लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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सतीश सिंह

 

वैसे तो भारत को आजाद हुए 63 साल हो गए हैं, फिर भी हम अभी तक मानसिक रुप से अंग्रेजों के गुलाम हैं। हमारे देश में अंग्रेजों के द्वारा बनाए हुए अधिकांश नियम-कानून आज भी अक्षरश: लागू हैं। जबकि आजादी के बाद से देश की आवो-हवा, हालत, आवाम की सोच व स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन आया है। पर अंग्रेजों के कायदे-कानून से हम और हमारे चुने हुए नुमाइंदे इतने प्रभावित हैं कि हमारी सरकार निर्विरोध बिना देश के बदले चेहरे पर नजर डाले अतार्किक नियम व कानून बना रही है।

गौरतलब है कि कीमतों को मापने वाला थोक मूल्य सूचकांक भी इसी तरह का एक कायदा है, जो अतार्किक तो है ही साथ में महंगाई को मापने में भी पूर्ण रुप से असफल है।

थोक मूल्य सूचकांक में उन्हीं वस्तुओं को शामिल किया जाता है जिसका लेन-देन बड़ी व्यापारिक इकाईओं के बीच होता है। इन वस्तुओं की संख्या 2400 है। इस सूचकांक से वस्तुओं की मांग एवं आपूर्ति पर नजर रखा जाता है। पुनष्च: इसकी सहायता से विनिर्माण क्षेत्र में होने वाले उतार-चढ़ाव पर भी निगाह रखा जाता है।

ज्ञातव्य है कि इस सूचकांक का मूल उद्देश्‍य है 2400 वस्तुओं की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को मापना। वह भी थोक स्तर पर होने वाली खरीद-बिक्री से संबंधित। ताकि महंगाई दर का पता चल सके।

जाहिर है थोक मूल्य सूचकांक थोक के भाव से बिकने वाले सामानों की कीमत का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय रिजर्व बैंक इसी मूल्य सूचकांक की मदद से अपनी मौद्रिक नीति की दशा और दिशा तय करता है। थोक मूल्य सूचकांक के मीटर पर वस्तुओं की कीमतों में आने वाले उतार-चढ़ाव को प्रत्येक सप्ताह गुरुवार के दिन दर्षाया जाता है, जिसका प्रभाव मुद्रार्स्फीति दर और शेयर बाजार दोनों पर पड़ता है।

 

 

लिहाजा थोक मूल्य सूचकांक का महत्व सरकार एवं भारतीय रिजर्व बैंक के लिए होना लाजिमी है। यहाँ विडम्बना यह है कि यह सूचकांक कभी भी महंगाई की वास्तविक तस्वीर जनता को बताने में सफल नहीं रहा है।

वस्तुओं की थोक भाव की कीमत और खुदरा भाव की कीमत में जमीन-आसमान का अंतर रहता है। आजादपुर सब्जी मंडी में जो भिंडी 20 रुपये किलो बिकती है वह दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले ग्राहकों तक पहुँचते-पहुँचते 50-60 रुपये किलो तक पहुँच जाती है। यही हाल गेहूँ और चावल से लेकर हर खाद्य पदार्थ का है। दूसरी वस्तुओं की भी यही कहानी है। स्पष्ट है खुदरा स्तर पर आए कीमतों में इस तरह के उछाल को थोक मूल्य सूचकांक कभी भी माप नहीं पाता है।

लब्बोलुबाव के रुप में कह सकते हैं कि गलत आंकड़ों से हम जिस तरह की तस्वीर बनाना चाहते हैं वह स्वभाविक रुप से कभी भी हकीकत बयां नहीं कर सकती है। कहने का तात्पर्य यह है कि गलत आंकड़ों से भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति भी गलत होगी और शेयर बाजार की हलचलों में भी हमेशा कृत्रिमता का मुल्लमा चस्पां रहेगा। साथ ही हम बेवजह मुद्रार्स्फीति के असंतुलन को लेकर विधवा विलाप करते रहेंगे।

अगर ‘देर आयद दुरस्त आयद’ वाली कहावत को प्रासंगिक माना जाए तो महंगाई मापने वाले नये मीटर यानि खुदरा मूल्य सूचकांक का हमें तहेदिल से स्वागत करना चाहिए। इस मीटर के आने के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि महंगाई की सही तस्वीर से कुछ हद तक हम जरुर रुबरु हो सकेंगे।

ध्‍यातव्य है कि विश्‍व के अन्य देषों के केन्द्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीति तैयार करने के लिए पहले से ही खुदरा मूल्य सूचकांक का सहारा ले रहे हैं। भारत की प्रख्यात रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के वरिष्ठ आर्थिक विष्लेशक डॉ डी के जोशी का मानना है कि ‘भारत में महंगाई के समग्र पैमाने की कमी थी।

नया महंगाई मीटर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की कमी को पूरा करेगा और यह महंगाई का सही मापक बन सकेगा, क्योंकि नये महंगाई मीटर से खुदरा स्तर पर वस्तओं की खरीद-बिक्री के दरम्यान होने वाले उतार-चढ़ाव को मापा जाएगा’।

उल्लेखनीय है कि थोक मूल्य सूचकांक से जिन वस्तुओं की महंगाई मापी जाती थी, उसका भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान महज 45 फीसद है। जबकि खुदरा मूल्य सूचकांक का दायरा काफी व्यापक है। सेवा क्षेत्र को भी इसके दायरे में लाया गया है।

पुन: घ्यान देने वाली बात यह है कि इस सूचकांक के अंतर्गत महंगाई की दर को मापने के लिए तैयारी मासिक आधार पर होगी आर्थात फरवरी, 2011 से खुदरा स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में होने वाली बढ़ोत्तारी को हर माह जोड़कर वार्षिक आधार पर महंगाई की दर जनवरी, 2012 में निकाली जाएगी। इस दृष्टिकोण से इस सूचकांक को अमलीजामा पहनाने में अभी एक साल की देरी है।

जानकारों का मानना है कि इस सूचकांक से महंगाई की वास्तविक तस्वीर उभर कर हमारे समक्ष आयेगी। जिससे भारतीय रिजर्व बैंक व सरकार को सही मौद्रिक नीति अपनाने तथा महंगाई को रोकने के लिए अन्यान्य नीतिगत कदम उठाने में सकारात्मक मदद मिलेगी।

सांख्यिकी तथा योजना कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार नए सूचकांक के तहत महंगाई की दर मापने के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के हिसाब से अलग-अलग मानक निर्धारित किए गए हैं।

इसी के बरक्स में 18 फरवरी को सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में बताया गया है कि खुदरा मूल्य सूचकांक का आधार 100 रहेगा और जनवरी, 2011 के लिए महंगाई की दर का निर्धारण 106 किया गया है। इसका मतलब यह है कि जनवरी, 2011 में महंगाई की दर मात्र 6 फीसद थी। यह निष्चित रुप से चौंकने वाला आंकड़ा है।

सभी जानते हैं कि पिछले महीनों में महंगाई का पारा आसमान को छूता रहा है और जनवरी माह में भी महंगाई डायन के बाणों से सभी बदहवास रहे हैं। अस्तु सरकार द्वारा जारी इस आंकड़े को पूर्णरुप से भ्रामक एवं अतार्किक कह सकते हैं।

स्पष्ट है इस गलतबयानी से खुदरा मूल्य सूचकांक की विश्‍वसनीयता हमेशा के लिए संदेह के घेरे में आ गई है। बावजूद इसके हम आशा कर सकते हैं कि जनवरी, 2012 तक आंकड़ों की इस बाजीगिरी में काफी हद तक कमी आयेगी और हम महंगाई के वास्तविक चित्र से अवगत हो पायेंगे।

 

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1 Comment on "मुश्किल है महंगाई को मीटर से मापना"

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himwant
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महंगाई को अधिक मेक्रो (व्यापक) दृष्टी से देखा जाना चाहिए. आत्मकेन्द्रित व्यक्ति की दृष्टी से महंगाई की विवेचना तथा देश की हितकारी अर्थ्तान्त्रिय दृष्टी से विवेचना में बड़ा अंतर है. में कृषि जन्य उत्पादों के मूल्यवृद्धि के पक्छ में हु. क्योकी आज के मूल्य किसानो.के खर्च की भी आपूर्ति नहीं करते/

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