लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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quran-islamic-terrorism-jihadप्रमोद भार्गव
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में आतंकवाद की जो घंटी बजी है,उसे भारत को खतरे की घंटी के रूप में लेने की जरूरत है। ढाका के जिस ‘स्पेनिश होली आर्टीजन रेस्त्रां‘ में हमला हुआ है, वह उच्च सुरक्षित क्षेत्र में आता है। यह राजनयिकों और अन्य विदेशी प्रवासियों व सैलानियों का पसंदीदा रेस्त्रां है। सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम होने के बावजूद इस्लामिक स्टेट के हाथियारबंद आतंकी इस रेस्त्रां में बेधड़क घुसे चले गए और रेस्त्रां को अपने कब्जे में लेकर वहां मौजूद ग्राहकों व रेस्त्रां कर्मचारियों को बंधक बना लिया। बाद में एक-एक करके 20 विदेशी नागरिकों की निर्ममतापूर्वक गला रेतकर हत्या कर दी। इन बद्नसीबों में भारतीय मूल की 18 वर्षीय तारिषी जैन नाम की किशोरी भी थी, जिसका गला रेता गया। आतंक के शिकार हुए अन्य लोगों में से ज्यादातर इटली और जापान के हैं। 30 लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं। 34 देशों के दूतावासों से गुलशन रहने वाले इस इलाके में अब जो सन्नाटा पसरा है, वह बात की तस्दीक है कि बांग्लादेश में आतंकी कहीं भी आसानी से कहर ढा सकते हैं।
बांग्लादेश में एक के बाद एक जिस तरह की आतंकवाद से जुड़ी वारदातें सामने आई हैं, उनका सबसे ज्यादा सबक भारत को लेने की जरूरत है। पूरे बांग्लादेश में करीब दो साल से नरमपंथी लोगों और धार्मिक अल्पसंख्यकों की अकारण हत्याओं का सिलसिला जारी है। यहां तक की धर्मनिरपेक्ष ब्लाॅगरों को भी नहीं बख्शा जा रहा है। हिंदू, बौद्ध और ईसाई धर्मावलंबियों के धर्मगुरूओं की हत्या का सुनियोजित ढंग से सिलसिला बना हुआ है। एक तरफ जब आतंकवादियों के गिरोह ने रेस्त्रां में ग्राहकों को बंधक बनाया हुआ था, वहीं दूसरी तरफ इसी समय झेनईदाह जिले के श्रीश्री राधागोविंद मंदिर के पुजारी श्यामानंदो दास पर धारदार हथियार से हमला हुआ। अस्पताल ले जाने पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। दास पर हमला तब किया गया, जब वे प्रातःकाल पूजा के फूल चुनने मंदिर की फुलवारी में जा रहे थे। दास की गला रेत कर हत्या की गई थी। इस घटना के ठीक एक दिन पहले सताखिरा जिले में भी एक पुजारी की हत्या की गई थी। इसी साल फरवरी में भी एक और पुजारी की हत्या हुई थी। रेस्त्रां पर हुए हमले के दो दिन पहले एक ईसाई कारोबारी की भी गला रेतकर हत्या की गई है। एक प्राध्यापक और कट्टरवादियों के खिलाफ लिखने वाले करीब एक दर्जन चिट्ठा लेखकों की हत्याएं भी हुई हैं। इन हमलों की जिम्मेबारी आईएस और अलकायदा ने ली है। आतंकवादी संगठन हूजी भी यहां सक्रिय है। रेस्त्रां के हमलावर आतंकियों को मार गिराने के बाद बांग्लादेश के पुलिस प्रमुख ने दावा किया है कि मारे गए सभी आतंकी बांग्लादेश के नागरिक थे। हालांकि अब तक बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार, उक्त आतंकवादी संगठनों का वजूद देश में होने से नकारती रही है। आईएस, अलकायदा, जैष-ए-मोहम्मद जैसे विदेशी आतंकी संगठनों के प्रभाव को भी सरकार नजरअंदाज करती रही है। अलबत्ता जो भी अल्पसंख्यकों पर आतंकी हमले हुए, उन्हें घरेलू जिहादी घटना करार जरूर देती रही हैं। हालांकि यही वे घरेलू जिहादी थे, जो लेखक,शिक्षक, विचारक और हिंदू पुजारियों की हत्या आतंकी संगठनों की वैचारिक पूंजी से प्रेरणा लेकर कर रहे थे।
अब रेस्त्रां पर हमले की जिम्मेबारी आईएस द्वारा लेने के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने देश से आतंकवाद और हिसंक चरमपंथ का खात्मा करने का संकल्प लेते हुए कहा है, ‘ये लोग किस तरह के मुसलमान हैं, जो रमजान में बेगुनाहों को मार रहे हैं। जिस तरह से आतंकियों ने निर्दोष लोगों की हत्या की है, वह कतई बर्दाश्त के योग्य नहीं है। उनका कोई धर्म नहीं है। सिर्फ आतंकवाद और हिंसा ही उनका धर्म है।‘ हालांकि बांग्लादेश द्वारा देश में आतंकवाद के प्रभाव को नहीं स्वीकारने के बावजूद अर्से से सरकार को भारत समेत अन्य देशों की खुफिया एजेंसियां यह आगाह कर रही थीं कि बांग्लादेश की धरती पर सक्रिय आतंकी संगठन कभी भी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं। अब अत्यंत सुरक्षित विदेशी दूतावास क्षेत्र में आतंकी कत्लेआम रचकर आतंकी यह पैगाम देने में सफल हो गए हैं कि बांग्लादेश में उनकी जबरदश्त मौजदूगी है। बहरहाल अब तक बांग्लादेश में पैर पसार रहे आतंकवाद की आहट सरकार और उसकी गुप्तचर संस्थाओं को सुनाई नहीं देना इस बात कि तस्दीक है कि वह इस गंभीर संकट के प्रति बेपराह रही है। इस खूनी खेल के बाद अब बांग्लादेश को सचेत होने की जरूरत है।
ढाका का यह हमला जितनी बड़ी चेतावनी बांग्लादेश के लिए है, उससे बड़ी चेतावनी भारत के लिए भी हैं। अभी तक पाकिस्तान भारत के लिए आतंक का पर्याय था, लेकिन अब यही स्थिति बांग्लादेश में भी बन सकती है। लिहाजा पूर्वी सीमा पर इस आतंक ने भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। हालांकि आईएस अपनी आॅनलाइन पत्रिका ‘दबिक‘ के मार्फत पहले ही अंतरराष्ट्रिय स्तर पर यह ऐलान कर चुका है कि उसका एक हिस्सा बांग्लादेश में सक्रिय है। वह चाहता है कि भारत और बांग्लादेश में ‘शरिया शासन‘ स्थापित हो। इस नजरिए से आईएस ने अपनी विद्रूप व हिंसक मंशा को आगे बढ़ाते हुए शेख अबु इब्राहिम अल हनाफी को बांग्लादेश का अमीर, मसलन नेतृत्व का प्रमुख भी घोषित कर दिया है। दबिक में छपे अबू के एक साक्षात्कार में अबू ने कहा है, ‘ शेख हसीना की सरकार भारत की पिट्ठू है और भारत की खुफिया एजेंसी ‘राॅ‘ हसीना की मदद कर रही है, ताकि उसकी सूचना पर जिहादी मार गिरा दिए जाएं।‘ इसी साक्षात्कार में अबू ने यह दावा भी किया है कि वह बांग्लादेश में जब तक हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों का आमूलचूल सफाया नहीं हो जाता, तब तक वारदातों को अंजाम देते रहेंगे। यह दावा इसलिए किया गया है, जिससे बांग्लादेश के मुस्लिमों का ध्रुवीकरण हो और वहां के लोग अन्य धार्मिक समुदायों के खिलाफ खड़े हो जाएं।
बांग्लादेश के ढाका में घटी भयावह घटना को जिस मकसद से अंजाम दिया गया है, उस लिहाज से यदि स्थानीय सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कड़ाई से पेश नहीं आती है तो सच भी साबित हो सकती है। वैसे भी धार्मिक भेद और आतंकी वारदातों के चलते बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या लगातार घट रही है। वर्तमान में बांग्लादेश में हिंदुओं की कुल आबादी एक करोड़ 70 लाख हैं। जो कुल आबादी का 10.7 प्रतिशत हैं। जबकि भारत के बंटवारे के बाद 1951 में यहां हिंदुओं की आाबादी 22 फीसदी थी। 1971 में स्वतंत्र बांग्लादेश बनने के बाद 1974 में हुई जनगणना के मुताबिक यहां हिंदुओं की आबादी घटकर 14 प्रतिशत रह गई हैं। साफ है, पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश में भी हिंदुओं की आबादी धार्मिक भेद के चलते लगातार घट रही हैं।
इस घटना में भारतीय मूल के कपड़ा व्यापारी संजीव जैन की बेटी तारिषी की जिस तरह से हत्या हुई है, उससे बांग्लदेश में हिंदुओं का भयभीत होकर पलायन को मजबूर होना स्वाभाविक है। हालांकि दुनियाभर के मस्लिम देशों में एक शेख हसीना ही ऐसी इकलौती प्रधानमंत्री हैं, जो इस्लामिक चरमपंथियों का पूरी ताकत से मुकाबला कर रही हैं। इस घटना के तत्कालबाद 12,000 चरमवंथियों को हिरासत में ले लिया गया है। पुलिस ने सीधी मुठभेड़ में भी अनेक कट्टरपंथियों को मारा भी है। लेकिन बांग्लादेश एक छोटा देश है। उसकी सामरिक व आर्थिक सीमाएं हैं। बावजूद वह आईएस, अलकायदा और हूजी के नए-नए वजूद में आ रहे अनुयायी समूहों से जूझ रहा है। लेकिन अंकुश लगाना मुश्किल हो रहा है, इसलिए भारत समेत इस्लामिक कट्टरपंथ से लड़ रहे देशों को जरूरत है कि आईएस जैसा खूंखार आतंकी संगठन बांग्लादेश में अपनी जड़ें मजबूत करे, उससे पहले उसे नेस्तनाबूद करने के लिए कमर कसने की जरूरत है।
भारत के लिए पूरब में उपजा यह खतरा, इसलिए भी बड़ा संकट है, क्योंकि भारत के पूर्वोत्तर के राज्य बहुत पहले से ही बांग्लादेश से अवांछित तत्वों और आतंकियों की घुसपैठ से दो चार हो रहे हैं। इन घुसपैठियों की संख्या चार करोड़ से भी ऊपर बताई जाती है। असम, माणिपुर, मेघालय अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम में तो इनकी संख्या इतनी बढ़ गई है कि इन्होंने यहां के मूलनिवासियों के जनसंख्यात्मक घनत्व तक को बिगाड़ दिया है। इन राज्यों में पनपा उग्रवाद इसी घुसपैठ की प्रमुख वजह है। इनमें ज्यादातर लोगों ने आसानी से राशन व आधार कार्ड बनाकर भारत की नागरिकता भी हासिल कर ली है। इस कारण ये मतदाता बनकर चुनाव को भी प्रभावित करने लगे हैं। असम की अपदस्थ तरुण गेगाई सरकार वोट बैंक की राजनीति के चलते घुसपैठियों के समर्थन में रही है। साफ है, बांग्लादेश की सीमा पर भारत की बाहरी व आंतरिक सुरक्षा व खुफिया तंत्र मजबूत नहीं हैं। आईएस और अलकायदा अपने मंसूबों की पूर्ति के लिए भारत में नागरिकता हासिल किए बैठे घुसपैठियों को बहला-फुसलाकर आतंक का पाठ पढ़ा सकता है। कालांतर में इस स्थिति का निर्माण होता है तो ढाका का आतंकी हमला वाकई भारत के लिए बड़े खतरे की घंटी साबित होगा। लिहाजा, इस आतंकी घंटी की आवाज से सबसे ज्यादा भारत को चौकन्ना होने की जरूरत है।

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