लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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hindi-bhasha डा.राज सक्सेना

भाषा और लिपि में एक ऐसा अव्यक्त और अटूट बंधन है जो एक बार टूटा तो सब कुछ बिखर कर रह जाता है | यह स्वंय सिद्ध है कि भाषा का जन्म पहले हुआ और उसकी सार्वभौमिकता और एकात्मकता के लिये लिपि का आविष्कार सम्भव हुआ | अपनी  बोली या भाषा की सहीसही अभिव्यक्ति की कसौटी ही लिपि की सार्थकता है | वही लिपि  सर्वश्रेष्ठ  और सर्वमान्य होती है जो भाषा या बोली के सटीक और सहीसही उच्चारण के सन्निकट हो | आप बोलें कुछ और लिखें कुछ, यह न तो किसी बोली या भाषा के हित में है और न ही लिपि के | ऐसी लिपियां यदि उनमे समयसमय पर आवश्यकतानुसार परिवर्धन,परिवर्तन और सम्वर्धन न किये जायं तो दीर्घ जीवी नहीं होतीं | सत्ता के बल पर उन्हें आप कुछ दिनों जीवित रख सकते है, अधिक नहीं |

हिन्दी के साथ जन्म से ही यह विडम्बना रही है कि उसकी स्थिति जन्मना “निर्धन की पत्नी” सरीखी रही है | उससे कभी भी और कहीं भी किसी को भी मजाक कर लेने का खुला अधिकार प्राप्त है | वर्ष 1931 में तत्कालीन परिस्थितियों के अधीन प्रगतिशील लेखक संघ ने यह प्रस्ताव पारित किया कि हिन्दी की लिपि देवनागरीलिपि के स्थान पर रोमन स्वीकार करली जाय | विकट विरोध हुआ और इस अव्यवहारिक प्रस्ताव को कोई समर्थन न मिल सका,तब से कभी न कभी इस प्रस्ताव को किसी न किसी व्यक्ति या मंच से उठाया जाता रहा है | हद तो तब हुई जब स्वंय हिन्दी के ही विद्वान प्रोफेसर स्तर के लोग इसका खुला समर्थन करने और समाचारपत्रों में जनसमर्थन के लिये लेख छपवाने लगे | गत वर्ष इस प्रकार के कई लेख प्रकाशित हुए कि हिन्दी को रोमन लिपि में लिखना व्यवहारिक और समयानुकूल होगा |

यहां आपके संज्ञान में लाना समीचीन होगा कि रोमन अक्षरो को ढाई हजार वर्ष पूर्व सेमेटिकलोगों से ग्रीक लोगों ने अपनाया था | स्वंय इस लिपि को प्रयोग करने

वाले अनेक विद्वानों ने इसकी कमियों को उजागर किया है | डा. आर्थर मेक्नाल्ड ने  संस्कृत साहित्य के इतिहास में लिखा है,”400 ई.पू.पाणिनी के काल में भारत ने अप नी लिपि को वैज्ञानिक रूप से समृद्ध कर विकास के उच्चतम स्थान पर प्रतिष्ठित कर लिया था जबकि हम यूरोपियन लोग इस वैज्ञानिक युग में,ढाई हजार वर्ष बाद भी,उसवर्णमाला को गले लगाए हुए हैं , जिसे ग्रीकों ने पुराने सेमेटिक लोगों से अपनाया था,जो हमारी भाषाओं के समस्त ध्वनि समुच्चय का प्रकाशन करने में असमर्थ है | हम तीन हजार साल पुराने अवैज्ञानिक स्वर व्यंजन मिश्रण का बोझ आज भी अपनी पीठ पर लादे हुए हैं |”यह तो एक उदाहरण मात्र है अनेकों यूरोपिन विद्वानों ने रोमन लिपि की अपूर्णता सिद्ध की है और उसमें संशोधन या अन्यलिपि के प्रयोग पर बल दिया है |कुछ प्रमुख विद्वान सर ईसाक पिटमैन,हुक्स मैक्डानल थामस, एफ.एस.ग्राउसु,व्युलर हार्नले,जान शोर,तथा आइजैक टेलर सरीखे विद्वान इस कमी को उजागर करते रहे हैं |यहां तक कि सर बर्नाड शा जैसे विद्वान को यह वसीयत करनी पड़ी कि,”अंग्रेजी भाषा मे होने वाले 42 उच्चारणों के लिये जो व्यक्ति 42 अक्षरों की एक पूरी वर्णमाला तैयार कर देगा उसे वे अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा हिस्सा प्रदान करने को तैयार है | इधर भारत में जार्ज बर्नाड शा से बडे स्वंयभू विद्वान हिन्दी की लिपि रोमन करने की वकालत  करने में जुट गए हैं |

यह भी कटुसत्य है कि पहले ‘ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज नहीं डूबने’ और अब वैश्विक उदारीकरण की आंधी के कारण अंग्रेजी को सर्वव्यापकता और सार्वभौमिकता प्राप्त हुई है | जिसके कारण इसे रोजगार की भाषा बनते देर नहीं लगी ,और इस भाषा ने सर्वव्यापक भाषा का रूप ले लिया | धीरेधीरे इसने दुनिया के सारे व्यापार को अपने पंजे में जकड़ लिया, फलस्वरूप अंग्रेजी अधिकांश देशों की सम्पर्क भाषा बन गई | भारत में तो  ‘करेला नीम चढा हुआ था ‘|  दो सौ वर्षों के लगभग भारत की राजभाषा  रही  अंग्रेजी निहित स्वार्थों और जनसाधारण से सरकारी कामकाज को अपरिचित रखने की नीति के चलते यह दिन दूनी रात चौगुनी बढी और रोजगारपरक ढिंढोरे के कारण आज तक रानी  बनी हुई है | रोमन इसी की लिपि है, और यही सबसे बड़ी विडम्बना भी है | यह सही है कि  आज अंग्रेजी रूस से फ्रांस और लैटिन अमेरिका से जापान तक बोली और समझी जाती है |  इसकाएक मात्र कारण इसकी लिपि की सार्वभौमिकता ही, नहीं है  और न ही इसकी कोई ज्ञात या अज्ञात, कोई खूबी ही |

एक बहुत बड़ी विडम्बना यह भी है कि समयसमय पर गठित शिक्षा आयोगों की सबल शिफारिसों कि,”शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं को ही बनाया जाय और बच्चे की शिक्षा का माध्यम तो उसकी मातृभाषा को ही बनाया जाय |”को दर किनार करके हमारी अंग्रेजी स्वीकार्यता से ग्रसित सरकारें अंग्रेजी समर्थक थोड़े से नौकरशाहों के दबाव में इन सिफारिशों को लागू नहीं कर रही हैं |     फलस्वरूप   सरकारों का प्रश्रय पाकर अंग्रेजी खूब फल फूल रही है, अपनी जन्मजात कमियों के बावजूद भी | सरकारों के अंग्रेजी मोह और इसे नौकरी परक बना देने के कारण तथा परीक्षाओं का माध्यम बनाये रखने की वजह से “कोढ में खाज” की स्थिति आती जा रही है | आज गलीगली खुलने वाले अंग्रेजी के स्कूलों के कैम्पस में अंग्रेजी के अतिरिक्त कोई अन्य भाषा बोलने पर जुर्माना ठोकने वाले स्कूलों की संख्या लगातार बढ रही है | बच्चे अंग्रेजी प्रेमी और हिन्दी विमुख हो रहे  है | रही सही कसर हिन्दी मीडिया के “कान्वैण्टी प्रोडक्ट” हिन्दी को हिंग्लिश बनाने की सुपारी ले चुके, प्रस्तोता व्यक्ति पूरी कर रहे हैं | आज स्थिति यह है कि पूरे भारत के मध्यम और निर्धन वर्ग के कुछ हिस्से में अपने बच्चे को हिन्दी में बोलते देख कर मांबाप शर्म से सर झुका लेते हैं |

यह स्थिति तब है जब विश्व के भाषाविद और विद्वान देवनागरी लिपि के  ध्वन्यात्मक और सम्पूर्ण वैज्ञानिक गुणों के आधार पर नागरी लिपि को सर्वोत्तम मान  रहे हैं | जो बहुत थोड़े से परिवर्धन और परिवर्तन से ‘विश्व लिपि’ बनने की पूर्ण  क्षमता रखती है | यह भी स्मरणीय है कि प्रतिलेखन और लिप्यांतरण के दृष्टिकोण से देवनागरी लिपि अन्य उपलब्ध लिपियों से बहुत ऊपर है | रोमन और फारसी लिपियां तो इसके समक्ष कहीं भी नहीं ठहरतीं | जहां तक देवनागरी में जटिलता की दुहाई का प्रश्न है, मात्र समझाने के लिये रोमन में 26 अक्षर हैं | वास्तव में यदि स्माल और कैपिटल आदि पर विचार करें तो ये 26x 4=104 अक्षर बनते हैं | जो सर्वाधिक हैं और इतनी संख्या होने पर भी “जो बोला जाय वही लिखा जाय” उक्ति पर खरे नहीं  उतरते | जबकि देवनागरी लिपि में आप जो सोचते हैं, जो बोलते हैं या जो चाहते हैं वही लिख कर वही पढ भी सकते हैं | है किसी अन्य लिपि में यह विशेषता? जबकि देवनागरी विश्व की किसी भी भाषा में जो बोला जाय वही लिख सकने में पूर्णतया सक्षम है | वह भी तब, जब इसमें मात्र 52 अक्षर(14 स्वर और 38 व्यंजन)हैं | वस्तुतः ध्वन्यात्मक रूप से रोमन अत्यन्त दरिद्र लिपि है |

किन्तु हिन्दी और देवनागरी लिपि की दुर्दशा के लिये हम भी कम जिम्मेदार नहीं हैं | अपने बच्चों को,रोजगारपरक भाषा के रूप में अंग्रेजी को मानकर उसे जो  प्राथमिकता दे रहे हैं,उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं जिसे भारत की आने वाली पीढी को भुगतना पड़ेगा | जब देश में देवनागरी में हिन्दी लिखने वालों की अत्यल्पसंख्या रह जाएगी | आनेवाली नस्ल कभीकभार हिन्दी बोल तो लेगी मगर  लिखेगी रोमन में ही, क्योंकि उसे देवनागरी में लिखने की आदत ही नहीं रहेगी | फिर हिन्दी की जो दुर्दशाहोगी वह हृदयविदारण का पर्याय बन जायगी |देहरादून-डेहराडून  हो जाएगा | दिल्ली-डिल्ली हो जाएगी |रामदेव-रैमडेव हो जाएंगे |हरिद्वार-हरिडुआर  बोला जाएगा | गहलौत जी -गैहलौट जी पुकारे जाएंगे | अंग्रेजी की दरिद्रता के कारण,बलसाड़-बलसाड हो जाएगा | अहमदाबाद-एहमडाबाड पुकारा जाने लगेगा | सोन भद्रसोन-भडरा कहलाएगा और देश के अस्सी प्रतिशत संज्ञावाचक शब्द विकृत होकर रह जाएंगे | ऐसे बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं जिससे हिन्दी में अनेक विकृतियों का समावेश होकर वह भी हास्यास्पद स्थिति में पहुंच जाएगी | आज यह  स्थिति है कि जनता के अन्धानुकरण और शासन की अंग्रेजी परक तथा हिन्दी के प्रति उपेक्षित नीति के चलते  अंगुलियों पर गिने जाने योग्य अंग्रेजीभक्तों के, जो पहली  कक्षा से अंग्रेजी पढाना अनिवार्य करा चुके हैं,के रहते हिन्दी और विशेषरूप से देवनागरी लिपि पर इस समय संकट छाया हुआ है | हालांकि इससे बहुत निराश होने की आवश्यकता नहीं है,अधिक से अधिक 2025 साल यह संकट चलेगा | मगर इस 2025 साल के संक्रमणकाल से हिन्दी को प्रदूषित होने से बचाना  अब पहली प्राथमिकता  हो गई है | अगर अगले 2025 साल हमने अपनी शब्द सम्पदा को अंग्रेजी गिद्ध  का कौर बनने से बचा लिया तो हिन्दी बचेगी वरना इसे हिंग्लिश बनने से कोई नहीं रोक पाएगा |

आखिर कैसे बचे हमारी शब्द सम्पदा और शब्दों का उच्चारण | इसके लिए  रोमन के दो अक्षरों का मुख्य रूप से उदाहरण देना  उचित होगा यह अक्षर  हैं ‘टी’ और ‘डी’ | ‘टी’ अक्षर त और ट दोनों के लिये समानरुप से प्रयोग होता है | तो ‘डी’ द, ड और ड़ तीन अक्षरों का उच्चारण व्यक्त करके हिन्दी को प्रदूषित कर रहा है | अन्य भी कई उदाहरण हैं किन्तु वे गौण हैं |  यहां यह भी उल्लेख आवश्यक है कि हमने अंग्रेजी के प्रत्येक अक्षर को हिन्दी या देवनागरी के अक्षर का आधा मान कर उसके साथ  ए (a) अक्षर को जोड़ने की परम्परा डालकर ,हिन्दी का स्वरूप  बिगाड़ने की परम्परा का श्रीगणेश ,जानबूझकर स्वंय कर लिया था | फलस्वरूप वेद का वेदा,योग का  गा,पतंजलि का पतांजलि,कुन्दन का कुन्दना,नैनीताल का नैनी टाल,छत्तीस गढ का छ्ट्टीस गढ, बलसाड़ का बलसाड या उत्तराखण्ड का उट्टराखण्ड और कोलकाता का कोलकाटा  आदि लाखों नामों का उच्चारण प्रदूषित हो जाएगा और सही नाम हिन्दी की देवनागरी लिपि के हिन्दी शब्दकोश में मन समझाने और प्रमाणस्वरुप प्रदर्शन के लिए अगली पीढी को दिखाना पड़ा करेगा | तो आखिर इस अंग्रेजी की पूर्ण यौवनावस्था में चल रही महामारी से बचाव कैसे हो ? | क्या व्यवस्था की जाए कि हिन्दी बच जाय, अब

इतिहास में हिन्दी का नाम विलुप्त भाषा के रूप में अंकित होने से बचाने के लिए सब  से पहले हमें यह नियत करना होगा कि अंग्रेजी (रोमन) का एक अक्षर देवनागरी  के पूर्ण अक्षर के समान है | हमें स्कूल (   school  ) का ‘एस’ जो आधी ध्वनि देता है, को पूर्ण अक्षर उसी प्रकार मानना होगा, जैसे इसी शब्द का अंतिम अक्षर ‘एल’ पूर्ण ल की ध्बनि देता है | आग्रही अंग्रेजीभक्त तो रोमन अक्षरों में कुछ घटाबढी करेंगे नही | वे तो चाहते ही हैं कि हिन्दी भ्रष्ट हो | मगर हमें हिदी बचानी है तो रोमन के प्रत्येक  अक्षर को चाहे कितनी भी विवशता हो देवनागरी (हिन्दी) का पूर्ण अक्षर मानना ही होगा | आप के मन में विचार अवश्य आएगा कि इससे तो स्थिति बड़ा हास्यास्पद रूप ले लेगी | उदाहरणस्वरूप बरेली शब्द को इस स्थिति में लिखेंगे तो इस प्रकार  बी आर ई एल आई (यहां हम छोटी इ के लिये आई या वाई) और बड़ी ई के  लिए डबल ई( ee  ) निर्धारित कर सकते हैं |  इसी प्रकार रोमन अक्षरों में  हिन्दी के समान हलन्त या कोई और चिन्ह निर्धारित कर उन्हें अर्धाक्षर का रूप  दिया जा सकता है | अब इस प्रकार हम ‘बरेली’ को( ‘Breli’ या ‘Brely’)लिखेंगे |  आप कहेंगे यह तो बहुत अटपटा लगेगा, हमारा कहना है कि यह   ‘Bareilly’  से कम अटपटा लगेगा | इसी प्रकार लखनऊ के लिए Lkhnau लिखना Lucknow  से कम अटपटा लग सकता है और सरल भी, किसी विशेष शहर की स्पैलिंग रटने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, उच्चारण के अनुसार स्वमेव पुनः बिलकुल सही, उच्चारणयोग्य लिखा जा सकेगा | आदत पड़ जाने पर यह बी यू टीबट और पी यू टी पुट से कम अव्यहारिक लगेगा |

अब लेते हैं ‘टी’ का उदाहरण | ‘टी’ को जब हम त के लिये प्रयोग करें तो उसके नीचे t (अन्डर स्कोर)लगाकर त का उच्चारण निश्चित कर दें तो टी का बिना अन्डर स्कोर प्रयोग स्वमेव ट के लिए प्रयोग होना निर्धारित मान लिया जाएगा |   अब आते हैं ‘डी’ पर ‘डी’ स्वंय में तीन ध्वनियों के लिए प्रयोग किया जाता है | ‘द’,’ड’ और ‘ड़’ के उच्चारण हेतु |यदि डी ‘d’ को अन्डर स्कोर कर उसे ‘द’ के लिए, और डी ‘d.’ के नीचे डाट लगा कर उसे ‘ड़’ के लिए निर्धारित कर दें तो ‘डी’ स्वमेव ‘ड’ के प्रयोग के लिए अवशेष रह जाएगा और इसे ‘ड’ के लिए ही निर्धारित किया जा सकेगा | अब देखें क्या स्थिति बनती है अहमदाबाद लिखने केलिए हम निःसंकोचAHMDABADलिख व पढ सकेंगे |बलसाड़  के लिए BLSAD.लिखा जाएगा तो मुलुण्ड के लिए  MULUND ही ध्वनि निकलेगी |है ना कितना सरल | मगर यह सब हमें करना पड़ेगा अपनी इच्छाशक्ति और अपने दम पर ही, बिना सरकारी मदद के, अगर हिन्दी को बचाना है तो यह बदलाव और पहल हिन्दी वालों को ही करना पड़ेगी |

‘ध’ के लिए Dh ,ढ के लिए Dh  का प्रयोग किया जा सकता है |   इसी प्रकार  न के लिए N  और ण के लिए N  का प्रयोग सटीक रहेगा |जहां तक मात्राओं का प्रश्न है | छोटी’इ’के लिए ‘ i ‘ और बड़ी ‘ई’ के लिए ‘ ee ‘, ‘ए’ के लिए ‘e’ और ‘ऐ’के लिए ‘ey’ का प्रयोग उचित रहेगा |  इसी प्रकार अन्य विसंगतियों और उच्चारण दोष को समाप्त करने के लिए इस प्रकार के छोटेछोटे संशोधन करके अपने स्तर से ही शुरुआत कर के हमें  हिन्दी को बचाना होगा | तभी दूसरों से हमारे आग्रह करने पर यह किया जाना संभव होगा और फिर दीप से दीप जलेगा | पूरे देश में यह प्रयोग सफल होगा | हिन्दी  बचेगी तो देवनागरी बचेगी और सबसे बड़ी बात हिन्दी बची तो भारतीयता बचेगी |राष्ट्र बचेगा | राष्ट्रीय संस्कृति बचेगी वरना सब कुछ मटियामेट हो जाएगा | कोई नहीं बचा सकेगा |

 

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2 Comments on "जरूरी है हिन्दी बचाना"

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बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर

रोमन लिपि मे लिखी हुई हिन्दी बिलकुल निर्जीव लगती है।

डा.राज सक्सेना
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जी सही कहा आपने

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