लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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beefडा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

दादरी में अख़लाक़ की हत्या की निन्दनीय घटना के पीछे का सच क्या है , यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा लेकिन यदि यह मान भी लिया जाये कि वह अपने घर में सचमुच ही गोमांस पका रहा था , तब भी किसी को उसे मारने का हक़ नहीं था । लेकिन दादरी की इस दुखद घटना के बाद जिस प्रकार देश भर में बहस चल रही है , वह सचमुच आश्चर्यचकित करने वाली है । होना तो यह चाहिए था कि सभी राजनैतिक दल एक स्वर से इस अमानुषिक हत्या कि निन्दा करते और बहस इस बात को लेकर करते कि भीड़ द्वारा क़ानून अपने हाथ में ले लेने की बढ़ती जा रही है घटनाओं को कैसे रोका जाये । लेकिन बहस इस बात को लेकर हो रही है कि गोमांस खाना चाहिए या नहीं । अपने आप को देश के प्राचीन इतिहास का ज्ञाता होने का दावा करने वाले , चार पाँच बुज़ुर्ग इतिहासकारों के एक प्रतिनिधि ने तो अंग्रेज़ी भाषा में बाक़ायदा एक लम्बा लेख प्रकाशित करवाया जिसमें बड़ी मेहनत से यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि हिन्दुस्तान के लोग प्राचीन काल में किस प्रकार चाव से माँस खाया करते थे और बैल के माँस का तो कहना ही क्या । वैसे तो ये बुज़ुर्ग इतिहासकार अपने सारे काम धाम छोड़ कर अरसे से यही स्थापित करने में लगे हैं कि प्राचीन काल में यहाँ के लोग गोमांस खाते थे । लेकिन जब  देश में गो हत्या को लेकर कोई झगड़ा हो जाता है , तो इनकी उछल कूद देखते ही बनती है । कचहरियों के प्रोफ़ेशनल गवाहों की तरह इनको तुरन्त गवाही के लिये बुलाया जाता है । इस बार किसी ने नहीं बुलाया तो इनमें से एक दो ने स्वयं ही आसपास घूमना शुरु कर दिया कि शायद आबाज पड़ जाये । इनकी ज़िद को देखते हुये सदा यह ख़तरा बना रहता है कि प्राचीन काल में गोमांस खाने के काल खंड  को इक्कीसवीं सदी में भी प्रासांगिक सिद्ध करने वाले ये बुज़ुर्ग इतिहासकार कहीं प्रतिक्रिया में इससे भी पीछे के ऐतिहासिक कालखंड में न चले जायें । तब ये यह सिद्ध तरने में लग जायेंगे कि उससे भी पहले के कालखंड में हिन्दुस्तान के लोग जंगलों में जानवरों की तरह नंगे रहते थे और जानवरों की तरह ही शिकार करते थे । ज़ाहिर है कि तब ये इतिहासकार नंगे रहने की उस परम्परा के अनुरूप इक्कीसवीं सदी में भी नंगे रहने की ज़िद करने लग सकते हैं  । ये लोग उन लोगों से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं जिन्होंने अख़लाक़ को मारा । ये अपराधियों को उनके कृत्य का वैचारिक आधार प्रदान करते हैं । जिस प्रकार एक विश्वविद्यालय में पिछले दिनों गोमांस भक्षण का बाक़ायदा एक उत्सव मनाया गया , संभव है ,उसी प्रकार नंगे रहने का सार्वजनिक उत्सव भी मनाए जाने की ज़िद होने लगे ।

लेकिन ताज्जुब है कि इखलाक की हत्या किस प्रकार की मानसिकता में हुई , इसकी चिन्ता किसी को नहीं है , उसकी क़ब्र पर रुदाली रुदन करके किस प्रकार राजनीति की रोटियाँ सेंकी जा सकती हैं , उसका नंगा प्रदर्शन हो रहा है । यह घोषणाएँ करने की होड़ लगी हुई है कि मैं भी गोमांस खाता हूँ । यहाँ तक की लालू प्रसाद यादव भी इस प्रतियोगिता में कूद पड़े । वे यह तो नहीं कह सकते थे कि मैं भी गोमांस खाता हूँ , क्योंकि सब जानते हैं कि वे ऐसा नहीं करते । इसलिए उनका झूठ पकड़ में ही नहीं आ जाता बल्कि वे हँसी के पात्र भी बनते । ( वैसे तो अब भी बनते ही रहते हैं) इसलिए इस बहस में उन्होंने यह कह कर छलाँग लगाई कि हिन्दू भी गोमांस खाते हैं । लेकिन वे यहीं तक नहीं रुके । आगे उन्होंने यह भी बताया कि गोमांस और बकरी के माँस में कोई अन्तर नहीं हैं । वैसे जब वे विभिन्न प्रकार के माँसों का परीक्षण कर ही रहे थे , तब यह भी कह सकते थे कि गोमांस , बकरी के माँस और आदमी के माँस में भी कोई अन्तर नहीं हैं । अपनी बात को पुख़्ता करने के लिये नर माँस भक्षण के लिये हुये निठारी कांड का उदाहरण भी दे ही सकते थे । उत्तर प्रदेश के एक मंत्री आज़म खान इससे भी एक क़दम आगे बढ़ गये । उनका तर्क सीधा था कि अब तो इस देश में गोमांस खाना मुश्किल हो गया है । स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि यदि कोई मुसलमान अपने घर में भी गोमांस खाता है तो लोग जाकर उसे मार देते हैं । इसलिए यह देश एक प्रकार से हिन्दू राष्ट्र बन गया है और अब यहाँ के मुसलमानों का क्या होगा ? अपनी यह चिन्ता वे टैलीविजन चैनलों पर आकर व्यक्त कर रहे हैं । पुराना ज़माना होता तो वे अपनी यह चिन्ता अंग्रेज़ बहादुर के पास जाकर व्यक्त करते , जैसे मोहम्मद अली जिन्ना किया करते थे । लेकिन आज़म खान के दुर्भाग्य से अंग्रेज़ बहादुर को इस मुल्क से गये लगभग सात दशक हो गये हैं और वायसराय भवन भी राष्ट्रपति भवन बन गया है । लेकिन लगता है आज़म खान भी जिन्ना की तरह ज़िद्दी हैं । उन्होंने अमेरिका में स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ को लम्बी चिट्ठी लिख दी है कि अब इस देश में मुसलमानों का क्या होगा ? साथ ही संघ के सचिव से व्यक्तिगत रुप से मिलने का समय भी माँगा है । ख़ुद जाकर उन्हें सारी स्थिति समझाना चाहते हैं । अब आज़म खान उत्तर प्रदेश में मंत्री हैं । लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि संघ के सचिव से मिलने के इस कार्यक्रम को भी वे आफिशियल ड्यूटी ही मानेंगे या व्यक्तिगत कार्य ? वैसे आज़म खान को पता होना चाहिये कि हिन्दोस्तान के मुसलमान गो माँस नहीं खाते । यह उनकी परम्परा या भोजन शैली का हिस्सा नहीं है । वे इसी देश के रहने वाले हैं । वे अरब , इरान या अफ़ग़ानिस्तान से नहीं आये हैं । उनकी विरासत इस देश की विरासत है । उन्होंने केवल अपना मज़हब या पूजा करने  का तरीक़ा बदला है , अपने पुरखे ,परम्परा या विरासत नहीं । पर इससे क्या होता है । यह बात तो जिन्ना भी जानते थे । जिन्ना अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये इस देश के मुसलमानों को इस देश की परम्परा से काटना चाहते थे । अब यही काम आज़म खान करना चाहते हैं । जिन्ना को अपने काम में अंग्रेज़ बहादुर की सरकार से मदद मिलती थी । यही मदद माँगने के लिये आज़म खान संयुक्त राष्ट्र संघ जाना चाहते हैं ।

जम्मू कश्मीर विधान सभा के एक सदस्य रशीद ने तो विधान सभा होस्टल में ही गोमांस की फीस्ट बाक़ायदा इसकी घोषणा करके दी । उनका कहना था कि देश के उच्चतम न्यायालय ने जम्मू कश्मीर के निवासियों को गोमांस के बारे में अनुमति प्रदान कर दी है । दरअसल जम्मू कश्मीर राज्य की दंड संहिता में ही गो हत्या पर सज़ा का प्रावधान है । पिछले दिनों प्रदेश के उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि इस प्रावधान का ज़मीनी तौर पर पालन भी सुनिश्चित किया जाये । इसको चुनौती देते हुये कुछ लोग उच्चतम न्यायालय में चले गये । उस न्यायालय ने इस निर्णय को फ़िलहाल स्थगित कर दिया । उसका लाभ उठाते हुये रशीद मियाँ ने गोमांस भक्षण की पार्टी ही आयोजित कर दी , वह भी विधान सभा सदस्यों के आवास स्थान पर । कश्मीर घाटी के लोग आम तौर पर गोमांस नहीं खाते । वह उनकी जीवन शैली का हिस्सा नहीं है । लेकिन रशीद का उद्देष्य माँस को लेकर तो था नहीं । उनका उद्देष्य घाटी के अल्पसंख्यकों को केवल चुनौती देना है । इस प्रकार की साम्प्रदायिक मनोवृत्ति की निन्दा की जानी चाहिये । रशीद मियाँ ने यहीं बस नहीं किया बल्कि विधान सभा के अन्दर भी अपनी इस बहादुरी के क़िस्से सुनाने लगे । ख़बरें छपी हैं कि उत्तेजना में किसी विधायक ने वहाँ रशीद को थप्पड़ भी रसीद किया ।

एक सज्जन या सजनी खुले आम यह चिल्लाते हुये घूम रहे हैं कि मैं भी गोमांस खाता या खाती हूँ , मुझे भी मारो । केरल के एक कालिज में कुछ तथाकथित प्रगतिवादियों ने तो गोमांस की फीस्ट ही आयोजित कर डाली । यह देश का साम्प्रदायिक वातावरण ख़राब करने की गहरी चाल दिखाई देती है ।  अख़लाक़ की लाश को आगे करके खेला जा रहा भारतीय राजनीति का यह बहुत ही घिनौना खेल है । इसकी जितनी निन्दा की जाये उतना ही कम है । राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने ठीक ही चेताया है कि लोग भारतीय मूल्यों और परम्पराओं को न भूलें और इस देश को भारत ही बना रहने दें । उनकी चिन्ता जायज़ है और उन्होंने ठीक समय पर इसका इज़हार भी किया है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने और भी सटीक कहा कि लोग इन नेताओं की बात न सुन कर राष्ट्रपति की आवाज़ सुनें । मोदी के अनुसार राष्ट्रपति का सुझाया हुआ रास्ता ही भारत का रास्ता है । वही सही रास्ता है । गोमांस को लेकर जन भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिये ।

 

 

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