लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

ईरान पर लगे प्रतिबंध हटने के साथ ही विश्वस्तरीय कूटनीति में नए दौर की शुरूआत होने की उम्मीद बढ़ गई है। पिछले साल जुलाई में ईरान और अमेरिका,यूरोपीय संघ और छह बड़ी परमाणु शक्तियों के बीच हुए समझौते ने एक नया अध्याय खोलने की भूमिका रची थी। इसे ‘संयुक्त व्यापक कार्रवाई योजना‘ नाम दिया गया था। इसकी शर्तों के पालन में ईरान ने अपना विवादित परमाणु कार्यक्रम बंद करने की घोषणा की थी। बदले में इन देशों ने ईरान पर लगाए गए व्यावसायिक प्रतिबंध हटाने का विश्वास जताया था। अब इस समझौते पर अमल की शुरूआत हो रही है। इस पहल से ईरान और पष्चिमी देशों के संबंध बेहतर होंगे। इसका असर खाड़ी के अन्य देशों पर भी दिखाई देगा,क्योंकि अब तक यहां अमेरिकी कूटनीति प्रभावित हो रही थी। अब उम्मीद है कि ईरान इस्लामिक आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में अहम् भूमिका निभाएगा।

प्रतिबंधों के बाद से ईरान अलग-थलग पड़ गया था। इसी दौर में ईरान और ईराक के बीच युद्ध भी चला,जिससे वह बरबाद होता चला गया। यही वह दौर रहा जब ईरान में कट्टरपंथी नेतृत्व में उभार आया और उसने परमाणु हथियार निर्माण की मुहिम शुरू कर दी। हालांकि ईरान इस मुहिम को असैन्य ऊर्जा व स्वास्थ्य जरूरतों की पूर्ति के लिए जरूरी बताता रहा था,लेकिन उस पर विश्वास नहीं किया गया। प्रतिबंध लगाने वाले राष्ट्रों के पर्यवेक्षक समय-समय पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का निरीक्षण करते रहे,लेकिन उन्हें वहां संदिग्ध स्थिति का कभी सामना नहीं करना पड़ा। बावजूद ये देश प्रतिबंध हटाने को राजी नहीं हुए। यहां गैरतलब बात यह भी है कि परमाणु कार्यक्रम के बहाने ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाले सभी देश खुद परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। अंत में आशंकाओं से भरे इस अध्याय का पटाक्षेप तब हुआ जब अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने निगरानी के बाद यह कहा कि ईरान ऐसे किसी परमाणु कार्यक्रम का विकास नहीं कर रहा है,जिससे दुनिया का विनाश संभव हो।

इस समझौते की प्रमुख शर्त है कि अब ईरान 300 किलोग्राम से ज्यादा यूरेनियम अपने पास नहीं रख सकेगा। ईरान अपनी परमाणु सेन्ट्रीफ्यूजन प्रयोगशालाओं में दो तिहाई यूरेनियम का 3.67 फीसदी भाग ही रख सकेगा। यह शर्त इसलिए लगाई गई है,जिससे ईरान परमाणु बम नहीं बना पाए। दरअसल यूरेनियम की प्राकृतिक अवस्था में 20 से 27 प्रतिशत ऐसे बदलाव करने होते हैं,जो यूरेनियम को खतरनाक परमाणु हथियार में तब्दील कर देते हैं। ईरान ने यूरेनियम में परिवर्तन की यह तकनीक बहुत पहले हासिल कर ली है। इसी शंका के चलते वह अब उस मात्रा में यूरेनियम रख ही नहीं पाएगा,जिससे आसानी से परमाणु बम बना ले।  सबसे अहम् शर्तों में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षकों को परमाणु सेन्ट्रीफ्यूजन के भंडार,यूरेनियम खनन एवं उत्पादन की निगरानी का  भी अधिकार है। यह शर्त तोड़ने पर ईरान पर 65 दिनों के भीतर फिर से प्रतिबंध लगाने की शर्त भी प्रारूप में दर्ज है। उसे मिसाइल खरीदने की भी छूट नहीं दी गई है। ईरान के सैन्य ठिकाने भी संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में होंगे। साफ है ईरान ने आर्थिक बदहाली के चलते ये शर्तें मानी हैं।

प्रतिबंधात्मक शर्तों से मुक्त होने के बाद ईरान को अब तेल और गैस बेचने की छूट मिल गई है। साथ ही ईरान सौ अरब डाॅलर की जब्त की गई संपत्ति का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र होगा। पष्चिम एशिया की बदल रही राजनीति ने भी ईरान और अमेरिका को निकट लाने का रास्ता खुल गया है। वैसे भी इराक में ये दोनों देश सुन्नी-मुस्लिम आतंकी संगठन आईएस के विरूद्ध जारी लड़ाई में मददगार हैं। अब नए करार से यह प्रगाढ़ता और बढ़ने की उम्मीद है। इसलिए इस करार के पालन में अनेक चुनौतियां संभावित हैं। करार से सबसे ज्यादा खफा सऊदी अरब है। आतंकियों और कटट्रपंथियों को हथियार व आर्थिक मदद सऊदी अरब ही करता है। इस करार से अमेरिका की रिपब्लिक पार्टी और ईरान के कटट्रपंथी भी प्रसन्न नहीं हैं। इसराइल इस समझौते को न केवल विरोध कर रहा था,बल्कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने करार को ऐतिहासिक भूल बताया है। बावजूद इस संधि को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। क्योंकि ओबामा पहले तो क्यूबा को विश्व की मुख्यधारा में लाए और अब ईरान को इस पथ का पथिक बना दिया है।

भारत और ईरान के बीच लंबे समय से राजनीतिक और व्यापारिक संबंध बने चले आ रहे थे। इन संबंधों में दूरी तब शुरू हुई,जब भारत को परमाणु शक्ति के रूप में उभरने के लिए अमेरिका के समर्थन की जरूरत पड़ी। यही वह दौर था,जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने राजस्थान के रेगिस्तान में परमाणु परीक्षण किया था। यह भारत द्वारा परमाणु बम बनाए जाने की पुष्टि थी। भारत के इस परीक्षण के बाद पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ने भी परमाणु बम बना लिए। यही वह समय था जब भारत परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयास में लगा था। इसलिए वह नहीं चाहता था कि ईरान भी परमाणु शक्ति संपन्न देश बन जाए। लिहाजा भारत को परमाणु निरस्त्रीकरण के मुद्दे पर अमेरिका के दबाव में ईरान के खिलाफ दो मर्तबा वोट देने पड़े थे। इस मतदान के समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार थी।

किंतु अब बदले हालात में भारत बिना किसी बाधा के ईरान से कच्चा तेल खरीद सकता है। भारत को अपनी खपत का लगभग 80 फीसदी तेल खरीदना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत इस वित्त वर्ष में करीब 90 लाख टन तेल खरीदेगा। ईरान से तेल खरीदा जाना सस्ता पड़ता है,इसलिए भारत को करीब 6300 करोड़ रूपए की बचत होने की उम्मीद है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भारत के तेल शोधक संयंत्र ईरान से आयातित कच्चे तेल को परिशोघित करने के लिहाज से ही तैयार किए गए हैं। गोया,ईरान के तेल की गुणवत्ता श्रेष्ठ नहीं होने के बावजूद भारत के लिए लाभदायी है। भारत और ईरान के बीच गैस सौदा भी लंबित है। भारत से ईरान तक रेल पटरी बिछाई जाने की योजना पर काम चल रहा है। हालांकि इन दोनों परियोजनाओं के पूरे होने की उम्मीद कम ही है,क्योंकि भारत ईरान के बीच बिछाई जाने वाली गैस पाइपलाइन पाकिस्तान होकर गुजरनी है,किंतु पाक में लगातार बढ़ते आतंकवाद के चलते ईरान अब इस पाइपलाइन संधि को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है।

ईरान तेल का बड़ा निर्यातक और खाद्यान्न वस्तुओं का आयातक देश है। तेल के अलावा ईरान की 400 वस्तुओं को वैश्विक बाजार मिलेगा। ईरान में खनिज संपदा के भी विविध भंडार हैं। ईरान भारत से बासमती चावल,सोयाबीन,शक्कर,मांस,हस्तषिल्प और दवाईयां बड़ी मात्रा में खरीदता है। भारत को इस निर्यात से सबसे बड़ा लाभ यह है कि सभी वस्तुएं तय मूल्य से 20 फीसदी अधिक मूल्य में निर्यात की जाती हैं। 2013-14 में यह निर्यात पांच अरब डाॅलर का था। प्रतिबंध हट जाने से इन वस्तुओं के निर्यात की मात्रा और बढ़ जाने की उम्मीद है। हालांकि अब दूसरे देशों के व्यापारी भी इस दिशा में पहल करेंगे इसलिए भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

भारत ईरान के साथ नए कूटनीतिक व रणनीतिक संबंधों को भी आगे बढ़ा सकता है। कुछ वर्ष पहले भारत ने ईरान में सामारिक मुद्दों के मद्देनजर चाबहार बंदरगाह का निर्माण अधूरा छोड़ दिया था। लेकिन भारत को अब इस बंदरगाह को फिर से विकसित करने की जिम्मेबारी लेनी होगी। क्योंकि चीन काशगर से लेकर पाकिस्तान के ग्वादर तक आर्थिक गलियारा तैयार कर रहा है। इसके लिए 46 अरब के बजट में से 11 अरब डाॅलर निवेश भी कर चुका है। यहां यह आशंका भी है कि चीन इस बंदरगाह से भारत पर खुफिया नजर भी रखेगा ? अलबत्ता भारत को वैकल्पिक समुद्री मार्ग के लिए जरूरी है कि वह भी चाबहार बंदरगाह को आधुनिक ढंग से विकसित करे। यहां से भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया के तुर्कनिस्तान एवं ताजिकिस्तान आदि देशों के लिए रास्ता खुल सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते साल इन देशों की यात्रा कर के मध्य एशियाई देशों से दोस्ती का हाथ भी बढ़ाया है। बहरहाल ईरान से प्रतिबंध हटना भारत की आर्थिक समृद्धि के लिए अच्छी खबर है।

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