लेखक परिचय

हर्षवर्धन पान्डे

हर्षवर्धन पान्डे

लेखक युवा पत्रकार और शोध छात्र हैं

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हर्षवर्धन पाण्डे

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की जंग इन दिनों परवान पर है | ४५ वे राष्ट्रपति चुनाव में ओबामा ने दुबारा राष्ट्रपति बनने के लिए अपनी सारी उर्जा चुनाव प्रचार पर केन्द्रित कर दी है वहीँ मिट रोमनी को उनका एक बड़ा प्रतिद्वंदी माना जा रहा है | इस साल के अंत में होने जा रहे चुनाव में जहाँ ओबामा के सामने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज करने की चुनौती खड़ी है वहीँ रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी डेमोक्रेट्स को हराने के लिए अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में लगा रहे हैं | जहाँ ओबामा अपने चार साल के कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड जनता के बीच ले जाकर अपनी उपलब्धियो का बखान कर रहे हैं वहीँ मिट रोमनी ओबामा की नाकाम नीतियों को कटघरे में खड़ा करके उन्हें कड़ी चुनोती दे रहे हैं |

बीते दिनों विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और उनके पति बिल क्लिंटन के साथ सीनेटर जान कैरी ने ओबामा के पक्ष में झुकाव दिखाते हुए अमेरिकी जनता से उन्हें दुबारा राष्ट्रपति चुने जाने की अपील की वहीँ लुसियाना के गवर्नर बाबी जिंदल ने ओबामा की नीतियों पर सीधा वार करते हुए कहा कि पिछले चार साल में ओबामा की लोकप्रियता का ग्राफ घटा है और चुनाव से पूर्व उनके द्वारा किये गए वादे भी पूरे नहीं हुए हैं लिहाजा अमेरिकी नीतियों के मामले में भारी अव्यवस्था देखने को मिली है | इसके बचाव में पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कहा कि इसके लिए ओबामा दोषी नहीं हैं | उन्होंने कहा कि ओबामा को ख़राब अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी अतः जनता उन्हें दुबारा मौका दे जिससे अमेरिका का पुराना वैभव फिर से वापस आ सके | यह दोनों बयान इस बात को बताने के लिए काफी हैं कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिकी अर्थव्यवस्था के इर्द गिर्द पूरी चुनावी कम्पैनिंग घूमेगी | आर्थिक नीतियों की यही दुखती रग है जो ओबामा की सबसे बड़ी मुश्किल इस दौर में हो चली है क्युकि चार साल पहले जिन उम्मीदों के साथ अमेरिकी जनता ने उन्हें राष्ट्रपति चुना था वह उम्मीदें बिगड़ी अर्थव्यवस्था के चलते धराशाई हो गई हैं | ऐसे में ओबामा के सामने जनता तक अपनी बात सही रूप में पहुचाने की बड़ी चुनोती सामने है | अमेरिकी आर्थिक नीतियां जहाँ इस दौर में पटरी से उतरी दिखी वहीँ संघीय खर्चो पर बीते चार बरस में पहली बार नकेल कसी हुई दिखी जिसकी सीधी मार विकास दर पर पड़ी | यही नहीं अमेरिका में बेरोजगारी के लगातार बढ रहे आंकड़ो ने भी हाल के वर्षो में ओबामा के सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा किया है क्युकि वहां के फेडरल रिजर्व के चेयरमेन बेन बर्नान्क ने खुद बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ो पर चिंता जताई है | जून जुलाई में ब्यूरो ऑफ़ लेबर स्टेटिक्स द्वारा बताये गए आंकड़े भी भयावहता की तस्वीर आँखों के सामने पेश करते हैं | इसको अगर आधार बनाये तो २००९ में आर्थिक मंदी आने के बाद से अमेरिका में रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं | अमेरिका का राष्ट्रपति चुने जाते समय ओबामा के कार्यकाल में जहाँ १४.३ फीसदी बेरोजगारों की तादात थी वहीँ २०१० में यह बढकर १४.८ फीसदी तक जा पहुची | आज यह आंकड़ा १५ फीसदी पार कर चुका है जो यह बताता है की अमरीका में हालात कितने बेकाबू हो गए हैं |

नए राष्ट्रपति चुनाव में भी अर्थव्यवस्था की छाप साफतौर से दिखाई दे रही है | वोटरों को रिझाने के लिए दोनों प्रत्याशी अपना सारा जोर अर्थव्यवस्था सुधारे जाने पर दे रहे हैं क्युकि बेरोजगारी, विकास दर भी सीधे इससे प्रभावित होते हैं | डेमोक्रेट्स ने जहाँ बीते चार बरस में इससे मुकाबले के लिए कोई बड़ी कार्ययोजना तैयार नहीं की वहीँ अब वह यह कह रहे हैं कि सत्ता में वापसी के बाद अमीरों के खर्चो में कटौती कर लगाकर की जाएगी | साथ ही उत्पाद पर कर कम किया जाएगा जिससे खर्च कम करने की कार्ययोजना को अमली जामा पहनाया जा सकेगा | वहीं रिपब्लिको ने सरकारी खर्चो पर सीधे कटौतियो की बात कही है | २०१२ की पहली तिमाही में अमेरिकी जीडीपी में १.७ फीसदी की बढोत्तरी दर्ज की गई | हाल ही में हुए चुनावी सर्वे में अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंदी मिट रोमनी पर बदत बनाये हुए देखे जा सकते हैं | रायशुमारी और सर्वे करने वाली संस्था गेलाप के अनुसार ५ में से ४ लोग अमरीकी मौजूदा आर्थव्यवस्था की हालत से संतुष्ट नहीं हैं | वोटर राष्ट्रपति किसे चुनेगा इसको लेकर भी कोई साफ़ लकीर नहीं खींच रहे हैं | मगर इतना जरुर है कि अर्थव्यवस्था इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा जरुर है | साथ ही घटते रोजगार के अवसर भी चुनाव प्रचार को सीधा प्रभावित कर रहे हैं | शायद ओबामा के पिटारे में इसके मुकाबले के लिए कई योजनायें हैं जिनमे वह ज्यादा कमाई करने वाले लोगो के टैक्स को बढ़ाकर ३९ फीसदी करने की बात कह रहे हैं | इसी साल यूरोप के साथ भी एक मुक्त व्यापार समझोता होने की उम्मीद उन्हें है जो ओबामा की साख को बदने का काम करेगी | उनके प्रतिद्वंदी रोमनी भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अपना रिपब्लिक फ़ॉर्मूला सुझा रहे हैं जिसमे अमीर लोगो को और कम टेक्स चुकाना पड़ेगा | २०१६ तक वह संघीय खर्चो में ५०० अरब डॉलर की कटौती कर लेंगे जिससे सरकारी व्यय घटकर २० फीसदी हो जाएगा |

भारतीय मूल की निक्की हेली और बाबी जिंदल रोमानी के पक्ष में खुलकर प्रचार अभियान चलाये हुए हैं | वहीँ इस चुनाव में ओबामा ने अपना एजेंडा साफ़ करते हुए कहा है रोजगार के अवसर ज्यादा बढ़ाना उनकी पहली प्राथमिकता रहेगी | एफ डी आई के द्वार भारत द्वारा खोले जाने को कई राजनीतिक विश्लेषक इसी नजर से देख रहे हैं | जहाँ तक हाल के वर्षो में ओबामा की विदेश नीति का सवाल है तो इस मोर्चे पर पहली बार ओबामा ने नई लीक पर चलने का साहस दिखाया है | वह ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं जिसने मुस्लिम राष्ट्रों का दौरा कर उनके साथ बीते दौर के गिले शिकवे भुलाकर एक नई पारी की शुरुवात कर जताया है कि अमरीका सभी देशो के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम करने की अपनी नीति का पक्षधर रहा है | यही नहीं अपने धुर विरोधी चीन, रूस की यात्रा द्वारा ओबामा ने यह जताया है कि वह बदलते दौर के मद्देनजर खुद को बदलने के लिए बेकरार खड़ा है | दुनिया के सभी देश बदल रहे हैं अतः उसे भी बदलना होगा नहीं तो यूरोप की तरह वह भी अर्श से फर्श पर आ सकता है |

अपने चार साल के कार्यकाल में ओबामा ने जहाँ ग्वांतानामो बे को बंद करने की बात दोहराई थी वहीँ उन्होंने २०१२ तक ईराक और अफगानिस्तान से सैनिको की वापसी का वादा सत्ता सँभालते समय किया था | इन दोनों वादों में वह खरा नहीं उतर पाए | वहीँ उनकी सबसे बड़ी कामयाबी आतंकवादियों के विरुद्ध कड़े रुख को दिखाने की रही जिसमे ओसामा बिन लादेन को पहली बार “ओपरेशन जेरोनेमो” के तहत मिली कामयाबी रही | उनके प्रतिद्वंदी रिपब्लिकन जहाँ ८ साल में ओसामा का ठिकाना नहीं खोज पाए वह काम उन्होंने दो साल के भीतर करके दिखाया | अगर अब ओबामा फिर से सत्ता में आते हैं तो इराक और अफगानिस्तान से अमरीकी सैनिको की वापसी २०१४ में हो सकती है | ओबामा ने खुद इसके लिए डेड लाइन तय की है | यह सभी ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ओबामा रोमनी पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं | वही उनके प्रतिद्वंदी रोमनी की चिंता इन दिनों हो रहे चुनावी सर्वे ने बढ़ा रखी है | गेलाप और ब्लूमबर्ग द्वारा हाल में किये गए सर्वे में ओबामा रोमनी से ६ अंक आगे हैं | यही नहीं नेशनल जर्नल चुनावी सर्वे में ओबामा को ७ अंको की बदत मिली है जिसे ओबामा की जीत की राह में अच्छा संकेत माना जा रहा है |

इस चुनाव पर पूरी दुनिया के साथ भारत की नजरें भी लगी हुई हैं | अगर ओबामा ने भारत को एशिया में बड़ा साझीदार माना है तो वहीँ रिपब्लिकन भी इस सच को नहीं झुठला सकते क्युकि बुश के कार्यकाल में ही पहली बार भारत और अमरीका की दोस्ती वाजपेयी के दौर में ही परवान चढी थी | उस दौर में न्यूक्लियर डील को अंजाम दिया गया था जो आज मनमोहनी इकोनोमिक्स कि छाँव तले आर्थिक सुधारो यानी एफ डी आई तक आगे बढ़ चुकी है | यकीन जानिए आज के दौर में अगर अमेरीका की सबसे बड़ी जरुरत भारत है क्युकि वह आज एशिया की उभरती ताकत है शायद इसी के चलते वहां के दोनों दल आज भारत को उसका एक बड़ा साझीदार मानने से गुरेज नहीं करते | फिलहाल व्हाइट हाउस की जंग इस साल अपने दिलचस्प मोड़ में खड़ी है | बड़ा सवाल यही से खड़ा होता है क्या ओबामा का जादू इस साल फिर वहां चलेगा ? कह पाना मुश्किल जरुर है लेकिन ओबामा रोमनी पर भारी पड़ रहे है | आगे क्या होगा कह पाना मुश्किल है क्युकि चुनाव में ऊट किसी भी करवट बैठ सकता है | तो इन्तजार कीजिये ६ नवम्बर का ………..

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