लेखक परिचय

चैतन्‍य प्रकाश

चैतन्‍य प्रकाश

लेखक स्‍वतंत्र चिंतक हैं।

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चैतन्य प्रकाश

उत्तर भारत में ठंड का मौसम बूढ़े लोगों के अंतिम दिनों को काफी नजदीक ला देता है। सड़क पर, फुटपाथ पर रहने वाले शहरी गरीब ऐसी ठंडक से बचने के लिए छोटे-मोटे अपराध कर जेलों में चले जाते हैं। जो नहीं जा पाते हैं, वे किसी सवेरे ठंड से अकड़ कर दम तोड़ देते हैं।

प्राय: इस मौसम में शवयात्राओं की संख्या बढ़ जाती है। गरीब का मर जाना कोई खबर नहीं है। बड़े लोगों की तबीयत खराब होने से भी खबर बनती है। यों बेहिसाब मसले हैं जो कई-कई बरसों से खबरों में आने को मोहताज हैं। मगर खबरें अपनी सीमा खुद बनाती हैं, खुद तोड़ती हैं।

लगातार ऐसा महसूस होता है कि खबरें हंगामें रचती हैं, हंगामे लिखती हैं, हंगामे दिखाती हैं। खबरों का केन्द्रीय तत्व हंगामा है। ऐसा भी लगता है कि बहुत सारे हंगामें खबरों के लिए हैं, लगभग सारी खबरें हंगामों के लिए हैं। यह परस्पर पोषक और पूरक संबंध दिलचस्प है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि बंदरों में एक ‘सेरटानिन’ नामक विशेष हारमोन स्रावित होता है जिसके कारण बंदर दूसरों की उपस्थिति में सक्रिय हो जाता है, उछल कूद मचाता है। मनुष्यों में इस हारमोन की उपस्थिति से संबंधित शोध की जरूरत है। अपने देश का लोकतंत्र खबरों के लिए हंगामें करने की स्वतंत्रता का पर्याय बनता जाता है।

एक-दूसरे को दिखाने, चिढ़ाने के लिए आयोजन करने की भारतीय सामाजिक मानसिकता अपव्यय की बुराई के रूप में आज भी चलती है। जगह-जगह विवाह के आयोजनों की अतिभव्यता हमारे भीतर की अहंजनित रूग्णता को ही जाहिर करती है। हर वर्ष नये साल की पार्टियों में मदमस्त होती नई धनाढय पीढ़ी किसी उल्लास या आनंद से नाचती नहीं दिखती है। यों जगह-जगह पर जलसे नजर आते हैं।

राजनेताओं के जन्मदिनों, पदग्रहण समारोहों, अधिवेशनों इत्यादि की अपव्यय केन्द्रित, प्रदर्शनकामी भव्यता किसी समझदार को संताप दिये बिना नहीं रह पाती है। मानो पूरा देश जैसे हंगामा वृत्ति की भांग पीकर डोलता नजर आता है।

विनोबा ने ‘गीता प्रवचन’ में उल्लेख किया है, एक गांव देखने गये विदेशी दल के प्रतिनिधि ने चौपाल पर ताश खेलते लोगों को देखकर पूछा, ”क्या ये लोग इतने समृद्ध हैं कि इन्हें ताश खेलने का वक्त मिल जाता है?”

हमारी समृद्धि अभी आनी शेष है। मगर अंधाधुंध आयोजन-प्रियता का यह रोग समृद्धि की राह में भी रोड़ा है। इंसान अब भी फुटपाथ पर ठंड से ठिठुरकर मर रहा है। किसान कर्ज में डूब कर आत्महत्या कर रहा है और हम जश्न और जलसों में नाचते हैं, नशे में झूमते हैं। भीतर के आनंद और उल्लास से नहीं बल्कि बाहर से जुटाये झूठे और भ्रामक अहंकार के कारण।

क्या यह एक खबर नहीं है? यह खबर बाहर की नहीं अन्तर्जगत की है। देह के, मन के पार यह खबर बड़ी सनसनीखेज है…! आइए इसे सुनकर देखें! भीतर झांककर देखें!!

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2 Comments on "क्या यह खबर नहीं है?"

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swamisamvitchaitanya
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जब तक गरीबो के लोग राजनीती करते रहेगे तब तक गरीब और गरीबी बदती रहेगी यदि ये बात समझ में आ जाये की हम अपनी आमदनी के हिसाब से बच्चे पैदा करे जिनको हम अच्छी तालीम भी और बेहतर जीवन भी दे सके तो उस दिन से गिरिबो के किसी की राजनीति का शिकार नहीं होना पड़ेगा

jay prakash singh
Guest

chaitnya prakash ji ek buri bhartya vritti ko bhartiya shaily me vyakhya karane ke liye dhanyawad . ajkal vishleshan tarko se dabkar mar jate hai

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