लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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jazbaa_posterकलाकार: ऐश्वर्या राय बच्चन, इरफान खान, शबाना आजमी, चंदन रॉय सान्याल, जैकी श्रॉफ, अतुल कुलकर्णी, सिद्धार्थ कपूर
निर्माता: संजय गुप्ता, अनुराधा गुप्ता, ऐश्वर्या राय बच्चन
निर्देशक: संजय गुप्ता
स्टार: 2.5

5 वर्षों बाद ऐश्वर्या राय बच्चन ने रुपहले पर्दे पर अपनी वापसी के निर्देशक संजय गुप्ता को चुना है जिनकी अधिकांश फिल्मों में कहानी से ज़्यादा तकनीक को महत्व दिया जाता है। ‘जज़्बा’ दक्षिण कोरियाई फिल्म ‘सेवन डेज’ का हिंदी रीमेक है। इधर पश्चिम की नक़ल करते-करते हमारे निर्माता-निर्देशक अब कोरियाई और ईरानी फिल्मों का रीमेक बना रहे हैं गोयाकि पश्चिम की नक़ल के सारे दरवाजे अब बंद हो चुके हैं और इन दोनों देश में उत्कृष्ट श्रेणी का सिनेमा बन रहा है। संजय गुप्ता ने ‘सेवन डेज’ का चयन तो ठीक किया है लेकिन उसका भारतीयकरण करने के चक्कर में फिल्म को रंगहीन कर दिया है। पर्दे पर अजीब से रंगों की अधिकता कहानी में झोल पैदा करती है। हालांकि कहीं-कहीं ‘जज़्बा’ उत्सुकता पैदा करती है मगर यह क्षणिक ही है।

कहानी: एडवोकेट अनुराधा वर्मा (ऐश्वर्या राय बच्चन) कभी कोई केस नहीं हारी हैं। यहां तक की अपराधियों के केस लड़ने से भी उन्हें कोई परहेज नहीं है। उनकी यही काबिलियत उनपर भारी पड़ती है जब एक बलात्कारी और हत्या के मुजरिम (चंदन रॉय सान्याल) को फांसी से बचाने के लिए उनकी बेटी को किडनैप कर लिया जाता है और उन पर उसका केस लड़ने का दबाव बनाया जाता है। अनुराधा की मदद उनका बचपन का दोस्त योहान (इरफ़ान खान) करता है जो सस्पेंडेड पुलिस अफसर है और मन ही मन अनुराधा को चाहता है। फिल्म की कहानी इसी ट्रेक पर आगे बढ़ती है और कई किरदारों से जुड़ने से केस पेचीदा हो जाता है। एक तरफ अनुराधा की बेटी की जिंदगी है तो दूसरी ओर बलात्कार और हत्या की शिकार लड़की की मां (शबाना आज़मी) है, जिसके खूनी को बचाने का प्रयास कर रही है अनुराधा। दोनों की अपनी मजबूरियां और दुःख हैं। आगे क्या होगा जैसे प्रश्न के लिए आपको सिनेमाघरों का रुख करना होगा।

निर्देशन: संजय गुप्ता ने एक बार फिर कहानी तो अच्छी चुनी पर भटकाव से नहीं बच पाए। फिल्म का अंत चौंकाता है पर तब तक दर्शकों के सब्र का इम्तिहान ले चुके होते हैं संजय गुप्ता। फिल्म के माध्यम से उन्होंने देश में बलात्कार के आंकड़े दिए हैं जो सभ्य समाज पर करारा तमाचा हैं। संजय गुप्ता ने फिल्म की गति काफी तेज रखी है और शायद यही वजह है कि वे दर्शकों को कहानी से नहीं जोड़ पाते। फिर जिस तरह फिल्म को ऐश्वर्या की कमबैक फिल्म कहा गया, उससे भी संजय गुप्ता नेपथ्य में चले गए और उन्होंने कहानी की बजाए ऐश्वर्या पर ध्यान केंद्रित कर दिया। वहीं फिल्म में गानों की गुंजाइश नहीं थी और संजय गुप्ता ने इसका ध्यान भी रखा है। फिर भी ‘बादशाह सिंह’ का रैप ज़बरदस्ती ठूसा गया सा लगता है।

अभिनय: ‘जज़्बा’ को ऐश्वर्या राय बच्चन की वापसी बताकर प्रचारित किया जा रहा है और उनके हाव-भाव की परिपक्वता भी ऐसा संदेश देती है किन्तु कई दृश्यों में ऐश्वर्या राय बच्चन अतिरेक का शिकार हुई हैं। मसलन, एक मां के अंदरूनी दर्द को उन्होंने चीखों द्वारा प्रस्तुत किया है जो आसानी से नहीं पचता। वहीं ऐश्वर्या के बहाने कामकाजी महिलाओं की स्थिति और कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दे उठाकर निर्देशक ने प्रभाव उत्पन्न करने की कोशिश की है मगर यहां भी ऐश्वर्या चूकती नज़र आती हैं। इरफ़ान खान का किरदार होंठों पर मुस्कान के साथ ही संतुष्टि के भाव लाता है। इस माह लगातार दो हफ्ते इरफ़ान (तलवार और जज़्बा) का छा जाना उनकी काबलियत को बयां करता है। सिद्धार्थ कपूर अपने पिता शक्ति कपूर की याद दिलाते हैं मगर उनतक पहुंचना फिलहाल सिद्धार्थ के लिए दूर की कौड़ी है। जैकी श्रॉफ का अभिनय औसत है जबकि शबाना आज़मी ने चौंकाया है। बाकी कलाकार भीड़ का हिस्सा हैं।

सारांश: यदि आप अति-भावुक व्यक्ति हैं, ऐश्वर्या राय बच्चन के डाई हार्ड फैन हैं, पर्दे पर रंगों की अधिकता से परहेज नहीं है और इरफ़ान खान के डायलॉग सिनेमाहॉल में सुन्ना चाहते हैं तो इस जज़्बे को जब्त कर सकते हैं। अन्यथा अपने सब्र का इम्तिहान बड़े पर्दे पर लेने की बजाए घर पर लें और फिल्म के टीवी पर आने का इंतजार करें।

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