लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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मूर्ख होना हमारा ज्न्म सिद्ध अधिकार है और जो लोग इस अधिकार से वाकिफ हैं वे जन्म से ही

मूर्ख होते हैं|खुदा की मार से मैं पैदाइशी मूर्ख नहीं हुआ|मैं बुद्धीमान हूं यह बात मुझे तब मालूम पड़ी जब

मेरे स्कूल टीचर ने मेरे पिताजी एवं माताजी को बताया कि लड़का इंटेलीजेंट है|क्या बताऊं आपको मुझे तो

केवल मूर्ख होने में दिलचस्पी थी और मैं पैदाइशी मूर्ख हूआ नहीं इसलिये मूर्ख दिखने का ही हर सभव प्रयत्न करने लगा|मैंने जिस देश में गंगा बहती है फिल्म देखी थी|राजकपूर ने मूर्ख बनकर दुर्दांत डाकुओं को पुलिस

के हवाले करा दिया था एवं सरदार की नूरे चश्म पर ही हाथ साफ कर दिया था|जैसे आजकल पीपली

लाइव किसानों को आत्म हत्या करने को प्रेरणा दे रही है उन दिनों जिस देश में गंगा बहती है मूर्खता की

ओर अग्रसर होने को प्रेरित करती थी|

मूर्ख बने रहो और अपना उल्लू सीधा करते रहो आज यही समय की मांग है यह मानकर हम मूर्खता की पायदाने चढ़ते हुये मूर्ख श्रेष्ठ बनने की ओर अग्रसर हो रहे हैं किंतु हमारे शुभ चिंतकों को हमारा यह मिजाज

पसंद नहीं आ रहा है वे चाहते हैं कीहम मूर्खता की सभी सीमायें लांघकर ससार के सर्वश्रेष्ठ मूर्ख बन जायें|ऐसा ही कुछ पाकिस्तान ने कारगिल मैं नियंत्रण रेखा लाँघकर पाकिस्तान में किया था| जब मैं अपना लटकानी झोला टांगकर टुम्मक टुम्मक सड़क पर चलता हूं तो लोग मुझे मूर्ख अंकल के नाम

से संबोधित कर दुआ सलाम करते हैं किंतु लगता है कि मूर्खता में मुझसे कई लोग आगे हैं|उनमें से एक तो

मेरे परम मित्र मिसरजी ही हैं,भोला परसाद मिसर|जैसा नाम वैसे गुण बिलकुल भोले भाले हैं मिसरजी,बिना सींग की दुधारू गाय की तरह जितना भी दुहो पूँछ तक नहीं हिलाते|जो एक बार उनसे मिल लेता है उनका ही होकर रह जाता है|कभी कभी सड़क पर मिल जाते हैं,मैं पूछता हूं” मिसरजी का हाल हैं|”

जबाब मिलता है”आपकी किरपा है,आपको आसीरबाद है|”

उनके घर में दो कुर्सियां हैं|जब मैं उनसे घर पर मिलता हूं तो एक कुर्सी मेरी तरफ सरका देते हैं और खुद

दरी पर बैठे रहते हैं|दूसरी कुर्सी पर पोर्टॆबिल टी वी रखा है|सामान्यत: टी वी पर नेता या अफसर रखे जाते

हैं परंतु यहां पर टी वी का रखा होना शोध का विषय है|इस विषय पर कई लड़के लड़कियां पी.एच.डी. की

डिगरी हासिल करने के लिये शोध कर रहे हैं|हो सकता है बीवी की अनुपस्थिती में टी.वी रखा हो क्योंकि

घर में तो बीवी का ही सर्व प्रथम अधिकार है कुर्सी पर बैठने का|खर अपन को क्या करना शोध तो हो ही

रहा है|दूध का दूध पानी का पानी हो ही जायेगा|वैसे भी सभी दूध पानी हो जाये तो विशेष अंतर नहीं होने

वाला|

मैं कहता हूं” मिसरजी कुछ सामान की जरूरत है दे देगें क्या”?

“काहे सरमिंदा करते हो का चाहिये ?सबई आपका है”गुड़ की चासनी में पगे मीठे जबाब से हम गदगद हो

जाते हैं,सरकारी सामान है लेना देना तो चलता ही है|

“बस यार दो तीन बोरी नट बोल्ट दे दें तो हमारा काम हो जायेगा,कुछ काम रुके पड़े हैं”

“बस इतना सा सामान,अभी लो” उन्होंनें चौकीदार को चिट्ठी लिख दी,सामान तुरंत दिया जाये|उनकी

दरिया दिली क मैं कायल हो गया|चरण स्पर्श करने को लालायत हो उठा,पर नहीं किया|

चौकीदार को तलाशने गये तो श्रीमानजी छुट्टी पर थे| मुझे मालूम हुआ कि उसे छुट्टी मिसरजी ने ही दी है

है और स्टाफ को सख्त आदेश दिये है कि वे कितने ही पत्र भेजें किसी को सामान न दें|मुझे भी नहीं मिला|

मैंने मन ही मन मिसरजी को नमस्कार किया|मुझे लगा कि मिसरजी देश की बागडोर सम्हालने लायक हो गये हैं|वैसे भी वे घोर सामाजिक प्राणी हैं|इतने घोर सामाजिक कम ही मिलते हैं|नमस्ते करने में उन्होंने डाक्ट्रेट हासिल की है|जिस निरीह को उन्होंने नमस्ते कर दिया समझो उसका उद्धार हो गया|इतने प्रेम से नमस्ते करते हैं कि सामने या तो बेहोश हो जाता या अधमरा हो जाता है|उनका सोचना है ,मारना है तो नमस्ते से मारो बंदूक या तलवार से क्या मारना,मारना है तो मुस्करा के मारो क्रोध से क्या मारना|

हे भगवान मुझे भी शक्ति दे मुस्करा के मार सकूं और मूरख बना रह सकूं|

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