लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

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लालकृष्ण आडवाणी

भारतीय संविधान का पहला अध्याय भारत को ‘राज्यों के संघ‘ के रुप में निरुपित करता है। संविधान सभा ने भारत को ‘राज्यों का परिसंघ‘ कहने वाले प्रारुप को अस्वीकार कर दिया था। संविधान के प्रारुप को प्रस्तुत करते समय, प्रारुप समिति के चेयरमैन डा0 अम्बेडकर ने इस पहलू की इस तरह से व्याख्या की:

”यद्यपि भारत को एक परिसंघ होना था, पर यह परिसंघ राज्यों द्वारा एक परिसंघ में शामिल हाने के समझौते का परिणाम नहीं था, और यह परिसंघ किसी समझौते का परिणाम नहीं था, किसी भी राज्य को अलग को अलग होने का अधिकार नहीं है। परिसंघ एक संघ है क्योंकि यह अविनाशी है।”

”हांलाकि देश और लोग प्रशासन की सुविधा से विभिन्न राज्यों में विभक्त होंगे, देश एक संपूर्ण एकात्मक है, इसके लोग एक हैं और एक ही स्त्रोत से उदृत होने वाले एक सूत्र के तहत रहते हैं।”

”अमेरिकियों को यह स्थापित करने के लिए गृहयृध्द लड़ना पड़ा कि राज्यों को पृथक होने का कोई अधिकार नहीं है और यह कि उनका परिसंघ अनश्वर है। प्रारुप समिति सोचती है कि अभी इसे साफ करना ज्यादा अच्छा है बजाय इसे अनुमानों या विवादों पर छोड़ने के।”

दो शताब्दियों तक अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया पर उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को कभी नही स्वीकारा। उल्टे वे भारत को ‘एक निर्माणाधीन राष्ट्र‘ मानते रहे। अपने राज करने के लिए मुस्लिम लीग ने द्वि-राष्ट्र सिध्दान्त प्रतिपादित कर एक पृथक देश बनवाया। कम्युनिस्ट भारत को बहुराष्ट्रीय राज्य कहते थे।

लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधता वाले हमारे देश के लिए एक संघीय संविधान की आवश्यकता को स्वीकारते हुए भी डा0 भीमराव अम्बेडकर ने अपने शब्दों और लेखन में उपरोक्त भारत के उपरोक्त एकमात्र राष्ट्रवाद पर जोर दिया।

संविधान का अनुच्छेद 263 भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करता है कि केन्द्र और राज्यों अथवा राज्यों में उत्पन्न विवादों के निपटारे के लिए वह एक अन्तर्राज्यीय परिषद गठित करें। भारत के संघवाद की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण प्रावाधान है। जनसंघ के दिनों से ही हम इस प्रावधान का उपयोग कर परिषद गठित करने की मांग करते रहे हैं। लेकिन नई दिल्ली कभी इसके लिए तैयार नहीं हुई।

सन् 1983 में प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने केन्द्र -राज्य सम्बन्धों के समूचे पहलुओं का परीक्षण करने के उद्देश्य से सरकारिया आयोग गठित किया था। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने ठीक ही दर्ज किया है:

”1967 से पूर्व केन्द्र और राज्यों के बीच पार्टी के स्तर पर उठने वाले विवादों या समस्याओं का समाधान करना ज्यादा आसान था क्योंकि केन्द्र और राज्यों मे एक ही पार्टी सत्ता में थी। 1967 से अनेक दल या केन्द्र में सत्तारुढ़ दल से अलग दलों का गठबंधन अनेक राज्यों में सत्तारुढ़ है। विभिन्न विचारों वाली इन राज्य सरकारों की दृष्टि क्षेत्रीय और अन्तर्राज्यीय समस्याओं पर भिन्न है। ऐसी स्थिति में अनुच्छेद 263 के तहत परिपूर्ण चार्टर के साथ एक अर्न्तराज्यीय परिषद का गठन अनिवार्यता बन गई है।”

अन्तर्राज्यीय परिषद का गठन अंतत: 1990 में किया गया। दु:खद यह रहा कि गठन के तुरंत बाद से ही परिषद निष्क्रिय हो गई। सन् 1996 तक, इसकी एक भी बैठक नहीं हुई। सन् 1998 में श्री वाजपेयी की सरकार में गृहमंत्री के रुप में, मैं इसे पुनर्जीवित करने में सफल रहा और एनडीए के कार्यकाल में प्रत्येक वर्ष इसकी बैठक होती रहीं। प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत अनेक केन्द्रीय मंत्रियों सहित सभी मुख्यमंत्री इस अन्तर्राज्यीय परिषद के सदस्य थे।

सरकारिया आयोग के 19 अध्यायों वाली रिपोर्ट में कुल 247 सिफारिशों पर विचार कर अंतिम निर्णय लिया गया।

लखनऊ में 3 और 4 जून को सम्पन्न भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में पारित एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव था जिसमें वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा संघवाद को निरन्तर उपेक्षित किए जाने को काफी सशक्त ढंग से उठाया गया है। यह प्रस्ताव गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी द्वारा प्रस्तुत किया गया और कार्यकारिणी द्वारा पारित किया गया।

5 पृष्ठीय प्रस्ताव में भाजपा ने यह संकल्प लिए हैं:

· सरकारिया आयोग की केन्द्र-राज्य सम्बन्धों पर की गई सिफारिशों को तुरन्त पूर्णत: कार्यान्वित किया जाए।

· ऐसे हमलों और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष के लिए एक फोरम की स्थापना हो। हम सभी राजनीतिक दलों के साथ मिलकर इन मुद्दों को उठाएंगे और आपसी सहयोग करेंगे। हम किसी भी गैर-कांग्रेसी राज्य पर हमला या भेदभाव के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होंगे।

· अंतर्राज्यीय परिषद को और अधिक सशक्त बनाना; यह अनुच्छेद 263 के अनुसार एक संविधानिक निकाय है।

· सीबीआई, सीएजी और सीवीसी के प्रमुखों की नियुक्ति को सरकार के शिकंजे से मुक्त कराना। चयन अधिशासी मंडल बिना किसी संशय के चयनित उम्मीदवार के प्रति स्वयं में पूरी तरह आश्वस्त होने चाहिए।

· सरकारिया और जस्टिस वेंकटाचलैया आयोग के संदर्भ में राज्यपालों की नियुक्ति, भूमिका और कार्यों पर पुनर्विचार पर राष्ट्रव्यापी चर्चा का आह्वान।

· हमारे राज्यों तथा संघीय शासन प्रणाली को कमजोर करने के गम्भीर खतरे के प्रति जन-जागरूकता पैदा करेंगे।

सन् 2006 से अब तक अन्तर्राज्यीय परिषद की कोई बैठक नहीं हुई है। अब समय आ गया है कि परिषद की बैठक बुलाकर इन सभी उपरोक्त मुद्दों पर विचार किया जाए।

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क्या संविधान संशोधन करने हेतु संसद की शक्तियां असीमित हैं?

गोलकनाथ केस के रुप में प्रसिध्द मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि संसद को ऐसे संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है जो मौलिक अधिकारों के प्रावधानों को छीनने या उनकी काट छांट करते हों।‘

इसके 6 वर्ष पश्चात् सन् 1973 में सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सीकरी सहित 13 न्यायाधीशों ने 7 बनाम 6 के आधार पर माना कि यद्यपि मौलिक अधिकारों सहित संविधान का कोई भी भाग संसद की संशोधन शक्तियों से ऊपर नहीं है (गोलकनाथ केस के उलट), लेकिन ”संविधान के आधारभूत ढांचे को किसी एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से भी नहीं समाप्त किया जा सकता है।”

बहुमत वाले निर्णय को लिखते समय न्यायामूर्ति सीकरी ने आधारभूत ढांचे को इंगित करते हुए ये तत्व बताए:

1- संविधान की सर्वोच्चता।

2- सरकार का एक गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक ढांचा।

3- संविधान का पंथनिरपेक्ष चरित्र।

4- शक्तियों के पृथकीकरण को बनाए रखना।

5- संविधान का संघीय चरित्र।

मैंने इन सबका इसलिए स्मरण कराया क्योंकि आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन के जरिये लोकतंत्र, संघवाद और शक्तियों के पृथकीकरण जैसी आवश्यक विशेषताओं को समाप्त प्रात: कर दिया गया था। इसलिए आपाताकल के दौरान केशवानन्द भारती निर्णय और संविधान के आधारभूत ढंाचे संबधी सिध्दांत को बदलने तथा समाप्त करने के सुनियोजित प्रयास किए गए। 10 और 11 नवम्बर, 1975 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे की अध्यक्षता वाली 13 जजों की पीठ ने जल्दबाजी में इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण केस की सुनवाई शुरु की।

नानी पालखीवाला और फली नरीमन जैसे नागरिक अधिकारों की वकालत करने वाले बैरिस्टरों ने केशवानन्द सिध्दांत को समाप्त करने वाले सरकारी प्रयासों के विरुध्द इतने शानदार ढंग से बहस की कि दूसरे दिन आते-आते मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे. ने पीठ में अपने को एकमात्र अल्पमत में पाया।

12 नवम्बर की सुबह मुख्य न्यायाधीश रे ने अचानक घोषणा की कि पीठ भंग की जाती है। केशवानन्द भारती आधारभूत ढांचा सम्बंधी सिध्दांत आज भी कानून बना हुआ है।

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टेलपीस (पश्य्लेख)

”लायबिलिटी काल्ड मनमोहन सिंह” शीर्षक से एक लेख ‘पायनियर‘ समाचार पत्र में इसके रविवारीय स्तंभ लेखक हरिशंकर व्यास ने प्रधानमंत्री के बारे में लिखा है:

”मनमोहन सिंह आपको अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की याद दिलाते हैं। जफर का शासन ज्यादा से ज्यादा पालम तक था, मनमोहन का अधिकार क्षेत्र दिल्ली की रायसीना पहाड़ी के सत्ता के केन्द्र तक सीमित है। समूचा राष्ट्र भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ है और आम आदमी के आक्रोश को महसूस कर रहा है और सत्ता के खिलाड़ी डरे हुए हैं कि देशभर से लोग दिल्ली की ओर मार्च करने लगेंगे।

जून के पहले सप्ताह में मनमोहन मोहम्मद शाह रंगीला बन गए। जब बताया गया कि शत्रु सेना दिल्ली पहुंच गई तो उसने अपने कमाण्डरों को शत्रु का स्वागत करने का आदेश दिया और उन्हें समझाने का।

प्रधानमंत्री ने भी अपने लोगों की हवाई अड्डे जाने को कहा तथा बाबा रामदेव को अपने आंदोलन न करने हेतु मनाने का प्रयास करने के लिए कहा। आज कल के दरबारी चतुर वकील/मंत्री हैं। अत: प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए कपिल सिब्बल ओर सुबोधकांत सहाय ने रामदेव पर कठिन मेहनत की। प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों ने सोचा कि शत्रु को मूर्ख बना दिया है और वह आत्मसमर्पण कर देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उल्टे पड़े इस ऑपरेशन ने 10 जनपथ को गुस्सा कर दिया: उनसे पूछा गया कि क्या यह शासन करने का तरीका है? 10 जनपथ से डांट खाने के बाद प्रधानमंत्री अपने दरबारियों से सिमटकर बैठे और पूछा आगे क्या? दरबारियों ने सलाह दी: ”चंगेज खान के रास्ते पर चला जाए, जब हमारा शत्रु सो रहा होगा तक हमें उन पर हमला करना चाहिए तो सब भाग जाएंगे।”

प्रधानमंत्री इस पर राजी हो गए और तब एकदम सच्चे चंगेजी ढंग से आदेश दिया गया: पुलिस बल भेजो। और इस तरह, 4 जून की मध्यरात्रि को रामलीला मैदान में सो रहे लोगों पर कार्रवाई की गई तथा जन समूह को वहां से भागने पर बाध्य किया गया। दो दिन बाद प्रधानमंत्री ने कहा मेरे पास कोई और विकल्प नहीं था।”

बहादुर शाह जफर, मोहम्मद शाह रंगीला और चंगेज खान के मिलेजुले शासन में दिल्ली निश्चित रुप से सुरक्षित बनी लेकिन पालम से आगे के लोगों के गुस्से की कल्पना तो करिए।”

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