लेखक परिचय

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक, पांचजन्य के पूर्व संपादक तथा वरिष्ठ इतिहासकार देवेन्द्र स्वरूप जी भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के गहन अध्येता है। 88 वर्षीय देवेन्द्र स्वरूप जी के स्तम्भों को पांचजन्य में नियमित पढ़ा जा सकता है। वे राष्ट्रवादी पत्रकारिता के आधारस्तम्भ है। जीवन में सादगी, विचारधारा से क्रांतिकारी सोच लिए देवेन्द्र स्वरूप जी को विचारनिष्ठा में हिन्दुत्व, भारतीय संस्कृति तथा धर्मनिरपेक्षता पर विचार-विमर्श करते हुए सदैव देखा जा सकता है। प्रस्तुत है डा. मनोज चतुर्वेदी और डा. प्रेरणा चतुर्वेदी द्वारा साक्षात्कार का संपादित अंश-

डा. मनोज चतुर्वेदी- आप अपने प्रारंभिक जीवन के संबंध में बताएं?

देवेन्द्र स्वरूप जी- मुरादाबाद जिले में काठ एक गांव है वही मेरा जन्म 30 मार्च, 1926 को हुआ। 3 भाइयों एवं 3 बहनों में, मैं 5 वें स्थान पर हूं। मेरी माता जी एवं पिता जी दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया था। अत: दसवीं तथा बारहवीं दोनों ही वर्गों में मैं स्कूल से निष्कासित कर दिया गया था। उस समय स्वतंत्रता की लहर चल रही थी, तथा मैं उसमें शामिल हो गया।

डा. मनोज चतुर्वेदी- पत्रकारिता की शुरुआत कहां से हुर्इ?

देवेन्द्र स्वरूप जी- जब मैं इंटर में विज्ञान का चंदौली में विधार्थी था। उसी समय महाविधालय से निकलने वाली पत्रिका का संपादक बना दिया गया। मेरे मामाजी प्रकाशक थे, उन्होंने उस समय के वामपंथी विचारधारा की कर्इ पुस्तकों का प्रकाशन किया था।

डा. मनोज चतुर्वेदी- एकाएक वाराणसी में ही अध्ययन की योजना कैसे बन गर्इ?

देवेन्द्र स्वरूप जी- त्रिलोचन शास्त्री जी ने कहा कि आप काशी में जाकर अध्ययन के साथ समाज सेवा की शिक्षा प्राप्त करें। महामना द्वारा स्थापित काशी हिन्दू विश्वविधालय उस वक्त स्वतंत्रता सेनानियों का गढ़ था तथा काशी की पांडित्य परंपरा के प्रति लगाव ने मुझे वहां अध्ययन हेतु जाने के लिए प्रेरित किया। भारत में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान की किरणों का प्रचार-प्रसार काशी से हुआ है। इसीलिए काशी की महिमा का वर्णन प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक ग्रंथों में प्रचुर मात्रा में हुआ है।

डा. मनोज चतुर्वेदी- राष्ट्रीय आंदोलन में मीडिया की भूमिका के संबंध में आपका क्या कहना है?

देवेन्द्र स्वरूप जी- मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम एक राष्ट्रीय यज्ञ था। इस यज्ञ के पूर्ति के लिए तमाम पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। सरकार नेताओं से ज्यादा मीडिया से डरती थी। राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं में लाला लाजपत राय ने केसरी, महात्मा गांधी ने यंग इंडिया, नवजीवन तथा हरिजन, विपिन चंद्रपाल और अरविंद ने वंदे मातरम, शिव प्रसाद गुप्त ने आज, सी. वार्इ. चिंतामणि ने लीडर, महामना ने अभ्युदय, स्वामी करपात्री जी ने सन्मार्ग, जवाहर लाल नेहरू ने इंडिपेंडेंट तथा नेशनल हेराल्ड, गणेश शंकर विधार्थी ने प्रताप, बाल गंगाधर तिलक ने मराठा तथा केसरी का संपादन किया था। ऊपर तो मैं ने कुछ चुनिंदा पत्र-पत्रिकाओं का नाम ही गिनाया है। यदि हम राष्ट्रीय आंदोलन में भाषार्इ पत्रों के अवदान पर चर्चा करेंगे तो इनकी संख्या हजार से ऊपर तक पहुंच जाएगी। स्वतंत्रता संग्राम में सारे नेताओं का एक ही लक्ष्य था। देश और समाज की समस्याओं को जनता तक पहुंचाना। सन 1877 में वायसराय लार्ड लिटन ने प्रेस एक्ट बनाया जिसे बर्नाक्यूलर एक्ट कहा जाता है। आनंद बाजार पत्रिका रातों रात अंग्रेजी में आ गयी।

डा. मनोज चतुर्वेदी-आप जयप्रकाश आंदोलन के साक्षी रहे हैं। आपातकाल में मीडिया की क्या स्थिति थी?

देवेन्द्र स्वरूप जी- आपातकाल में मीडिया का बहुत दमन हुआ। लालकृष्ण आडवाणी बार-बार आपातकाल में मीडिया के संबंध में कहते हैं कि उनको झुकने के लिए कहा गया पर वे रेंगने लगे।

आपातकाल में मैं, बनवारी जी, कृष्ण कुमार, भानुप्रताप शुक्ल और रामशंकर अगिनहोत्री ने मिलकर प्रचार विभाग को संभाला। मुझे पंजाबीबाग का एसएचओ पहचानता था। क्योंकि मैं प्रयाग में प्रचारक रह चुका था। वही से वह मुझे पहचानता था पर भानुप्रताप शुक्ल और पं. रामशंकर अगिनहोत्री को उसने छोड़ दिया। इंदिरा गांधी ने आर.एस.एस. को कहा कि ये सभी भारत में दूष्प्रचार कर रहे हैं तथा यह तंत्र बहुत मजबूत है। हर शहर व प्रांत से बुलेटिनों का प्रकाशन हुआ। एवरीमैंस में प्रभाष जोशी व अनुपम मिश्र थे। जयप्रकाश आंदोलन में इंदिरा जी इंडियन एक्सप्रेस से बहुत चिढ़ी थी। क्योंकि जयप्रकाश और गोयनका जी में बहुत अच्छी मित्रता थी।

डा. मनोज चतुर्वेदी- मैं उस वक्त का पंचजन्य पढ़ रहा था। आपने श्रीराम जन्मभूमि के संबंध में भी एक लेख लिखा था। रामजन्म भूमि आंदोलन में मीडिया की क्या भूमिका रही?

देवेन्द्र स्वरूप जी- अयोध्या आंदोलन को भारत का स्वतंत्रता संग्राम कहा जा सकता है। श्रीराम ही भारत है। श्रीराम का वास भारत की कोटि-कोटि जनता में है। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को विराटता में ले जाने का श्रेय संत शकित को जाता है। जिस समय ढांचा गिरा। उस वक्त बी.बी.सी. के मार्क टुली भी वहां उपसिथत थे। वह अकलिपत दृश्य था। 2 से ढार्इ लाख से ऊपर जनता वहां थी। वह पूर्ण अनुशासित जनता का जमावड़ा था। कही भी भगदड़ नहीं हुर्इ। लेकिन मीडिया ने उसे सकारात्मक-नकारात्मक रूप से दिखाया टार्इम्स आफ इंडिया के संपादक दिलीप पांडगांवकर ने इंग्लैंड में वी. एस. नायपाल तथा निरद सी चौधरी का लंबा साक्षात्कार प्रकाशित किया।

मीडिया ने रामजन्मभूमि आंदोलन की घटना को भारतीय इतिहास की युगांतकारी घटना कहते हुए समर्थन किया।

डा. मनोज चतुर्वेदी- अन्ना आंदोलन और मीडिया के बारे में आपका क्या कहना है?

देवेन्द्र स्वरूप जी- अन्ना हजारे द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को समाचारपत्रों एवं इलेक्ट्रानिक चैनलों ने प्रमुखता से प्रचारित-प्रसारित किया है। मीडिया ने भ्रष्टाचार पर बहुत ही प्रभावी भूमिका निभार्इ है।

देश में हो रहे घोटालों को मीडिया द्वारा जनता के समक्ष लाया गया है। तभी तो देश भर के नौजवान अन्ना हजारे के साथ खड़े हो गए तथा आंदोलन में शामिल हुए। मीडिया ने मजबूत लोकपाल के लिए जनजागरण किया। उसने जनता को बताया कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए जनलोकपाल का होना राष्ट्रहित में है।

 डा. मनोज चतुर्वेदी- पेड न्यूज के बारे में !

देवेन्द्र स्वरूप जी- यधपि व्यवसायिकरण ने मीडिया की मिशनरी भूमिका को प्रभावित किया है तथा कुछ अखबार पैसा लेकर समाचार छापते हैं। जो कि पत्रकारिता के लिए ठीक नहीं है। इसके लिए कड़े कदम उठाने होंगे। प्रभाष जोशी और राम बहादुर राय ने पेड न्यूज के खिलाफ जन जागरण किया था।

डा. मनोज चतुर्वेदी- आप संघ के स्वयंसेवक कब बने?

देवेन्द्र स्वरूप जी- मैंने सन 1947 में काशी हिन्दू विश्वविधालय से बी.एससी, (फिजिक्स, केमेस्ट्री और जीयोलाजी) किया। उस समय वहां सर्वपल्ली राधा—ष्णन कुलपति थे। चिंतामणि शर्मा और विजयेंद्र लाहौटी ये दोनों मेरे मित्र हैं। विजयेंद्र जी मेरे इंटर के सहपाठी हैं। वहीं संघ का स्वयंसेवक बना।

डा. मनोज चतुर्वेदी- आपको दो बार छात्र जीवन में निष्कासन के दंश को झेलना पड़ा।

देवेन्द्र स्वरूप जी- हां, 10 वीं तथा 12 वीं में मुझे हार्इ स्कूल तथा इंटर से निष्कासित कर दिया गया था लेकिन कुछ ही समय के बाद मुझे परीक्षा देने की अनुमति मिल गर्इ।

डा. मनोज चतुर्वेदी- संघ के प्रचारक कब निकले?

देवेन्द्र स्वरूप जी- सन 1947 में मैं संघ का प्रचारक निकला। मेरे साथ यादवराव देशमुख भी प्रचारक निकले थे। मैं जब गाजीपुर में जिला प्रचारक था तो वहां रहते ही संघ पर प्रतिबंध लगा। मैं गाजीपुर जेल में 6 माह तक रहा। भाऊराव जी ने कहा कि 2 अक्टूबर, 1948 से चेतना का प्रकाशन काशी से हो रहा है। मैं चेतना से जुड़ गया। राजाराम द्रविड़ उसके संपादक थे। वे पका महाल में रहते थे तथा गांडीव के पास ही आस भैरो में चेतना का दफ्तर था। स्वर्गीय भगवान दास अरोड़ा जी गांडीव का प्रकाशन-संपादन करते थे। जब 1948 में संघ ने सत्याग्रह शुरू किया तो अटल जी अंडरग्राउंड हो गए तथा चेतना के संपादन की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गर्इ।

सत्याग्रह के बाद संघ ने पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु किया। भाऊराव जी प्रांत प्रचारक थे। उन्होंने कहा कि एक माह लखनऊ में दीनदयाल उपाध्याय के साथ काम कर लो। फिर चेतना में लगना पडे़गा। उस वक्त मैं गाजीपुर बलिया में विधार्थी परिषद का काम देख रहा था। जब मैं लखनऊ गया तो वही हिन्दुस्थान समाचार शुरु हुआ था। वहां मैं कार्यालय में जाता था। सदर बाजार में राष्ट्रधर्म का कार्यालय था। वहीं नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी इत्यादि वरिष्ठ कार्यकर्ता रहते थे। जब मैं गाजीपुर जेल में था तो वहीं सरयू पांडे जी से मेरा परिचय हुआ।

डा. मनोज चतुर्वेदी- आपने एम.ए. तथा पी.एच.डी कब की ?

देवेन्द्र स्वरूप जी- मैंने 1961 में लखनऊ विश्वविधालय से इतिहास विषय में एम.ए. तथा प्राचीन भारत में राष्ट्रीय एकता की प्रक्रिया पर शोध कार्य पूर्ण किया। सन 1951 में जनसंघ के प्रांतीय कार्यालय में मैं प्रचार विभाग में आ गया, फिर 1958 में पंचजन्य में तिलक सिंह परमार के साथ जुड़ गया फिर वचनेश त्रिपाठी के साथ बाद में मैं संपादक बना। सन 1950 में प्रयाग विश्वविधालय में विधार्थी प्रमुख के नाते कार्य किया। सन 1952 में देहरादून में जि.प्र., वहां मैं 1952-54 तक रहा। फिर 1954 में ही प्रयाग में नगर प्रचारक के रूप में आ गया।

जब मैं पंचजन्य में था तो पंचजन्य में संघ कार्यपद्धति पर एक लेख लिखा। लेकिन उसमें संघ का कहीं भी नाम नहीं है। वह लेख मेरी पुस्तक संघ- बीज से वृक्ष तक में संकलित है। उसमें मैंने यह प्रश्न उठाया कि संघ की यह कार्यपद्धति अप्रसांगिक है। सन 1961 में जब मैंने पी.एच.डी की तो भाऊराव देवरस जी ने कहा कि तुम पंचजन्य का काम देखों। मैंने कहा कि मेरे ऊपर परिवार की जिम्मेदारी है।

जब मैंने यह निश्चय किया कि मैं भारतीय इतिहास का अध्ययन करुंगा तो मैंने बी.एच.यू. में प्रयास किया लेकिन मेरा वहां नामांकन नहीं हुआ। यह इसलिए कि 14 वर्षों का एक लंबा अंतराल था। एक समस्या यह भी आर्इ की मैं बीएस.सी था और एम.ए (इतिहास) करना चाहता था। उस समय दंत चिकित्सक बनर्जी नगर संघचालक थे। मैंने अपनी समस्या बतार्इ। उन्होंने उस समय के कुलपति की दंत चिकित्सक की थी। बहुत प्रयास के बाद भी बी.एच.यू. में मेरा नामाकंन नहीं हो सका। उसके बाद मैंने लखनऊ विश्वविधालय से एम.ए (इतिहास) किया। सन 1960 में मैं स्वतंत्र भारत से जुड़ा। ललन प्रसाद व्यास जी के साथ मैं काम करने लगा। सन 1961 में मेरी शादी हो गर्इ तथा 1964 में मैं दिल्ली आ गया।

डा.मनोज चतुर्वेदी-दिल्ली में आते-आते आपकी नौकरी लग गर्इ या नौकरी के लिए संघर्ष भी करना पड़ा ?

देवेन्द्र स्वरूप जी- जब मैं नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जा रहा था तो सोचा कि झंडेवालान में दीनदयाल जी से मिल लूं। दीनदयाल जी ने कहा कि साक्षात्कार में धोती में मत जाओ। कोर्इ तुम्हें नौकरी में नहीं रखेगा। अपना पोशाक बदलो मैं बहुत असमंजस में पड़ गया। माधव राव जी मुले उस वक्त प्रांत प्रचारक थे। उनका एक भार्इ था। उससे मैं पैंट-शर्ट लेकर साक्षात्कार देने गया फिर मैंने पटरी पर से पैंट-शर्ट लिया। हां, लेकिन एक वर्ष के बाद ही मैं भारतीय पोशाक में आ गया।

 डा. मनोज चतुर्वेदी- संघ और मीडिया के संबंध में आपका क्या विचार है ?

देवेन्द्र स्वरूप जी- संघ का जन्म एक कर्म आंदोलन के रूप में हुआ। डा. साहब ने व्यकितगत संपर्क के द्वारा संघ विस्तार को प्राथमिकता दी। सन 1947 तक संघ ने कोर्इ अखबार नहीं निकाला। हिन्दी में राष्ट्रधर्म पहले शुरु हुआ तथा अंग्रेजी में आर्गनाइजर का प्रकाश हुआ। दिल्ली में ही भारतवर्ष नाम से एक दैनिक का प्रकाशन हुआ था। सन 1948 में मकर संक्रांति के दिन पंचजन्य का शुभारंभ हुआ।

अब तक संघ की छवि बुद्धिहीनों के संगठन के रूप में थी। सन 1948 में ही दादा साहब आप्टे ने हिन्दुस्थान समाचार नामक बहुभाषी संवाद समिति शुरु की। जो सहकारिता से काम करने वाली सबसे बड़ी संवाद समिति थी।

सन 1948 में संघ ने लगभग सभी भारतीय भाषाओं में एक साथ पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु किया। उनमें से -जालंधर से आकाशवाणी, लखनऊ से पंचजन्य वाराणसी से चेतना, पटना से प्रवर्तक, जबलपुर से उषाकाल, अकोला से सुदर्शन (मराठी), बड़ौदा से सावधान (गुजराती), युगधर्म नागपुर से (हिन्दी), कलकता से स्वसितका, गुवाहाटी से शंखनाद, स्वदेश मध्य प्रदेश से तथा तरूण भारत (मराठी) का प्रकाशन नागपुर तथा पुणे से हुआ। तब लोगों को लगा कि संघ के पास भी बौद्धिक क्षमता से ओत-प्रोत कार्यकर्ताओं की लंबी फौज है।

डा. मनोज चतुर्वेदी- नाना जी से आपका परिचय कब हुआ?

देवेन्द्र स्वरूप जी- जब मैं काशी में संघ का प्रशिक्षण ले रहा था वही नानाजी के पहले दर्शन मुझे हुए। जब मैं 1948 में लखनऊ में आया तो मैं नाना जी के और करीब हो गया। हां, जब 1951 में मैं जनसंघ प्रांत. कार्यालय लखनऊ में आया तो मेरा ठीक तरह से नानाजी से परिचय हो गया। फिर तो वह संबंध लगातार बढ़ता ही गया। नानाजी बराबर कहां करते थे कि मैं 10 वीं पास हूं पर रर्इस लोग उनके चारों और चक्कर लगाते रहते थे। कभी-कभी जब खाने का मन होता तो हमको हजरतगंज में बुला लेते थे।

डा. प्रेरणा चतुर्वेदी- इस समय आप क्या कर रहे है तथा भविष्य में क्या करने की योजना है ?

देवेन्द्र स्वरूप जी- इस समय मैं महात्मा गांधी (1931-34) के जीवनकाल का अध्ययन कर रहा हूं। क्योंकि यह कालखंड राष्ट्रीय दृषिट से महत्वपूर्ण है। महात्मा जी 1930 के नमक सत्याग्रह में टाप पर थे। इरविन के साथ समझौता करके ब्रिटिश कुटनीति के जाल में फंस गए। उन्होंने 1934 में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। यह कालखंड महात्मा गांधी का महत्वपूर्ण कालखंड है।

मैं वेद विधा तथा पुराण विधा दोनों एक दूसरे के पूरक कैसे है तथा भारत की ज्ञान यात्रा ब्रहम विधा तक कैसे पहुंची? इन्हीं दोनों विषयों पर लिखने की मेरी योजना है।

डा. प्रेरणा चतुर्वेदी- भारत का भविष्य कैसे दिखार्इ दे रहा है?

देवेन्द्र स्वरूप जी- पिछले 65 वर्षों की राजनीतिक यात्रा को देखें तो भारत अपने राजनीतिक लक्ष्यों से लगातार पीछे जा रहा है। क्योंकि ब्रिटिश संसदीय प्रणाली के प्रभाव ने देश के सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, भार्इ-भतीजावाद तथा धनबल और बाहुबल को बढ़ावा दिया है। इसने व्यकितवाद रूपी दुर्बलता को मजबूत किया है। अगर भारत इस प्रणाली का विकल्प नहीं खोजता तो भारत, भारत के रूप में जीवित नहीं बचेगा। यदि हमें भारत को विश्व गुरु के रूप में देखना है तो हमें प्रबल बौद्धिक एवं सामाजिक आंदोलन करना होगा। यह गैर राजनीतिक लोकशाही के द्वारा ही संभव हो सकता है। इस विषय पर देश भर से मेरी चर्चा हुर्इ है।

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1 Comment on "देवेन्द्र स्वरूप जी से डा. मनोज चतुर्वेदी एवं डा. प्रेरणा चतुर्वेदी की बातचीत."

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डॉ. मधुसूदन
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देवेन्द्र जी की, समर्पित जीवनी, प्रेरणा की महक ही फैलाती है.
सादर चरण स्पर्श.

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