिणाम है। आज राजनीति हो या व्यापार हो उसमें चाहे वित्तीय संगठन हो या उद्योग के नए क्षेत्र, गतिविधियों को ग्लैमर प्रदान करने की मजबूरी नही हैपर फिर भी अनेक कर्ता-धर्ता इसी रास्ते चल रहे हैं। उनको मितव्ययी, अनुशासित एवं सरलकार्य पद्धति के पुराने दावे इतिहास बन चुके हैं और वे भी झुठ-प्रपेय और प्रचार के बल पर उन्मुक्त बाजार में अपना सिक्का जमाने के लिए आक्रामक बन चुके हैं। इसीलिए कदाचित उन्हें भ्रष्टाचार की असलियत नहीं दिखती है।

* लेखक संप्रति मुंबई विद्यापीठ के बीमा प्रबंधन के स्नातकोत्तर पाठयक्रम के संयोजक है।

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1 Comment on "बीमा क्षेत्रों में भ्रष्टाचार के नए रूप"

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श्रीराम तिवारी
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यह बिलकुल सही है की वीमा क्षेत्र में चारो और लूट ही लूट मची है .ताजुब है की वीमा नियामक .इरडाऔर केद्र सरकार की जानकारी में हिने के बावजूद इस शुद्ध अनुत्पादक धंदे में आम आदमी लुट रहा है .चतुर चालकों ने गाय के पिछले भाग पर और गाय का मुह आम आदमी की और कर दिया है .आपका आलेख प्रासंगिक और काबिले गौर है .

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