लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधेश्याम द्विवेदी
अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस प्रत्येक वर्ष ’18 मई’ को मनाया जाता है। संग्रहालय में हमारे पूर्वजों की अनमोल यादों को संजोकर रखा जाता है। यह दिवस विश्वभर में संग्रहालयों की भूमिका के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए प्रतिवर्ष मनाया जाता है। लोग तो चले जाते हैं, लेकिन उनकी यादें हमेशा बनी रहती हैं। यह यादें भी कई तरह से संजोकर रखी जाती हैं। हमारे पूर्वजों ने अपनी यादों को सुन्दर तरीक़े से संजोकर रखा, जिससे कि हम भी उनके बारे में जान सकें। ऐसी कई चीज़ें हैं, जो हमारे पूर्वज तो हमारे लिए रख कर गए, लेकिन उसे नुकसान ना पहुंचे, इसके लिए कई संग्रहालय बना दिये गए, जो हमें अपने पूर्वजों को याद रखने में मदद करते हैं।
संग्रहालयों की विशेषता और उनके महत्व को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 1983 में ’18 मई’ को ‘अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया था। इसका उद्देश्य आम जनता में संग्रहालयों के प्रति जागरुकता फैलाना और उन्हें संग्रहालयों में जाकर अपने इतिहास को जानने के प्रति जागरुक बनाना है। यह दिवस विश्वभर में संग्रहालयों की भूमिका के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए प्रतिवर्ष मनाया जाता है। ‘अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय परिषद’ के अनुसार, “संग्रहालय में ऐसी अनेक चीज़ें सुरक्षित रखी जाती हैं, जो मानव सभ्यता की याद दिलाती हैं। संग्रहालयों में रखी गई वस्तुएं प्रकृति और सांस्कृतिक धरोहरों को प्रदर्शित करती हैं।” इस दिवस का उद्देश्य विकासशील समाज में संग्रहालयों की भूमिका के प्रति जन-जागरूकता को बढ़ाना है और यह कार्यक्रम विश्व में काफ़ी समय से मनाया जा रहा है।
‘अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय परिषद’ 1992 से प्रत्येक वर्ष एक विषय का चयन करता है एवं जनसामान्य को संग्रहालय विशेषज्ञों से मिलाने एवं संग्रहालय की चुनौतियों से अवगत कराने के लिए स्रोत सामग्री विकसित करता है। वर्ष 2012 का विषय “बदलती दुनिया में संग्रहालय: नई चुनौतियाँ, नई प्रेरणाएँ” था। अनमोल यादों का संग्रह संग्रहालय में हमारे पूर्वजों की अनमोल यादों को संजोकर रखा जाता है। किताबें, पाण्डुलिपियाँ, रत्न, चित्र, शिला चित्र और अन्य सामानों के रूप में तमाम तरह की वस्तुएं संग्रहालयों में हमारे पूर्वजों की यादों को ज़िंदा रखे हुई हैं। हर देश की संस्कृति को समझने में कई वस्तुएं विशेष योगदान निभाती हैं, जिन्हें संग्रहालयों में ज़िंदा रखा जाता है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग मुख्य लेख : भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग भारत में भी ‘अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस’ पर तमाम तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य आम जनता, छात्रों एवं शोधार्थियों को विभिन्न संग्रहालयों में उपलब्ध समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की जानकारी देना है। आज के दिन ‘भारत सरकार’ के सभी संग्रहालयों में प्रवेश निःशुल्क कर दिया जाता है। ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ ने वर्ष 2011 के ‘अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस’ का विषय “संग्रहालय और स्मृति” (Museum and Memory) निर्धारित किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (भा.पु.स.) भारत की सांस्कृतिक विरासतों के पुरातत्वीय अनुसंधान तथा संरक्षण के लिए एक प्रमुख संगठन है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का प्रमुख कार्य राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों तथा पुरातत्वीय स्थलों और अवशेषों का रखरखाव करना है। इसके अतिरिक्त, प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के प्रावधानों के अनुसार यह देश में सभी पुरातत्वीय गतिविधियों को विनियमित करता है। यह पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 को भी विनियमित करता है। यह संस्कृति मंत्रालय के अधीन है।
राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों तथा पुरातत्वीय स्थलों तथा अवशेषों के रखरखाव के लिए सम्पूर्ण देश को 24 मंडलों में विभाजित किया गया है। संगठन के पास मंडलों, संग्रहालयों, उत्खनन शाखाओं, प्रागैतिहासिक शाखा, पुरालेख शाखाओं, विज्ञान शाखा, उद्यान शाखा, भवन सर्वेक्षण परियोजना, मंदिर सर्वेक्षण परियोजनाओं तथा अन्तरजलीय पुरातत्व स्कन्ध के माध्यम से पुरातत्वीय अनुसंधान परियोजनाओं के संचालन के लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित पुरातत्वविदों, संरक्षकों, पुरालेखविदों, वास्तुकारों तथा वैज्ञानिकों का कार्य दल है।
भारतीय पुरातत्वष पुरातत्वीेय स्थाल संग्रहालय संग्रहालय भारत में संग्रहालय की अवधारणा अति प्राचीन काल में देखी जा सकती है जिसमें चित्र-शाला (चित्र-दीर्घा) का उल्लेख मिलता है। किंतु भारत में संग्रहालय का दौर यूरोप में इसी प्रकार के विकास के बाद प्रारंभ हुआ। पुरातत्‍व विषय अवशेषों को संग्रहित करने की सबसे पहले 1796 ई. में आवश्‍यकता महसूस की गर्इ जब बंगाल की एशियाटिक सोसायटी ने पुरातत्‍वीय, नृजातीय, भूवैज्ञानिक, प्राणि-विज्ञान दृष्‍टि से महत्‍व रखने वाले विशाल संग्रह को एक जगह पर एकत्र करने की आवश्‍यकता महसूस की। किंतु उनके द्वारा पहला संग्रहालय 1814 में प्रारंभ किया गया। इस एशियाटिक सोसायटी संग्रहालय के नाभिक से ही बाद में भारतीय संग्रहालय, कोलकाता का जन्‍म हुआ। भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण में भी, इसके प्रथम महानिदेशक एलेक्‍जेंडर कनिंघम के समय से प्रारंभ किए गए विभिन्‍न खोजी अन्‍वेषणों के कारण विशाल मात्रा में पुरातत्‍व विषयक अवशेष एकत्रित किए गए।
‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग’ के तहत देश में 41 से अधिक संग्रहालय हैं। स्‍थल संग्रहालयों का सृजन सर जॉन मार्शल के आने के बाद हुआ, जिन्‍होंने सारनाथ (1904), आगरा (1906), अजमेर (1908), दिल्‍ली किला (1909), बीजापुर (1912), नालंदा (1917) तथा सांची (1919) जैसे स्‍थानीय संग्रहालयों की स्‍थापना करना प्रारंभ किया। भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण के एक पूर्व महानिदेशक हरग्रीव्‍स द्वारा स्‍थल-संग्रहालयों की अवधारणा की बड़ी अच्‍छी तरह से व्‍याख्‍या की गई है:
‘भारत सरकार की यह नीति रही है कि प्राचीन स्‍थलों से प्राप्‍त:- किए गए छोटे और ला-लेजा सकने योग्‍य पुरावशेषों को उन खंडहरों के निकट संपर्क में रखा जाए जिससे वे संबंधित है ताकि उनके स्‍वाभाविक वातावरण में उनका अध्‍ययन किया जा सके और स्‍थानांतरित हो जाने के कारण उन पर से ध्‍यान हट नहीं जाए।’ मॉर्टिन व्‍हीलर द्वारा 1946 में भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण (ए एस आई) में एक पृथक संग्रहालय शाखा का सृजन किया गया। आजादी के बाद, भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण में स्‍थल-संग्रहालयों के विकास में बहुत तेजी आई। वर्तमान में, भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण के नियंत्रणाधीन 41 से अधिक स्‍थल संग्रहालय हैं।
आगरा मण्डल इसकी स्थापना:-आगरा मण्डल जोकि प्रारंभ में उत्तरी मण्डल के नाम से जाना जाता था। इसकी स्थापना सन् 1885 में की गई। मण्डल का मुख्यालय 22 माल रोड, आगरा में स्थित है। प्रसिद्ध विद्धान आर. फ्रोड टकर, मुहम्मद शोएब, गोर्डन सैन्डर्सन, एच. हरग्रीव्स, जे. एफ. ब्लेकीस्टोन, जे. ए. पागे, मौलवी जफर हसन, एम. एस. वत्स, के. एन. पुरी, बी.बी. लाल, एस. सी. चन्द्रा, एस. आर. राव, एन. आर. बनर्जी, वाई.डी. शर्मा, डी. आर. पाटिल, डब्लू. एच. सिद्धीकी, समय -समय पर मण्डल कार्यालय के कार्यालयाधक्ष के रूप में पदासीन रहे है। वर्तमान में आगरा मण्डल उत्तर प्रदेश के 24 जिलों में स्थित 265 स्मारकों पुरास्थलों की देखभाल कर रहा है। उक्त कार्य के सफल संचालन हेतु ताजमहल, आगरा किला, एतमाद-उद-दौला, सिकन्दरा, फतेहपुर सीकरी, मथुरा, मेरठ एवं कन्नौज मण्डलों की स्थापना की गई है।
आगरा मण्डल के अन्तर्गत संग्रहालय:- वर्तमान में आगरा मण्डल के अन्तर्गत एक स्थलीय संग्रहालय ताजमहल परिसर में एक फतेहपुर सीकरी में स्थित है।फतेहपुर सीकरी संग्रहालय दीवान -ए- आम बुकिंग काउंटर के पास स्थि है। यह 9.00 से 5.00 बजे तक खोला जाता है। शुक्रवार बंद और प्रवेश सभी आगंतुकों के लिए नि:शुल्क है।
ताज संग्रहालय:- सर्वप्रथम भारत के वायसराय लार्ड कर्जन (1899-1905 ई.) के काल में ताज संग्रहालय की स्थापना ताजमहल के मुख्य प्रवेश द्वार के पश्चिम में स्थित दो षटकोणीय कमरों में की गई थी। कालांतर में खान बहादुर मौलवी जफ़र हुसैन- मानद क्यूरेटर एवं अधीक्षक, पुरातत्व सर्वेक्षण, उत्तरी मण्डल, आगरा, ने इस संग्रहालय को विकसित करने में बहुमूल्य योगदान दिया। उस समय संग्रहालय में आगरा के किले तथा ताजमहल की प्राचीन निर्माण योजनाओं का प्रारूप, पत्थर के नमूने, जड़ाऊ कार्य में उपयोग होने वाले औजार, कुछ रंगीन चित्र, शाही फरमान, सनद, (भूमि संबंधित अभिलेख/आलेख) आगरा के किले से मिले लेख, ताजमहल निर्माण में प्रयुक्त कीमती पत्थरों के नमूने पुराने चित्रों का संग्रह इत्यादि प्रदर्शित किए गए थे। वर्तमान ताज संग्रहालय पश्चिमी जलमहल में स्थित है, जो कि ताजमहल परिसर का ही अभिन्न अंग है यह एक दुमंजिला भवन है जो पश्चिमी दीवार के मध्य में एक ऊँचे आसन/मंच पर चतुष्कोणीय छज्जे के रुप में निर्मित है निचला तल संग्रहालय के तौर पर प्रदर्शित किया गया है, जबकि ऊपरी तल का उपयोग संग्रहालय के कार्यालय के तौर पर किया जाता है। वर्तमान में प्रदर्शित पूर्ण विकसित संग्रहालय ने अपना कार्य 18 सितम्बर 1982 से प्रारंभ किया था। संग्रहालय में प्रत्येक विषय को प्रदर्शित करने के लिए विशेष तौर पर दीर्घाऐं विकसित की गई हैं। संग्रहालय में मुख्य हाल के अलावा तीन दीर्घाओं को सम्मिलित किया गया है जिसमें प्रदर्शित अधिकतर सामग्री ताजमहल के निर्माण एवं मुगल काल से संबंधित है। मौटे तौर पर इसमें मुगल लघु चित्र, पांडुलिपियाँ, शाही फरमान, सनद सुलेखन/खुशनबीसी (कुरान की आयतें लिखने की शैली) के नमूने शस्त्र, बरतन, ताजमहल की निर्माण योजनाओं के प्रारूप एवं ताज परिसर के चित्र, पेंटिंग, पच्चीकारी (कीमती पत्थर-रत्न, इत्यादि जड़ना) कार्य, आगरा किले के दो संगमरमर खम्भों के पुरातन अवशेष प्रदर्शित किए गए हैं। मुख्य हाल-चहुल मजलिस (चालीस की सभा) की 1612 ई. की एक दिलचस्प पांडुलिपि भी प्रदर्शित की गई है जिसमें सम्राट शाहजहाँ (1628-1658) के हस्ताक्षर हैं और 4 फरवरी 1628 की तिथि के साथ शाही मुगल मोहर भी लगी हुई है, साथ ही अन्य महत्त्वपूर्ण शाही फरमान (आदेश), दस्तावेज, ब्रिटिश कलाकार डेनियल द्वारा सन् 1795 ई. में तैयार आरेख चित्र भी प्रदर्शन के लिए रखे गए हैं।
ताज संग्रहालय का आंतरिक दृश्य:- एक अन्य दिलचस्प जनरल पेरन का आदेश जो मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के काल का है जो ताजगंज के बगीचे के फलों की नीलामी के विवरण के आंकड़े प्रदर्शित करता है। शाहजहां के शाही फरमान जिसमें विभिन्न गांवों को दिए गए भूमि अनुदान एवं शेख हातिम को दिए गए अनुदान के वंशानुगत भूमि हक की अनुमोदित करने वाले फरमान भी दीर्घा में प्रदर्शन हेतु रखे गए हैं।
शाहजहाँ के दिनांक 1042 हिज़री (अगस्त 1632 ई.) के फरमान की प्रतिलिपियाँ जो जयपुर (राजस्थान) के राजा जय सिंह को संबोधित करते हुए जारी किया था। इसमें शाही इमारत ताजमहल निर्माण के लिए मकराना (मकराना तहसील, जिला नागौर, राज्य राजस्थान) से मकराना संगमरमर पत्थर की निरंतर आपूर्ति संबंधी निर्देश हैं भी प्रदर्शन के लिए रखी गई है। ताज महल की प्रतिमूर्ति के साथ ही एक विश्व मानचित्र भी प्रदर्शित किया गया है जिसमें ताजमहल निर्माण में प्रयुक्त विभिन्न जड़ाऊ कार्य के लिए कीमती पत्थरों को विश्व के किन-किन स्थानों से लाया गया था चिन्हित किए गए है साथ ही अर्ध कीमती पत्थरों के नमूने भी प्रदर्शित किए गए हैं।
दीर्घा 1:- खुशनवीसी (सुलेखन) कला, मिर्जा मुहम्मद सुलेमान (दारा शिकोह के बेटे) और मुहम्मद शाह (शाहजहाँ के दूसरे बेटे) शूजा अब्दुर रशीद दैल्मी, मुहम्मद हुसैन अल कातिब तथा मूलराज जैसे उस काल के सुप्रसि़द्ध खुशनवीसों का कार्य भी प्रदर्शन के लिए रखा गया है। कुछ जेड पत्थर और चीनी मिट्टी की वस्तुए जैसे जेड का नक्काशीदार कुरान रखने को स्टैण्ड, एक अलंकृत लोटा जिस पर जेड की सुन्दर नक्काशी की गई है, पत्थर पर जड़ा दर्पण कलाडान के कटोरे एवं बर्तन जो विषैले खाद्य पदार्थ के सम्पर्क में आने पर रंग बदल लेते थे या टूट जाते हैं, तलवारें, खंजर इत्यादि भी इस दीर्घा में प्रदर्शित किए गए हैं।
दीर्घा 2:- सम्राट शाहजहाँ (1628-1658 ई.) और उनकी सबसे प्रिय बेगम मुमताज महल दोनों की हाथी दांत पर उकेरी गई लकड़ी के फ्रेम में जड़े चित्र इस दीर्घा में प्रदर्शित है। प्रसिद्ध फारसी महाकाव्य फिरदौसी रचित शाहनामा का एक अन्य चित्र और सम्राट जहांगीर, शाहजहां एवं अन्य शाही परिजनों के सभी लघु चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं।
दीर्घा 3:- ताजमहल की वास्तुकला की विशेषताओं पर प्रकाश डालती निर्माण योजनाएं और रंगीन चित्राकृतियाँ इस दीर्घा में दिखाई गई हैं। साईट (कार्यस्थल) की योजना, गुम्बद की फ्रण्ट एलिवेशन (अग्रपृष्ठीय उभार) योजना एवं अन्य साइट योजना पर दर्ज विवरण भी प्रदर्शित किए गये हैं। अकबराबाद में ढाले गये सोने एवं चादी के कुछ सिक्के भी इस दीर्घा में प्रदर्शित किए गये हैं।

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